प्रतीकों की राजनीति करते प्रतीक न बन जाएं अरविंद केजरीवाल


दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन की एक तस्वीर
प्रतीकों का इस देश में बड़ा महत्व है। एक धोती से पूरा शरीर ढंकने, सबकुछ त्याग कर देने और बिना लड़े (अहिंसक) लड़ाई के प्रतीक महात्मा गांधी ऐसे बने कि आज तक देश के राष्ट्रपिता बने हुए हैं। यहां तक कि मोहनदास करमचंद गांधी के प्रयोगों को भी प्रतीकों के तौर पर त्याग के प्रयोग मान लिया जाता है। ऐसे ही कांग्रेस भी प्रतीक बन गई। देश की आजादी की लड़ाई वाली पार्टी का। फिर नेता के तौर पर प्रतीक बन गए जवाहर लाल नेहरु, सोनिया गांधी यहां तक कि राजीव गांधी और अब सोनिया, राहुल गांधी भी। सोचिए कितने ताकतवर विचार, व्यवहार के रहे होंगे लोहिया, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी लेकिन, कितनी मुश्किल हुई इन्हें नेता के तौर पर प्रतीक बनने में। चूंकि नेता के तौर पर तो वही प्रतीक बन सके थे इस देश में जो कांग्रेसी नेता थे। ये प्रतीकों के हम भारतीयों के दिमाग में जम जाने का मसला तो कुछ ऐसा है कि मुझे ध्यान में है कि इलाहाबाद में एक भी विधायक कांग्रेस का नहीं जीतता था। सांसद होने का तो सवाल ही नहीं। लेकिन, फिर भी नेता कांग्रेस के ही शहर में बड़े थे। बड़ी मुश्किल से ये प्रतीक टूटा है। हालांकि, वो भी पूरी तरह से नहीं।

इस बात को आज के दौर के दोनों बड़े नेताओं ने समझ लिया कि या तो प्रतीक बन जाओ या प्रतीकों को ध्वस्त करो। ये दोनों नेता हैं नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल। नरेंद्र मोदी ने खुद को विकास का प्रतीक बना दिया। खुद को देश की हर समस्या के निदान का प्रतीक बना दिया। प्रतीक बना दिया नई तकनीक से जुड़ने वाले नेता। प्रतीक बना दिया कि ये स्वयंसेवक भले है लेकिन, विकास की बात हो तो मंदिर-मस्जिद कुछ भी तोड़वा सकता है। प्रतीक बना दिया खुद को इस कदर कि एक ही समय में कॉर्पोरेट और आम जनता दोनों के हितों का पैरोकार नजर आने लगा। नरेंद्र मोदी दुनिया में प्रतीक बन गए हैं ऐसे भारतीय नेता के जो आया तो सब ठीक कर देगा। वो ऐसे प्रतीक बने हैं कि शेयर बाजार सिर्फ इस सर्वे भर से उछाल मारने लगता है कि नरेंद्र मोदी 2014 में सरकार के मुखिया हो सकते हैं। दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां इसी अंदाजे में भारत के शेयर बाजार के अनुमान लगाने लगती है कि 2014 में नरेंद्र मोदी आएंगे या नहीं। वो कारोबार के प्रतीक बन गए हैं। भारत के प्रतीक बन गए हैं। नरेंद्र मोदी ऐसे प्रतीक बन गए हैं कि अमेरिका वीजा भले न दे लेकिन, हर दूसरे चौथे वहां का कोई सीनेटर ये बोल देता है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर वो उनके साथ अच्छे संबंध रखेंगे। वो ऐसे बोलते हैं जैसे अमेरिका के वीजा देने न देने से ही नरेंद्र मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने का फैसला रुका हुआ हो।

प्रतीकों की राजनीति के मामले में बाजी मार ली है अरविंद केजरीवाल ने। राजनीति के नायक अभी अरविंद केजरीवाल बने हों या न बने हों। लेकिन, मेरी निजी राय यही है कि प्रतीकों की राजनीति का इस समय का सबसे बड़ा नायक अरविंद केजरीवाल ही है। अरविंद केजरीवाल प्रतीक खुद भी बनते हैं। प्रतीक बनाते भी हैं। और प्रतीकों का बखूबी इस्तेमाल भी करते हैं। अरविंद ने पहला प्रतीक बनाया- आईआरएस की नौकरी छोड़कर समाजसेवा। मैगसेसे अवॉर्ड विजेता का प्रतीक। यानी त्याग का प्रतीक और श्रेष्ठ पुरस्कार का भी प्रतीक। अरविंद केजरीवाल देश में बदलाव के सबसे बड़े प्रतीक बन रहे थे। लेकिन, मुश्किल ये देश उन्हें त्याग, बदलाव का प्रतीक मान तो रहा था लेकिन, पूरी तरह स्वीकार नहीं रहा था। अरविंद खोज लाए एक और बड़े प्रतीक को। महाराष्ट्र में बरसों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक अन्ना हजारे हवाई जहाज से दिल्ली आ गया। धोती-कुर्ता, गांधी टोपी लगाए, सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक अन्ना के कभी बगल तो कभी पीछे खड़े अरविंद एक बड़े संगठनकर्ता के प्रतीक बन रहे थे। इस कदर कि जो भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई में उनके साथ नहीं आया वो बदलाव की लड़ाई में बाधा का प्रतीक बनता गया। शुरुआत स्वामी अग्निवेश जैसे संदिग्ध चरित्र वालों से हुई। फिर कोई मौलाना तो कोई और। अंत में तो किरन बेदी और अन्ना हजारे को भी बदलाव की लड़ाई में बाधा का प्रतीक अरविंद ने बना दिया। अरविंद केजरीवाल निश्चित तौर पर आज प्रतीकों की राजनीति के सबसे बड़े नायक हैं। इसीलिए वो किरन बेदी से पूरी तरह किनारा कर लेने के बाद भी किनारा किए दिखना नहीं चाहते। यहां तक कि किरन बेदी को दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी निस्वार्थ भाव से सौंपे दिखना चाहते हैं। वही त्याग के प्रतीक लेकिन, किरन बेदी ये अच्छे से समझ रही थीं। उन्होंने बड़े सलीके से चुनावी राजनीति में न जाने के अपने पक्ष को ठुकरा दिया। Arvind Kejriwal बिना बहस बड़े बुद्धिमान और आत्मविश्वास वाले नेता हैं। सत्ता के लालची न होने का प्रतीक बने रहने के लिए वो बिना शर्त दिए जा रहे कांग्रेस के समर्थन को जंतर मंतर पर जाकर जोर से ठुकरा देते हैं। जंतर-मंतर पर- मतलब वही कि यहां सबकुछ आप तय करते हैं वाले भ्रम का प्रतीक। लेकिन, जब वो दिल्ली की मुख्यमंत्री के लिए किरन बेदी को बुलाते हैं। जब वो हरियाणा में जाने के लिए अशोक खेमका और उत्तर प्रदेश में #AAP के विस्तार के लिए दुर्गा शक्ति नागपाल का आह्वान करते हैं। तो मुझे लगता है कि प्रतीकों को ध्वस्त करते-करते अरविंद केजरीवाल कहीं सिर्फ प्रतीकों की ही राजनीति तो नहीं करना चाहते।

अब सोचिए क्या उन्हें नहीं पता था कि किरन बेदी किसी कीमत पर फिर से उनके साथ नहीं जाएंगी। फिर भी उन्होंने सिर्फ प्रतीक के लिए किरन बेदी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने की बात कही। अब सोचिए वो अशोक खेमका की ईमानदारी के जरिए हरियाणा में जाना चाहते हैं। हरियाणा खुद उनका भी गृहप्रदेश है। लेकिन, यहां की राजनीति में भी पांव जमाने के लिए उन्हें खेमका जैसा ईमानदारी का प्रतीक चाहिए। ऐसे ही वो यूपी कैडर की अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल को AAP पार्टी में शामिल होने के लिए बुलाते हैं। सिर्फ प्रतीक के लिए। अब सोचिए जो दुर्गाशक्ति नागपाल अपना निलंबन वापस कराने के लिए आईएएस पति के साथ जाकर मुख्यमंत्री आवास में समझौता कर आती है। उसके भरोसे अरविंद केजरीवाल अपनी ईमानदार पार्टी को उत्तर प्रदेश में शीर्ष पर देखना चाहते हैं। दुर्गाशक्ति नागपाल ने अपनी अधिकारी वाली पारी की शुरुआत भर की है। और जो कुछ नोएडा में हुआ वो एक बहुत छोटा सा अधिकारों को समझकर किया गया काम था। अरविंद दूसरी पार्टियों के भी ईमानदारों को अपनी पार्टी से बगावत कर उनकी पार्टी में आने को कह रहे हैं। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि प्रतीकों की राजनीति का इस समय का सबसे नायाब चेहरा नए प्रतीक भी अब नहीं खोज पा रहा है। उसे कहां ईमानदार अधिकारियों की छवि पर भरोसा होता दिख रहा है। तो कहीं दूसरी पार्टियों के भी ईमानदार लोगों पर भरोसा करने की नौबत आ रही है। दरअसल इससे वही खतरा साबित होता दिख रहा है जिसको लेकर मैं आशंकित होता था।

दरअसल अरविंद केजरीवाल बड़ी जल्दी में हैं। इतनी जल्दी में कि अन्ना से अलग होने के बाद जल्दी से पार्टी बनाकर दिल्ली में सरकार बना लेना चाह रहे थे। अब दिल्ली विधानसभा जीतने से रह गए तो जल्दी से लोकसभा चुनाव लड़कर दिल्ली की सरकार पर काबिज हो जाना चाह रहे हैं। अब मुश्किल ये कि पूरी तरह शहरी दिल्ली और सभासदों के इलाके जितने छोटे विधानसभा क्षेत्रों में उके बनाए प्रतीक काम कर गए। लेकिन, आम आदमी पार्टी का न तो ढांचा है न ही देश भर में काम करने वाले लोग। सरकार न बने तो पार्टी/ संगठन में ही अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री या दूसरे पदों के जरिए कुछ करने का अहसास दूसरी पार्टियां देती हैं। लेकिन, अरविंद की आप में तो कोई कुछ है ही नहीं। अकेला प्रतीक अरविंद केजरीवाल। यही प्रतीक दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी, यही प्रतीक लोकसभा चुनाव हुआ तो उसमें भी और यही प्रतीक होगा अगर दिल्ली नगर निगम के चुनाव लड़ने हुए तो उसमें भी। घोर परिवारवाद वाली पार्टियों में भी अकेले प्रतीक से काम नहीं चलता। लेकिन, अरविंद दूसरा कोई प्रतीक खड़ा नहीं करना चाहते। क्योंकि, बड़ी मुश्किल से तो सारे प्रतीक उन्होंने ध्वस्त किए हैं। अरविंद केजरीवाल को इस समय इस बात को सलीके से समझना होगा कि प्रतीकों को ध्वस्त करते-बनाते वो अकेले प्रतीक रह गए हैं। दूसरी पार्टियों के हाईकमान, आलाकमान को गरियाते-गरियाते वो स्वयं उसी तरह के हो गए हैं। डर लग रहा है कि कहीं आज के समय प्रतीकों की राजनीति का सबसे बड़ा नायक आने वाले समय में खुद भी प्रतीक भर बनकर न रह जाए।