100000 करोड़ रुपये का बैड लोन है राहुल गांधी का किसान मांग पत्र

देवरिया से दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी ने संसद मार्ग पर एक ऐसा शब्द बोल दिया कि जिस मकसद से राहुल गांधी और कांग्रेस ने पूरी खाट पर चर्चा की थी, उसके मायने ही खत्म हो गए। नरेंद्र मोदी पर सैनिकों के खून की दलाली के लिए राहुल गांधी की जमकर आलोचना हुई। इस कदर कि कांग्रेस को अपने युवराज को बचाना मुश्किल सा हो गया। ये ऐसा बयान था जिसकी आलोचना होनी ही चाहिए। लेकिन, ये बयान पूरी तरह से राजनीतिक बयान है और इसका कोई बहुत सीधा असर नहीं पड़ने वाला है। लेकिन, राहुल गांधी की बड़ी आलोचना जिस बात के लिए होनी चाहिए। उसकी चर्चा शायद ही कहीं हो रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस एक ऐसी जमीन तैयार कर रहे हैं जिससे देश की तेज तरक्की की राह में बड़ी रुकावट आ सकती है। जब केंद्र सरकार सरकारी बैंकों के डूबते कर्ज पर पूर्व सीएजी विनोद राय की अगुवाई में बनी समिति से ये चाह रही है कि सरकारी बैंकों के डूबते कर्ज से बैंकों को डूबने से बचाने की कोई राह निकाली जाए, ऐसे समय में राहुल गांधी ने सरकारी बैंकों को कम से कम 100000 करोड़ रुपये के बैड लोन के जाल में डालने की जमीन तैयार कर दी है। और ये जमीन तैयार हो रही है राहुल गांधी कि किसान यात्रा में किसानों के मांग पत्र से।
देवरिया से दिल्ली की यात्रा के दौरान राहुल गांधी का पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश के किसानों पर ही रहा। वो लगभग हर सभा में ये बताते रहे कि केंद्र सरकार बड़े-बड़े उद्योगपतियों के अरबों के कर्ज नहीं वसूल पा रही है। लेकिन, किसानों से कर्ज वसूली हर कीमत पर करना चाहती है। और उन्होंने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश के किसानों को भरोसा देने की कोशिश की, कि वो उनका कर्ज माफ कराएंगे। कमाल की बात तो ये है कि राहुल गांधी कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में उनकी सरकार आई तो 10 दिनों में किसानों का सारा कर्ज माफ कर दिया जाएगा। लेकिन, राहुल गांधी का ये आश्वासन झूठी बुनियाद पर किस तरह से टिका है, इसे देखिए। उत्तर प्रदेश में हर किसी को पता है कि इस तरह की किसान यात्रा और खाट पर चर्चा से मीडिया में भले ही कांग्रेस चर्चा में आ गई हो। लेकिन, इतना तो तय है कि अभी भी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चौथे स्थान की ही पार्टी है। हां, हो सकता है कि चौथा स्थान थोड़ा ऊपर चला आए। चलिए अब चमत्कार को नमस्कार के सिद्धांत को मानते हुए कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में सरकार बन जाती है। तो क्या किसी राज्य की सरकार के पास इस तरह के वित्तीय अधिकार होते हैं कि वो किसानों के सरकारी बैंक से लिए कर्ज को माफ कर सके। इसका जवाब भी ना में ही है। कुल मिलाकर राहुल गांधी या कांग्रेस पर निजी तौर पर किसानों को कर्ज माफ करने का सीधा कोई दबाव नहीं बनने वाला है। एक तो उत्तर प्रदेश का चुनाव नतीजा इस पर कोई असर नहीं डालेगा। दूसरा केंद्र की सरकार के लिए चुनाव 2019 में ही होना है। लेकिन, राहुल गांधी और कांग्रेस ये सब जानते हुए भी उत्तर प्रदेश के किसानों की भावना के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। साथ ही सरकारी बैंकों की पहले से बिगड़ी सेहत को और बिगाड़ने की कोशिश भी।
राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के किसानों को याद दिलाते हैं 2008 का देश का बजट। यही बजट था जिसमें तत्कालीन यूपीए की सरकार ने किसानों का 60000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया था। हालांकि, उसके बाद बैंकों का एनपीए तेजी से बढ़ा था। इसी को आधार बनाकर राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के किसानों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। या यूं समझिए कि खुद पर भरोसा दिलाने से ज्यादा नरेंद्र मोदी पर भरोसा खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी कहते हैं कि मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट्स का एक लाख करोड़ रुपये का कर्जा माफ किया है, तो फिर किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ किया जा सकता। देवरिया से दिल्ली की 26 दिन की यात्रा में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को कॉर्पोरेट समर्थक और कांग्रेस को किसान समर्थक बताने की कोशिश में किसानों को आसानी से कर्ज देने वाले सरकारी बैंकों की बैलेंसशीट पर एक बड़ी चोट की बुनियाद तैयार कर चुके हैं। अभी तक किसानों से 75 लाख मांगपत्र कांग्रेस ने भरवाए हैं। कांग्रेस का लक्ष्य है कि उत्तर प्रदेश के 2 करोड़ किसानों से कर्ज माफी का ये मांगपत्र भरवाया जाएगा। किसान मांगपत्र की एक प्रति किसान के पास और दूसरी कांग्रेस ने रखी है।
कांग्रेस की अगली तैयारी संसद सत्र में किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे को जोर शोर से उठाने की है। कुल मिलाकर राहुल गांधी और कांग्रेस की पूरी कोशिश यही होगी कि सरकार पर इस तरह के दबाव बनाया जाए कि या तो वो किसानों को कर्ज माफ करे और ये संदेश जाए कि कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ करवाया। और अगर मोदी सरकार, किसानों का कर्जा माफ नहीं करती है, तो ये जमकर प्रचारित किया जाए कि मोदी सरकार किसान विरोधी है। अब इतना तो तय है कि नरेंद्र मोदी की सरकार इस राजनीतिक कर्ज माफी को स्वीकार नहीं करने वाली। वो भी तब जब नरेंद्र मोदी की अतिमहत्वाकांक्षी योजना 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने के लक्ष्य पर काम कर रही है। लेकिन, इससे कर्जमाफी की एक जमीन तो राहुल गांधी ने तैयार कर ही दी है। जिसमें किसान कर्ज लेकर उसे माफ कराने की ही रणनीति पर काम करेगा। वैसे तो किसानों ने एक लाख रुपये से ज्यादा औसत कर्जा माफी का मांगपत्र सौंपा है। लेकिन, अगर औसत 50000 रुपये का भी एक किसान का कर्ज माना जाए और कांग्रेस 2 करोड़ किसानों से ऐसे मांगपत्र भरवाने में कामयाब हो जाती है, तो ये सीधे-सीधे 100000 करोड़ रुपये के सरकारी बैंकों के एनपीए या बैड लोन की बुनियाद पक्की होगी। और पहले से ही एनपीए की वजह से खस्ताहाल सरकारी बैंकों पर ये बड़ी चोट होगी। राहुल गांधी की आलोचना खून की दलाली वाले बयान से ज्यादा इस किसान मांगपत्र के जरिए देश का आर्थिक स्थिति कमजोर करने की कोशिश के लिए होनी चाहिए।

वैसे राहुल गांधी ने बड़ी चतुराई से ये दांव खेला है। क्योंकि, राहुल गांधी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। और अगर कुछ किसान इस मांगपत्र के भरोसे कांग्रेस के साथ आ गए, तो सोने पर सुहागा हो जाएगा। वरना ये बहस तो चल ही निकली है कि राहुल गांघी किसानों की कर्जमाफी की लड़ाई लड़ रहे हैं।
(ये लेख CatchHindi पर छपा है।)