Saturday, August 24, 2013

शीर्षक सूझ नहीं रहा!


#MumbaiGangRape की खबर आ गई थी। वो मुंबई जहां रात 2 बजे भी एक लड़की दस लड़कों के साथ घूमने जा सकती है। और, अकेले लड़के के साथ भी। और, बिना किसी लड़के के साथ भी। उस मुंबई में शाम 6 बजे एक वीरान पड़ी मिल में किसी पत्रकार बनने की शुरुआत करने वाली लड़की के साथ 5 लड़कों ने दुष्कर्म किया। उसके साथी भी था जिसे बांध दिया गया था। मुंबई से आई इस खबर के दूसरे दिन राज ठाकरे के प्रेस कांफ्रेंस करने की खबर आई। हमारे 4-5 बिहारी साथियों ने तुरंत अंदेशा जताया हो न हो इसमें बिहारी ही होंगे। और, कमाल की बात ये कि उन बिहारी साथियों ने ये मान भी लिया कि ऐसे करेंगे तो राज ठाकरे जैसों को मौका मिल ही जाएगा। डर की वजह भी थी। पिछली बार जब 2007 की आखिरी रात को मुंबई के एक होटल के बाहर एक लड़की को निर्वस्त्र करने की कोशिश हुई थी तो, राज ठाकरे ने सारा ठीकरा बिहारियों, यूपी से आए लोगों परडाल दिया था। हालांकि, वो आशंका इस बार सच साबित नहीं हुई। लेकिन, ये डर मीडिया में बना हुआ है कि बलात्कार किसने किया या गलत काम किसने किया उसके आधार पर खबर बढ़ाई जाएगी, पहचान बताई जाएगी। खैर धीरे-धीरे उस लड़की के साथ दुष्कर्म करने वाले 5 लड़कों की पहचान हो गई। मोहम्मद अब्दुल, कासिम बंगाली, सलीम और अशफाक, पांचवां था विजय जाधव। एक न्यूजचैनल के ट्विटर अकाउंट पर इनके नाम आए लेकिन, थोड़ी देर बाद गायब हो गए। किसी भी न्यूज चैनल ने उस दिन इन बलात्कारियों के नाम नहीं दिखाए। शायद 4 मुसलमानों के बलात्कार में शामिल होने से सांप्रदायिक होने के खतरा था। 

यही असल खतरा है। न्यूजरूम में बैठे स्वयंभू नैतिकता के ठेकेदारों ने ये तय कर लिया। अब सवाल यही है कि नैतिकता पीड़ित का चेहरा नाम न बताने-दिखाने की बात कहती है या बेशर्म बलात्कारियों की पहचान छिपाने की। क्योंकि, अगर मीडिया भी कोई कहां का है या किस धर्म का है इस आधार पर नीच कृत्य करने वालों की पहचान छिपाएगा या बताएगा तो फिर समाज सुधरने की बात हम कैसे सो. पाएंगे। हालांकि, इसके बाद अखबारों में सारे नाम छपने के बाद कई चैनलों ने भी बलात्कारियों की पहचान सबको बताई। मुझे तो लगता है कि पहचान छिपाने के पीछे भी सरकारी या सत्ता-सुविधा भोग रहे लोगों की जमात होती है जो नहीं चाहती कि ऐसी घटनाएं लोगों को हमेशा याद रहें और जगाए रहें। 16 दिसंबर को बलात्कार की शिकार लड़की की मृत्यु के बाद और उसके पिता की इजाजत के बाद भी हमारीसरकार ने उसकी जीवित रहने की कोशिश को ही मार दिया था। वो जिंदा रहती तो हर रोज हमें झकझोरती रहती। हर रोज हम इस खतरे से निपटने को सोचते रहते। वरना तो रोज की जिंदगी की जद्दोजहद में हम कहां ऐसी गंदी बातें याद रखते हैं जब तक हमारे साथ, बगल में या ऐसे ही मीडिया पर बड़ी खबर न बन जाए। 

दरअसल कहने को भारत आधुनिक हो चुका है। लेकिन, सच्चाई यही है कि अभी भी हम आदिम काल में ही हैं। बलात्कार को मानसिक विकृति कहने के बजाए हमारे नेताजी लोग पहनावे और टीवी पर दिखने वाली अश्लीलता की वजह से बता रहे हैं। मुंबई की घटना के बाद अभी नरेश अग्रवाल, लालू यादव जैसे लोग बोले। जबकि इन्हें शायद ही पता हो कि लड़की ने क्या पहना था। और, वो कुछ भी पहने होती ऐसे कमीने क्यों रुकते। खैर ये शायद भारतीय नेताओं की प्रवृत्ति है 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद देश के गृहमंत्रीसुशील कुमार शिंदे और दूसरे नेताओं की बयानबाजी भला किसे भूली होगी। जैसी मीडिया में खबरें हैं कि उस लड़की ने हालत ठीक होते ही यही कहा कि किसी भी हालत में दोषियों को छोड़ना नहीं है और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वैसे बहस अभी भी इस बात पर जारी है कि फांसी होनी चाहिए या नहीं। कुछ खबरें बड़ी हो जाती हैं और इस वजह से उसके बहाने समाज के गिरते स्तर पर संवेदनहीनता पर बात चर्चा हो जाती है। गुवाहाटी की सड़कों पर नवंबर 2007 में भी ऐसी ही घटना हुई थी। बिंदास बंबई जैसे देश के सारे शहर बनाने की ओर हम बढ़ते कि रात-दिन का भेद भुलाकर हम मस्त रह पाते। हुआ उल्टा हम सरेशाम मुंबई की मस्ती का ही बलात्कार कर रहे हैं। देश तो पहले ही बलात्कारी बना हुआ है।
(लिखना शुरू किया था तो शीर्षक सूझा नहीं अब लग रहा है कि इसी आखिरी लाइन को शीर्षक बनाना चाहिए था)

Friday, August 02, 2013

गड्ढा !

अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में बेहतर हुई सड़कों ने देश में सड़क के रास्ते कितना यातायात बढ़ाया इसका कोई ठीक ठाक आंकड़ा मुझे नहीं मिल सका। लेकिन, नेशनल हाईवेज के सफर पर लोगों का बढ़ा भरोसा साफ दिखता है। पहले हाईवेज पर ट्रकों बसों के बीच में इक्का दुक्का ही कारें नजर आतीं थीं। दिखतीं भी थीं तो वो टैक्सी वाली कारें होती थीं। लेकिन, अब ये दृश्य उलट हो चुका हैं। सड़क के रास्ते अपनी कार से रफ्तार वाला सफर सहूलियत के लिहाज से करने का मोह मैं भी छोड़ नहीं पाता हूं। वैसे भी दिल्ली से इलाहाबाद का सफर यमुना एक्सप्रेस वे बनने के बाद और बेहतर हुआ है। इसीलिए इस बार भी मैं इलाहाबाद अपनी कार से ही गया। दिल्ली से इलाहाबाद जाने का सफर बेहद शानदार रहा और सुबह 8.30 पर नोएडा छोड़ा तो शाम 5 बजते-बजते इलाहाबाद पकड़ में आ गया। यही उम्मीद वापसी की भी थी। लेकिन, इस बार धोखा हो गया। और उस पर भी बुरा ये कि मैं सपरिवार था। अच्छा ये था कि छोटे भाई जैसा छोटे भाई का दोस्त साथ था वरना तो हाईवे का सफर बेहद मुश्किल हो जाता।

NH 2 राष्ट्रीय राजमार्ग 2 जो दिल्ली से कोलकाता जाता है। मथुरा, आगरा, इटावा, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस होते हुए। उस राजमार्ग का हाल ये है कि सारे रास्ते में आपको सफर में अहसास ये होता रहता है कि ये स्थानीय मार्ग है या राष्ट्रीय राजमार्ग। कमाल ये है कि करीब एक दशक से ज्यादा तो मुझे ही इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते हुए और ये समस्याएं जस की तस हैं।
तो, क्या राष्ट्रीय राजमार्ग के रखरखाव की जिम्मेदारी वाले अधिकारी इन चुनौतियों से कभी नहीं गुजरे होंगे जिससे मुझे गुजरना पड़ता है। मैंने ये तस्वीरें राष्ट्रीय राजमार्ग पर कहां ली हैं ये ध्यान नहीं है लेकिन, लगभग पूरे राष्ट्रीय राजमार्ग का यही हाल है। कहीं से भी उल्टे आते वाहन के बावजूद आप दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुए तो सौभाग्यशाली। उल्टी आती गाड़ी बचा ली तो, जानवर बड़ी चुनौती देने के लिए आ जाएंगे। और, राष्ट्रीय राजमार्ग की हर बाजार में सड़क पार करके जाते ये बिजली के तार तो होंगे ही।

लेकिन, इन चुनौतियों से भी बड़ी एक चुनौती है जिसका अहसास इस बार मुझे इलाहाबाद से दिल्ली आते समय हुआ। इटावा बाजार के ठीक पहले करीब 3 किलोमीटर लंबा जाम लगा था। गाड़ी बंद करके अंदाजा लगाना चाहा कि माजरा क्या है तो पता चला कि कोई दुर्घटना हुई जिसके बाद स्थानीय लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम कर दिया है। करीब एक घंटे तक फंसे रहने के बाद पीएसी आई तो राष्ट्रीय राजमार्ग अपनी बची खुची प्रतिष्ठा वापस पा सका और हमारी स्थिर कार चालायमान हो सकी।  ऐसा नहीं है कि पुलिस नहीं थी। लेकिन, पुलिस स्थानीय लोगों से निपट नहीं पा रही थी। जैसे ही पुलिस की बजाए पीएसी बाजार में पहुंची जाम में फंसे हम लोगों की जान में जान आई। और राष्ट्रीय राजमार्ग को स्थानीय बना देने वाले स्थानीय लोगों का गुस्सा जाने क्यों गायब हो गया और वो भी गायब हो गए।


लेकिन, अभी भी ये देश के राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2 की सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। बार-बार चिंता जताने वाले चिंतित होते रहते हैं कि देश गड्ढे में जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर सलीके से हुए इन गड्ढों को देखकर मैं उसे संशोधित करके कहता हूं कि देश बड़ी रफ्तार में गड्ढे में जा रहा है। और, गड्ढे में देश की गाड़ी जाकर PUNCTURE नहीं BURST हो रही है। यही मेरी कार के साथ भी हुआ। इटावा बाजार के जाम से निकलने के बाद इटावा डीपीएस के ठीक सामने करीब 90 की रफ्तार में चल रही कार से दोनों पहिये निकलकर कार के आगे जाते दिखे तो मेरी जान सूख गई। कार मैं रोक चुका था। बुद्धि स्थिर हुई तो समझ में आया कि दोनों पहिये नहीं पहिये के कवर थे। देखा तो आगे वाला टायर BURST हो चुका था। जिस रिम पर ट्यूबलेस टायर चढ़ा था चार में से 2 रिम उस गड्ढे के प्रकोप से सिकुड़ गए थे।

(9 अगस्त को हिंदुस्तान दिल्ली के संपादकीय पृष्ठ पर साइबर संसार कॉलम में जिक्र)




Thursday, August 01, 2013

इंडिया फर्स्ट नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड

नरेंद्र मोदी के विरोधी और समर्थक जितने मुखर हैं उतने शायद भारतीय राजनीति में कभी किसी नेता के नहीं रहे। नरेंद्र मोदी के विरोधी ऐसे कि गलती से कोई छोटी सी बात भी मोदी के खिलाफ हो तो उसको पहाड़ बनाने में नहीं चूकते और समर्थक भी ऐसे कि देश की हर समस्या की रामबाण औषधि मोदी को ही मानते हैं। फिर कोई नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनता दिखता है तो, उसकी मिट्टी पलीद करने से भी नहीं चूकता। फिर वो चाहे नोबल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न अमर्त्य सेना ही क्यों न हों। यहां तक कि पत्रकार से नेता बने चंदन मित्रा जैसे लोग भी बहककर दोबारा एनडीए की सरकार आने की आशा में अमर्त्य सेन से भारत रत्न छीनने तक की बात कर बैठते हैं। हालांकि, बाद में वो माफी मांग लेते हैं। लेकिन, अभी टीवी पर जो चेहरे नरेंद्र मोदी के समर्थक के तौर पर नजर आते हैं उनकी बात ही इस सहमति के बाद शुरू होती है कि नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री बनकर देश की सारी समस्याओं को सुलझा सकते हैं। ऐसा ही नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया ब्रिगेड का है। दरअसल नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कुछ ऐसा है। नरेंद्र मोदी का बोलना करना उनके समर्थकों को अंधभरोसा देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। और, यही अंधडर उनके विरोधियों को देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। इसीलिए समर्थक मोदी के आने से कम कुछ नहीं बर्दाश्त कर पा रहे और विरोधी मोदी के अलावा किसी भी और पर मान जाने को तैयार बैठे हैं।

नरेंद्र मोदी ने एक काम तो कर दिया है कि गुजरात में जो स्थिति तैयार की थी। वैसी ही स्थिति देश में तैयार कर दी है। गुजरात विधानसभा के पिछले चुनाव यानी 2007 के दौरान मैं वहां कवरेज पर था। कारोबारी चैनल के लिए स्टोरी कर रहा था इसलिए कारोबारियों के संपर्क में ज्यादा था। राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में कारोबारी नरेंद्र मोदी को राजा जैसी सत्ता दे देने के पक्ष में थे। क्योंकि, उनका मानना था कि मोदी के अलावा कोई नहीं जो इतनी आसानी से कारोबार के मौके दे सके। कुछ ऐसी ही राय गैर कारोबारियों की भी थी कि जीवन को सुखमय करने का बेहतर रास्ता मोदी ही खोज सकते हैं। लेकिन, उसी चुनाव कवरेज के दौरान भावनगर के हीरा व्यापारी और अलंग पोर्ट के कारोबारी भी मिले जिनका ये मानना था कि नरेंद्र मोदी का शासन उनके कारोबार के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। और उनके जीवन की बदहाली के रास्ते और पुख्ता कर रहा है। वजह साफ थी कि अलंग पोर्ट के कारोबारियों से नरेंद्र मोदी का संतुलन नहीं बैठ पाया था। वैसे तो किसी भी ताकतवर नेता के साथ या खिलाफ वाला फॉर्मूला तगड़े से काम करते हैं लेकिन, नरेंद्र मोदी ने मेरे साथ या मेरे खिलाफ वाली अवधारणा को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

इतना कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे ताकतवर नेता के घर के सामने मोदी के पक्ष में लोग नारे लगाने पहुंच गए। इतना ही नहीं लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली में बीजेपी के अनुसूचित मोर्चे के कार्यक्रम में रिकॉर्डतोड़ नतीजे बीजेपी के पक्ष में आने का अनुमान लगा रहे थे तो, ट्विटर पर एक मोदी समर्थक महिला लिख रही थी बुड्ढा बोल रहा है शाम को टीवी पर डिबेट कराएगा। ये महिला कुछ देर पहले ही गोविंदाचार्य को भी गरिया चुकी थीं। गुजरात में नरेंद्र मोदी 5 करोड़ गुजरातियों की बात करते थे। अब इंडिया फर्स्ट की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेवजह 2002 दंगों का भूत उनके विरोधियों ने ऐसे मजबूत किया कि नरेंद्र के उत्साही समर्थकों की कतार बड़ी होती चली गई। हालांकि, अब उन्हीं समर्थकों का अतिउत्साह कई मोदी समर्थकों को विरोधी लाइन में भी खड़ा कर रहा है। 2007 विधानसभा चुनाव के दौरन मैंने वहां जो महसूस किया था कि नरेंद्र मोदी ने खुद को एक ऐसे ब्रांड के तौर पर स्थापित कर लिया था। जहां गुजरात को बेहतर तरीके से चलाने-बनाने की एकमात्र किरण मोदी दिखने लगे थे और ऐसे में फिर कोई केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला, प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप अगर नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनते दिख रहे थे तो, गुजराती उसे दुश्मन मानने लगते थे। यही वजह थी कि जिस 2002 के लिए नरेंद्र मोदी को अभी अभी भी सबसे ज्यादा चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं। उसके असल आधार रहे विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया भी जब नरेंद्र मोदी की राह में बाधा दिखने लगे तो, बीजेपी और संघ का खांटी कैडर भी तोगड़िया का साथ छोड़ मोदी के साथ खड़ा हो गया। यहां तक कि संघ के एक राष्ट्रीय अधिकारी के पुत्र भी नरेंद्र मोदी का विरोध करके गुजरात में काम करने की स्थिति में नहीं रहे।

राष्ट्रीय परिदृष्य में भले ही सीधे तौर पर केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला और प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप सीधे तौर पर न दिख रही हो लेकिन, हालात कमोबेश वैसे ही बन गए हैं। फैसला लेने वाली बीजेपी की सर्वोच्च संस्था में जब तक नरेंद्र मोदी नहीं थे तब तक लालकृष्ण आडवाणी ही सबकुछ थे। यहां तक कि संघ के खांटी समर्थन से अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने भले ही बैठकों को आडवाणी के 30 पृथ्वीराज रोड के घर से उठाकर 13 तीनमूर्ति लेन ले आए लेकिन, सच्चाई यही थी कि बैठक से पहले और आडवाणी के इशारे से संसदीय बोर्ड की फैसला भी हिला रहता था या आशंकित रहता था। अब सबको गोवी की बीजेपी बैठक के समय 30 पृथ्वीराज रोड के सामने का वो दृष्य तो याद ही रहेगा जिसमें पता नहीं कौन कौन सी खांटी हिंदू सेना का दावा करने वाले लोग आडवाणी के विरोध और नरेंद्र मोदी के पक्ष में नारे लगा रहे थे। गुजरात के बापा केशुभाई की तरह बीजेपी के लौह पुरुष को नरेंद्र मोदी की तगड़ी चुनौती थी। इसके पहले भी हालांकि, मोदी ने सद्भावना उपवास और आडवाणी की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा के समय मोदी के साथ या विरोध में रहने वाली अवधारणा को मजबूती दे दी थी। लेकिन, सबसे तगड़ी चोट दिल्ली में 30 पृथ्वीराज रोड पर ही लगी। 5 करोड़ गुजराती की बात नरेंद्र मोदी करते हैं भले ही मोदी को जो वोट मिले हैं वो इससे काफी कम हैं। लेकिन, गिरी हालत में भी एक करोड़ मुखर गुजराती मोदी के समर्थन में ऐसे बोलते हैं कि गैर मुखर उससे कई गुना गुजरातियों के नेता भी नरेंद्र मोदी ही दिखते हैं।

गुजरात को मोदी ने वाइब्रैंट गुजरात नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बना दिया। जिसे सीईओ नरेंद्र मोदी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा दिलाया है। इसीलिए गुजरात के एक बड़े वर्ग को मोदी के खिलाफ कही गई कोई भी बात यहां के विकास में अड़ंगा जैसा लगता है। अब जैसे वाइब्रैंट गुजरात को नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बनाने के लिए गुजरात के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (विधानसभा) में मोदी के इतने मेंबर्स शामिल करने की जरूरत थी जो, मोदी को गुजरात का मुनाफा बढ़ाने के लिए उन्हें सीईओ और चेयरमैन (मुख्यमंत्री) की कुर्सी सौंप देगा। मोदी के बाइब्रैंट गुजरात का साल दर साल प्रॉफिट 10 प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। वाइब्रैंट गुजरात में काम करने वाले कर्मचारियों (आम जनता) को हर साल अच्छा इंक्रीमेंट मिल रहा है। पूरे गुजरात में सड़कें-बिजली-पानी सब कुछ लोगों को देश के दूसरे राज्यों से अच्छे से भी अच्छा मिल रहा है। गांवों में भी कमोबेश हालात देश की दूसरी कंपनियों (राज्यों) से अच्छे हैं।
वाइब्रैंट गुजरात में हर कोई अपना इंक्रीमेंट बढ़ाने के लिए जमकर काम करने में लगा हुआ है। सीईओ की पॉलिसी ऐसी हैं कि शेयरहोल्डर्स (आम जनता, किसान), उसमें पैसा लगाने वाले इंडस्ट्रियलिस्ट और FII (NRI) सब खुश हैं। हर किसी को यहां अच्छा मुनाफा दिख रहा है। ऐसा नहीं है वाइब्रैंट गुजरात लिमिटेड में इसके पहले के सीईओज ने बहुत कुछ न किया हो। लेकिन, नया सीईओ (मुख्यमंत्री) तुरंत फैसले लेता है। यूनियन (केशूभाई पटेल, सुरेश मेहता, कांशीराम रांणा, भाजपा संगठन, विहिप) पर रोक लगा दी गई है। हर कंपनी की तरह वाइब्रैंट गुजरात में भी ऊपर के अधिकारियों की सैलरी तेजी से बढ़ी है। लेकिन, खुद को साबित करके आगे बढ़ने का मौका सबके पास है। लेकिन, कंपनी के सीईओ नरेंद्र मोदी से पंगा लेकर यूनियन (केशूभाई पटेल, सुरेश मेहता, कांशीराम रांणा, भाजपा संगठन, विहिप) के लोगों से हाथ मिलाने की कोशिश की तो, फिर मुनाफा तो छोड़िए मूल पूंजी भी जा सकती है। नरेंद्र मोदी के कंपनी हित में लिए गए कड़े फैसलों (तानाशाही) से उसमें पैसा लगाने वाले खुश हैं। क्योंकि, इस कंपनी (गुजरात राज्य) से जुड़े किसी काम के लिए सबको खुश नहीं करना पड़ता। सीईओ या फिर उनके पसंदीदा बोर्ड मेंबर्स (विधायक) और सीईओ के प्रशासनिक अधिकारियों (IAS अफसरों) के जरिए बिना किसी रोक-टोक के हो सकता है। FII’s (NRI) तो नरेंद्र मोदी को ही दुबारा सीईओ और चेयरमैन देखना चाहते हैंकांग्रेस (पहले के सीईओ) के गुजरात को मोदी (नए सीईओ) ने वाइब्रैंट गुजरात बना दिया है। नए सीईओ के परिवार के कुछ बुजुर्ग भी (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) कह रहे हैं कि जब से इस बच्चे को कमान सौंपी गई ये फैसलों में किसी की सुनता ही नही। लेकिन, अब शेयर होल्डर्स (जनता) इनकी सुनते नहीं दिख रहे। अब यही फॉर्मूला नरेंद्र मोदी देश पर लागू करने की कोशिश में लगे हैं। काफी हद तक सफल भी हैं। इस बात का अंदाजा परिवार के बुजुर्गों (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) को लग गया इसीलिए वो परिवार के सबसे तेज बच्चे पर दांव लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए। उन्हें पता है कि परिवार का नाम तो बढ़ेगा इसी के जरिए भले हमारी इसके बाद कम सुनी जाए लेकिन, परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ने वाली है।

अब नरेंद्र मोदी इंडिया फर्स्ट की बात करने लगे हैं। नरेंद्र ने परिवार की जमी जमाई जमीन (शाखा) से आगे बढ़कर तकनीक को पकड़ा। सोशल मीडिया के जरिए हैलो हाय करने और अपनी ऊटपटांग तस्वीरे, वीडिया साझा करने वाले उन नौजवानों को पकड़ा जिनके लिए राजनीति मतलब चवन्नी छाप बात थी। उन नौजवानों के दिमाग में ये फिट कर दिया कि ये जौ मौज की जिंदगी है ये चलने वाली नहीं अगर नरेंद्र मोदी नहीं आया। क्योंकि, नरेंद्र मोदी आएगा तो इंडिया फर्स्ट कंपनी का मुनाफा तेजी से बढ़ेगा तुम नौजवानों के हाथ में ढेर सारी नौकरियां, जेब में जमकर पैसे और जिंदगी में हर सुविधा होगी। ये नौजवान भारतीय लोकतंत्र के सोते-जागते वाले पहरेदार थे। मोदी ने इन्हें जगा दिया है। ऐसा जगाया कि अब ये हैलो हाय, तस्वीरें, वीडियो अपलोड करने से पहले नमो-नमो जपने लगे हैं। नमो मंत्र को किसी ने अशुद्ध किया तो, उसका क्रियाकर्म करने को तैयार हो जाते हैं। पुराने बीजेपी के नेता गुजरात बीजेपी के नेताओं की तरह यूनियन यहां भी बना रहे हैं। बीजेपी के ‘शत्रु’ नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुखर हो गए हैं। स्थापित हो चुके दुश्मनों से हाथ मिला रहे हैं। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने आजमाया फॉर्मूला ऐसा पका लिया है कि नीचे से आवाज आई तो, ये क्या कर लेंगे।

बस मोदी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुराने दमदार बीजेपी के सीईओ से ज्यादा बोर्ड डायरेक्टर्स वो कैसे चुनवा पाते हैं। खराश वाले गले से बीजेपी के पुराने सीईओ अभी भी बीजेपी के 2 से 184 वाली कहानी दोहराते रहते हैं। अब मोदी कैसे 543 वाली संसद में कम से कम 200 से ज्यादा सदस्य चुनवा पाते हैं ये सबसे बड़ी बात होगी। क्योंकि, पुराने सीईओ अब परिवार के समर्थन और परिवार के बाहर मोदी के डर से बने पक्के समर्थन के भरोसे बैठे हैं। एक मुश्किल और है वाइब्रेंट गुजरात में कब्जे के लिए जो 51 प्रतिशत हिस्सेदारी चाहिए थी उससे छिटपुट शेयरधारक नहीं थे। इंडिया फर्स्ट में कांग्रेस बीजेपी दो बड़े शेयरधारक हैं लेकिन, छोटे-छोटे शेयरधारक मिल जाएं तो इन दोनों के बड़े शेयरधारकों से भी बड़े होने का खतरा है। इसीलिए नरेंद्र मोदी वही स्मार्टफोनपर गेम खेलने वाले नौजवानों को जगा रहे हैं जो, वोट करने के अधिकारी हैं करते नहीं हैं। उन्हें समझा रहे हैं कि पूरी ताकत दोगे तभी हम सीईओ बन पाएंगे और वाइब्रेंट गुजरात की तरह इंडिया फर्स्ट नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड का मुनाफा जमकर बढ़ाएंगे। जो इंडिया फर्स्ट में अपने मुनाफे देख रहे हैं वो नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक हैं। जो इंडिया फर्स्ट में अपने अधिकारों को एकदम समाप्त होता देख रहे हैं वो मोदी के घोर विरोधी हैं। दोनों के हित पूरी तरह बनने या बिगड़ने की बात है इसीलिए वो पूरी तरह से मोदी समर्थक या विरोधी हैं। और, यही नरेंद्र मोदी का चरित्र है, ताकत है।

Friday, July 26, 2013

राहुल गुस्सा क्यों कम करना चाहते हैं?

राहुल गांधी ने अमेठी में बड़ी अच्छी अच्छी बातें बोली हैं। गुस्सा बुरी बात है। गुस्सा करना ठीक नहीं है। उन्होंने अच्छी बातें करते हुए ये भी कहा कि नौजवानों को मौका मिलना जरूरी है। राहुल ये भी बोल गए कि पंजाब में कांग्रेस और अकालियों ने नौजवानों को बड़े मौके दिए और उससे राज्य के साथ नौजवानों की भी तरक्की हुई। बड़ी अच्छी बातें कही हैं राहुल गांधी ने। लेकिन, राहुल गांधी के साथ बड़ी विडंबना है। अब सोचिए वो अमेठी में पंजाब के नौजवानों का भला याद कर रहे हैं और इसमें भी कोई एतराज नहीं लेकिन, वो पंजाब में भी कांग्रेस के साथ अकालियों के अच्छे काम को नौजवानों की तरक्की के लिए बेहतर बता रहे हैं। क्या राहुल गांधी 1984 के बाद ये कल्पना भी कर सकते हैं कि कांग्रेस और अकाली समीकरण साथ काम कर सकते हैं। खैर, इस कपोल कल्पना पर ध्यान देने की इच्छा मेरी नहीं है। मेरी इच्छा दरअसल राहुल गांधी की इस बात को समझने की है कि वो गुस्सा करने से मना क्यों कर रहे हैं और गुस्से वाले नौजवान को वो बिना गुस्से के ही भला आदमी क्यों मान रहे हैं।

सवाल ये भी है कि वो अचानक ये क्यों कह रहे हैं कि गुस्सा लोगों में भरा जा रहा है और गुस्सा ठीक नहीं है।बड़ी जायज बात कही है राहुल गांधी ने। गुस्सा ठीक नहीं होता और अगर गुस्सा सरकार के खिलाफ हो। सरकार में बैठे लोगों के खिलाफ हो तो बिल्कुल ठीक नहीं होता। सही भी है कि गुस्सा होगा और नौजवान को होगा तो मुश्किल किसे होगी। जाहिर है जिससे नौजवानों की उम्मीदें पूरी नहीं हो रही होंगी। और, वो उम्मीदें सत्ता में बैठे लोग ही बंधाते हैं। 2004 में जब यूपीए सत्ता में आया तो देश के नौजवानों को बड़ी उम्मीदें बढ़ीं थीं। वजह साफ थी 90 के दौर में पी वी नरसिंहाराव की सरकार के चमत्कारिक वित्त मंत्री मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के त्याग के बाद प्रधानमंत्री बन रहे थे। देश के नौजवानों के मन में गुस्सा नहीं तब उम्मीदें थीं। उम्मीद इस बात की थी कि दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुल जाएंगे। हर मौके पर पहला अधिकार उन्हीं का होगा। ये उम्मीद ऐसी थी कि 2008 की मंदी के बाद भी 2009 में बीजेपी के लौह पुरुष और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी के मनमोहन को बेहद कमजोर बताने के बाद भी लोगों का भरोसा यूपीए 2 के लिए बन गया। अब यूपीए 3 की जमीन टूटी दिख रही है। यूपीए 2 के आधे से नौजवान सड़कों पर आ गया। गुस्से में है। कभी अन्ना तो कभी अरविंद के साथ सड़कों पर सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखाया। 
गुस्सा ऐसा हो गया कि 16 दिसंबर की बलात्कार की घटना के बाद नौजवान रायसीना हिल्स पर ऐसे चढ़ गया जैसे दुश्मन देश की चोटी फतह करने जा रहा हो। ये गुस्सा सत्ता को डराता है। और इसी गुस्से को अपनी बनाई उम्मीदें दिखाकर नौजवानों के गुस्से को साधने की कोशिश में नरेंद्र मोदी भी लग गए। उनको दिख गया कि भ्रष्टाचार एक समय के बाद तो सबको स्वीकार हो जाता है। बस नौजवान ही इसे स्वीकार नहीं करता। क्योंकि, नौजवान भ्रष्टाचार से खटता है लेकिन, उस भ्रष्टाचार के खाने में वो हिस्सेदार नहीं होता। देश के नौजवान के सामने अर्थशास्त्र का मनमोहक सिद्धांत भी बिखर चुका है। न जेब में पैसे हैं न अच्छी नौकरी से जेब में पैसे आने का कोई भविष्य दिख रहा है। नौजवान गुस्साएगा ही। लेकिन, गुस्साएगा तो सत्ता को खतरा होता है। राहुल गांधी की पार्टी सत्ता में है। राहुल सत्ता के शीर्ष पर हैं। भले प्रधानमंत्री न हों। इसलिए राहुल अब कह रहे हैं कि गुस्सा ठीक नहीं है।

अब राहुल गांधी बांह चढ़ाकर गुस्साने की बात नहीं करते। क्योंकि, राहुल समझ गए हैं कि गुस्सा बढ़ाने की उनकी नीति उनकी ही सत्ता के खिलाफ जा रही है। इसीलिए अब कह रहे हैं कि गुस्सा मत करिए। अभी किसी राज्य सरकार के खिलाफ गुस्से का मसला भी नहीं है। राहुल को पता है कि गुस्सा और वो भी नौजवानों का गुस्सा 2014 पर भारी पड़ सकता है। और, इस मुद्दे को बढ़ाने का कोई मौका नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी छोड़ने वाली नहीं है। इसीलिए नौजवान के इस गुस्से को अच्छा या खराब बताने के दोनों ही रास्ते सत्ता पाने या सत्ता गंवाने की तरफ जाते हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी केंद्र सरकार को हर मौके पर गरियाकर ये जताना बताना चाहते हैं कि सत्ता में बैठे लोग चाहते तो नौजवानों की उम्मीद बढ़ती लेकिन, वो काम ऐसा कर रहे हैं कि गुस्सा बढ़ाने की जरूरत है। गुस्सा बढ़ाइए सत्ता में मुझे बैठाइए और फिर मैं उम्मीद बढ़ाऊंगा।

Monday, July 01, 2013

आंकड़ों का जादू चलेगा या नरेंद्र मोदी का

543 ये वो आंकड़ा है जिसके आधार पर एक बात बार-बार आसानी से स्थापित हो जाती है। वो ये कि इस देश के एक बड़े भूभाग में लगभग शून्य की स्थिति में होने की वजह से भारतीय जनता पार्टी या फिर उसके कितने भी करिश्माई नेता के लिए दिल्ली की गद्दी पर काबिज होना संभव नहीं है। आज की तारीख में बीजेपी मतलब नरेंद्र मोदी समझें तो ये 543 का आंकड़ा और भयावह दिखने लगता है। राजनीतिक जानकार शुरुआत देश के निचले इलाके से करते हैं और पूरब की तरफ बढ़त हुए केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का जिक्र करके आसानी से साबित कर पाते हैं कि यहां भारतीय जनता पार्टी किसी भी हाल में लड़ाई की स्थिति में न आ पाती है और आती दिख रही है। उसमें एक ताजा वाजिब तर्क ये जुड़ जाता है कि दक्षिण के बीजेपी के प्रवेश द्वार कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी चरमकाल से क्षरणकाल की ओर बढ़ी है जिससे अब पहले आई सीटें आधी रह जाएं तो कोई अचरज नहीं। महाराष्ट्र की बात करें तो, शिवसेना-महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का घरेलू बंटवारा रिश्ते में आए बीजेपी के लिए वोट बांटने का काम और करेगा।

मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वहां सत्ता विरोधी समीकरण लोकसभा चुनावों पर भी काम करेगा। अभी इन दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के पास जितने सांसद हैं वो अधिकतम हैं तो जाहिर है कि इसका भी नुकसान बीजेपी को ही होगा। और, बीजेपी मतलब इस समय वैसे ही नरेंद्र मोदी हैं जैसे किसी समय अटल-आडवाणी हुआ करते थे। बिहार में नीतीश नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर छोड़ गए तो जाहिर है कि सेक्युलर नीतीश कुमार को इसका फायदा होगा और बीजेपी की सीटें पहले से घटेंगी। झारखंड में भ्रष्टाचार का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ जाएगा। उत्तर प्रदेश की बात करें तो, नए नेता बीजेपी में बने नहीं और पुराने नेता जितना भी मिले उनको मिले के लिए लड़ रहे हैं। उस पर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती का मजबूत जातिवादी वोटबैंक नरेंद्र मोदी के करिश्मे को खाक कर देगा। यानी उत्तर प्रदेश में भी नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी गई काम से। तर्क ये भी कि अयोध्या अब किसी को अपील नहीं करता। और, अगर बीजेपी ध्रुवीकरण की कोशिश करेगी तो इसका भी नुकसान बीजेपी को होगा क्योंकि, मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ वोट करेगा।
गुजरात गौरव नरेंद्र मोदी जितना वहां हैं उससे ज्यादा अब संभव है नहीं। 26 सांसदों वाले गुजरात में पहले से ही बीजेपी के 17 सांसद हैं। अगर 2-4 और बढ़ गए या पूरी 26 भी बीजेपी को मिल गई तो भी बीजेपी 1998-99 वाला करिश्मा दोहराती नहीं दिख रही है। बीजेपी ने 1998 में 25.6% वोट के साथ 182 सीटें हासिल की थीं और इसी स्तर पर 1999 में 23.7% वोट के साथ रही। 2009 में बीजेपी 18.8% वोट के साथ सिर्फ 116 सीटों पर रह गई। अब यहीं से मेरा तर्क नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी के पक्ष में जाने लगता है। सबसे पहले तो ये तथ्य कि इस देश में मतदान का प्रतिशत लगभग 60 के आसपास ही होता है। जब कोई लहर होती है तो, वोटिंग प्रतिशत 60 के ऊपर चला जाता है नहीं तो 56 से 58 प्रतिशत के बीच रहा है। 1977, 84, 89, 91 और फिर 1998 में वोटिंग प्रतिशत 60 के ऊपर गया। यानी 2009 इस लिहाज से मतदाताओं को प्रेरित करने वाला चुनाव नहीं रहा। 2009 में ही बीजेपी का वोट प्रतिशत 98 के उच्चतम स्तर से करीब 6 प्रतिशत कम रहा। तो इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि बीजेपी अपना वोट में 6 प्रतिशत का इजाफा कर सकती है। ये इजाफा होने की दो ही मुख्य वजहें होती हैं। पहला देश में अभी की जो सरकार है उसके खिलाफ लोगों में इतना गुस्सा भर जाए कि वो इसे उखाड़ फेंकने की तैयारी कर लें। दूसरा जो विकल्प दिख रहा हो उस पार्टी और उसके नेता में लोगों का भरोसा उतना ही हो कि वो सत्ता उखाड़ फेंकें तो, विकल्प में जो नेता दिख रहा है उसे सौंपने का भी मन बना लें। मुझे नहीं लगता कि पहली वजह अच्छे से तैयार है इस पर किसी को भी संदेह होगा। अब बात दूसरी वजह की। उत्तराखंड की राष्ट्रीय आपदा- भले इसे सरकार घोषित न करे- में जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने काम किया वो, दूसरी वजह को और मजबूत बनाती है। भले ही नरेंद्र मोदी की पीआर एक्सरसाइज में लगी कंपनी या फिर उनके उत्साही समर्थकों ने पंद्रह हजार गुजरातियों को एक झटके में आपदामुक्त करने के मोदी के काम को रैंबो एक्ट बनाकर विवादित कर दिया। लेकिन, जैसे-जैसे इस मुद्दे पर विवाद बढ़ा और मामला साफ हुआ तो, कुछ बातें जो साफ होकर आईं वो मोदी के पक्ष में ही जाती दिख रही हैं। पहली बात ये कि नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड पर खुद कभी राजनीति नहीं की। छनकर जो खबरें आईं उसमें उन्होंने अपनी पार्टी के उत्तराखंड के नेताओं को इस मुद्दे पर राजनीति के लिए डांटा भी। दूसरा उन्होंने इस आपदा पर कभी खुद कोई दावा नहीं किया। तीसरा जिस तरह से वो आपदा की जानकारी के दूसरे ही दिन अपनी पूरी मशीनरी के साथ वहां पहुंचे और उत्तराखंड के सोते-जागते दिखने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को साथ रखकर राहत काम की अगुवाई की वो, एक शानदार नेता की तस्वीर तैयार करती हैं। गुजरात में बड़ा बढ़िया विकास करते हैं। भुज को भूकंप के बाद तेजी में फिर से खड़ा कर दिया इसकी कहानियां नरेंद्र मोदी के लिए अच्छी बुनियाद तैयार कर चुकीं हैं लेकिन, बात आगे बढ़ने में यही रोड़ा बन रहा था। लोग विरोधी तर्क पेश कर रहे हैं कि देश गुजरात नहीं है। लेकिन, पहाड़ पर आई अब तक की सबसे भयानक आपदा में नरेंद्र मोदी ने जिस तरह नेतृत्व किया और उसके बाद कांग्रेस की बौखलाहट साफ दिखाती है कि नरेंद्र मोदी अपना काम कर गए।
और इसी आधार पर मैं मानता हूं कि ऊपर जिस 543 के आंकड़े से मैंने लेख की शुरुआत की है। उसकी बजाए 272 के आंकड़े पर बात करें तो तस्वीर व्यहारिक दिखेगी। पहले उन राज्यों की बात कर लेते हैं जहां से 356 सीटें आती हैं। और, यहां बीजेपी का प्रभाव कम है ज्यादा इस पर बहस हो सकती है लेकिन, नहीं है ये कहने वाले नहीं होंगे। ये राज्य हैं गुजरात (26 सांसद), उत्तर प्रदेश (80 सांसद), उत्तराखंड (5 सांसद), मध्य प्रदेश (29 सांसद), राजस्थान (25 सांसद), पंजाब (13 सांसद), झारखंड (14 सांसद), बिहार (40 सांसद), महाराष्ट्र (48 सांसद), कर्नाटक (28 सांसद), हरियाणा (10 सांसद), दिल्ली (7 सांसद), गोवा (2 सांसद), हिमाचल प्रदेश (4 सांसद), छत्तीसगढ़ (11 सांसद), असम (14 सांसद)। गुजरात में बीजेपी का प्रभाव सब जानते हैं। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे ज्यादा संभावना है। और, मोदी के प्रचार प्रमुख बनने पर बिहार के बाद सबसे ज्यादा खुसी जाहिर करने वाला राज्य उत्तर प्रदेश ही रहा। मतलब साफ है कि एक अदद नेता यूपी में बीजेपी कैडर को फिर से 1990 वाले दशक की तरह खड़ा कर सकता है और बीजेपी कार्यकर्ताओं को नरेंद्र मोदी में वो नेता नजर आ रहा है। राजस्थान में फिर से बीजेपी मजबूत होती दिख रही है। असम में इस समय भी 14 में से 4 सांसद बीजेपी के ही हैं। और, बार-बार छिटकने वाले सहयोगियों की चर्चा हो रही है। लेकिन, नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी की एक स्वाभाविक सहयोगी तमिलनाडु के बीजेपी अछूत राज्य में शानदार स्थिति में हैं। लोकसभा में 39 में से आधी से कुछ ज्यादा भी बीजेपी के लिए जुड़ा तो मोदी का काम हो जाएगा। इसे जोड़ लें तो 395 सीटें हैं जिन पर भाजपा लड़ाई में है। अब अगर बीजेपी 200 सीटों से ज्यादा जोड़ पाती है तो, अभी के एनडीए में सिर्फ जयललिता को जोड़ते ही सवा दो सौ का आंकड़ा पार कर जाएगा। एक बड़ी पुरानी पिक्चर मैंने देखी है जिसमें सेठ की भूमिका वाला कलाकार दूसरे फटेहाल कलाकार को समझाता है कि देखो पैसा पैसे को खींचता है। ये सुनकर फटेहाल कलाकार अपने जेब से रुपय्या निकालकर सेठ की नोटों की गड्डी खींचने का प्रयास करता है। इतने में सेठ सिक्का छीनकर फटेहाल कलाकार को भगा देता है और कहता है कि पैसा पैसे को खींचता है ये सच है। लेकिन, ज्यादा पैसा कम पैसे को खींचता है। तो, सीधी सी बात है कि एनडीए तो 272 के आंकड़े तक खिंच ही जाएगा लेकिन, इसके लिए खुद बीजेपी को 200 का आंकड़ा पार करना होगा। और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा का एक बयान नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी का पक्ष मजबूत कर रहा है। संगमा ने हाल ही में कहा है कि नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता बस धर्मनिरपेक्ष पक्ष कमजोर है। मतलब साफ है कि अगर आडवाणी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष हो सकते हैं तो 200 के पार खड़ी नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी के साथ भला कौन आने से सांप्रदायिक बनेगा। फिर चाहे वो चंद्रबाबू नायडू हों या उड़ीसा वाले नवीन पटनायक।

Tuesday, June 18, 2013

चिदंबरम साहब इतनी भी नहीं सुधरी है अर्थव्यवस्था

12 जून को अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग बढ़ाने का एलान किया। हालांकि, इसे अगर ध्यान से समझें तो ये रेटिंग बढ़ने से ज्यादा बद से बदतर हुई साख के थोड़ा सुधरने का मसला था। लेकिन, लंबे समय से ऐसी किसी खबर के इंतजार में बैठी सरकार और उसके वित्त मंत्री के लिए इससे बेहतर खबर भला क्या हो सकती थी। फिच के मुताबिक अब भारत में निवेश करने वालों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। ढेर सारे आर्थिक सुधारों की जरूरत है लेकिन, सरकार सही रास्ते पर जा रही है। और, इसीलिए रेटिंग एजेंसी ने भारत का आउटलुक निगेटिव से बढ़ाकर स्थिर कर दिया। और, सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम को भी फिर से वित्त मंत्रालय में आए 9 महीने भी बीत चुके हैं। ठीक 9 महीने बाद आई इस शुभ खबर के बहाने वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश को ये बताने की कोशिश की कि उनके आने के बाद अर्थव्यवस्था के हालात कितने बेहतर हुए हैं। इसलिए रेटिंग सुधरने के अगले दिन चिदंबरम साहब मीडिया के जरिए देश के सामने थे। रेटिंग सुधारने के फिच के फैसले के जरिए उन्होंने समझाने की कोशिश कि ज्यादातर मोर्चों पर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर लौट आई है। और जहां कमी रह गई है उसे 2 महीने यानी जून और जुलाई के महीने तक सुधार लिया जाएगा। 

वित्त मंत्री की उम्मीदों को और परवान मिला लगे हाथ आए महंगाई दर के आंकड़ों से। होलसेल प्राइस इंडेक्स के आंकड़े बता रहे हैं कि मई में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही जबकि, अप्रैल में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही थी। इस लिहाज से महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 3 साल में सबसे कम रही है। यही महंगाई का वो आंकड़ा है जिसके आधार पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी मौद्रिक नीति तय करता है। इसका मतलब ये कि इसी के आधार पर ब्याज दरें घटेंगी या बढ़ेंगी ये तय होता है। हालांकि, घटती महंगाई दर में आम जनता के लिहाज से एक आंकड़ा जो और छिपा हुआ है जिसकी चर्चा सरकार कम ही करना चाहेगी वो है फूड इनफ्लेशन यानी खाने पीने के सामानों की महंगाई दर। दरअसल फूड इनफ्लेशन अभी भी 8.25% प्रतिशत है। जबकि, पिछले साल मई में ये 6.08%  था। शायद फूड इनफ्लेशन के इस स्तर पर होने की ये वजह ही है कि वित्त मंत्रालय के साफ इशारों के बाद भी रिजर्व बैंक उस रफ्तार से ब्याज दरें नहीं घटा रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही है। और, एक दूसरा पहलू ये भी है कि रिजर्व बैंक चाहता है कि पहले बैंक रेपो रेट में की गई कटौती को लोगों तक पहुंचाएं। क्योंकि, इस साल पौना प्रतिशत और पिछले साल अप्रैल से अब तक रिजर्व बैंक सवा प्रतिशत रेपो रेट घटा चुका है लेकिन, आशंकित बैंक अभी भी ग्राहकों को इस कटौती का फायदा नहीं दे रहे हैं। हाल ये है कि अभी भी अगर घर के लिए किसी को कर्ज लेना है तो, साढ़े दस प्रतिशत के नीचे के ब्याज पर कर्ज मिलना लगभग असंभव है। सरकारी बैंक एसबीआई दस प्रतिशत के आसपास ब्याज पर कर्ज दे रहा है लेकिन, उससे कर्ज मिलना देश के ज्यादातर प्रोजेक्ट के लिए लगभग असंभव है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि अगर कोई अभी घर के लिए कर्ज लेगा तो, उसे बैंक को इस ब्याज दर पर कर्ज ली गई रकम का दोगुना 20 सालों में चुकाना होगा।

फिच की रेटिंग सुधरने के बहाने वित्त मंत्री ने स्थापित करने की कोशिश की कि महंगाई घटी है, विदेशी कर्ज भी कम हुआ है और रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है जो, बेहतर होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है। ये काफी हद तक सही भी है कि पिछले 9 महीने में देश की अर्थव्यवस्था सुधरी है या यूं कहें कि अर्थव्यवस्था सुधरने के संकेत सुधरे हैं। लेकिन, इस बात की चर्चा भले कम हो और रिजर्व बैंक फैसले महंगाई के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर लेता हुआ न दिखे। सच्चाई यही है कि इन 9 महीनों की छोड़िए 2009 में यूपीए दो आने के बाद से इस देश के लोगों को जिस महंगाई का सामना करना पड़ा है वो दस प्रतिशत के ऊपर है। आंकड़ों में भी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) से तय होने वाला रिटेल इनफ्लेशन 2009 में 10.83 प्रतिशत रहा। 2010 में ये 12.11 प्रतिशत पर पहुंच गया। 2011 में इसमें काफी कमी आई लेकिन, फिर भी ये 8.87 प्रतिशत रहा। 2012 में फिर 9.30 प्रतिशत हो गया और इस साल की बात करें तो, औसत महंगाई करीब साढ़े ग्यारह प्रतिशत है। 
ये महंगाई दर के आंकड़े अगर कम भयावह दिखते हैं तो, इन्हें कुछ और आंकड़ों के साथ रखकर देखिए अर्थव्यवस्था की स्थिति और साफ हो जाएगी। महंगाई की मार झेलने वाले देश के लोगों की जेब में रकम कितनी बढ़ रही है इस पर नजर डालिए। 2012-13 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय बढ़कर 39,168 रुपए हुई ये 2011-12 से सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ी है। जबकि, 2011-12 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 4.7 प्रतिशत बढ़ी थी। महंगे कर्ज के बोझ से परेशान कंपनियों के तिमाही नतीजे और बीते वित्तीय वर्ष में दस साल में सबसे कम तरक्की की रफ्तार अर्थव्यवस्था की चुनौती के हालात साफ साफ बयान कर देती है। बीते वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार पांच प्रतिशत रही है। हालांकि, ये साल सुधार का साल है। और आगे अर्थव्यवस्था सुधरती दिख रही है। लेकिन, अगर सबकुछ अच्छा रहा तो, भी 2015 में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत के नीचे ही रहती दिख रही है। ये अनुमान विश्व बैंक का है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2014 में खत्म होने वाले यानी इस वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान 5.7 प्रतिशत का है। जो पूरी तरह से निर्यात के बेहतर आंकड़ों और निवेश पर टिका हुआ है। वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर दिखाई। कोयला, गैल, फर्टिलाइजर क्षेत्र में निवेश की बेहतर तस्वीर भी दिखी। साथ ही वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया कि विदेशी निवेश की शर्तें बेहतर करने के लिए चंद्रशेखर समिति की सिफारिशों पर 25 जून को होने वाला सेबी की बैठक में कुछ अच्छे फैसले लिए जाएंगे। हफ्ते के आखिरी दिन अच्छी तेजी देखने को मिली। लेकिन, शुक्रवार को 350 अंक से ज्यादा चढ़ने के बाद भी सेंसेक्स अभी बमुश्किल उन्नीस हजार से कुछ आगे ही जा पाया है। जो, कितने दिनों तक टिकेगा पता नहीं। जनवरी 2008 में 21000 पार करने वाला सेंसेक्स आज तक 21000 छोड़िए 19000 के आसपास ही लहराता रह जा रहा है। वित्त मंत्री भरोसा दिला रहे हैं कि रुपए की औकात डॉलर के मुकाबले अब और नहीं गिरेगी। वैसे 2008 में 1 डॉलर के लिए 46 रुपए के भाव वाला रुपया गिरकर अब 59 के भाव तक पहुंच गया है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम बार-बार लोगों से अपील कर रहे हैं कि सोना मत खरीदो और उनकी इस चाह में मैं भी पूरी तरह से साथ हूं लेकिन, सोने के अतिमोह वाले भारतीयों के मन का क्या करेंगे कि जिस दिन उन्होंने भरे गले से ये अपील की उस दिन भी सोने का भाव 360 रुपए प्रति दस ग्राम चढ़ गया। फिर अभी तो शादियों का सीजन शुरू हो रहा है। उसके बाद त्यौहारों की झड़ी लग जाएगी। फिर भारतीय कहां से चिदंबरम साहब की अपील सुनने लगे। सोने पर आयात ड्यूटी जनवरी से दोगुनी हो चुकी है। चार प्रतिशत लगती थी अब आठ प्रतिशत लगती है फिर भी भारतीयों का सोना प्रेम बहुत कम नहीं हो पा रहा है। भारतीयों के बीच सोने की हैसियत जितनी बढ़ेगी और भारतीय रुपए की हैसियत दुनिया में जितनी गिरेगी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत उतनी ही तेजी से सिर के बल चलने लगेंगे। पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर सब्सिडी घटाकर सरकार ने सब्सिडी बिल काफी कम कर लिया है। लेकिन, डीजल की कीमत अठन्नी बढ़ती हुई और पेट्रोल की कीमत रुपए दो रुपए बढ़कर सरकार के महंगाई घटने के सपने को फिर से आधी नींद में हो तोड़ देगी। और, चुनाव नजदीक हैं तो, सरकार खर्चे घटाने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। खुद वित्त मंत्री अब कह रहे हैं कि सभी मंत्रालय खर्च तेजी में करें। तो वित्तीय घाटा तो सुरसा के बढ़ते मुंह की तरह और खुलने के लिए तैयार ही बैठा है। यही वजह रही वित्त मंत्री जी कि आपके लाख इशारे के बाद भी 17 जून को रिजर्व बैंक ने चवन्नी रेट भी नहीं गिराया अब कम से कम 30 जुलाई तक के लिए कर्ज सस्ता होने की उम्मीद धूमिल हो गई है। वित्त मंत्री जी रिजर्व बैंक पर दबाव बनाने से पहले आपको बैंकों पर दबाव बनाना होगा कि वो कर्ज सस्ता करें।

प्रधानमंत्री जी एनर्जी पॉलिसी बेहतर कीजिए जिससे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खोज का काम तेज हो और पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली से पूछिए और इस बात का इंतजाम कीजिए कि देश की पेट्रोलियम पॉलिसी में बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके। क्योंकि, सारा खेल भरोसे का है अगर देश के लोगों को ये लगेगा कि कोई और ताकत देश को चला रही है तो, भला वो भरोसा कहां से आएगा। और, अगर भरोसा नहीं आया तो फिर ये यूपीए दो के आखिर में अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर का सपना दिखाकर यूपीए तीन बनाने का सपना भी सपना ही रह जाएगा।

Saturday, April 13, 2013

बुद्धिवालों मुझे गरियाने मत लगना !

आमतौर पर सामान्य बुद्धि वालों की तरह मैं भी बाबा विरोधी हूं। ज्यादातर बाबाओं का जो, अंधविश्वास, अंधभक्ति फैलाकर लोगों को बरगलाते हैं और उनकी कमाई से खुद दुनिया की सारी सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं। सिरसा वाले बाबा राम रहीम सिंह में भी मुझे इसी तरह की कमियां दिखती हैं। चमकते कपड़े पहनकर और अजीब से संगीत वाले विज्ञापनों के जरिए वो भले ही लोगों तक पहुंचते हों। लेकिन, उनके खिलाफ कई अपराध के मामले हैं। ये अलग बात है कि उन पर कानूनी शिकंजा उनके भक्तों के जनदबाव की वजह से शायद नहीं बन पाता।

सितंबर 2007 में मैंने राम रहीम सिंह के इन्हीं कारनामों के खिलाफ लिखा भी था। और, मैं मानता हूं कि वो मुद्दा अलग है और उस पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। उस रिपोर्ट पर एक बड़ी तीखी टिप्पणी आई थी। टिप्पणी किन्हीं रोहित की थी जो, हरियाणा के बलवारा से हैं और शायद किसी चैनल के स्ट्रिंगर हैं। वो, टिप्पणी मैं पूरी यहां चिपका रहा हूं। (aap ko kya lagta hai aapne ye sach likha hai??? kya aap ke paas in baato ka koi paroof hai???? harsh ji midal ho kar saocho ek tarfa mat likho...kya aapne kabhi dere dwara manvta bhlai ke ke baare main bhi blog pe kuch publish kiya hai??? kya aapne kabhi dere main aakar dekha ki waha kasa mahool hai,,, aap un gharo se pucho ki dere ki kya ahmiyt hai jo pehle shrab ki gandgi se ghire the or aaj waha suckh shanti hai,,,,, jo dere ke kehlaf mamle hai ye aap bhi jante hai or main bhi..ye sab mamle rajniti ke karan hai... chalo aap ko bolne ka haqq hai lekin plz pehle tathyo ko parkha karo phir kuch likho to acha hoga...)

नोएडा में सड़क नाली साफ करते डेरा सच्चा सौदा के लोग
उस वक्त मुझे लगा कि ये भी बाबा के अंधभक्तों में से होंगे इसलिए मैंने उनसे बहस नहीं की। लेकिन, आज सुबह जब मैं अपने घर से निकल रहा था। तो, घर के सामने की सड़क पर ढेर सारी महिलाएं और पुरुष सड़क-नाली सब साफ कर रहे थे। और, साफ कर रहे थे मतलब पूरे मनोयोग से साफ कर रहे थे। किसी NGO के लोगों की तरह फोटो खिंचवाने के लिए और फोटो खींचकर उससे रकम वसूलने के लिए नहीं। मैं गाड़ी स्टार्ट करके निकल पड़ा तो, बाहर कई बड़ी बसें, ट्रैक्टर खड़े दिखे। बसों पर बैनर लगा था। डेरा सच्चा सौदा सिरसा वाले। उसके नीचे नोएडा महासफाई अभियान। फिर मैंने गाड़ी मोड़ी अपने घर के सामने की सड़क पर समाजसेवा का काम कर रहे लोगों की एक फोटो अपने मोबाइल से ली। और, आगे उन्हीं में से एक से बात की तो, पता चला कि कल बाबा का सत्संग नोएडा के किसी सेक्टर में है। इसलिए सत्संग से पहले बाबा के अनुयायी पूरे नोएडा को साफ कर रहे हैं। उसने बताया कि करीब 3 लाख लोग एक साथ इस सफाई अभियान में हैं और सेक्टर 55, 56, 57 की तरफ पंजाब के लोग हैं। और, दूसरी तरफ हरियाण, यूपी के भी लोग हैं। संख्या कम ज्यादा हो सकती है। अब तक के अनुभव के आधार पर मैं ये दावा कर सकता हूं कि इतना बड़ा सफाई अभियान चलाने की ताकत शायद भारत के किसी नगर निगम में नहीं है और नोएडा अथॉरिटी उसका अपवाद नहीं है। सलाम इस जज्बे को। अपने घर के सामने के सफाई अभियान की तस्वीर भी चिपका रहा हूं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...