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Sunday, August 03, 2008

घूरा बनने में कितना दिन लगता है

यूपी-बिहार में ये आम कहावत है कि घूरे का दिन भी आता है। घूरा मतलब शहरी लोग कम समझते होंगे। वही घूरा जहां, गांव-घर में बाहर गोबर-गंदगी डाली जाती है। ये काफी-कुछ उस जुमले का और देसी संस्करण है जो, बातचीत में आता है कि हर कुत्ते का दिन आता है। अंग्रेजी में EVERY DOG HAS ITS DAY तो, सबको पता ही होगा।


लेकिन, आजतक मुझे ये जुमला-कहावत कभी उलट के नहीं सुनाई दिया कि आखिर कोई भी जगह, व्यक्ति या संस्थान कितने दिन में घूरा बन जाता है। और, ये सवाल मेरे मन में उठा अचानक कई सालों बाद नेमिचंद्र जैन उर्फ तांत्रिक चंद्रास्वामी की प्रतिष्ठा देखकर। शनिवार को मुंबई के ज्यादातर अखबारों में बांद्रा के रंग बिरंगे स्काईवॉक पर तांत्रिक चंद्रास्वामी अपनी पुरानी वेशभूषा में-माथे पर बड़ा सा गोल, कई रंगों वाला टीका लगाए बैठे थे। और, चंद्रास्वामी के सामने पूरी आस्था से झुका स्काईवॉक बनाने वाला कॉन्ट्रैक्टर दंपति बैठा था। पता नहीं किसी टीवी चैनल ने इसे कवर किया था या नहीं। क्योंकि, मैं दो दिनों से न्यूज चैनल देख नहीं पाया हूं।

चंद्रास्वामी स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी को दूर भगाने आए थे। चंद्रास्वामी का दावा है कि स्काईवॉक के आसपास ढेर सारी निगेटिव एनर्जी है जिससे पुल को और इस पर चलने वालों को नुकसान हो सकता है। लेकिन, चंद्रास्वामी की पूजा के बाद ये निगेटिव एनर्जी दूर हो जाएगी। अब टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के साथ मुफ्त बंटने वाले टेबलॉयड मुंबई मिरर के संवाददाता की बुद्धि भी देखिए। वो, भी चंद्रास्वामी की निगेटिव एनर्जी की बात से जोड़कर ये भी बता रहा है कि लोगों को शुरू में स्काईवॉक कांपता दिखा। ऐसा करके वो, एक तरह से चंद्रास्वामी में कुछ लोगों की आस्था जगाने का काम तो कर ही दिया होगा।

ये वही चंद्रास्वामी हैं जो, करीब तीन दशकों तक देश के बड़े-बड़े लोगों को निगेटिव एनर्जी से दूर रखते थे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और नरसिम्हाराव के समय में तो, प्रधानमंत्री कार्यालय और घर से लेकर देश भर तक की निगेटिव ऊर्जा चंद्रास्वामी के ही प्रताप से दूर होती थी। लेकिन, सबकी निगेटिव ऊर्जा भगाते-भगाते स्वामी जी के ऊपर ही निगेटिव एनर्जी हावी हो गई और, चंद्रास्वामी और निजी सचिव मामाजी जेल तक पहुंच गए। लखूभाई पाठक ने एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी का आरोप भी लगा डाला। निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी के यहां भीख में समय मांगने वाले अचानक गायब से हो गए।

फिर काफी दिन बाद चंद्रास्वामी को जमानत मिल गई है। चंद्रास्वामी फिर पीछे के दरवाजे से सक्रिय हो गए हैं। मुंबई के पहले स्काईवॉक से निगेटिव एनर्जी भगाने आए। अब पता नहीं कितनी जगह की निगेटिव एनर्जी भगाएंगे। मुझे चंद्रास्वामी के किस्से इलाहाबाद में खूब सुनने को मिलते थे। इलाहाबाद के ECC डिग्री कॉलेज का पूर्व अध्यक्ष विक्रम सिंह चंद्रास्वामी के बेहद नजदीक था। और, हाल ये था के ज्यादातर छात्रनेता अकसर कॉफी हाउस या फिर विश्वविद्यालय कैंपस में ही चंद्रास्वामी के गुणगान करते मिल जाते थे। वजह ये थी कि जिस छात्रनेता ने भी निगेटिव एनर्जी भगाने के लिए चंद्रास्वामी का चरण चांपन एक बार दिल्ली जाकर कर लिया। उसे कुछ आर्थिक सहायता देकर स्वामी उसकी कुछ निगेटिव एनर्जी तो दूर कर ही दिया करते थे। एक बार विक्रम सिंह इलाहाबाद आया तो, सैकड़ो गाड़ियों के काफिले में शहर का चक्कर लगाया तो, उसके राजनीतिक जमीन तैयारी करने की कोशिश के भी कयास लगे।

उसके बाद चंद्रास्वामी के दिन खराब हुए तो, विक्रम सिंह का न तो, अता-पता रह गया। न चंद्रास्वामी के दिल्ली आश्रम से जुड़े किस्सों का। अब चंद्रास्वामी जैसे घूरे का दिन तो फिर बहुर रहा है। हो सकता है कि इस बार इलाहाबाद जाऊं तो, फिर से चंद्रास्वामी के कुछ किस्से सुनने को मिल जाएं। अब घूर के दिन बहुरने का तो सबको पता है। लेकिन, अगर आपमें से किसी को पता हो तो, मुझे ये जरूर बताइएगा कि घूरा बनता कितने दिन-महीने-साल में है।

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