राज'नीति' और विरोध'नीति' की मानसिकता


कांग्रेस ही क्यों देश में राज करती है। ऐसा तो है नहीं कि कांग्रेस का विरोध करने वाले आज ही अरविंद केजरीवाल की शक्ल में जन्म लिए हों। आजादी के बाद से ही कांग्रेस के भीतर नेहरू-गांधी परिवार का विरोध करने वाले और बाहर पार्टी की शक्ल में कांग्रेस पार्टी का विरोध करने वाले बहुतेरे रहे हैं। सामाजिक संगठन के तौर पर दुनिया में मिसाल बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक कै पैदाइश ही कांग्रेस विरोध से हुई है। फिर सवाल ये है कि आखिर इतने विरोध, विरोधियों के बाद भी कांग्रेस ही राज कैसे करती रहती है। मुझे लगता है कि इसका जवाब ये है कि कांग्रेस सारी कमियों के बाद राजनीति करती है और विरोध करने वाले ढेर सारी अच्छाइयों के बाद भी विरोधनीति। ये विरोधनीति कई बार राजनीति पर हावी होती है और समय-समय पर देश में जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन या फिर अंत में 'आप' की अप्रत्याशित सफलता दिख जाती है। हर बार लगा है कि कांग्रेस खत्म हो गई। लेकिन, फिर वही सवाल खड़ा हो जाता है कि विरोध नीति से सरकार कैसे चल सकती है। उसके लिए तो राजनीति करनी होगी। आजादी के 65-66 सालों में लटपटाते, गिरते, पड़ते, कांग्रेस से बार-बार पिटते-पिटते विरोधनीति की अगुवा पार्टी भारतीय जनता पार्टी थोड़ा बहुत राजनीति भी सीख गई और अब ये कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है। लेकिन, जब भी सिर्फ विरोधनीति से दूसरी पार्टियां कांग्रेस की राजनीति उलटने की कोशिश में लगीं तो वो थोड़ी दूर चलकर लड़खड़ाकर गिर गईं।

ऐसा नहीं है कि राजनीति में अच्छे लोग आते नहीं हैं या अच्छे लोग आना नहीं चाहते। होता ये है कि चाहे जो पार्टी हो अच्छे लोग चाहते हैं कि सबकुछ उनके लिहाज से हो। उनको सबकुछ अच्छा मिले जिसमें वो अच्छे से काम कर सकें। कभी अच्छे लोगों को नहीं देखा कि वो खराब करने वालों से ज्यादा मेहनत करके अच्छे को अच्छा रहने दें। यहां तक कि अच्छे लोग जरा सा खराब होती परिस्थितियों में हाथ बांधकर बैठ जाते हैं कि ये सब खराब हो रहा है। ये विरोधनीति है। जबकि, जो खराब लोग होते हैं वो खराब स्थितियां बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। सबकुछ इतना खराब कर देते हैं कि लगता है कि इतनी खराब स्थितियों में तो कोई अच्छा आदमी काम ही नहीं कर सकता। दरअसल इसमें राजनीति और विरोधनीति के साथ आने वाले यश अपयश का भी बड़ी भूमिका होती है। होता ये है कि विरोधनीति करने वाले ज्यादातर लोगों को अगर देखा जाए तो वो जवाबदेही से लगभग बच जाना चाहते हैं। वो ये चाहते हैं कि चूंकि वो आदर्श नेता हैं इसलिए आदर्श स्थितियां पहले बनें तब वो आदर्श तरीके से राजनीति करेंगे वरना वो विरोधनीति से ही काम चलाएंगे। अब सोचिए- अरविंद केजरीवाल या फिर उनके दबाव में बीजेपी के डॉक्टर हर्षवर्धन क्या कर रहे हैं। दोनों में कोई भी विरोधनीति छोड़कर राजनीति की तरफ बढ़ना नहीं चाह रहा है। क्यों- क्योंकि, दोनों ही अच्छे लोग हैं। दोनों राजनीति में आदर्श स्थितियों में काम करना चाहते हैं। इसके पहले भी हर्षवर्धन के सामने से बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने दिल्ली बीजेपी के नेतृत्व की डोर खींचकर किसी और को थमा दी थी। वो आदर्श राजनीति करना चाहते थे। इसलिए विरोधनीति तो चलाते रहे। लेकिन, राजनीति करने के लिए कुछ नहीं किया। बीजेपी के ही विजय गोयल ने राजनीति करने के लिए काफी कुछ किया। अरविंद जो विरोधनीति के तहत दिल्ली सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन करते रहे। वो विजय गोयल राजनीति के लिए करते रहे। वो बेशर्मी से अरविंद क उठाए हर मुद्दे को हथियाते रहे। वो तो बुरा हो नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा का। वरना विजय गोयल तो अरविंद की पार्टी से 2-4 ज्यादा क्या बराबरी की सीटों पर भी होते तो अब तक जोड़तोड़ से सरकार बनाने की पूरी कोशिश कर रहे होते। मैं विजय गोयल की राजनीति का पक्षधर नहीं हूं। लेकिन, डॉक्टर हर्षवर्धन जैसे विरोधनीति से राजनीति की ओर बढ़ें ये जरूर चाहता हूं। अब अरविंद केजरीवाल को ही लीजिए बार-बार वो ये कह रहे हैं कि जनता ने कांग्रेस विरोधी जनादेश दिया है लेकिन, हमें विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। हम विपक्ष में बैठेंगे। उन्हीं की तरह के लेकिन, बीजेपी के नेता डॉक्टर हर्षवर्धन की तरफ से भी यही बयान आ रहा है कि हमने भी दिल्ली की जनता के लिए बड़े सपने मन में संजोए थे लेकिन, हमें वैसा जनादेश नहीं मिला इसलिए हम भी विपक्ष में बैठेंगे। ये विरोधनीति की राजनीति करने वाले दोनों नेताओं के बयान हैं। और जरा खांटी राजनीति करके सबको विरोधी बना देने वाली कांग्रेस पार्टी के नेताओं के बयान सुनिए। वो आप को बिना शर्त समर्थन देने को तैयार हैं। वो किसी भी तरह राजनीति करना चाह रहे हैं। सरकार बनाना चाह रहे हैं। दिक्कत यही है राजनीतिऔर विरोधनीतिकी मानसिकता की। अब सोचिए आठ सीटों वाली कांग्रेस किसी भी तरह राजनीति करना चाह रही है सरकार बनाना चाह रही है और 34 और 28 सीटों वाली बीजेपी और आप विरोधनीति करके ही चेहरा चमका रहे हैं। सरकार बनाने से बचना चाह रहे हैं। फिर बताइए जनता चुनाव किसलिए करती है। सिर्फ विरोध के लिए या चुनाव के लिए।

मात्र यही राज'नीति' और विरोध'नीति' का फर्क है जिसकी वजह से Congress ने देश में सबसे लंबे समय तक राज किया। मेरी नजर में सबसे बड़ी वजह ये कि उसने लोगों के दिमाग में ये भर दिया कि सरकार चलाना तो कांग्रेस को ही आता है। BJP के लिए शानदार विपक्ष और फिर हमारी नीतियों जैसी ही सरकार वाली पार्टी का ठप्पा लगाने का काम भी कांग्रेस के प्रचार तंत्र ने बड़े सलीके से कर दिया। अब AAP इसी में फंसती दिख रही है। अभी तो नैतिकता के ऊंचे आदर्श पर सफल हुए अरविंद केजरीवाल को ये नहीं दिखेगा लेकिन, सच्चाई यही है कि चुनाव खत्म होते ही फिर चुनाव की आहट से कुछ अरविंद समर्थक भारतीयों पर ये जुमला काम करता दिख रहा है कि सरकार चलाना तो कांग्रेस को ही आता है। और सबसे बड़ी बात कांग्रेस ये प्रचार करेगी ही। Social Media पर सलीके से काबिज BJP का प्रचार तंत्र भी 'आप' की मिट्टी पलीद करने में लग गया है। जहां तक सार्वजनिक पैंतरे की बात है तो डॉक्टर हर्षवर्धन की शक्ल में बीजेपी के पास भी अरविंद केजरीवाल से कम साफ सुथरा चेहरा नहीं है। सोचिए कि अरविंद को तो अभी राजनीति को दलदल में पूरी तरह उतरना है बमुश्किल सवाल साल की बनी पार्टी के नेता हैं अरविंद। डॉक्टर हर्षवर्धन पिछले करीब तीन दशक से दिल्ली की राजनीति के जाने-पहचाने चेहरे हैं फिर भी बेदाग हैं। इसलिए AAP, BJP दोनों को समझना होगा कि देश में कांग्रेस विरोधी लंबे समय से बहुत हैं फिर भी कांग्रेस ही क्यों अल्पमत, बहुमत, जोड़ तोड़ की सरकार चलाने में कामयाब रहती है। #AAP हो या BJP दोनों को ये समझना होगा कि जनभावना पर खरे उतरने के लिए सरकार बनानी पड़ती है, चलानी पड़ती है। विरोधनीति से सरकार बनाने के करीब पहुंचा जा सकता है। सरकार बन भी सकती है। लेकिन, सरकार चलाने के लिए राजनीति चाहिए। कांग्रेस विरोधी पार्टियों को जनता के साथ, जनता के लिए राजनीति करनी होगी। वरना विरोधनीति का गुब्बारा फूटेगा और कांग्रेस फिर से राजनीति के जरिए सरकार बनाएगी, राज करेगी। विरोधनीति वाले बस विरोध करने के लिए बचे रह जाएंगे।