राहुल गुस्सा क्यों कम करना चाहते हैं?

राहुल गांधी ने अमेठी में बड़ी अच्छी अच्छी बातें बोली हैं। गुस्सा बुरी बात है। गुस्सा करना ठीक नहीं है। उन्होंने अच्छी बातें करते हुए ये भी कहा कि नौजवानों को मौका मिलना जरूरी है। राहुल ये भी बोल गए कि पंजाब में कांग्रेस और अकालियों ने नौजवानों को बड़े मौके दिए और उससे राज्य के साथ नौजवानों की भी तरक्की हुई। बड़ी अच्छी बातें कही हैं राहुल गांधी ने। लेकिन, राहुल गांधी के साथ बड़ी विडंबना है। अब सोचिए वो अमेठी में पंजाब के नौजवानों का भला याद कर रहे हैं और इसमें भी कोई एतराज नहीं लेकिन, वो पंजाब में भी कांग्रेस के साथ अकालियों के अच्छे काम को नौजवानों की तरक्की के लिए बेहतर बता रहे हैं। क्या राहुल गांधी 1984 के बाद ये कल्पना भी कर सकते हैं कि कांग्रेस और अकाली समीकरण साथ काम कर सकते हैं। खैर, इस कपोल कल्पना पर ध्यान देने की इच्छा मेरी नहीं है। मेरी इच्छा दरअसल राहुल गांधी की इस बात को समझने की है कि वो गुस्सा करने से मना क्यों कर रहे हैं और गुस्से वाले नौजवान को वो बिना गुस्से के ही भला आदमी क्यों मान रहे हैं।

सवाल ये भी है कि वो अचानक ये क्यों कह रहे हैं कि गुस्सा लोगों में भरा जा रहा है और गुस्सा ठीक नहीं है।बड़ी जायज बात कही है राहुल गांधी ने। गुस्सा ठीक नहीं होता और अगर गुस्सा सरकार के खिलाफ हो। सरकार में बैठे लोगों के खिलाफ हो तो बिल्कुल ठीक नहीं होता। सही भी है कि गुस्सा होगा और नौजवान को होगा तो मुश्किल किसे होगी। जाहिर है जिससे नौजवानों की उम्मीदें पूरी नहीं हो रही होंगी। और, वो उम्मीदें सत्ता में बैठे लोग ही बंधाते हैं। 2004 में जब यूपीए सत्ता में आया तो देश के नौजवानों को बड़ी उम्मीदें बढ़ीं थीं। वजह साफ थी 90 के दौर में पी वी नरसिंहाराव की सरकार के चमत्कारिक वित्त मंत्री मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के त्याग के बाद प्रधानमंत्री बन रहे थे। देश के नौजवानों के मन में गुस्सा नहीं तब उम्मीदें थीं। उम्मीद इस बात की थी कि दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुल जाएंगे। हर मौके पर पहला अधिकार उन्हीं का होगा। ये उम्मीद ऐसी थी कि 2008 की मंदी के बाद भी 2009 में बीजेपी के लौह पुरुष और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी के मनमोहन को बेहद कमजोर बताने के बाद भी लोगों का भरोसा यूपीए 2 के लिए बन गया। अब यूपीए 3 की जमीन टूटी दिख रही है। यूपीए 2 के आधे से नौजवान सड़कों पर आ गया। गुस्से में है। कभी अन्ना तो कभी अरविंद के साथ सड़कों पर सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखाया। 
गुस्सा ऐसा हो गया कि 16 दिसंबर की बलात्कार की घटना के बाद नौजवान रायसीना हिल्स पर ऐसे चढ़ गया जैसे दुश्मन देश की चोटी फतह करने जा रहा हो। ये गुस्सा सत्ता को डराता है। और इसी गुस्से को अपनी बनाई उम्मीदें दिखाकर नौजवानों के गुस्से को साधने की कोशिश में नरेंद्र मोदी भी लग गए। उनको दिख गया कि भ्रष्टाचार एक समय के बाद तो सबको स्वीकार हो जाता है। बस नौजवान ही इसे स्वीकार नहीं करता। क्योंकि, नौजवान भ्रष्टाचार से खटता है लेकिन, उस भ्रष्टाचार के खाने में वो हिस्सेदार नहीं होता। देश के नौजवान के सामने अर्थशास्त्र का मनमोहक सिद्धांत भी बिखर चुका है। न जेब में पैसे हैं न अच्छी नौकरी से जेब में पैसे आने का कोई भविष्य दिख रहा है। नौजवान गुस्साएगा ही। लेकिन, गुस्साएगा तो सत्ता को खतरा होता है। राहुल गांधी की पार्टी सत्ता में है। राहुल सत्ता के शीर्ष पर हैं। भले प्रधानमंत्री न हों। इसलिए राहुल अब कह रहे हैं कि गुस्सा ठीक नहीं है।

अब राहुल गांधी बांह चढ़ाकर गुस्साने की बात नहीं करते। क्योंकि, राहुल समझ गए हैं कि गुस्सा बढ़ाने की उनकी नीति उनकी ही सत्ता के खिलाफ जा रही है। इसीलिए अब कह रहे हैं कि गुस्सा मत करिए। अभी किसी राज्य सरकार के खिलाफ गुस्से का मसला भी नहीं है। राहुल को पता है कि गुस्सा और वो भी नौजवानों का गुस्सा 2014 पर भारी पड़ सकता है। और, इस मुद्दे को बढ़ाने का कोई मौका नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी छोड़ने वाली नहीं है। इसीलिए नौजवान के इस गुस्से को अच्छा या खराब बताने के दोनों ही रास्ते सत्ता पाने या सत्ता गंवाने की तरफ जाते हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी केंद्र सरकार को हर मौके पर गरियाकर ये जताना बताना चाहते हैं कि सत्ता में बैठे लोग चाहते तो नौजवानों की उम्मीद बढ़ती लेकिन, वो काम ऐसा कर रहे हैं कि गुस्सा बढ़ाने की जरूरत है। गुस्सा बढ़ाइए सत्ता में मुझे बैठाइए और फिर मैं उम्मीद बढ़ाऊंगा।