2000-2001 में इलाहाबाद महाकुंभ में रिपोर्टिंग के समय दुनिया भर के बाबाओं और साधुओं की हकीकत देखी थी। ऐसा नहीं है कि सब ढोंगी ही थे। कई संत ऐसे भी थे जिन्हें देखकर-मिलकर उनकी संगत का मन होता था। लेकिन, बड़ी संख्या ऐसे ही बाबाओं की थी जिनके लिए प्रयाग के महाकुंभ की रेती पर उनका आश्रम विदेशी-देसी मालदार भक्तों को बढ़ाने का जरिया भर था। मुझे याद है कि रिपोर्टिंग के दौरान एक रमेश तांत्रिक के आश्रम में हम लोग पहुंच गए थे। अब मुझे नहीं पता कि वो, तांत्रिक होने का दावा करने वाला बाबा क्या कर रहा है। लेकिन, उस समय वो सिर्फ और सिर्फ विदेशियों को नशे की पिनक में रेती पर लोटने का आनंद देकर उनसे ज्यादा से ज्यादा वसूली का तंत्र फैला रहा था। हम लोगों को वो ज्यादा सम्मान इसलिए भी दे रहा था कि उसका फंडा एकदम साफ था। उसने कुटिल मुस्कान के साथ कहाकि देखो अखबार-टीवी से विदेशी भक्त नहीं मिलेंगे। विदेशी भक्त तो इंटरनेट से मिलेंगे।
उस समय मैं http://www.webdunia.com/ के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। आपको लग रहा होगा अचानक मुझे करीब 10 साल पहले की घटना क्यों याद आ रही है। दरअसल इसके याद आने के पीछे एक वजह ये भी है कि इसी समय एक वीडियो मैंने देखा था जिसमें सत्यमसाईं बाबा के चमत्कारों की असलियत बताई गई थी। दिखाया गया था कि किस तरह से सत्यसाईं लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। आज अचानक जब मैं आज इंदिरा गांधी के विशेष कार्यक्रमों की खोज में टीवी पर पहुंचा तो, खबर दिखी किस तरह से ढोंगी सत्यसाईं के चरणों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के साथ पूरी सरकार झुकने को बेताब है। मुझे लगा कि क्या तमाशा है चव्हाण और उनकी पूरी सरकार कैसे पूरे राज्य को एक ऐसे व्यक्ति का अअंधभक्त बनने के लिए प्रेरित कर सकती है जिसके चमत्कारों की पोल देसी-विदेशी, हिंदी-अग्रेजी चैनल जाने कितनी बार खोल चुके हैं।
अब अगर अशोक चव्हाण को उनके मुख्यमंत्री बनने में बाबा का चमत्कार दिख रहा है तो, इसके लिए सत्यसाईं बड़े अपराधी साबित होंगे क्योंकि, चव्हाण को मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया कि तब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई और देश की शान ताज पर हमले को भांप-समझ नहीं पाए। उसके बाद जो, घटनाक्रम बने उस शर्म-छीछालेदर से बचने के लिए कांग्रेस को चव्हाण को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। चव्हाण नेताओं में नौजवान थे। मैं उस समय मुंबई में ही था अच्छा लगा था। लेकिन, इस तरह से अशोक चव्हाण सत्यसाईं के चरणों में लोट जाएंगे अंदाजा न था। टीवी की फुटेज में कांग्रेस-एनसीपी सरकार के ढेर सारे मंत्रियों के अलावा पुराने गृहमत्री शिवराज पाटिल भी दिख रहे थे। पता चला कि मुख्यमंत्री के सरकारी निवास 'वर्षा' पर अशोक चव्हाण सत्यसाईं का चरण पूजन करेंगे।
अशोक चव्हाण ने इससे पहले बाबा को बांद्रा वर्ली सी लिंक भी घुमाया था ताकि, पुल को बाबा का 'आशीर्वाद' मिल सके। अब सोचिए खबर जब इसे बरसों की मेहनत के बाद बनाने वाले इंजीनियरों-मजदूरों को पता चली होगी तो, उनके दिल पर क्या गुजरी होगी। खैर, ऐसे बाबाओं के किस्से अनंत हैं और इनके चरणों में गिरने वाले राजनेताओं के भी। नरसिंहाराव के समय में तांत्रिक चंद्रास्वामी के जलवे तो किसी को भूले नहीं होंगे। अब तो बस यही लगता है कि काश घूरा बनने का भी समय तय होता
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Sunday, November 01, 2009
Sunday, August 03, 2008
घूरा बनने में कितना दिन लगता है
यूपी-बिहार में ये आम कहावत है कि घूरे का दिन भी आता है। घूरा मतलब शहरी लोग कम समझते होंगे। वही घूरा जहां, गांव-घर में बाहर गोबर-गंदगी डाली जाती है। ये काफी-कुछ उस जुमले का और देसी संस्करण है जो, बातचीत में आता है कि हर कुत्ते का दिन आता है। अंग्रेजी में EVERY DOG HAS ITS DAY तो, सबको पता ही होगा।
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लेकिन, आजतक मुझे ये जुमला-कहावत कभी उलट के नहीं सुनाई दिया कि आखिर कोई भी जगह, व्यक्ति या संस्थान कितने दिन में घूरा बन जाता है। और, ये सवाल मेरे मन में उठा अचानक कई सालों बाद नेमिचंद्र जैन उर्फ तांत्रिक चंद्रास्वामी की प्रतिष्ठा देखकर। शनिवार को मुंबई के ज्यादातर अखबारों में बांद्रा के रंग बिरंगे स्काईवॉक पर तांत्रिक चंद्रास्वामी अपनी पुरानी वेशभूषा में-माथे पर बड़ा सा गोल, कई रंगों वाला टीका लगाए बैठे थे। और, चंद्रास्वामी के सामने पूरी आस्था से झुका स्काईवॉक बनाने वाला कॉन्ट्रैक्टर दंपति बैठा था। पता नहीं किसी टीवी चैनल ने इसे कवर किया था या नहीं। क्योंकि, मैं दो दिनों से न्यूज चैनल देख नहीं पाया हूं।
चंद्रास्वामी स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी को दूर भगाने आए थे। चंद्रास्वामी का दावा है कि स्काईवॉक के आसपास ढेर सारी निगेटिव एनर्जी है जिससे पुल को और इस पर चलने वालों को नुकसान हो सकता है। लेकिन, चंद्रास्वामी की पूजा के बाद ये निगेटिव एनर्जी दूर हो जाएगी। अब टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के साथ मुफ्त बंटने वाले टेबलॉयड मुंबई मिरर के संवाददाता की बुद्धि भी देखिए। वो, भी चंद्रास्वामी की निगेटिव एनर्जी की बात से जोड़कर ये भी बता रहा है कि लोगों को शुरू में स्काईवॉक कांपता दिखा। ऐसा करके वो, एक तरह से चंद्रास्वामी में कुछ लोगों की आस्था जगाने का काम तो कर ही दिया होगा।
ये वही चंद्रास्वामी हैं जो, करीब तीन दशकों तक देश के बड़े-बड़े लोगों को निगेटिव एनर्जी से दूर रखते थे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और नरसिम्हाराव के समय में तो, प्रधानमंत्री कार्यालय और घर से लेकर देश भर तक की निगेटिव ऊर्जा चंद्रास्वामी के ही प्रताप से दूर होती थी। लेकिन, सबकी निगेटिव ऊर्जा भगाते-भगाते स्वामी जी के ऊपर ही निगेटिव एनर्जी हावी हो गई और, चंद्रास्वामी और निजी सचिव मामाजी जेल तक पहुंच गए। लखूभाई पाठक ने एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप भी लगा डाला। निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी के यहां भीख में समय मांगने वाले अचानक गायब से हो गए।
फिर काफी दिन बाद चंद्रास्वामी को जमानत मिल गई है। चंद्रास्वामी फिर पीछे के दरवाजे से सक्रिय हो गए हैं। मुंबई के पहले स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी भगाने आए। अब पता नहीं कितनी जगह की निगेटिव एनर्जी भगाएंगे। मुझे चंद्रास्वामी के किस्से इलाहाबाद में खूब सुनने को मिलते थे। इलाहाबाद के ECC डिग्री कॉलेज का पूर्व अध्यक्ष विक्रम सिंह चंद्रास्वामी के बेहद नजदीक था। और, हाल ये था के ज्यादातर छात्रनेता अकसर कॉफी हाउस या फिर विश्वविद्यालय कैंपस में ही चंद्रास्वामी के गुणगान करते मिल जाते थे। वजह ये थी कि जिस छात्रनेता ने भी निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी का चरण चांपन एक बार दिल्ली जाकर कर लिया। उसे कुछ आर्थिक सहायता देकर स्वामी उसकी कुछ निगेटिव एनर्जी तो दूर कर ही दिया करते थे। एक बार विक्रम सिंह इलाहाबाद आया तो, सैकड़ो गाड़ियों के काफिले में शहर का चक्कर लगाया तो, उसके राजनीतिक जमीन तैयारी करने की कोशिश के भी कयास लगे।
उसके बाद चंद्रास्वामी के दिन खराब हुए तो, विक्रम सिंह का न तो, अता-पता रह गया। न चंद्रास्वामी के दिल्ली आश्रम से जुड़े किस्सों का। अब चंद्रास्वामी जैसे घूरे का दिन तो फिर बहुर रहा है। हो सकता है कि इस बार इलाहाबाद जाऊं तो, फिर से चंद्रास्वामी के कुछ किस्से सुनने को मिल जाएं। अब घूर के दिन बहुरने का तो सबको पता है। लेकिन, अगर आपमें से किसी को पता हो तो, मुझे ये जरूर बताइएगा कि घूरा बनता कितने दिन-महीने-साल में है।
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लेकिन, आजतक मुझे ये जुमला-कहावत कभी उलट के नहीं सुनाई दिया कि आखिर कोई भी जगह, व्यक्ति या संस्थान कितने दिन में घूरा बन जाता है। और, ये सवाल मेरे मन में उठा अचानक कई सालों बाद नेमिचंद्र जैन उर्फ तांत्रिक चंद्रास्वामी की प्रतिष्ठा देखकर। शनिवार को मुंबई के ज्यादातर अखबारों में बांद्रा के रंग बिरंगे स्काईवॉक पर तांत्रिक चंद्रास्वामी अपनी पुरानी वेशभूषा में-माथे पर बड़ा सा गोल, कई रंगों वाला टीका लगाए बैठे थे। और, चंद्रास्वामी के सामने पूरी आस्था से झुका स्काईवॉक बनाने वाला कॉन्ट्रैक्टर दंपति बैठा था। पता नहीं किसी टीवी चैनल ने इसे कवर किया था या नहीं। क्योंकि, मैं दो दिनों से न्यूज चैनल देख नहीं पाया हूं।
चंद्रास्वामी स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी को दूर भगाने आए थे। चंद्रास्वामी का दावा है कि स्काईवॉक के आसपास ढेर सारी निगेटिव एनर्जी है जिससे पुल को और इस पर चलने वालों को नुकसान हो सकता है। लेकिन, चंद्रास्वामी की पूजा के बाद ये निगेटिव एनर्जी दूर हो जाएगी। अब टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के साथ मुफ्त बंटने वाले टेबलॉयड मुंबई मिरर के संवाददाता की बुद्धि भी देखिए। वो, भी चंद्रास्वामी की निगेटिव एनर्जी की बात से जोड़कर ये भी बता रहा है कि लोगों को शुरू में स्काईवॉक कांपता दिखा। ऐसा करके वो, एक तरह से चंद्रास्वामी में कुछ लोगों की आस्था जगाने का काम तो कर ही दिया होगा।
ये वही चंद्रास्वामी हैं जो, करीब तीन दशकों तक देश के बड़े-बड़े लोगों को निगेटिव एनर्जी से दूर रखते थे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और नरसिम्हाराव के समय में तो, प्रधानमंत्री कार्यालय और घर से लेकर देश भर तक की निगेटिव ऊर्जा चंद्रास्वामी के ही प्रताप से दूर होती थी। लेकिन, सबकी निगेटिव ऊर्जा भगाते-भगाते स्वामी जी के ऊपर ही निगेटिव एनर्जी हावी हो गई और, चंद्रास्वामी और निजी सचिव मामाजी जेल तक पहुंच गए। लखूभाई पाठक ने एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप भी लगा डाला। निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी के यहां भीख में समय मांगने वाले अचानक गायब से हो गए।
फिर काफी दिन बाद चंद्रास्वामी को जमानत मिल गई है। चंद्रास्वामी फिर पीछे के दरवाजे से सक्रिय हो गए हैं। मुंबई के पहले स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी भगाने आए। अब पता नहीं कितनी जगह की निगेटिव एनर्जी भगाएंगे। मुझे चंद्रास्वामी के किस्से इलाहाबाद में खूब सुनने को मिलते थे। इलाहाबाद के ECC डिग्री कॉलेज का पूर्व अध्यक्ष विक्रम सिंह चंद्रास्वामी के बेहद नजदीक था। और, हाल ये था के ज्यादातर छात्रनेता अकसर कॉफी हाउस या फिर विश्वविद्यालय कैंपस में ही चंद्रास्वामी के गुणगान करते मिल जाते थे। वजह ये थी कि जिस छात्रनेता ने भी निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी का चरण चांपन एक बार दिल्ली जाकर कर लिया। उसे कुछ आर्थिक सहायता देकर स्वामी उसकी कुछ निगेटिव एनर्जी तो दूर कर ही दिया करते थे। एक बार विक्रम सिंह इलाहाबाद आया तो, सैकड़ो गाड़ियों के काफिले में शहर का चक्कर लगाया तो, उसके राजनीतिक जमीन तैयारी करने की कोशिश के भी कयास लगे।
उसके बाद चंद्रास्वामी के दिन खराब हुए तो, विक्रम सिंह का न तो, अता-पता रह गया। न चंद्रास्वामी के दिल्ली आश्रम से जुड़े किस्सों का। अब चंद्रास्वामी जैसे घूरे का दिन तो फिर बहुर रहा है। हो सकता है कि इस बार इलाहाबाद जाऊं तो, फिर से चंद्रास्वामी के कुछ किस्से सुनने को मिल जाएं। अब घूर के दिन बहुरने का तो सबको पता है। लेकिन, अगर आपमें से किसी को पता हो तो, मुझे ये जरूर बताइएगा कि घूरा बनता कितने दिन-महीने-साल में है।
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