Saturday, October 30, 2021

लड़कियों को लड़कों से लड़ाकर यूपी कैसे जीतेगी कांग्रेस

हर्ष वर्धन त्रिपाठी



उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का चुनावी अभियान एक वादे और एक पोस्टर के आधार पर खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ का नारा देते हुए पोस्टर जारी कर दिया। साथ ही यह एलान भी कर दिया कि 40 प्रतिशत विधानसभा टिकट महिलाओं को ही दिए जाएँगे। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को संजीवनी मिलने से देश में कांग्रेस पार्टी की स्थिति बेहतर होगी, मानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने प्रियंका वाड्रा के इस एलान भर से कहना शुरू कर दिया कि, कांग्रेस ने बहुत बड़ा दांव खेल दिया है, लेकिन क्या उत्तर प्रदेश में मृतप्राय कांग्रेस पार्टी, लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ, कहकर और 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर महिलाओं का मत अपने पक्ष में कर सकती है। इसे समझने के लिए कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जिन्हें एक-एक करके समझने से आसानी से बात समझ जाएगी। जब इस लिहाज़ से समझने की कोशिश करते हैं तो महिला मतदाता एकदम से सिर्फ़ इस आधार पर मतदान करेंगी कि महिला प्रत्याशी चुनाव मैदान में है, ऐसा होता नहीं दिखता। दरअसल, लड़की हूं, लड़ सकती हूँ और 40 प्रतिशत महिला प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस भले ही सोच रही हो कि महिलाएँ उसके पक्ष में मतदान कर देंगी, सच यही है कि भारतीय समाज के मतदान करने की मूल मनःस्थिति को ही कांग्रेस समझ नहीं पाई है, यह प्रमाणित होता दिख रहा है। भारत में भले ही राजनीतिक परिवारों में पिता-पुत्र, भाई-भाई, जेठानी-देवरानी, माँ-बेटा या यूँ कह लें कि हर रिश्ते के चुनावी मैदान में आमने-सामने उतरने के जाने कितने उदाहरण हों, लेकिन सच यही है कि ऐसे उदाहरण भारतीय मतदाता संख्या के लिहाज़ से लगभग शून्य ही हैं और भारतीय मतदाता अभी भी परिवार में ही जाकर मतदान करता है। प्रियंका वाड्रा महिलाओं को लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ बताकर परिवार में लड़कियों को लड़कों के ख़िलाफ़ खड़ा करके जिस तरह से मत लेना चाहती हैं, कितना आधारहीन है, इसका एक बड़ा प्रमाण 2019 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को लगा था कि तीन तलाक़ के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाएँ अपने परिवार के विरोध में जाकर उन्हें मत दे देंगी। ऐसा हुआ नहीं। हाँ, यह अवश्य है कि उज्ज्वला जैसी महिला केंद्रित योजनाओं की वजह से महिलाओं ने मोदी के पक्ष में अपने परिवार की ही बात को और मज़बूत करने में मदद की। आँकड़े स्थापित करते हैं कि आज भी भारतीय मतदाता परिवार में ही मतदान करता है। यही वजह रही कि दलित-पिछड़े या कहें कि कमजोर आय वर्ग के परिवारों में महिलाओं ने पुरुषों को भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में मतदान करने के लिए तैयार किया। ऐसा बहुत कम होता है कि परिवार में हर कोई अलग-अलग मतदान करता हो। और, महिला-पुरुष मतदाताओं के मामले में तो ऐसा लगभग ना के बराबर होता है। 

अब एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रियंका वाड्रा के इस दांव को कसकर देखते हैं कि क्या महिलाओं को अधिक टिकट देकर ही उन्हें शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इस दांव पर कांग्रेस शुरू में ही औंधे मुँह गिर जाती है कि कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति है नहीं कि चुनाव जीत सके और ऐसे में यह आरोप मज़बूती से कांग्रेस पर चिपकता है कि हार का ठीकरा लड़कियों के सिर फोड़ने की कोशिश कांग्रेस कर रही है। यहाँ तक कि दूसरे राज्यों में जहां कांग्रेस की स्थिति उत्तर प्रदेश से बेहतर है, वहाँ लड़की लड़ सकती है ही कांग्रेस 40 प्रतिशत टिकट देने की बात भी कर रही है। कांग्रेस पार्टी का दोहरा रवैया यहीं इस पूरे अभियान को शुरू होने से पहले ही ख़त्म कर देता है, लेकिन अब इससे आगे की बात कर लेते हैं। प्रियंका वाड्रा जिस भारतीय जनता पार्टी के सामने महिलाओं को शक्ति देने की बात कर रही हैं। उस भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में सर्वाधिक 11 महिलाओं को मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। पहली लोकसभा में 5 प्रतिशत महिला सांसद से 2019 में मोदी सरकार के समय महिला सांसद 14 प्रतिशत पहुँच गई हैं। देश के ताकतवर वित्त मंत्रालय को भी नरेंद्र मोदी की सरकार में एक महिला निर्मला सीतारमन ही चला रही हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन और स्मृति ईरानी के साथ ही मीनाक्षी लेखी, कनुप्रिया पटेल, रेणुका सिंह, दर्शना जरदोश, भारती पवार, शोभा करंदलाजे, साध्वी निरंजन ज्योति, प्रतिमा भौमिक और अन्नपूर्णा देवी मोदी के मंत्रिमंडल में हैं और पुरुष साथियों जैसे ही शक्तिशाली हैं। नरेंद्र मोदी जब 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने 6 महिलाओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल की तुलना देश के दूसरे प्रधानमंत्रियों से करें तो डॉक्टर मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में भी कुल 10 महिलाएँ हीं थीं, जबकि मोदी सरकार में 11 महिला मंत्री हैं। और, पुरुष मंत्रियों जैसी ही शक्तिशाली हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रथम मंत्रिमंडल में अकेली महिला मंत्री के तौर पर राजकुमारी अमृता कौर थीं। दूसरी सरकार में किसी महिला मंत्री का प्रतिनिधित्व ही नहीं था और तीसरी सरकार में नेहरू जी ने डॉक्टर सुशीला नय्यर को मंत्री बनाया। लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में इंदिरा गांधी सहित तीन महिला मंत्री थीं। और, देश की शक्तिशाली प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित इंदिरा गांधी ने महिला होकर भी एक भी महिला को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया। हाँ, उनके दूसरे और तीसरे मंत्रिमंडल में डॉक्टर सरोजिनी महिषी, नंदिनी सत्पथी, सुशीला रोहतगी और सरोज खपराडे मंत्री ज़रूरी रहीं। 

राजीव गांधी को भी मंत्री बनाने के लिए महिलाएँ कम योग्य लगीं, यही वजह रही कि उनके मंत्रिमंडल में भी सिर्फ़ मोहसिना किदवई को ही मौक़ा मिला। क्या प्रियंका वाड्रा कह रही हैं कि उनके पिता से लेकर नेहरू जी तक कम महिला मंत्री या प्रतिनिधि होने का मतलब महिलाओं का शक्तिशाली नहीं होना था। इस लिहाज़ से देश की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री में से एक इंदिरा गांधी के समय में भी महिलाओं का प्रतिनिधत्व बहुत कम था। जिस उत्तर प्रदेश में प्रियंका महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की बात कहकर महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रही हैं, उस राज्य के इतिहास में पहली बार रिकॉर्ड 40 विधायक भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार में ही पहुँची हैं। विधायक बनी 40 में से 35 महिलाएँ भारतीय जनता पार्टी के ही टिकट पर जीती हैं। और, इसके लिए भारतीय जनता पार्टी ने लड़कियों को लड़कों से लड़ाने का तो नारा दिया और ही परिवार विभाजित करने का अभियान चलाया। इसलिए कांग्रेस के इस नारे और वादे पर यह प्रश्न भारी पड़ जाता है कि परिवार में मतदान करने के आदी भारतीय मतदाताओं में लड़कियों को लड़कों से लड़ाकर क्या हासिल कर पाएगी कांग्रेस।  

(यह लेख आज दैनिक जागरण में छपा है)

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