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Monday, November 19, 2007

नंदीग्राम में वामपंथियों का नंगा नाच जारी है

गुजरात दंगों जैसा ही है नंदीग्राम का नरसंहार। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के चेयरमैन जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने ये बात कही है। राजेंद्र बाबू कह रहे हैं कि जिस तरह से नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों पर राज्य प्रायोजित अत्याचार हो रहा है वो, किसी भी तरह से गोधरा के बाद हुए गुजरात के दंगों से कम नहीं है। लेकिन, मुझे लगता है कि गुजरात दंगों से भी ज्यादा जघन्य कृत्य नंदीग्राम में हुआ है। नरेंद्र मोदी में भी कभी ये साहस नहीं हुआ कि वो उसे सही ठहराते लेकिन, बौराए बुद्धदेव तो इसे सही भी ठहरा रहे हैं।

दरअसल नंदीग्राम में स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है जितनी राजेंद्र बाबू कह रहे हैं। लेफ्ट के गुडों का नंगा नाच अभी भी खुलेआम चल रहा है। बंगाल की बुद्धदेव सरकार अब सीआरपीएफ को काम नहीं करने दे रही है। सीआरपीएफ के देरी से आने का रोना रोने वाले बुद्धदेव के बंगाल के डीजीपी अनूप भूषण वोहरा ने सीआरपीएफ के डीआईजी को कहा है कि वो वही सुनें जो, राज्य पुलिस का स्थानीय एसपी (ईस्ट मिदनापुर) एस एस पांडा कह रहा हो। यानी केंद्र सरकार की ओर से राज्य में कानून व्यवस्था बनाने के लिए भेजी गई सीआरपीएफ पूरी तरह से राज्य पुलिस के इशारे पर चलेगी।

ये वही राज्य पुलिस है जो, लेफ्ट कैडर के इशारे के बिना सांस भी नहीं लेती। सीपीएम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नंदीग्राम के निरीह किसानों की हत्या करने वाली पुलिस अब जो कहेगी वही सीआरपीएफ के जवानों को करना होगा। सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज ने राज्य पुलिस से नंदीग्राम और आसपास के इलाके के अपराधियों की एक सूची मांगी थी अब तक सीआरपीएफ को वो सूची नहीं दी गई। आलोक राज ने कहा पुलिस का इतना गंदा रवैया उन्होंने अपने अब तक के कार्यकाल में नहीं देखा है।

सीआरपीएफ के 5 बेस कैंपों को हटाकर दूसरी जगह भेजा जा रहा है। ये वही बेस कैंप हैं जिन्हें बनाने के लिए सीआरपीएफ को लेफ्ट के अत्याधुनिक हथियारों, बमों से लैस गुंडों से छीनने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। इतना कुछ होने के बावजूद सीपीएम महासचिव की बेशर्म बीवी और सीपीएम पोलित ब्यूरो की पहली महिला सदस्य बृंदा करात टीवी चैनल पर नंदीग्राम के मसले पर इंटरव्यू के दौरान नंदीग्राम में महिलाओं के साथ हुए बलात्कार की तो चर्चा भी नहीं करना चाहतीं। और, वो इसी इंटरव्यू के दौरान बेशर्मी से हंसती भी दिख जाती है।

वहीं एक दूसरे चैनल पर सीपीआई नेता ए बी वर्धन नंदीग्राम को गुजरात से भी गंदा बताने पर भड़क जाते हैं। इन बेशर्मों को ये नहीं दिख रहा है कि नंदीग्राम के एक स्कूल में 1,200 से भी ज्यादा किसान शरण लिए हुए हैं। ये लोग भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के सदस्य हैं। अब स्कूल का हेडमास्टर सीपीएम के दबाव में उन्हें स्कूल खाली करने को कह रहा है। कमेटी के 38 से ज्यादा सदस्य अभी भी लापता हैं। आशंका हैं कि गांव में कब्जे के दौरान सीपीएम कैडर ने इन लोगों की हत्याकर उनकी लाश कहीं निपटा दी है।

Wednesday, November 14, 2007

दो बूढ़े वामपंथियों के अहं की लड़ाई में बरबाद हो रहा है बंगाल

रिजवानुरहमान की मौत के बाद पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का बयान- इस मामले में राज्य सरकार ने सही समय पर सही कदम नहीं उठाया।

नंदीग्राम और सिंगूर मामले पर राज्य सरकार सलीके से लोगों को समझा नहीं पाई- ज्योति बसु।

पुराने वामपंथी लकीर के फकीर हैं। वो, समय के साथ खुद को बदल नहीं पा रहे हैं- बुद्धदेव भट्टाचार्य

बंगाल के नौजवानों को रोजगार की जरूरत है और वो बिना पूंजी के संभव नहीं। पूंजी के लिए पूंजीवादियों का सहारा लेना ही होगा। ये समय की जरूरत है- बुद्धदेव भट्टाचार्य


पिछले कुछ महीने में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के बीच हुए अघोषित शीत युद्ध की ये कुछ बानगियां हैं। कैडर के दबाव और स्वास्थ्य की मजबूरियों ने ज्योति बसु पर बुद्धदेव को कुर्सी देने का दबाव तो बना दिया। लेकिन, ये बूढ़ा वामपंथी अभी भी बंगाल पर अपना दखल कम नहीं होने देना चाहता। और, बंगाल की राजनीति को नजदीक से समझने वालों की मानें तो, इन दो बूढ़े वामपंथियों के अहम की लड़ाई में बंगाल बरबाद होता जा रहा है।

ज्योति बसु ने हर उस नाजुक मौके पर बुद्धदेव के हर फैसले को गलत ठहराने की कोशिश की। जब बुद्धदेव को बचाव की जरूरत थी। इसी रस्साकशी का परिणाम था कि दो दशकों ज्योति बसु के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली ममता सिंगूर के मुद्दे पर ज्योति बसु के घर चाय-नाश्ता मंजूर कर लेती हैं। लेकिन, बुद्धदेव से मिलने को भी तैयार नहीं होती हैं।

बंगाल में सीपीएम कैडर के खिलाफ सीपीएम का ही कैडर खड़ा है। इस बात में तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता कि SEZ और जमीन के बहाने लड़ाई के जो तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं वो, ताकत राज्य में सीपीएम कैडर के अलावा किसी और के पास नहीं है। बुद्धदेव हिंसा में माओवादियों का हाथ होने की बात कह रहे थे। लेकिन, रिपोर्ट साफ बताती है कि माओवादी कहीं नहीं हैं। माओवादी तरीका जरूर अपनाया जा रहा है।

कोलकाता में ये चर्चा आम है कि सबसे ज्यादा हिंसा बुद्धदेव का विरोधी खेमा ही कर रहा है। अब ये बताने की जरूरत तो नहीं है कि मुख्यमंत्री के अलावा राज्य में दूसरे किस वामपंथी नेता को कैडर का अंधा भरोसा हासिल है। दोनों बूढ़े वामपंथियों की लड़ाई में बंगाल बरबाद होता जा रहा है। और, अब लेफ्ट नेताओं को भी लगने लगा है कि इस लड़ाई में दुनिया के अकेली सबसे ज्यादा समय तक चलने वाली लोकतांत्रिक सरकार इतिहास बन सकती है। यही वजह है कि करात इस बार खुलकर बुद्धदेव के साथ खड़े हो गए। लेकिन, कुल मिलाकर बरबादी तो बंगाल की ही हो रही है। बंगाल के लोग अब तो जाग जाओ।

बौराए बुद्धदेव से कौन बचाएगा बंगाल को

नंदीग्राम में हालात इतने खराब हो गए हैं कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ रही है। सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो ये है कि सरकारी स्कूलों में चल रहे इन राहत शिविरों में ज्यादातर वो मुसलमान हैं जो, अब तक सीपीएम का वोटबैंक माने जाते रहे हैं। महीने भर से करीब 5,000 से ज्यादा लोग अपने घरों को छोड़कर राहत शिविरों में डरे सहमे पड़े हुए हैं।

5-7 साल के बच्चों को सीपीएम कार्यकर्ता उनकी रैलियों में शामिल न होने पर पीट रहे हैं। 7 साल की अमीना खातून को 20 दिन पहले उस समय घर छोड़ना पड़ा जब उसके गांव पर सीपीएम कैडर ने गोली, बमों के साथ हमला कर दिया। इस गांव में तृणमूल कांग्रेस समर्थित भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी का दबदबा था। इसे हटाने के लिए सीपीएम कैडर ने गांव को बरबाद कर दिया। लोग जान बचाकर राहत शिविरों में भाग गए।

बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और प्रकाश करात तो बेशर्मी की सारी हदें पार कर गए हैं। वो कह रहे हैं सीपीएम कार्यकर्ताओं को उनके घर नहीं जाने दिया जा रहा था। इसलिए सीपीएम कैडर को हथियार उठाना पड़ा। बुद्धदेव इतने पर ही नहीं माने। वो कह रहे हैं कि यहां हुई हिंसा के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है। केंद्र से बार-बार सीआरपीएफ मांगने के बाद भी समय से सुरक्षा बल के जवान नहीं पहुंचे। इसीलिए नंदीग्राम में इतनी हिंसा हुई।

बुद्धदेव को शर्म नहीं आती जब पूरा देश ये देख रहा है कि नंदीग्राम और आसपास के गांवों में सीआरपीएफ के जवानों को हथियारबंद सीपीएम कैडर और बंगाल की पुलिस घुसने ही नहीं दे रही है। और, अगर बुद्धदेव के बयान पर भरोसा करें तो, क्या वो ये मान रहे हैं कि बंगाल में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। फिर ऐसी सरकार के बने रहने का क्या तुक है। चुनी हुई राज्य सरकारों के तख्तापलट के लिए छोटी-छोटी बातों पर राष्ट्रपति शासन का इस्तेमाल करने वाली कांग्रेसी सरकार क्यों कान में तेल डालकर बैठी हुई है।

साफ है कांग्रेस और लेफ्ट के बीच तू मेरी गलती को छिपा मैं तेरी गलती को अच्छाई में बदलता हूं, वाला फॉर्मूला चल रहा है। यानी दलालों की सरकार हमारे ऊपर राज कर रही है।

Tuesday, November 13, 2007

पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल कितने एक से दिखने लगे हैं

पाकिस्तान में मुशर्रफ की तानाशाही चलती है ये, दुनिया जानती है। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का कैडर पिछले 30 सालों से तानाशाही चला रहा है लेकिन, पश्चिम बंगाल सरकार को दुनिया की सबसे ज्यादा समय तक चलने वाली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार कहा जाता है।
मुशर्रफ ने अभी पाकिस्तान में आपातकाल लगाया है। पश्चिम बंगाल में पिछले 30 सालों से सीपीएम कैडर का अघोषित आपातकाल चल रहा है।
मुशर्रफ दुनिया के सामने पाकिस्तान को बचाने के लिए आपातकाल जरूरी बताते हैं। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या और सीपीएम महासचिव प्रकाश करात बंगाल के विकास के लिए हर उस व्यक्ति को कुचल देने की हिमायत कर रहे हैं जो, इस रास्ते में रोड़ा बन रहा हो।
मुशर्रफ बेनजीर को वतन लौटने की इजाजत देते हैं लेकिन, पाकिस्तान में आते ही आत्मघाती दस्ते बेनजीर का स्वागत करते हैं। पश्चिम बंगाल में रहकर दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हल्ला करने वालों को वामपंथी सरकार सर पर बिठाकर उन्हें ट्रेडमार्क की तरह इस्तेमाल करती है लेकिन, अगर बंगाल में सरकारी और लाल झंडा कैडर की काली करतूतों के खिलाफ कोई कुछ बोला तो, मेधे पाटेकर की तरह उसकी कार पर हमला बोल दिया जाता है।
पाकिस्तान में मुशर्रफ ने पहले जेहादियों को पैदा किया। उन्हें भारत के खिलाफ और पाकिस्तान में अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया। अब वही जेहादी लाल मस्जिद जैसे कांड कर रहे हैं और मुशर्रफ के लिए ही मुश्किल बन गए हैं। वामपंथी विचारधारा से निकले माओवाद और माओवादियों का इस्तेमाल सीपीएम ने पूरे देश मे अपने विरोध में उठने वाले हर विचार को दबाने में किया। अब जब बंगाल में अपनी जमीन बचाने के लिए किसान माओवादी तरीके अपना रहे हैं तो, करात और दूसरे वामपंथी कह रहे हैं कि ममता बनर्जी वामपंथी सरकार गिराने के लिए माओवादियों का इस्तेमाल कर रही हैं।
पाकिस्तान में कई इलाके ऐसे हैं जहां सेना की भी घुसने की हिम्मत नहीं होती। पाकिस्तान के ऐसे इलाकों में अक्सर जेहादियों की अत्याधुनिक हथियार लहराते टीवी चैनल्स अखबारों में दिखते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में हाल और भी खराब है। सीपीएम कैडर के साथ वहां की पुलिस मिली हुई है। बंकर बनाकर सीआरपीएफ के जवानों को घुसने से रोका जा रहा है। सीआरपीएफ को जमीन-रास्ते में जगह-जगह बारूद-बम बिछे मिले हैं।
पाकिस्तान में मुशर्रफ जजों की और उनके बेटे-बेटियों की अश्लील तस्वीरें खींचकर अपने साथ रहने के लिए ब्लैकमेल कर रहे हैं। तो, पश्चिम बंगाल में सरकार के कुकृत्यों पर आंख मूंदे रखने के लिए वामपंथी केंद्र सरकार पर दबाव (परमाणु समझौता, FDI और ऐसे ही दूसरी बातों के जरिए) बनाए रखते हैं। यही वजह है कि सीपीएम कैडर के इतने नंगे नाच के बाद भी केंद्र सरकार ने कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया है। दूसरी कोई सरकार होती तो, राष्ट्रपति शासन के बहाने अब तक कांग्रेस ही वहां राज कर रही होती।
नंदीग्राम में 14 लोगों की हत्या के आंकड़े सरकारी थे। असली आंकड़ा छिपा लिया गया। सीबीआई जांच में ये साबित हो गया था कि सारी हत्याएं सीपीएम कैडर और उसके साथ मिले पुलिस वालों ने की। लेकिन, कुछ नहीं हुआ। सिंगूर में सीपीएम का कैडर एक नाबालिग लड़की के बलात्कार और उसकी हत्या के आरोप में जेल में है।
सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन 7 पर एक महिला चीख-चीखकर बता रही थी कि सीपीएम के कैडर ने उसे मारा पीटा और फिर उसके और उसकी बेटियों के साथ बलात्कार किया। उसके बाद वो दरिंदे उसे उठा ले गए और अब तक उसकी बेटियों का पता नहीं हैं। टीवी चैनलों पर नंदीग्राम की हकीकत देखने के बाद मन बहुत ज्यादा खिन्न हो गया है। बस इतना ही कहूंगा कि पाकिस्तान में और पश्चिम बंगाल दोनों ही जगहों पर जितने ज्यादा दिनों तक तानाशाही रहेगी, भारत देश के लिए खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा।

Monday, July 23, 2007

पश्चिम बंगाल में लाल सलाम के ३० साल

21 जून 2007 को पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के तीस साल हो गए। ये दुनिया की अकेली ऐसी कम्युनिस्ट सरकार बन गई। जो, चुनकर इतने सालों तक शासन में रही। ये रिकॉर्ड शासन इतने सालों का रहा कि इस शासन की शुरुआती बागडोर संभालने वाले मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु को हटाकर (बूढ़ा हो जाने का हवाला देते हुए ) दूसरे खांटी कामरेड बुद्धदेब भट्टाचार्य को राज्य की बागडोर देनी पड़ी। लेकिन, जब वामपंथी शासन के तीस सालों पर नजर डालें तो, साफ दिख जाएगा कि शासन तो, भले ही पश्चिम बंगाल में कहने को वामपंथियों का ही चल रहा है। लेकिन, दरअसल ये शासन पूरी तरह से पूंजीवादियों के हाथ में है। और, ये बात में नहीं कह रहा हूं। ये बात निकलकर आई है अभी के पश्चिम बंगाल के मुखिया बुद्धदेब भट्टाचार्य के श्रीमुख से।

तीस साल पूरे होने पर अलग-अलग टीवी चैनलों-अखबारों ने बुद्धदेब से जानना चाहा कि आखिर दुनिया की सबसे ज्यादा समय तक चुनकर चलने वाली वामपंथी सरकार की दिशा-दशा क्या है। बुद्धदेब ने कहा पुराने वामपंथी लकीर के फकीर रह गए हैं। उन्हें आज के जमाने की समझ नहीं है। आज की जरूरतों की समझ नहीं है। और, समय आ गया है कि जब वामपंथी बुद्धिजीवियों को ये समझना होगा कि राज्य के विकास के लिए उद्योगों की जरूरत है और उद्योग लगाने के लिए पूंजी चाहिए। बुद्धदेब बाबू ने कहा इसलिए साफ है कि हमें पूंजीपतियों के लिहाज से ही चलना होगा। उन्होंने इसके लिए राज्य के नौजवानों के रोजगार का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कुछ पुराने वामपंथियों को खुश रखने के लिए वो राज्य के लाखों नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते हैं।


बुद्धदेब बाबू को तीस साल के लाल सलाम के बाद ये बात समझ में आ गई कि अब सिर्फ लाल सलाम से बात नहीं बनने वाली। अब रेट कार्पेट बिछाने की आदत डालनी होगी। बुद्धदेब बाबू ने रेड कार्पेट बिछाया तो, सस्ती जमीन, सस्ता मजदूर पसंद करने वाले उद्योगपतियों की मनमांगी मुराद पूरी हो गई। टाटा-अंबानी से लेकर देश-दुनिया के सारे बड़े उद्योगपति राइटर्स बिल्डिंग के सामने लाइन लगाए खड़े हो गए। टाटा देश की सबसे सस्ती कार कोलकाता में ही बनाना चाहते हैं तो, मुकेश अंबानी को कोलकाता से ही पूरे बंगाल में रिटेल चेन फैलाने का आसान रास्ता दिखा जिससे वो, किसानों से सस्ते में खरीदकर उन्हीं को बेचकर मुनाफा कमा सकते। लेकिन, बात यहीं बिगड़ने लगी। क्योंकि, इन सभी को बंगाल में अपने उद्योग लगाने-अपनी दुकान खोलने के लिए जमीन चाहिए थी। और, इस जमीन पर काबिज थे वो लोग, जिन्होंने पहले ज्योति बसु और फिर बाद में बुद्धदेब बाबू को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया था। ये वो लोग थे जिनको लेफ्ट ने जमीन देकर पहले कैडर बनाया और फिर उसी कैडर को भरोसा दिलाकर बार-बार सत्ता में आते रहे। लेकिन, जब उनकी चुनी लेफ्ट की सरकार ने उनको दी जमीन, उद्योगपतियों के लिए मांगनी शुरू की तो, मामला पलट गया। उन्होंने जमीन देने से साफ इनकार कर दिया। और, अपनी जमीन बचाने के लिए जान लेने-देने पर उतारू हो गए। राजनीति भी उनके साथ खड़ी हुई और सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति बनाने वाला लेफ्ट कैडर ममता बनर्जी की अगुवाई में खड़ा हो गया और उसके सामने पुलिस-सत्ता से लैस लेफ्ट का कैडर गोली चलाने लगा।


दरअसल आज से तीस साल पहले जब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था तो, सामंतवाद को हटाने और सबको जमीन की बराबर हिस्सेदारी देने का ही नारा बुलंद हुआ था। लेफ्ट की ये अपील काम कर गई और 21 जून 1977 को लंदन से ऊंची पढ़ाई करके लौटा 64 साल का कामरेड ज्योति राज्य का मुख्यमंत्री बन गया। बसु को सत्ता में पहुंचने की वजह साफ मालूम थी और बसु की सरकार ने सबसे पहले राज्य में भूमिहीन किसानों को जमीन बांटना शुरू किया। बसु सरकार ने राज्य में 13 लाख एकड़ जमीन गरीबों और भूमिहीन किसानों को बांट दी। ये रिकॉर्ड है, ऐसा काम देश का कोई राज्य नहीं कर पाया है। पश्चिम बंगाल ही देश का पहला राज्य था जहां सत्ता के विकेंद्रीकरण की शुरुआत हुई और सबसे पहले त्रिस्तरीय पंचायत राज लागू हुआ। यही वजह है कि आज पश्चिम बंगाल में खेती की जमीन का 83 प्रतिशत हिस्सा ऐसे ही छोटे किसानों के पास है। और ये किसान किसी भी कीमत पर उद्योगों के लिए अपनी जमीन देने कौ तैयार नहीं हैं। वो, जान देने को तैयार हैं लेकिन, जमीन किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं है। नतीजा सिंगुर, नंदीग्राम, पुरुषोत्तमपुर, आसनसोल जैसे हालात राज्य के हर उस हिस्से में बन रहे हैं जहां सरकार उद्योग लगाना चाहती है। सिंगुर में टाटा को कार फैक्ट्री के लिए जमीन देना इज्जत का सवाल बन गया है। टाटा को भी बंगाल में मुनाफा ही मुनाफ दिख रहा है इसलिए 18 साल बाद कोलकाता में दूसरा ताज होटल खुलने जा रहा है। टाटा इतने मेहरबान हैं इसलिए राज्य सरकार का साफ कह रही है कि किसी भी कीमत पर ये मौका छोड़ा नहीं जा सकता। राज्य के उद्योग मंत्री निरुपम सेन का कहना है कि टाटा को राज्य में निवेश के लिए रास्ता तैयार न कर पाना बहुत बड़ी भूल होगी। शायद इसीलिए इस रास्ते में आने वाले हर किसी को जान से हाथ धोना पड़ सकता है। इसका सबूत है सीपीएम के जोनल हेड सुरीद दत्ता का नाम, सिंगुर में तापसी मलिक की हत्या और बलात्कार के मामले में सामने आना। तापसी मलिक सिंगुर की जमीन बचाओ समिति की सदस्य थी।


30 साल के लाल सलाम का परिणाम ये हुआ कि दुनिया भर में क्रांति का झंडा लहराने के लिए कॉलेज कैंपसों में मार्क्स-लेनिन के नारे बुलंद करने वाली लेफ्ट के रिकॉर्ड शासन वाले राज्य में सबसे पहले कॉलेज कैंपस पर ही हमला हुआ। एजुकेशन सिस्टम फेल हो गया है। पुराने वामंपथी दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में इकट्ठा होकर मार्क्स लेनिन के सिद्धांत पढ़ा रहे हैं लेकिन, बंगाल के कॉलेजों में गुंडागर्दी और सीपीएम के कैडर के अलावा कुछ नहीं बचा है। यहां तक कि सीपीएम और सीपीआई के अलावा दूसरे लेफ्ट संगठनों की छात्र शाखाएं भी अगर कैंपस में कुछ करने की कोशिश करती हैं तो, उसे पुलिस के साथ मिलकर सीपीएम-सीपीआई के कैडर के गुंडे दबा देते हैं। इसलिए सरकार को चेताने वाली विरोध की युवा ताकत नहीं रह गई।


लेफ्ट सरकार ने किसानों को जमीनें तो, बांट दीं। लेकिन, उनकी फसल लोगों तक, मंडियों तक बिकने के लिए पहुंच सके। इसका इंतजाम नहीं हो सका। जिसका नतीजा ये हुआ कि बंगाल में जमीन वितरण तो, हो गया लेकिन, वहां का एक भी किसान पंजाब के किसान की तरह कोई ऐसा मॉडल नहीं पेश कर सका। जिससे राज्य की बढ़ती आबादी के लिए रोजगार के मौके भी बनते। लगातार सरकार बनाने के लिए ऐसी बुनियादी सुविधाओं के लिए विकास को, सत्ता के मद में चूर वामपंथियों ने कभी मुद्दा ही नहीं बनने दिया। जमीन पाए गरीबों, किसानों को अपनी चुनी हुई सरकार पर पूरा भरोसा भी था। लोकिन, इस सरकार के राज में पूरे बंगाल में ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम का जिस तरह से बंटाधार हुआ। उससे पहले से वहां जमी कंपनियों ने भी दूसरे राज्यों का रुख कर लिया। लेकिन, लेफ्ट उस समय भी नहीं चेता। क्योंकि, बंगाल अकेला राज्य था जिसके आदर्श के बूते वो पूरे देश में अपनी विचारधारा की दुहाई देते घूमते थे। हालात, ये हुए कि देश में सबसे पहले मेट्रो रेल और ट्रॉम गाड़ी जैसी अत्याधुनिक यातायात सुविधा की शुरुआत करने वाले कोलकाता में भी जमाने के रफ्तार को पकड़ने वाली सड़कें भी नहीं रह पाईं। राज्य के दूसरे हिस्सों में तो सड़कों का विकास ना के बराबर हो पाया। आज कोलकाता का सीवेज सिस्टम शायद देश के किसी भी शहर की तुलना में सबसे खराब है। बुनियादी सुविधाओं का हाल ऐसा है कि अंग्रेजों को जमाने से ही संपन्न बंगाल के गांवों में आज तक बिजली नहीं पहुंच सकी है। राज्य में चालीस लाख से ज्यादा पढ़े-लिखे नौजवान बेरोजगार हैं। जो, राज्य के पढ़े-लिखे नौजवानों का सत्तर प्रतिशत है।


सच यही है कि बुद्धदेब भट्टाचार्यकी ये बात एकदम सही है कि पश्चिम बंगाल हो या फिर कोई भी राज्य उसे विकास के लिए, युवाओं को रोजगार देने के लिए उद्योगों को बढ़ावा देना ही होगा। क्योंकि, तीस साल के खेती के अनुभवों से कम से कम बंगाल में तो विकास नहीं ही आया है। लेकिन, सवाल यही है कि क्या बुद्धदेब जिस तरह से इंडस्ट्रियलाइजेशन के पक्ष में उद्योगपतियों की तरफदारी में खड़े हैं क्या वो, जनता के खिलाफ जाता नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल के ही ईस्ट मिदनापुर के सालबोनी गांव में अपना स्टील प्लांट लगाने जा रही JSW स्टील और राज्य के ही दूसरे हिस्से में टाउनशिप बनाने आ रही DLF का मॉडल अपनाया गया होता तो, शायद ही उद्योगों के आने के इस तरह से विरोध होता, जैसे आज लोग जमीन न देने के लिए जान भी देने पर उतारू हैं। लेकिन, गुजरात और महाराष्ट्र से विकास की दौड़ लगाने में जुटे बुद्धदेब उद्योगपतियों की शर्त पर राज्य के उस तबके की जमीन बांटने चल पड़े, जिसका पूरा परिवार सिर्फ उसी जमीन के भरोसे अपनी रोटी पा रहा था। JSW स्टील को ईस्ट मिदनापुर में करीब 4,500 एकड़ जमीन चाहिए जिसमें से 450 एकड़ कंपनी गांव के 700 किसान परिवारों से करीब तीन लाख रुपए एकड़ के भाव पर खरीद रही है। किसानों को जमीन की कीमत के बराबर के शेयर भी कंपनी में मिलेंगे और घर के एक सदस्य को नौकरी भी। अब भला इस औद्योगीकरण का विरोध कोई क्यों करेगा।


लेकिन, क्या बंगाल के वामपंथी शासक सचमुच में राज्य के लोगों का भला चाहते हैं और उनके विकास के बारे में सोचते हैं। देश में माओवादी आंदोलन की शुरुआत करने वाले कानू सान्याल ऐसा नहीं मानते। कानू सान्याल कहते हैं कि सीपीएम ने सत्ता पाने के सिर्फ पांच सालों तक ही अच्छा काम किया। उसके बाद उन्होंने कभी भी राज्य के लोगों का भला नहीं किया। बंगाल के बहुचर्चित जमीन सुधार (लैंड रिफॉर्म) आंदोलन की शुरुआत करने वाले सान्याल का कहना है कि सीपीएम और यहां तक कि सीपीआई पूरी तरह से जमीन सुधार के पक्ष में कभी रहा ही नहीं। अपने घर से सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) आंदोलन चला रहे सान्याल की बात काफी हद तक इसलिए भी सही लगती है कि पश्चिम बंगाल देश का वो राज्य है जहां ग्रामीण इलाकों में साल के कुछ महीनों में हर दिन सबसे ज्यादा लोग भूखे सोते हैं। भुखमरी के लिए बदनाम उड़ीसा इस मामले में दूसरे नंबर पर है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के जून 2004 से जून 2005 के बीच हुए सर्वे के मुताबिक, बंगाल गांवों में 10.6 प्रतिशत घरों में साल के कई महीनों में खाने को नहीं मिलता है।


बुद्धदेब भट्टाचार्य अब उद्योगों की वकालत उसी तरह कर रहे हैं जैसे, आज से तीस साल पहले कामरेडों ने खेती के जरिए विकास का नारा देकर दुनिया में सबसे लंबे समय तक चुनकर चली वामपंथी सरकार का तमगा हासिल कर लिया। लेकिन, क्या ये तमगा आज से कुछ साल बाद भी उपलब्धि के तौर पर जाना जाएगा या फिर ये सत्ता पर कब्जे के रिकॉर्ड के लिए ही जाना जाएगा। क्योंकि, बुराई न तो, आज के उद्योगों के जरिए विकास के मॉडल में है और बुराई न तो, तीस साल पहले के लिए खेती, ज्यादा से ज्यादा लोगों को जमीन बांटकर विकास के मॉडल में थी। लेकिन, सवाल यही है कि क्या वामपंथी विकास के किसी भी फॉर्मूले पर एक साथ काम करने के लिए अपने को कभी तैयार कर पाएंगे। खासकर बुद्धदेब के इस नए वामपंथी फॉर्मूले (उद्योगों के जरिए ही विकास हो सकता है) पर। क्योंकि, तीस साल पहले जमीन सुधार के जरिए विकास के फॉर्मूले पर तो, सारे वामपंथी एक थे। आज तो, तीस साल पहले जमीन सुधार के आंदोलन में पला-बढ़ा वामपंथी—इस नए बुद्धदेब स्टाइल के वामपंथी विकास के मॉडल के एकदम खिलाफ खड़ा है। जहां लाल सलाम नारा नहीं जमीन की खूनी लड़ाई में बदल गया है।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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