एनसीपी में जा रहे हैं अमर सिंह?

ये सवाल फिर से खड़ा हो रहा है। हालांकि, इसकी कहीं भी चर्चा नहीं हो रही है। मीडिया में चर्चा सिर्फ इस बात की हो रही है कि अमिताभ बच्चन का अपमान कांग्रेस क्यों कर रही है। लेकिन, इस बात की तरफ शायद जानबूझकर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि अचानक अमिताभ बच्चन को कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में एक ऐसे सीलिंक के उद्घाटन में बुलाने की वजह क्या हो सकती है जिसका शुरुआती उद्घाटन खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया हो।

अब भले ही सी लिंक का उद्घाटन सोनिया ने कर दिया था और अब बची चार लेनों का लोकार्पण होना था। लेकिन, सच्चाई तो यही हुई कि सी लिंक की 8 लेनों में से 4 का लोकार्पण सोनिया ने किया और कांग्रेस सरकार, संगठन के न चाहते हुए भी मीडिया में जिस तरह से अमिताभ छाए हैं। बची 4 लेनों का लोकार्पण अमिताभ के हाथों ही याद किया जाएगा। अब अचानक एनसीपी को अमिताभ को सोनिया गांधी के बराबर खड़ा करने की तो नहीं सूझी होगी।

और, अगर आप ध्यान से देखें तो, अमिताभ के सीलिंक उद्घाटन समारोह में आने से सबसे ज्यादा तिलमिलाए दिख रहे हैं मुंबई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह। कृपाशंकर सिंह उत्तर भारतीय हैं, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से आते हैं। कांग्रेस में उत्तर प्रदेश के एकमात्र मजबूत नेता हैं, ठाकुर हैं। अमर सिंह भी ठाकुर हैं, उत्तर प्रदेश से आते हैं। समाजवादी पार्टी से ठिकाना छूटने के बाद कहीं ठिकाना तलाश रहे हैं। क्षत्रिय सम्मेलन और कुछ सितारों के ग्लैमर के जरिए खुद को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं।

वैसे, जब अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दिया था तभी इस बात की चर्चा जोर-शोर से उठी थी। लेकिन, अमर सिंह और एनसीपी शायद आपसी तालमेल के लिए तैयार नहीं हो पाए थे। इस बीच कांग्रेस ने महंगाई के लिए सीधे तौर पर पवार को जिम्मेदार ठहराया है। पवार को कांग्रेस एकदम से निपटाने की हर कोशिश में लगी है। पवार कभी बाल ठाकरे से मिलकर तो, कभी पूरी सरकार को महंगाई के लिए दोषी ठहराकर कांग्रेस को लगातार परेशान करते ही रहते हैं। लेकिन, उनको एक चेहरा चाहिए जो, महाराष्ट्र से बाहर भी कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर सके। और, इस बात से किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए कि अमर सिंह एक ऐसा चेहरा है जिसे एनसीपी अपने लिहाज से और अमर सिंह एनसीपी को अपने लिहाज से इस्तेमाल करने के लिए बेहद मुफीद दिखते हैं।

ये अमर सिंह का ही प्रताप था कि समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र में 4 विधायक जिता ले गई। भले ही उसकी अगुवाई अबू आजमी जैसे आरोपी के हाथ में हो। लेकिन, उत्तर भारतीय और मुसलमान वोटबैंक को अपील करने की एक शानदार कला अमर सिंह के पास है जो, एनसीपी के लिए फायदे की हो सकती है। इसमें भी कोई बहस नहीं है कि अमिताभ अब राजनीति में खुद आएं तो, ये दैवीय चमत्कार से कम नहीं होगा। वो, पत्नी जया बच्चन और छोटे भाई अमर सिंह के जरिए ही राजनीति से जुड़े रहेंगे। और, अमिताभ भले राजनीति से दूर रहें इतनी राजनीति तो, उन्हें पहले से आती है और अमर सिंह की संगत ने इस तरह की सोच को इतनी धार तो दे ही दी थी कि उन्हें अच्छे से अंदाजा होगा कि कांग्रेस सरकार के राज में इतने बड़े आयोजन में विशेष अतिथि बनने के बाद क्या होगा। अमिताभ की ही भाषा में रंक, राजा का बराबरी की कोशिश कर रहा है।

इस कोशिश के पीछे राजनीतिक वनवास झेल रहे छोटे भाई अमर सिंह को फिर से राजनीति में अहम रोल दिलाने की कोशिश हो सकती है। बेवजह नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अछूत होने का राग अलापा जा रहा है। असली निशाना कहीं और है। क्योंकि, अमर सिंह जैसे तिकड़मी व्यक्ति की बीजेपी जैसी किसी राष्ट्रीय पार्टी में शायद ही कभी अहमियत बन सके। ऐसे में महाराष्ट्र की एनसीपी को देश के महा प्रदेश उत्तर प्रदेश में थोड़ी बहुत राजनीतिक उर्वर जमीन और महाराष्ट्र में सितारों की बड़ी लाइन को शायद बेहतर राजनीतिक सौदा लगे। अमर सिंह के लिए इससे भला क्या होगा कि फिर से वो टीवी पर दिखने लगेंगे। सस्ती शेरो शायरी का दौर फिर शुरू होगा। अपने कॉरपोरेट क्लाइंट्स को फिर से ताकत का अहसास दिला सकेंगे और अमर सिंह मार्का राजनीति को बीते दिनों की बात मान चुके लोगों को फिर से इसे झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। और, तो ये राजनीतिक रंग हैं गिरगिट भी इन्हें देखकर अब रंग बदलने में शर्माते हैं।