जनता के पसीने की कमाई, निजी कंपनियों को मलाई



भ्रष्टाचार के एक और बड़े मुद्दे ने लेफ्ट-राइट को एक साथ ला खड़ा किया है। निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने की सरकारी कोशिशों की जिक्र सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आने के बाद विपक्ष हमलावर हो गया है। हालांकि, सरकार इस मामले को हल्का करने की कोशिश कर रही है और इस मामले पर पत्रकारों को सही रिपोर्टिंग की सलाह दे रही है। और, ये समझाने की कोशिश कर रही है कि सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट आखिरी पड़ताल नहीं है। लेकिन, इसने विपक्ष को तगड़ा मुद्दा दे दिया है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने सरकार पर हमला बोल दिया कि सरकार ने राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करके निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। पिछले शुक्रवार को सीएजी रिपोर्ट में रिलायंस और दूसरी निजी कंपनियों को फायदे के आरोप पर बीजेपी और लेफ्ट ने एक साथ हमला बोला।


बीजेपी की तरफ से वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी थे तो, लेफ्ट की तरफ से सीताराम येचुरी। जोशी और येचुरी दोनों ने ही साफ कहा कि इसकी जांच होनी जरूरी है। जोशी ने सवाल उठाया है कि आखिर तेल रिपोर्ट लीक कैसे हो गई। जोशी ने ये भी सवाल खड़ा किया है कि कोई भी रिपोर्ट बिना संसद में पेश हुए कैसे कहीं पब्लिश की जा सकती है। पहले से ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जूझ रही सरकार के लिए निजी कंपनियों को तेल के खेल में फायदा पहुंचाने का आरोप और भारी पड़ता दिख रहा है। और, सबसे बड़ी बात ये है कि इस मुद्दे पर लेफ्ट-राइट दोनों साथ हैं। इससे इस मामले की सीबीआई जांच होनी तय दिख रही है। सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि सरकार देश के प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों को गलत इस्तेमाल के लिए सौंप चुकी है और इसकी जांच होनी जरूरी है।


देश उद्योगपति चलाते हैं ये बात अकसर आम लोगों की चर्चा में आती रहती है। लेकिन, उद्योगपति देश चलाने में किस कदर हावी हो रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कि अब निजी कंपनियों की कमाई बढ़ाने के लिए खुद सरकार और सरकारी हितों की चिंता के लिए बनाए गए विभाग निजी कंपनियों के पक्ष में बनी-बनाई नीतियों की ऐसी-तैसी करने से नहीं चूक रहे हैं। ताजा मामला तेल की खोज के बहाने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने का दावा करने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज और केयर्न को नियमों की अनदेखी करके फायदा पहुंचाने का है।

देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था सीएजी की ताजा रिपोर्ट में जो निकलकर आ रहा है वो, चौंकाने वाला है। रिपोर्ट साफ कह रही है कि रिलायंस ने केजी यानी कृष्णा गोदावरी बेसिन में जो, खोज की है उसके लिए उसने सरकार से वो रकम भी वसूल ली है जो, रकम खर्च ही नहीं हुई थी। रिलायंस को उसके ऑफशोर पेट्रोलियम उत्पाद की खोज में लगे पेट्रो उत्पाद की खोज के लिए रकम भी ज्यादा दी गई। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2007-08 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा गोदावरी बेसिन में ऑपरेशंस के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपनी सहयोगी कंपनी से ही ऊंची कीमत पर डीजल खरीदा और सरकार से 745 मिलियन डॉलर यानी करीब साढ़े तीन हजार करोड रुपए की रिकवरी का दावा पेश कर दिया। जबकि, रिलायंस ने ये रकम खर्च ही नहीं की थी।

रिलायंस ने कमाल का तेल का खेल किया है। सीएजी की रिपोर्ट में साफ नजर आ रहा है कि किस तरह से कंपनी ने अपनी ही सहयोगी कंपनी को ऑपरेशंस के लिए डीजल की बोली सौंप दी। 2006 में के जी बेसिन में तेल कुओं की खोज के लिए बोली लगी तो, रिलायंस की सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड ने 25457 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। जबकि, इंडियन ऑयल ने उससे कम 23,054 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। लेकिन, रिलायंस ने सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल की कीमत में ही एक्साइज ड्यूटी और दूसरे टैक्स जोड़ दिए जिससे इंडियन ऑयल की बोली महंगी हो गई और रिलायंस ने अपनी ही सहयोगी कंपनी रिलायंस पेट्रो मार्केटिंग लिमिटेड को 25457 रुपए प्रति किलोलीटर पर 4000 किलोलीटर का ऑर्डर कर दिया। जबकि, सीएजी की राय साफ है कि एनईएलपी यानी न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत यहां एक्सपोर्ट ड्यूटी लगनी ही नहीं थी।

इतना ही नहीं के जी बेसिन के लिए 2008 में एक और बोली मंगाई। जिसमें सरकारी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम ने 23463 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। रिलायंस ने इन कंपनियों को इसी आधार पर एक मार्च 2008 को पांच-पांच हजार किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। लेकिन, ये दोनों कंपनियां सप्लाई करतीं इससे पहले ही 4 मार्च 2008 को ऑपरेटर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक इंटर्नल नोट जारी करके कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डीजल की कमी के कारण सरकारी तेल कंपनियां डीजल की सप्लाई करने की हालत में नहीं हैं। और, इसी आधार पर रिलायंस ने तीन दिन बाद ही फिर से अपनी सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड को 31,601 रुपए प्रति किलोलीटर के भाव पर 3600 किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। ये सीधे-सीधे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के भाव से 8137 रुपए प्रति किलोलीटर ज्यादा था। हालांकि, रिलायंस ने मीडिया में बयान जारी किया है कि उसे अभी तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं मिली है। और, वो एक जिम्मेदार ऑपरेटर की तरह पीएससी यानी प्रोडक्ट शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट के नियमों से बंधी है। रिलायंस गुजरात के जामनगर में 330 लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी चलाती है। इसमें एक एक्सपोर्ट यूनिट भी शामिल है। खैर, रिलायंस लाख सफाई दे और सरकार इस गड़बड़झाले को दबाने की कोशिश करे। लेकिन, मीडिया में इस घोटाले की खबर खबर आने के बाद से रिलायंस के शेयरों में जोरदार गिरावट देखने को मिली है। हफ्ते के पांचों कारोबारी दिन लगातार रिलायंस के शेयरों में गिरावट देखने को मिली है। शुक्रवार को बाजार बंद हुआ तो, रिलायंस का शेयर 52 हफ्ते के निचले स्तर पर लुढ़क गया और 868 रुपए के भाव पर चला गया।

सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में रिलायंस को नियमों से बाहर जाकर सरकारी संरक्षण मिलने की लंबी लिस्ट है। इसमें कहा गया है कि रिलायंस को तीन बार से ज्यादा अपना कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने की इजाजत दी गई। इसकी वजह से के जी तेल-गैस क्षेत्र में रिलायंस का कैपिटल एक्सपेंडिचर बारह हजार करोड़ रुपए से बढ़कर पैंतालीस हजार करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान रिलायंस ने इस फील्ड के उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर करीब दोगुना कर दिया। हालांकि, के जी बेसिन में डी 6 ब्लॉक में रिलायंस के उत्पादन अनुमान पर बार-बार संदेह किया जा रहा है।

सीएजी की रिपोर्ट में जो बात सामने आ रही है उसके मुताबिक, तेल और गैस उत्पादन पर निगाह रखने वाले नियंत्रक डीजीएच यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन ने सरकारी हितों की रक्षा करने के बजाए निजी तेल-गैस खोजने वाली कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। रिपोर्ट बता रही है कि कम से कम तीन निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी की गई है या फिर नियमों को बदला गया है। जाहिर है, सरकारी गड़बड़ियों की मिसाल सिर्फ रिलायंस के ही हक में नहीं है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में जिन तीन निजी कंपनियों की बात की गई है वो, हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज, केयर्न और ब्रिटिश गैस। कहा जा रहा है कि इन कंपनियों को मंत्रालय और डीजीएच की तरफ से नियमों में ऐसी ढील दी गई जिससे सरकारी नुकसान हुआ और इन कंपनियों को फायदा पहुंचा है।

रिलायंस के अलावा केयर्न इंडस्ट्रीज को भी सरकार की तरफ से फायदा पहुंचाया गया है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आरोप है कि राजस्थान के बाड़मेर में केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से हटके फायदा पहुंचाने का आरोप लगा है। केयर्न बाड़मेर में देश का सबसे बड़ा ऑनलैंड ऑयलफील्ड ऑपरेट कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल मंत्रालय और तेल और गैस खोजने वाली कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए बनी सरकारी संस्था डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने नियमों की जमकर अनदेखी की है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट में तय 11108 वर्ग किलोमीटर के अलावा 1708 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र दिया गया जो, पूरी तरह से शर्तों को उल्लंघन है। सीएजी की रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि तेल मंत्रालय और डीजीएच ने पिछले दरवाजे से निजी तेल कंपनियों को कई तरह से फायदा पहुंचाया। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, बीजी यानी ब्रिटिश गैस और सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी के ज्वाइंट वेंचर वाले पन्ना मुक्ता और ताप्ती ग्रुप की गैस फील्ड पर भी सीएजी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

अब मीडिया में मामला आने के बाद और विपक्ष के हमलावर होने के बाद हो सकता है कि सरकार इसमें कुछ कार्रवाई करे। लेकिन, लगातार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह से सामने आ रहे हैं। और, उन मामलों पर सरकार बलि का बकरा खोजकर ही कार्रवाई की इतश्री कर ले रही है। उससे अंदेशा है कि इस मामले में भी कुछ डीजीएच और तेल मंत्रालय के अधिकारियों पर कार्रवाई कर कहीं लीपापोती न कर दी जाए। जिसकी शुरुआत सरकारी बयानों के जरिये हो भी चुकी है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)