सम्पादक, किताब, विमुद्रीकरण और मोदी सरकार

 जब मैं 2008 दिसंबर में सीएनबीसी आवाज़ मुंबई से दिल्ली भेजा गया, तो सबने ढेर सारी नसीहतें, अनुभव, हिदायत दिया। आलोक जी ने ये किताब दी। किताब पर आलोक जी का लिखा मेरे लिए बड़ी ताक़त है। आधार का आधार स्तम्भ नंदन नीलेकनि की लिखी #ImaginingIndia आलोक जोशी अब आवाज़ के सम्पादक हैं और उन्होंने सम्पादक बनने के बाद जो पहला काम किया वो था हर हफ़्ते २ किताबें की टीवी पर बात। बेहद जरूरी है टीवी देखने वाले समझें कि किताब क्यों जरूरी है। और ये भी कि टीवी सिर्फ़ तमाशा नहीं है। सम्पादकों को दरअसल अपने साथ रिपोर्टर को, डेस्क पर काम करने वाले को ज्यादा से ज्यादा किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अच्छी पीटीसी भी रिपोर्टर बिना अच्छा और खूब पढ़े नहीं लिख सकता। और यही हाल डेस्क पर बैठे पत्रकार का भी होता है, जब वो अलग से पढ़ता नहीं है। आजकल के भला कितने सम्पादक हैं, जो पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। देश के अतिप्रतिष्ठित पत्रकार रामबहादुर राय ने एक बार मुझे बताया कि रात में सोने से पहले 2 घंटे वो पढ़ते जरूर हैं। मैंने भी उस दिन के बाद कई दिन पढ़ा, फिर छूट जाता है। लेकिन, बीच-बीच में क्रम चला लेता हूं।


अख़बार में नंदन के मोदी सरकार के विमुद्रीकरण पैनल में शामिल होने की ख़बर पढ़ी तो इसी बहाने ये लिख रहा हूँ। उस किताब को पढ़ते समझ में आता है कि बदलते भारत को किस तरह से झेलना पड़ा कुछ काम समय से न कर पाने की वजह से। ये भी एक ऐसा ही काम है। हालाँकि, नंदन अपनी किताब में बदलते भारत का मज़बूत पक्ष अंग्रेज़ ज्ञान वाले बढ़ते भारतीयों को बताते हैं। यहीं हमारा मतैक्य नहीं है। नंदन बेंगलुरू दक्षिण से कांग्रेस से २०१४ का लोकसभा चुनाव लड़े थे। फिर भी मोदी सरकार ने उन्हें अपने साथ लिया है। इस विषय पर उनकी विशेषज्ञता को देखते बेहद अच्छा फैसला। फिर कह रहा हूँ सरकार सही रास्ते पर है।