तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)