Wednesday, June 01, 2022

हरियराए से झुराए जाए तक

हर्ष वर्धन त्रिपाठी



कल सुबह भी सैर के निकले तो पेड़ों की शाखाएँ टूट-टूटकर गिरी हुईं थीं, लेकिन तब यह बात मन मथने जैसी लगी ही नहीं, लेकिन आज सुबह की सैर में निकला तो एक के एक अपनी शाखाएँ छोड़कर स्वतंत्र हो गए, पेड़ से अब सिर्फ डाली रह गए तो बिना कुछ सोचे ही मन में मथनी सी चलने लगी कि, क्या से क्या हो गया। मोटा-मोटा दो दिन-48 घंटे भी रंगत बची रह सकी। पेड़ में टिकी शाख के पत्ते और टूटी शाख के पत्तों की रंगत एकदम तेजी से बदल गयी थी। इतनी तेजी से कि, अगर उसी पेड़ के पास अभी पड़े होते तो भ्रम सकता था कि, यह शाखा इस पेड़ की है भी या नहीं। भला हो नोएडा प्राधिकरण का कि, दिल्ली की तरह से तेजी से 30 मई को आई आंधी से टूटी शाखों को हटाया नहीं। नोएडा प्रशासन के पास यह गुंजाइश थी। दिल्ली से कम यहाँ पुराने पेड़ हैं तो अपनी शाखों से टूटे भी कम और दिल्ली में टूटी शाखों को बिना हटाए लोगों का आवागमन रुक जाता। दिल्ली में सब दिखता भी ज्यादा है तो दबाव में शाखों के झुराने (सूख जाने) की प्रतीक्षा करने की स्थिति में दिल्ली नगर निगम नहीं था। नोएडा प्रशासन प्रतीक्षा कर सकता है कि, टूटी हुई शाखें अच्छे से सूख जाएँ, फिर उन्हें हटाने में आसानी होगी। यह भी एक उम्मीद कि, नोएडा के गाँवों के आसपास के कुछ लोग टूटी शाखों को उठा ले जाएंगे तो कुछ काम कम हो जाएगा। 

दरअसल, शाखों से टूटने के बाद कितना भी अच्छा वृक्ष हो, उसकी पहचान बस उपयोग में आने वाली लकड़ी से ही होती है। तो उसकी हरियाली किसी को लुभाती है और ही वातावरण खुशनुमा करने में उसकी कोई भूमिका रह जाती है। ऐसे में बहुत अच्छी लकड़ी वाला उपयोगी पेड़ है तो हो सकता है कि, किसी अच्छे घर में किसी तरह के फर्नीचर के तौर पर ज्यादा या कम चमकता पड़ा रहे, लेकिन जीवन और उसकी हरियाली तो लौटने से रही। बचपन में लगभग हर पाठ्यक्रम में वृक्ष और उनकी शाखों के बारे में अवश्य पढ़ाया जाता है। नाना प्रकार के वृक्षों के बारे में भी पढ़ाया जाता है। कुछ बीज से वृक्ष बनते हैं। कुछ डाली से वृक्ष बन जाते हैं। कुछ खाद-पानी देना पड़ता है। कुछ को बरसों समय लगता है। कुछ को खाद पानी चाहिए, उनको समय लगता है, लेकिन ऐसे वृक्ष कँटीले, झाड़ झंखाड़ जैसे होते हैं। पहली फुर्सत में यह काट छाँटकर निपटा दिए जाते हैं। वैसे तो वृक्ष, पौधे आदि के बारे में बच्चों को वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण के बारे में ज्ञान बढ़ाने के लिए पढ़ाया जाता है, लेकिन मेरा मन मंथन हुआ तो लग रहा है कि, बच्चों के कोमल, कोरे मन मस्तिष्क पर अपनी शाखों से जीवन पर्यंत जुड़े रहने, मजबूत, अच्छा वृक्ष बनने का प्रशिक्षण इसी बहाने दिया जाता है। जीवन में अच्छा नागरिक बनना है तो झाड़ झंखाड़, काँटों वाला पेड़ पौधा नहीं बनना है, यह भी समझा देने की कोशिश होती है। परिवार, अपनी जड़ों से जुड़े लोग कितने भी बड़े हो जाएँ, कितने भी दूर हों, लेकिन उनके चेहरे पर चमक, हरियाली, उसी पेड़ की पत्तियों की तरह होती है जो अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। अपनी शाखों से जुड़ा है, भले विस्तार लेता जा रहा है। वरना, अपनी शाखों से कटकर हरियराने से झुराने तक में समय ही कितना लगता है। सुबह की सैर पर जाते एक काम मैं करता हूँ कि, सड़क किनारे चलते हाथ की पहुँच में आने वाली पत्तियों को छूते जाता हूँ। हरियरयाई पत्ती का स्पर्श, छुअन का अहसास अद्भुत होता है। टूटी शाख की झुराई पत्तियाँ जमीन पर गिरी हुई हैं, लेकिन उनसे बचकर निकल जाते हैं। घर-परिवार, देश-समाज समझिए। जुड़े रहिए। हरियराए रहिए।

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