भइया यूपी में किसी नेता के पास जातीय मत हैं नहीं

घोर कांग्रेसी रीता बहुगुणा जोशी बीजेपी में आ सकती हैं। और वो आएंगी तो बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर आएंगी, ऐसा कहा जा रहा है। एक भाई विजय बहुगुणा पहले से ही बीजेपी में हैं। हालांकि, रीता पहले भी समाजवादी पार्टी में रही हैं। लेकिन, बीजेपी में उनके जाने की अटकलों को ब्राह्मणों को लुभाने की कांग्रेसी कोशिश में एक बड़ी बाधा के तौर पर देखा जा रहा है। जबकि, उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई ऐसा नेता हो अपनी जाति को पूरी तरह से बांधकर रखने की ताकत रखता हो। उत्तर प्रदेश में जाति-जाति सब चिल्ला रहे हैं। जातीय नेताओं से लेकर जातीय सम्मेलनों तक की धूम है। एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने वाला नेता जाति के आधार पर ही अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करता दिख रहा है। लेकिन, उत्तर प्रदेश की जातीय सच्चाई ऐसी है नहीं। दरअसल, उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश बन गया है, जहां किसी भी जाति का वोट पक्के तौर पर किस पार्टी को मिलेगा, ये समझ पाना बड़ा कठिन है। बीजेपी ब्राह्मण, बनिया और अगड़ों की पार्टी, समाजवादी पार्टी को छोड़कर यादव कहीं नहीं जाने वाला और बीएसपी का हाथी छोड़ दलितों को कुछ नहीं लुभाता, खासकर जाटव मायावती के अलावा किसी को नेता नहीं मानते। ये तीनों स्थापित जातीय मान्यताएं उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने बुरी तरह से ध्वस्त की हैं। कम से कम पिछली 2 विधानसभा चुनावों का जातीय वोटिंग पैटर्न तो यही दिखा रहा है। 2014 का लोकसभा चुनाव एक तो लोकसभा का चुनाव था, दूसरे जिस तरह का चमत्कार हुआ था, उसमें जातीय पैटर्न खोजना ज्यादा समझदारी का काम नहीं होगा। बड़ा प्रदेश होने और अगड़ी-पिछड़ी-दलित जातियों के जबरदस्त संतुलन की वजह से इस प्रदेश में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए आज की तारीख में जाति प्रभावित करने का पक्का वाला फॉर्मूला खोजना कठिन हो गया है।
2012 की बात करते हैं। अखिलेश यादव पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रहे। और इसके पीछे सामान्य धारणा यही रही कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों ने बहनजी को छोड़ दिया और वापस बीजेपी की तरफ चले गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि बीएसपी को दरअसल 2012 में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य तीनों ही जातियों के मत 2007 से ज्यादा मिले हैं। 2007 में पड़े हर 100 ब्राह्मण मतों में से बहुजन समाज पार्टी को 16 मत मिले थे। जबकि, 2012 में 100 में से 19 ब्राह्मण मत हाथी चुनाव चिन्ह पर पड़े थे। और यही ट्रेंड राजपूत और वैश्य मतों में भी बरकरार रहा। हर पड़े 100 मतों में 12 से बढ़कर 14 और वैश्य मत 14 से बढ़कर 15 बीएसपी के खाते में आ गए।
दूसरी सामान्य धारणा ये है कि यादव किसी भी हाल में अपने नेता यानी मुलायम सिंह यादव से दूर नहीं जाता है। और जब 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो ये माना गया कि यादवों का पूरा ही मतदान एसपी के पक्ष में हुआ। लेकिन, सच ये है कि यादवों के भरोसे तो अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत की सरकार कतई न बनती। क्योंकि, 2007 में 100 में से 72 यादवों ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया था। जबकि, 2012 में 100 में से सिर्फ 66 यादवों ने ही साइकिल की सवारी की। जबकि, 2007 के 100 में से 17 कुर्मी मतों के मुकाबले 2012 में 100 में 35 कुर्मी मत समाजवादी पार्टी को मिले हैं। जबकि, समाजवादी पार्टी में ऐसा कोई स्थापित कुर्मी नेता भी नहीं था। और सिर्फ कुर्मी/कोइरी ही नहीं, समाजवादी पार्टी को दलितों में जाटव मत भी खूब मिले। 2007 में 100 में से सिर्फ 4 मत साइकिल निशान पर मुहर लगा आए थे। लेकिन, 2012 में 100 में से 15 जाटव समाजवादी पार्टी पर भरोसा कर गए। पासी और दूसरी दलित जातियों के मत भी समाजवादी पार्टी को ज्यादा मिले।
ब्राह्मण, राजपूत मतदाताओं ने दरअसल 2012 के चुनाव में हाथी और साइकिल पर 2007 के मुकाबले ज्यादा भरोसा जताया। समाजवादी पार्टी को 2007 में ब्राह्मणों के 100 में से 10 मत मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 19 हो गए। इसी तरह राजपूतों का मत 20 से बढ़कर 26 हो गया। वैश्य मतदाताओं का भरोसा न तो समाजवादी पार्टी पर बढ़ा, न घटा।
अब अगर 2012 के विधानसभा चुनावों के आधार पर मिले जातीय मतों के आधार पर देखें, तो बीजेपी की ब्राह्मण, बनिया वाली पार्टी होने की छवि बुरी तरह से टूटती दिखती है। 2007 में 100 में से 44 ब्राह्मणों ने बीजेपी को मत दिया था। इसी तरह 100 में से 46 राजपूत और 52 वैश्यों ने बीजेपी को मत दिया। अन्य अगड़ी जातियों के पड़े 100 में से 41 मत बीजेपी के पक्ष में गए थे। लेकिन, 2012 में सारी अगड़ी जातियां बीजेपी से भागती दिखीं। 100 में से सिर्फ 38 ब्राह्मण, 29 राजपूत, 42 वैश्य और दूसरी अगड़ी जातियों के 17 मत ही बीजेपी को मिले। परंपरागत तौर पर पिछड़ों में कुर्मी मत बीजेपी के नजदीक माना जाता है। लेकिन, 2007 में मिले 42 मतों में से 20 ही बीजेपी के पास बचे रह गए। एक छोटी सी जरूरी जानकारी ये भी है कि 2007 में पड़े मुसलमानों के 100 मतों में से सिर्फ 3 बीजेपी को मिले थे। 2012 में 100 में 7 मुसलमान मत भाजपा के पक्ष में थे।   
दलित मतों की पूरी ठेकेदारी मायावती के पास ही मानी जाती है। लेकिन, 2012 में दलित मतों में भी जाटव वोट तेजी से हाथी से दूर भागते दिखे। 2007 में 100 में से 86 जाटव मत बीएसपी को ही मिले थे। लेकिन, 2012 में 62 मत ही बीएसपी को मिले। वाल्मीकि जातियों के 100 में से 71 मत हासिल करने में बीएसपी को 2007 में कामयाबी मिली थी। 2012 में बीएसपी के हाथ में वाल्मीकि मत सिर्फ 42 रह गए। इसीलिए जातियों के नेताओं के इस पार्टी से उस पार्टी में जाने को गंभीरता से मत लीजिए। वो नेता अपनी इज्जत बचाने के लिए कूदफांद कर रहे हैं। जातीय मत किसी नेता के हाथ में नहीं। 2017 में जातीय मान्यताओं को पूरी तरह ध्वस्त होते देखा जा सकता है।