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Tuesday, July 05, 2011

तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Saturday, May 16, 2009

देखिए शायद यही गणित ठीक बैठ जाए

चुनाव नतीजे आने से पहले सर्वे-एक्जिट पोल का मौसम है। मैंने भी एक सर्वे कर डाला है। बस ऐसे ही कोई न तो सैंपल साइज है न तो मैं किसी राज्य में गया हूं। यहीं दिल्ली में बैठकर अपनी राजनीतिक समझ के आधार पर ये सर्वे किया। सर्वे क्या यूं कहें कि ये पूरी तरह अंदाजा भर है।


इसके लिहाज से कांग्रेस+ यानी UPA के कुल 199 सांसद बनते दिख रहे हैं। जिसमें कांग्रेस के साथ डीएमके, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और नेशनल कांफ्रेंस शामिल हैं।


BJP+ यानी NDA के कुल 180 सांसद बनते दिख रहे हैं। इसमें TRS के 5 सांसद जोड़ दें तो, ये संख्या 185 पहुंच जाती है।

तीसरे मोर्चे की बात करें यानी लेफ्ट पार्टियों के साथ जेडीएस, टीडीपी, जयललिता, बीएसपी, बीजू जनता दल को जोड़ें तो, ये बनते हैं 112।


और, यूपीए और तीसरे मोर्चे से टूटकर बने चौथे मोर्चे यानी लालू-मुलायम-पासवान की तिकड़ी की बात करें तो, इसे कुल 26 सीटें ही मिलती दिख रही हैं।


इन मोर्चों के अलावा दूसरी पार्टियों और अन्य को बीस के आसपास सीटें मिल सकती हैं। कुल मिलाकर सारा दम करीब 31 सीटें जीतने वाली मायावती और 20 के पास सीटें जीतने वाली जयललिता के गठजोड़ पर होगा। यही दोनों महिलाएं मिलकर तय करेंगी कि यूपीए की सरकार बनवाएं- एनडीए की या फिर इन दोनों में से किसी एक का समर्थन लेकर खुद ही दिल्ली की गद्दी संभालें।



उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सबसे ज्यादा 29 सीटें मायावती हथिया लेंगी। समाजावादी पार्टी के जिम्मे 19 सीटें लग सकती हैं। कांग्रेस-बीजेपी दोनों को फायदा हुआ है। कांग्रेस को 13 और बीजेपी को 16 सीटें मिल सकती हैं। बीजेपी की सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल को 3 सीटें मिल सकती हैं।



उत्तर प्रदेश से सटे बिहार की चालीस सीटों में नीतीश का डंका बज रहा है। वो, 19 सीटें झटक सकते हैं। सहयोगी बीजेपी को 10 सीटें मिल सकती हैं। लालू की पार्टी को 4 और पासवान की लोकजनशक्ति को 2 सीटों से ही संतोष करना पड़ सकता है जबकि, अकेले लड़ रही कांग्रेस को 5 सीटें मिल सकती हैं।



बात करते हैं स्विंग स्टेट यानी जहां की क्षेत्रीय पार्टियों को मिलने वाली सीटें केंद्र में सत्ता का समीकरण बना-बिगाड़ सकती हैं। पहले बात आंध्र प्रदेश की। यहां की 42 सीटों में से कांग्रेस को 17, टीडीपी को 16, पीआरपी को 2, टीआरएस को 5, सीपीआई-सीपीएम को 1-1 सीट मिल सकती है। यानी कांग्रेस को सत्ता में रहने का ज्यादा घाटा नहीं हुआ है।


एक और स्विंग स्टेट हैं तमिलनाडु। यहां की 39 सीटों में से डीएमके को 13 सीटें ही मिलती दिख रही हैं। एआईएडीएमके का पलड़ा भारी है उसे 20 सीटें मिल सकती हैं। कांग्रेस को 4, पीएमके को 1, एमडीएमके को 1 सीटें मिलने के आसार हैं।


गुजरात की 26 में से 18 बीजेपी को, कांग्रेस को 8


मध्य प्रदेश की 29 में बीजेपी को 20, कांग्रेस को 9

राजस्थान की 25 में से 14 कांग्रेस को, 10 बीजेपी को, 1 बीएसपी को

अरुणाचल प्रदेश की दोनों सीटें कांग्रेस को

हरियाणा की 10 में से 5 इंडियन नेशनल लोकदल, 3 कांग्रेस और एक-एक सीट बीजेपी और बीएसपी को

महाराष्ट्र की 48 सीटों से कांग्रेस को 12, एनसीपी को 13, बीजेपी को 11, शिवसेना को 12



असम की 7 में से 1 कांग्रेस, 1 एयूडीएफ, 3 एजीपी, 2 बीजेपी


हिमाचल प्रदेश की 4 में से 3 सीट बीजेपी और एक कांग्रेस को


जम्मू कश्मीर की 6 सीटों में से 2 नेशनल कांफ्रेंस, 2 पीडीपी, और कांग्रेस-बीजेपी को 1-1 सीटें


दक्षिण के ही एक और राज्य कर्नाटक में बीजेपी को 28 में से 16 सीटें मिलती दिख रही हैं। कांग्रेस को यहां पर 8 और तीसरे धड़े की अगुवा जेडीएस को 4 सीटें मिल सकती हैं।


बीजेपी से नाता तोड़ने का नवीन पटनायक को नुकसान नहीं है वो, कुल 21 लोकसभा में से 9 सीटों पर कब्जा करते दिख रहे हैं। बीजेपी को 4, कांग्रेस को 7 और लेफ्ट को यहां 1 सीट मिल सकती है।


पश्चिम बंगाल में तीन दशकों में पहली बार लाल किला कमजोर होता दिख रहा है। राज्य की 42 में से सीपीएम 18, सीपीआई को 1, फॉरवर्ड ब्लॉक को 1, आरएसपी को 1 सीटें मिल सकती हैं। जबकि, ममता-कांग्रेस गठजोड़ काफी फायदे में है। ममता की तृणमूल को 13 और कांग्रेस को 7 सीटें मिल सकती हैं। साथ ही दार्जिलिंग की एक सीट पाकर बीजेपी भी राज्य में खाता खोल सकती है।


वामपंथी शासन वाले एक और राज्य केरल में भी कांग्रेस को बढ़त है। कुल बीस में से कांग्रेस को 10 सीटे मिलती दिख रही हैं। जबकि, सीपीएम को 7 और सीपीआई को 2 सीटें मिल सकती हैं। पोन्नानी से निर्दलीय उम्मीदवार के जीतने की उम्मीद है।



गोवा में बीजेपी और कांग्रेस एक-एक सीट बांटते दिख रहे हैं।



पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठजोड़ की स्थिति थोड़ी खराब हुई है। अकाली दल को 3, बीजेपी को 2 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलती दिख रही हैं। यहां कुल 13 सीटें हैं।



छत्तीसगढ़ में बीजेपी को सत्ता में रहने का कोई नुकसान नहीं है। 11 में से बीजेपी को 9 और कांग्रेस को 2 सीटें मिल सकती हैं।


झारखंड की 14 सीटों में से पांच बीजेपी को मिलती दिख रही है। झरखंड मुक्ति मोर्चा को सिर्फ 3 सीटें मिलने के आसार हैं जबकि, कांग्रेस को यहां चार और लालू की पार्टी आरजेडी और झारखंड विकास मोर्चा को एक-एक सीट मिल सकती है।


उत्तराखंड की 5 सीटों में से 3 बीजेपी और दो कांग्रेस को मिल सकती हैं। दिल्ली में सात में 5 सीटें कांग्रेस की झोली में जाती दिख रही हैं। उसे एक सीट का नुकसान है यहां। बीजेपी को 2 सीट मिल सकती है।



लक्षद्वीप, सिक्किम, त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, दमन-दीव, दादरा-नगर हवेली, अंडमान निकोबार में कांग्रेस को 1-1 सीट मिल सकती है। मणिपुर में 1 सीट मणिपुर पीपुल्स पार्टी को जा सकती है।

Friday, June 06, 2008

साहब, खाली पेट और भूख लगती है

कर्नाटक में ब्लैकमेलर देवगौड़ा परिवार की धोखाधड़ी और ऐन मौके पर दिखी महंगाई (महंगाई खतरे के निशान पर पहुंच तो, साल भर पहले ही गई थी। आज शुक्रवार है और फिर महंगाई दर बढ़ गई है।) इन दोनों ने दक्षिणपंथी बीजेपी को दक्षिण दुर्ग का द्वार भेदने में मदद कर दी। वरना फिलहाल ऐसा कोई मुद्दा नहीं था जो, बीजेपी के पक्ष में वोट का अंबार लगा पाता। कांग्रेस के युवराज को डिस्कवर इंडिया में कुछ काम का नहीं मिला जो, नेहरू जी के डिस्कवरी ऑफ इंडिया से आगे बढ़ पाता। पूरा देश घूमने वाले युवराज की महंगाई से भी मुलाकात नहीं हुई। जबकि, मेरी महंगाई से मुलाकात एक ही दिन में नैनीताल के स्टेट गेस्ट हाउस में मुन्ना खां की शक्ल में हो गई।

बीजेपी कर्नाटक में सत्ता में आ गई है। और, उत्तरांचल में पहले से ही है। अचानक बने प्रोग्राम में एक दिन के लिए मैं नैनीताल पहुंच गया। रात की फ्लाइट से मुंबई से दिल्ली। रात भर चलकर सड़क के रास्ते से रुद्रपुर और वहां से नैनीताल। एक रात नैनीताल में दूसरे दिन शाम को फिर वापस और रात की फ्लाइट से फिर मुंबई। वैसे तो नैनीताल पहुंचना ही बहुत सुखद अनुभव रहा। लेकिन, नैनीताल के स्टेट गेस्ट हाउस (नैनीताल क्लब के नाम से मशहूर) में सुबह हुई मुन्ना खां से मुलाकात ने बता दिया कि- महंगाई मार गई, का डर ऐसे ही बड़ी-बड़ी सरकारों पर भारी नहीं पड़ता।


सुबह उठा तो, कड़ुआ तेल की शीशी चटकाते बुजुर्ग सज्जन मालिश के आग्रह के साथ दरवाजे पर खड़े थे। पहाड़ों का खुशनुमा मौसम और दिल्ली से नैनीताल तक सड़क के रास्ते आने की थकान में मेरा मन भी मालिश के लिए मचल गया। लेकिन, चुचके गालों और झुर्रियों से सिकुड़े मुन्ना खां के हाथ और चेहरे को देखकर मेरा मालिश कराने का मन थोड़ा हिचका। मुन्ना खां ने कहा- साहब, 130 रुपए में बढ़िया मालिश करूंगा। मैंने कहा- 100 रुपए (क्योंकि, मुझे लगा कि ये मालिश क्या करेंगे, ऐसे ही निपटा देंगे।)

मुन्ना खां ने कहा- साहब, बस मई-जून। उसके बाद तो 10-20 रुपए में भी कोई मालिश के लिए नहीं पूछता। और, साहब मन खुश होगा तो, आप मुझे 10-20 रुपए ज्यादा ही देंगे। घड़ी दिखाकर बोले- पूरे आधे घंटे लगते हैं। कड़ुए तेल की शीशी भी सुंघा दी। एकदम असली कड़ुआ तेल था— महक आंखों तक उतर गई थी (असली कड़ुए तेल का अनुभव जिनको न हो उनके लिए, कड़ुए तेल के आंखों में उतरने का अहसास जरा मुश्किल ही है।)

मैं तैयार हो गया। मुझे क्या पता था कि मुन्ना खां की शक्ल में खुद महंगाई मेरी मालिश करने जा रही थी। मैंने उमर पूछी तो, मुन्ना ने 60 साल बताई। जबकि, मुझे 70 के ऊपर लग रही थी। ठीक वैसे ही जैसे महंगाई दर के आंकड़े कुछ और होते हैं और हमारे-आपके घर में पहुंचकर वो और ज्यादा दिखने लगती है। खैर, मुन्ना खां ने जब मेरी मालिश शुरू की तो, मुझे अहसास हुआ कि मुझसे ज्यादा ताकत अभी भी उनमें बची है।

साहब, मई-जून के बाद तो काम ही नहीं मिलता। खाली रहता हूं। चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है। सबकुछ इतना महंगा हो गया है। चावल-दाल किलो भर लेने में खून जल जाता है। और, जब काम नहीं मिलता, खाली रहता हूं, कमाई नहीं होती तो, खाली पेट भूख और ज्यादा लगती है। काम में तो फिर भी भूख से ध्यान हट जाता है। और, पहाड़ों पर तो, वैसे भी महंगाई कुछ ज्यादा ही असर करती है। सब बड़े-बड़े घरों के बच्चे आते हैं। या फिर शहरों से लोग मौसम बदलने आते हैं। उनकी जेब तो भरी होती है। पहले से महंगी चीज को और महंगा कर जाते हैं।

मुझे मुन्ना खां की बात में दम लगा। मैंने भी नैनीताल की मॉल रोड से 100 रुपए का बैटरी से चलने वाला मसाजर ले लिया। तुरंत ही बगल में खड़े एक सरदारजी बोले- पचास रुपए से ज्यादा का नहीं है। दूसरी सुबह हम झील में बोटिंग करने के बाद निकले तो, दूसरा मसाजर बेचने वाला 70 रुपए में ही देने को तैयार हो गया। दुपट्टे जैसे हल्के कपड़े के शॉल 150 रुपए में मिल रहे थे। झील के किनारे के होटल पीक सीजन (गर्मियों में) एक रात के लिए 3,000 से 7,000 रुपए तक वसूलते हैं। और, हमें घुमाने वाले गाइड ने रास्ते का एक होटल दिखाकर बताया- ये यहां का सबसे महंगा होटल है। एक रात का 10,000 रुपए से ज्यादा लगता है। मुझे लगा बाहर से आने वाले लोगों को जो, इतने महंगे सामान या फिर होटल के कमरे मिलते हैं। उसकी कमाई में मुन्ना खां जैसा खांटी पहाड़ियों को हिस्सा अब भी क्यों नहीं मिल पा रहा। अब तो सिर्फ पहाड़ के लोगों के लिए अलग से राज्य भी बन गया है।

खैर, मालिश के साथ ही मुन्ना खां की बात आगे बढ़ चुकी थी। बाहरी लोग आके साहब पहाड़ काट रहे हैं। दो मंजिल की परमीशन पर 4-5 मंजिल की बिल्डिंग तान देते हैं। 3500 घर ऐसे ही बने हैं साहब। कभी-कभी कुछ घर टूटते भी हैं। नैनीताल क्लब में ही साहब पहले सिर्फ 40-50 कमरे थे अब 300 कमरे हैं। बहुत विरोध हुआ था। पुलिस ने लाठियां बरसाईं थीं। लड़कों ने बहुत बवाल किया था।

मुन्ना खां नैनीताल में हैं। वहां बीजेपी की सरकार है। ये दूसरी बार है। लेकिन, मुन्ना खां महंगाई पर बरस रहे थे। और, सरकार पर बरस रहे थे। एक बार भी उन्होंने बीजेपी या कांग्रेस का नाम नहीं लिया। हां, ये जरूर कह दिया कि अंग्रेज सरकार हमारे सरकार से अच्छे थे। महंगाई भी नहीं थी। कोई गलती करे—गलत काम करे तो, सीधे गोली से उड़ा दिया जाता था। इस वजह से लोगों में डर था। अब तो ऐसी सरकार है कि कुछ भी करके आदमी बच जाता है। पैसा सारे पाप छिपा लेता है।

पहाड़ों में मैंने कभी हिंदू-मुस्लिम भी नहीं सुना। देहरादून में करीब डेढ़ साल रहते हुए। मुन्ना खां से नैनीताल क्लब में आधे घंटे मालिश करवाते हुए और मुस्लिम घोड़े वालों के साथ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाते हुए भी। नैनीताल की सैर करवाने वाले ज्यादातर घोड़े वाले मुस्लिम ही थे। हम लोगों जिन 4 घोड़ों पर ऊपर तक गए। उसे ले जाने वाले भी दोनों ही मुस्लिम ही थे। और, ये सिर्फ यहीं नहीं है। वैष्णो देवी के दर्शन के लिए ले जाने वाले सारे घोड़े वाले और पालकी वाले भी मुस्लिम हैं। हिंदू भक्तों का देवी दर्शन मुस्लिमों के ही भरोसे हो रहा है।

खैर, नैनीताल भी पहाड़ पर है तो, कोई न कोई देवी-देवता तो होंगे ही। नैनीताल की झील के बगल में ही नयना देवी का मंदिर है। मेरी पत्नी और उनकी दोनों बहनें मंदिर गईं। मैंने कहा- मैं जूते पहने हूं, बाहर से ही प्रणाम कर लेता हूं। दरअसल, मैं आज तक ये जान नहीं पाया हूं कि भगवान में मेरी कितनी आस्था है। ये जरूर लगता है कि कोई न कोई शक्ति तो जरूर है जो, सुपरपावर है। खैर, मैं बाहर खड़ा था एक अधेड़ उम्र दंपति आए। पत्नी ने कहा- गोपाल आओ, दर्शन कर लेते हैं। लेकिन, गोपाल बाहर ही रुक गए। पत्नी अंदर चली गई। थोड़ी ही देर बाद गोपाल भी कुछ सोचते विचारते मंदिर के अंदर थे। मैं सोचने लगा कि क्या उम्र बढ़ने के बाद मैं भी इसी तरह पत्नी के पीछे मंदिर में दर्शन करने जाने लगूंगा।

नयना देवी मंदिर के बाहर मैं खड़ा इंतजार कर रहा था। और, प्रसाद की दुकान पर फुल वॉल्यूम में गाना बज रहा था- नयनों की मत सुनियो ... नयना ठग लेंगे। और, जिस तरह से महंगाई की राजनीति शुरू हो गई है। उससे तो साफ लग रहा है कि कांग्रेस को महंगाई ठग लेगी।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...