Sunday, May 24, 2009

ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हार है


बीजेपी के देश भर में तेजी से घटे ग्राफ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली टिप्पणी आई- बीजेपी को बेहतर करना है तो, अपना चेहरा बदलना होगा। ये टिप्पणी कुछ वैसी ही मिलती-जुलती है जैसे दो साल पहले उत्तर प्रदेश में मायावती को पूर्ण बहुमत और बीजेपी को पहले से भी कम सीटें मिलने पर RSS के मुख्यपत्र ऑर्गनाइजर में कहा गया कि बीजेपी ने आधे मन से हिंदुत्व का रास्ता अपना लिया। और, मायावती ने इंदिरा गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व के फॉर्मूले से चुनाव जीत लिया। अब दो साल बाद भी RSS की ओर से वैसी ही टिप्पणी पर तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस कहावत से भी गई गुजरी लगती है। संघ ने तब भी नहीं माना था कि यूपी के जातियों में बंटे धरातल पर संघ के विचार फेल हुए हैं। और, इस तरह से सच्चाई से आंखें मूदने से RSS के और कमजोर होने का रास्ता बन रहा है।


लोकसभा चुनाव 2009 में बीजेपी की इस तरह की हार के बाद बीजेपी का असली चेहरा माने जाने वाले आडवाणी की राजनीतिक करियर भी खत्म हो गया। इस हार को समझने के लिए सबसे पहले उत्तर प्रदेश में 2007 विधानसभा और 2009 लोकसभा तक जो परिवर्तन हुए हैं उनको समझना होगा। उत्तर प्रदेश ही वो राज्य था जहां से कांग्रेस गायब हुई थी और उस जगह को बीजेपी ने काफी समय तक थामे रखा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के उत्थान की वजह जो लोग सिर्फ राममंदिर आंदोलन को मानते हैं वो, शायद थोड़ी गलती करते हैं।


दरअसल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के स्थान पर आई बीजेपी - ये परिवर्तन कुछ वैसा ही परिवर्तन है जैसा यूपी में कांग्रेस के खिलाफ 1984 के बाद हुआ था। 1984 में भी इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति की लहर न आई होती तो, शायद कांग्रेस को चेतने का समय मिल जाता। लेकिन, 1984 में कांग्रेस को बहुमत मिल गया तो, गदगद कांग्रेसी टिनोपाल लगा कुर्ता पहनकर मंचों पर गला साफ करने में जुट गए। उत्तर प्रदेश की अंदर ही अंदर बदलती जनता का कांग्रेसियों को अंदाजा ही नहीं लग रहा था। इसका सही-सही अंदाजा RSS को लग रहा था। वजह ये थी कि कांग्रेसी नेता मंचों पर थे -- बरसों की विरासत के साथ और RSS लोगों के पास जमीन में जुटकर काम कर रहा था।


कांग्रेसी नेताओं से ऊबी जनता को राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान के नाम पर संघ ने अपनी विचारधारा से लोगों को जोड़ने की सफल कोशिश की। साथ ही पिछड़ी-दबी-कुचली जातियों को साथ लेकर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की। कोशिश काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, मंडल आंदोलन ने RSS और बीजेपी की काम बिगाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, 1989 में RSS-बीजेपी ने समय की नजाकत समझी और मंडल-कमंडल का गठबंधन हो गया। दोनों को फायदा हुआ लोकसभा में जनता दल को 143 सीटें मिलीं और बीजेपी को 89। बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि थी 1984 में सिर्फ दो संसद सदस्यों वाली पार्टी के पास लोकसभा में 89 सांसद हो गए थे। RSS की राजनीतिक शाखा उत्थान पर थी आगे संघ के प्रिय आडवाणीजी की रथयात्रा निकली और पार्टी और आगे पहुंच गई 1991 में अयोध्या (भगवान राम) ने बीजेपी को 119 सीटें दिला दीं।


बीजेपी उत्तर प्रदेश और पूरे देश में जम चुकी थी। कई राज्यों में सरकारें भी बन गई थीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की मेहनत काफी हद तक काम पूरा कर चुकी थी। 1999 में एक स्वयंसेवक के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद बचाखुचा काम भी पूरा हो गया। बस यहीं से बीजेपी के कांग्रेस बनने की शुरुआत हो गई। अब RSS ने बीजेपी से अखबारों-टीवी चैनलों की बहसों में किनारा करना शुरू कर दिया। स्वेदशी जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ के सभी अनुषांगिक संगठन बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग मुद्दों पर बीजेपी के खिलाफ नारा लगाने लगे थे। अब बीजेपी-RSS को ये पता नहीं लग पा रहा था
कि अंदर-अंदर जनता कैसे बदल रही है। पता तब लगा जब इंडिया शाइनिंग का नारा फ्लॉप हुआ और कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सत्ता में आ गई।


2004 में यूपीए का सत्ता में आना महज संयोग भर था। बीजेपी, कांग्रेस से बस थोड़ा ही पीछे थी। लेकिन, 2009 में कांग्रेस यूपीए के 262 में से 201 सांसद लेकर आई है। और, इस 201 के आंकड़े के पीछे उत्तर प्रदेश ही है जहां राहुल गांधी ने 2007 के विधानसभा में प्रत्याशी खड़ करते समय ही कह दिया था कि ये तैयारी हम 2009 लोकसभा और 2012 की विधानसभा की कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए ऊसर-बंजर कही जा रही सीटों पर भी राहुल ने नए कांग्रेसियों को टिकट बांटा। राहुल ने ही समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ को नकार दिया। गठजोड़ होता तो इतनी सीटें तो, सपा जीतती ही नहीं। और, जितनी जीतती उसका ज्यादा फायदा सपा को ही होता।


कांग्रेस देश भर में राष्ट्रीय पार्टी की तरह व्यवहार कर रही थी। बीजेपी NDA के सहयोगियों की गिनती बढ़ाने में लगी थी। 2007 विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ तो, भी RSS, बीजेपी के साथ कहीं नहीं दिख रहा था। बीजेपी का व्यवहार लोगों में ये भ्रम पैदा कर रहा था कि कहीं बीजेपी-समाजवादी पार्टी का कहीं अंदर ही अंदर कोई समझौता तो नहीं हो गया है। और, मायावती दहाड़ रही थी- मेरे सत्ता में आने के बाद गुंडे या तो जेल में होंगे या प्रदेश से बाहर। बचे-खुचे संघ के स्वयंसेवक भी बहनजी के कार्यकाल को मुलायम से बेहतर बता रहे थे। 2009 का लोकसभा का चुनाव शुरू हुआ तो, बीजेपी का बचा-खुचा कैडर वोटर भी पलट गया था। कैडर वोटर जाति के लिहाज से कहीं हाथी और जहां हाथी नहीं मिला वहां हाथ का साथ थाम लिया। क्योंकि, वो सपा के साथ नहीं जाना चाहता था। 2 साल में ही मायावती के साथ गुंडों की ऐसी फौज खड़ी हो गई कि उत्तर प्रदेश की जनता को लगाकि हाथी से जो आगे निकले उसी को वोट दो। न बीजेपी विधानसभा चुनाव में मुलायम के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठा पाई थी न लोकसभा चुनाव में मायावती के खिलाफ बने माहौल का।


खैर, संघ-बीजेपी के इस तरह फेल होने से असली संघी आडवाणी की राजनीतिक पारी खत्म हो गई और इसी के साथ सबसे बड़ा संकट ये खड़ा हो गया है कि बीजेपी में एक तथाकथित दूसरी पांत है जो, सब ही पहली पांत में आना चाहते हैं। लेकिन, उनके पीछे के नेता और उससे नीचे कार्यकर्ताओं की कड़ी बनाने वाला कोई है ही नहीं। वजह भी साफ है संघ के ज्यादातर दिग्गज अब बीजेपी में हैं और संघ को ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अब एजेंडा तय करने का काम संघ नहीं बीजेपी के ऊपर छोड़ देना चाहिए। लेकिन, मुश्किल वही कि एजेंडा तय करने वाले बीजेपी के नेता अब मंचों पर हैं और जमीन पर काम करने वाले बचे-खुचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक स्वयंसेवा में लग गए हैं। कोई ऐसा प्रेरणा देने वाला नेता भी उन्हें नजर नहीं आ रहा है।


संघ की शाखाओं में आने वाले हर जगह घटे हैं। हाल ये है कि कई जगह शाखाएं बंद हो गई हैं और जहां चल रही हैं वहां बहुत सी शाखाओं में मुख्य शिक्षक के अलावा ध्वज प्रणाम लेने वाले भी मुश्किल से ही मिल रहे थे। वजह ये नहीं थी कि लोगों को संघ की विचारधारा अचानक इतनी बुरी लगने लगी थी कि वो शाखा नहीं जाना चाहते। वजह ये कि उन्हें ये दिख रहा था कि उन्हें शाखा से निकालकर बीजेपी विधायक सांसद के चुनाव में पर्ची काटने पर लगाने वाले RSS के प्रचारक सत्ता-सरकार बनाने बिगाड़ने की दौड़ को ही अपना अंतिम लक्ष्य मान बैठे हैं।


1991 से कमल निशान पर ही वोट डालता आ रहा पक्का संघी वोटर भी 2007 में पलट गया और इलाहाबाद की शहर उत्तरी जैसी सीट से भी कमल गायब हो गया, हाथ का साथ लोगों ने थाम लिया था। ये वो सीट थी जहां हर दूसरे पार्क में 2000 तक शाखा लगती थी और हर मोहल्ले में दस घर ऐसे होते थे जहां हफ्ते में एक बार प्रचारक भोजन के लिए आते थे। अब सुविधाएं बढीं तो, प्रचारकों को स्वयंसेवकों के घर भोजन करने की जरूरत खत्म हो गई। और, इसी के साथ संघ का सीधे स्वयंसेवकों के साथ संपर्क भी खत्म हो गया। सीधे संपर्क का यही वो रास्ता था जिसके जरिए संघ ने राम मंदिर आंदोलन खड़ा किया था। ये एकदम सही नहीं है कि राम मंदिर आंदोलन खड़ा होने से संघ से लोग जुड़े। संघ-बीजेपी के लोग भी इस भ्रम में आ गए कि जयश्रीराम के नारे की वजह से ही लोग बीजेपी-संघ के साथ खड़े हो रहे हैं। जबकि, सच्चाई यही थी कि जब संघ के स्वयंसेवक लोगों के परिवार का हिस्सा बन गए थे, जब लोगों के निजी संपर्क में थे, जब उनके दुखदर्द परेशानी में उनके साथ खड़े थे तो, संघ का हर नारा बुलंद हुआ। लेकिन, जब संघ के लोग सत्ता के लोभी होने लगे। जब संघ की शाखाओं में सिर्फ टिकटार्थी और सत्ता से सुख पाने के लोभी ही बचे। जाति के समीकरण संघ के काम पर हावी हुए तो, संघ से लोग कटने लगे।


अब 5 सालों के लिए यूपीए सरकार सत्ता में आ गई है। कोई अड़चन 5 साल तक इस सरकार को नहीं होने वाली। कांग्रेस बदल गई है। राहुल जैसा नौजवान चेहरा मिल गया है। साथ में एक नए खून का संचार पूरी ही कांग्रेस में हो गया है। अब अगर संघ सचमुच चाहता है कि बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनावों और 2014 की लोकसभा में बेहतर करे तो, उसे लोगों से संपर्क जोड़ने होंगे और अपने मूल काम स्वयंसेवक तैयार करने पर ही जोर-शोर से लगना होगा। नेता तैयार करने का काम बीजेपी पर ही छोड़ देना ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि, अभी तो कुछ राज्यों में सत्ता है। नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह जैसे काम के प्रतीक मुख्यमंत्री हैं जो, राज्यों में विकास के नाम पर वोट जुटा पा रहे हैं। लेकिन, अगर संघ मूल काम से इस तरह हट गया तो, बीजेपी की हालत और खराब होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। क्योंकि, क्षेत्रीय पार्टियों की गंदी राजनीति से ऊबी जनता अगले कुछ सालों के लिए किसी राष्ट्रीय पार्टी पर ही भरोसा करने का मन बना चुकी है। जाहिर है इसका फायदा नौजवान कांग्रेस को होगा हर रोज थकती बीजेपी को नहीं।

11 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

हर्ष भाई! आप के इस विश्लेषण से बहुत से यथार्थ सामने आए हैं। अच्छा आलेख है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

संघ सुविधाभोगी हो गया है। भाजपा थकी हुई पार्टी है। आपका विश्लेषण सटीक है। पर विपक्ष में बैठने के अपने लाभ हैं - जो भाजपा को उठाने चाहियें।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

एक सत्य भाजपा इसलिए हार रही क्योकि संघ मर रहा है . जब बिजली घर खराब हो जाता है तब बल्ब नहीं जला करते .

mahashakti said...

आपकी पूरी पोस्‍ट को पढ़ा अच्‍छा लगा, आपकी बातो से सहमत भी हूँ। परन्‍तु आपने कहा कि यह संघ की हार है तो मै यह नही मानता।


अभी इसी चुनाव में राष्‍ट्रीय पार्टी की ओर जनता का रूझान गया है, 2007 तक यूपी में सपा और बसपा रही है। इस बार के चुनाव में काग्रेस को बहुत फायदा मुस्लिम बोटो के कारण हुआ है।

संघ पहले से बहुत बदल गया है, किन्‍तु गलत दिशा में, इस समय जरूरत है कि संघ सार्थक दिशा की ओर बदले जिससे युवा भी इससे जुड़ सके।

लोगो की मानसिकता ही यही रहा है कि जो संघ को जाना नही वो भी बोलने से पीछे नही रहता है। भाजपा आज एक अच्‍छे विपक्ष के रूप में सामने आये और आने वाले विस चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाये जैसे कर्नाटक, गुजराज और छत्‍तीसगंढ में है।।

SHASHI SINGH said...

कंफ्य्यूज्ड लोग हमेशा हाशिये पर ही जाते हैं... भाजपा भी वहीं गई।

विचारधारा के मामले में वामपंथियों की तरह भाजपा की भी एक अलग पहचान थी... उस पहचान पर उसने खुद ही चूना पोत दिया। बिना पहचान के भाजपा भी सत्ता भोग के खेल के एक खिलाड़ी की तरह दिखी।

और साहब, जब खेल सत्ता का ही खेलना है तो इतिहास गवाह है साम, दाम, दंड, भेद के हर कायदे कानून की जानकारी रखने वाली कांग्रेस से बेहतर सत्ता का खिलाड़ी इस देश में कोई दूसरा नहीं।

भाजपा को भाजपा बनना होगा या फिर वापस दो सीटों पार्टी बनने के लिये तैयार रहना होगा... माफ कीजियेगा... अब तो वो दो सीट निकालने वाले नेता भी नहीं रहे।

मोदी, रमन सिंह और चौहान जैसे नेताओं की दुहाई देने वाले समझ लें कि बात राष्ट्रीय पार्टी भाजपा की हो रही है न कि भाजपा (मोदी), भाजपा (रमन सिंह) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

लगता है, समय आ गया है कि काम किये बिना, बस गाल बजाने से नहीं चलेगा.
अब वोटर रेडी- स्टेडी से उकता गया है...वो बस go सुनना चाहता है.

Anil Pusadkar said...

संघ मे भी पंजा छाप संघी मिलने लगे हैं।

प्रदीप कुमार said...

sangh me kuch aise log aa gaye hai. allahabad me bhi jo pahle bjp ka garh tha wahana chaupat ho gai bjp

Natkhat said...

यूपी में कहते है की गुंडे चढ़ गए हाथी पर , गोली मारेंगे छाती पर. यही गुंडे कल तक साईकिल पर सवार थे. लिहाजा साईकिल पंचर हो गयी हाथी के महावत ध्वस्त हो गए. और नया खून काम कर गया.

Udan Tashtari said...

अच्छा विश्लेषात्मक आलेख.

डॉ. मनोज मिश्र said...

संभवतः आप सही हैं .

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