इंडिया ने तो कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है

अब जो बनना चाहते हैं ऊ तो हम बनेंगे ही। भले थोड़ी मुश्किल झेलनी पड़ जाए। आखिर कितना सोच समझकर तो हममें से ज्यादा का मानस इस पर एकमत हुआ है कि ऐसा ही बनने लायक है। वरना तो हम हमेशा ही ढेर सारा कन्फ्यूजियाए रहते हैं कि कैसे बनें कि मजा आ जाए। लेकिन, कुछ बुद्धिमान लोग हैं डरा रहे हैं कि वैसा बनने की कोशिश की तो, जाने कैसा-कैसा हो जाएगा। अरे आप नहीं समझ पाए- कैसा। अरे वही अमेरिका जैसा।


घर खरीदने के लिए करीब-करीब सबसे ज्यादा लोगों को कर्ज देने वाले वाले HDFC के दीपक पारेख साहब पता नहीं क्यों मूडा गए हैं। कह रहे हैं कि अमेरिका के सबप्राइम संकट जैसा खतरा हमें झेलना पड़ सकता है। अब बताइए गजब बात हुई हम हिंदुस्तानी बेचारे अमेरिका जैसे मजे के आसपास भी नहीं पहुंच पा रहे हैं औ ई साहब पहिलवै कहने लगे हैं कि सबप्राइम संकट (अरे वही दुर्दशा जिससे अमेरिका 2 साल से एड़ी-चोटी का जोर लगाकर भी छुटकारा नहीं पा रहा है। ओबामौ क देख लिहे बेचारे)का खतरा झेलना पड़ जाएगा।



पता नहीं क्यों पारेख साहब ओवररिएक्ट कर रहे हैं। बात बस इत्ती सी है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (अरे वही बैंक जो सरकारी है फिर भी ई पारेख-कोचर-कामत टाइप लोग मिलकर भी जिसको पिछाड़ नहीं पा रहे हैं)ने ब्याज दर फिर घटा दी है। अब सबप्राइम के खतरे से ही डरकर तो सबने पारेख-कोचर टाइप के महाउद्यमी लोगों के बैंक से अपना खाता हटाया था। पहिले तो ई लोग दौड़ा-दौडाकर क्रेडिट कार्ड हम सबैका पर्स भर दिए, उधार पे जीने की आदत डाल दी। अब कह रहे हैं कि जो, सैलरी अकाउंट में रखा है उसी से सब उधारी भरवा लेंगे।





शनिवार को जब मैंने पारेख साहब को हेडलाइन बनाया तो, मुझे लगा कि ई बउरा गए हैं का। एक बैंक के ब्याज दर थोड़ा और घटा देने से का हो जाएगा। ऐसे थोड़ी ना सबप्राइम संकट आ जाता है। लेकिन, आज सुबह जब बिग बाजार में बिल की लाइन में लगा था तो, आगे वाले सज्जन के चार्वाक दर्शन पर अटूट भरोसे ने मुझे भी पारेख साहब की लाइन लेने के लिए तैयार कर दिया। मेरे आगे के सज्जन बिल देने के लिए विचार नहीं पा रहे थे कि पर्स में आभूषण और तमगे की तरह सजे क्रेडिट कार्ड में से कउन वाला बिल के लिए दिया जाए। दू ठो कार्ड निकाले फिर झटके में इसमें से एक हजार काट लीजिए और इसमें से बाकी। इस्तेमाल तो भइया ने दुइयै ठो कार्ड किया। लेकिन, उनकी हैसियत बड़ी थी। चाहते तो, 6-8 भी दे सकते थे।


भाईसाहब का फंडा गजब था। मेरे भी एकाध जानने वाले इस फंडे की कहानी बड़े मजे से सुनाते हैं कि कैसे उनके चार क्रेडिट कार्ड एक दूसरे के कर्ज और 45 दिन की समयसीमा के बीच संतुलन बिठाते हुए उनका हर महीना मजे से गुजार देते हैं। ई सब भाईसाहब लोग कर्ज पर चल रहे हैं।


अब मुझे लग रहा है पारेख साहब एकदम सही कह रहे हैं कि सस्ता कर्ज मिलेगा तो, जिसकी हैसियत चवन्नी की है ऊ अठन्नी-रुपय्ये का घर खरीदेगा। औ मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपना देखेगा कि जइसनै कीमत दुइ रुपया होए बेचके अढ़ाई रुपया वाला घर खरीदैं। फिर वही सस्ता कर्ज लैके। पारेख साहब की बात में दम दिखता है। फिर से रियल एस्टेट के नए प्रोजेक्ट के विज्ञापन ग्लेज्ड (चमकदार, रंगीन) पेपर पर पूरे-आधे पन्ने में चमकने लगे हैं। पहले प्रोजेक्ट पर काम शुरू होने से पहले ही 100% sold out के दावे के साथ phase 2, 3 की लॉन्चिंग की खबरें दिखने लगती हैं। हम मीडिया वाले भी खबर करते हैं कि रियल एस्टेट सेक्टर में फिर मजबूती लौट रही है। सुनहरा भारत दिखाने का जिम्मा भी तो हमारा है। वैसे भी बहुत दिन तक मंदी-मंदी करेंगे तो, लोग टीवी बंद कर देंगे औ हमारी भी नौकरिया चली जाएगी। लेकिन, भइया पारेख साहब कह सही रहे हैं।


कुल मिलाकर क्रेडिट कार्ड, लाखों की सैलरी, बढ़िया फ्लैट और लंबी कार वाला चमकता इंडिया तो, बहुत पहले से कोई कसर नहीं छोड़ रहा है लेकिन, का करें ई बेवकूफ भारत हर बार रस्ता रोके खड़ा हो जाता है अडियल सांड़ की तरह। बताइए पूरी मंदी गुजर गई औ हम सबप्राइम संकटवा का मजै नहीं ले पाए। थोड़ा तो अमेरिका की तरह बड़े हो पाए होते। चलिए लगे रहते हैं आज नहीं तो, जैसे-जैसे इंडिया बड़ा, भारत छोटा होता जाएगा। अमेरिका के मजे औ अमेरिका के सबप्राइम संकट की चिंता दोनों अनुभव मिलने में आसानी होती जाएगी।