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Tuesday, October 15, 2013

अमेरिका पर भरोसा दुनिया में ताला लगाएगा!



अमेरिका में आंशिक तालाबंदी अमेरिका और अमेरिकियों का नया चरित्र दुनिया के सामने पेश कर रही है। ऐसे सरकारी कर्मचारी जिनको अस्थाई तौर पर छुट्टी के लिए कहा गया है। उनके सामने कितनी तेजी में संकट हो गया है। इसका अंदाजा इस उदाहरण से आसानी से लग जाएगा। ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत यावत जीवेत सुखम जीवेत का सिद्धांत भले ही चार्वाक दर्शन हो और भारतीयों के संदर्भ में जाना जाता हो लेकिन, सच्चाई ये है कि इस सिद्धांत को जीते सिर्फ अमेरिकी हैं। हफ्ते भर में ही बिना वेतन के छुट्टी पर भेजे गए कर्मचारियों के सामने संकट खड़ा हो गया है। बचत है नहीं देनदारियां ढेर सारी। अमेरिका के डिफेंस डिपार्टमेंट की डिफेंस एक्विजिशन यूनिवर्सिंटी में आईटी एक्सपर्ट के तौर पर काम करने वाली मेकाइला कोलमैन की मुश्किल इतनी बड़ी हो गई है कि उन्हें अपने रोज के खर्चों के लिए अपने पुराने सामान बेचने की नौबत आ गई है। और ये सामान क्या हैं ये सुनकर आपको हंसी आ सकती है। मेकाइला ने अपने बच्चों के कुछ ऐसे सामानों को बेचने का विज्ञापन दिया है जिसकी उन्हें आगे जरूरत नहीं लगती। विज्ञापन में मेकाइला ने साफ लिखा है कि कीमतों कम ज्यादा हो सकती हैं लेकिन, जो सचमुच खरीदना चाहते हैं वही संपर्क करें क्योंकि उन्हें खर्च चलाने के लिए रकम की सख्त जरूरत है। जिन सामानों का विज्ञापन दिया गया है उसकी अनुमानित कीमत करीब 300 डॉलर बताई गई है। मेकाइला के पति भी काम करते हैं लेकिन, मेकाइला और उनके पति ने सारी बचत अपने उस घर को ठीक कराने में हाल ही लगा दी जिसे वो बेचना चाहते हैं। मेकाइला और उनके पति को अंदाजा ही नहीं था कि एक राजनीतिक तूफान आएगा और उनकी जिंदगी में इस तरह का संकट खड़ा हो जाएगा। डेमोक्रैट और रिपब्लिकन के बीच की जंग अमेरिकियों के लिए खतरनाक संकट बनती दिख रही है और धीरे-धीरे दुनिया के लिए भी। 

ये अंदाजा दुनिया को भी नहीं था कि अमेरिका ऐसे बंद भी हो सकता है। चौंकाने वाली बात है कि ये कैसे हो सकता है। दुनिया जिस एक देश के इशारे पर चलती है। जिस एक देश के बारे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ये सोचते हैं कि उसके मुखिया से शिकायत लगाकर भारतीय प्रधानमंत्री अपने पक्ष की बात मजबूत कर लेंगे। जिस एक देश की अपनी समस्याएं भले खत्म न हों लेकिन, कश्मीर सुलझाने के लिए वो आगे आ जाता है। जिस देश के बैंकिंग सिस्टम के दिवालियेपन से दुनिया एक बार बर्बाद हो चुकी है और अब बड़ी मुश्किल से पटरी पर आती दिख रही थी। जिस अमेरिका के सुधरने से भारत जैसा देश भी अपनी अर्थव्यवस्था सुधरने का अनुमान लगाए बैठा है। उस अमेरिका में ताला कैसे लग सकता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि वहां ताला लग गया है। अमेरिका को ताला लगने का मतलब क्या हुआ, पहले तो ये समझना जरूरी है। दरअसल अमेरिका के 8 लाख फेडरल कर्मचारी (भारतीय संदर्भ में समझें तो केंद्रीय सरकार के कर्मचारी) छुट्टी पर भेज दिए गए हैं। अमेरिकी फेडरल के कुल करीब तैंतीस लाख कर्मचारी हैं। और उनमें से ये आठ लाख कर्मचारी एक अक्टूबर से तब तक तनख्वाह नहीं पाएंगे। जब तक किसी तरह अमेरिका की इज्जत बचाने के लिए कोई समझौता रिपब्लिकन और डेमोक्रैट के बीच हो जाए तो बात अलग। इसकी वजह है अमेरिकी सीनेट और कांग्रेस में प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों दलों डेमोक्रैट्स और रिपब्लिकन के बीच चल रही तनातनी।

वैसे तो अमेरिका जिस राह पर था उसका इस हाल में पहुंचना तय था। लेकिन, अभी जो अमेरिकी बंदी की वजह बनी है वो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की निजी इच्छा है। निजी इच्छा मतलब ओबामा ने 2010 में एक हेल्थकेयर कार्यक्रम लागू किया था जिसे एक अक्टूबर से लागू कर दिया गया है। सारी लड़ाई उसी की है। इसके लिए फंड का भी प्रावधान कर दिया है वहां की सीनेट (संसद) ने। अमेरिका के मुख्य सदन में इस बिल को अफोर्डेबल हेल्थकेयर फॉर अमेरिका एक्ट के नाम से जाना जाता है। यही कानून सीनेट में पेशेंट प्रोटेक्शन और अफोर्डेबल एक्ट के नाम से पास हुआ। हाउस और सीनेट दोनों के अपने अलग अनुमान हैं इस बिल को लागू करने में आने वाले खर्च को लेकर। हाउस मानता है कि इसे लागू करने में एक हजार बिलियन डॉलर से कुछ ज्यादा की रकम खर्च होगी जबकि, सीनेट का अनुमान इस पर करीब साढ़े आठ सौ बिलियन डॉलर खर्च होने का है। इस कानून के मुताबिक, हर अमेरिकी को स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए बीमा करने में आसानी की बात है। वैसे अमेरिका में बीमा सुरक्षा करीब पचासी प्रतिशत लोगों के पास पहले से है। भारत जैसा नहीं कि खाद्य सुरक्षा योजना से पचास करोड़ गरीबों को फायदा मिलेगा या 82 करोड़ गरीबों को यही तय नहीं हो पा रहा है। लेकिन, इस नए कानून के बाद सभी अमेरिकियों को बीमा सुरक्षा देने की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की योजना है। यहं से रिपब्लिकन का विरोध शुरू हो जाता है। रिपब्लिकन का कहना है कि इस योजना पर होने वाले खर्च से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा साथ ही लोगों पर भारी टैक्स थोपा जाएगा। इसीलिए रिपब्लिकन इस बिल को कम से कम एक साल के लिए टालने की बात कर रहे हैं। जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का साफ कहना है कि ये पूरी तरह से राजनीति है। ओबामा का कहना है कि ये अमेरिका के इतिहास में पहली बार होगा जब रिपब्लिकन इस बात पर अड़े हैं कि मैं करोड़ो लोगों के हित वाला कानून को लागू न करूं। ऐसा करने पर वो अमेरिकी सरकार को बंद करने की धमकी दे रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका अपनी देनदारी नहीं चुका पाएगा।

अब अगर ओबामा के इस हेल्थकेयर बिल के बारे में उदाहरण के साथ समझना है तो इसे आप भारत के खाद्य सुरक्षा बिल की तरह से समझ सकते हैं। भारत का चालू खाते का घाटा लगातार बढ़ रहा है इसके लिए सरकार ने पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म करने की योजना बनाई है लेकिन, सवा लाख करोड़ रुपये के खर्च वाली खाद्य सुरक्षा योजना को आनन फानन में पहले अध्यादेश और फिर कानून बनाकर संसद से पास कर दिया गया। चालू खाते का घाटा पहले तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान जीडीपी के 4.9% को पार कर गया है। लेकिन, सोनिया गांधी की निजी इच्छा वाली खाद्य सुरक्षा योजना लागू हो गई है। हालांकि, वो धीरे-धीरे लागू होगी। चुनावी राज्यों यानी दिल्ली, राजस्थान से इसकी शुरुआत हुई है और 2014 के चुनाव जीतने भर की वोट सुरक्षा योजना बन गई है। ठीक इसी तरह बराक ओबामा ने अमेरिकियों के लिए हेल्थकेयर योजना शुरू की है। अब अमेरिका पहले ही कर्ज के बोझ में बुरी तरह डूबा हुआ है। उस पर ये हेल्थकेयर योजना का खर्च मुसीबत बन गया है। इससे पहले भी कर्ज की सीमा बढ़ाने को लेकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था खतरनाक संकट से जूझ चुकी है। अमेरिकी कांग्रेस ने अभी कर्ज लेने की अधिकतम सीमा $16.7 ट्रिलियन तय कर रखी है। अब अगर ये सीमा नहीं बढ़ाई जाती है तो सरकार खर्च चलाने के लिए भी रकम का जुगाड़ मुश्किल से कर पाएगी। क्योंकि, ये सीमा 17 अक्टूबर तक परी हो जाएगी। इसका सीधा सा मतलब होगा कि अगर सीनेट ने अमेरिका के कर्ज लेने की सीमा नहीं बढ़ाई तो अमेरिका के लिए देनदारी चुकाना भारी पड़ने लगेगा। और ये बड़े संकट की शुरुआत होगी। अमेरिका पूरी तरह से करीब एक दशक से उधार की अर्थव्यवस्था पर चल रहा है। दुनिया भर की सरकारें कर्ज लेती हैं लेकिन, अमेरिका का कर्ज संकट कितना बड़ा है इसको समझना जरूरी है। भारत की सरकार का कर्ज उसके जीडीपी का 67% है। मतलब 100 रुपये अगर भारत की जीडीपी मान लें तो 67 रुपये का कर्ज भारत पर है। लेकिन, जरा अमेरिका की स्थिति समझिए। अमेरिका पर कर्ज उसकी जीडीपी का 104% है। मतलब अगर अमेरिकी जीडीपी- हिंदी में अमेरिका की पूरी हैसियत- 100 डॉलर मानें तो उस पर कर्ज 104 डॉलर से ज्यादा है। ये अमेरिका की अर्थव्यवस्था है। इस अर्थव्यवस्था में चुनाव के पहले ओबामा हर अमेरिकी को बीमा सुरक्षा आसान प्रीमियम और शर्तों पर देना चाहते हैं और रिपब्लिकन इससे किसी भी कीमत पर डेमोक्रैट को चुनावी फायदा नहीं होने देना चाहते। यही पूरी लड़ाई है और अमेरिकी शटडाउन के संकट की वजह है। ये लंबी खिंचे या जल्दी खत्म हो जाए। इससे दुनिया को एक चेतावनी जरूर है कि उसे विकल्प खोजना होगा। डॉलर भुगतान संतुलन और उधारी की अर्थव्यवस्था पर चल रहे अमेरिका पर अब भरोसा दुनिया के लिए खतरनाक हो सकता है। वीजा मिलना इस समय थोड़ा मुश्किल है लेकिन, उधारी पर दादागीरी दिखाने वाले अमेरिका की असलियत देखनी हो तो इसी समय अमेरिका जाइए। नेशनल पार्क तक में घूमने का मौका नहीं मिलेगा। क्योंकि, नेशनल पार्क के कर्मचारी भी उन्हीं आठ लाख कर्मचारियों में से हैं जिन्हें अस्थाई छुट्टी गई है। इससे हर रोज अमेरिका को 30 लाख डॉलर का नुकसान हो रहा है। फिलहाल अमेरिका बंद है, डेमोक्रैट, रिपब्लिकन लड़ रहे हैं और दुनिया दहशत में है।

Saturday, August 31, 2013

खुद पर भरोसा नहीं दूसरों से भरोसा करने को कहते हो !

रुपया कब मजबूत होगा। इस सवाल के जवाब में अब हम भारतीय रुपये की मजबूती की कल्पना करते हैं तो शायद दिमाग में 64-65 का भाव अच्छा दिखता होगा। वजह ये कि जिस तेजी से रुपया डॉलर, पाउंड और दूसरी मुद्राओं के मुकाबले सरक रहा है उसमें हमें ये लगता है कि जहां है वहीं रुक जाए तो बात बन जाए। और, शायद भारत की सरकार भी ऐसे ही सोच रही है। इसी वजह से फिलहाल रुपये की मजबूती के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि, हमारी सरकार अभी भी रुपये की मजबूती की अपनी नीति पर खास काम करती नहीं दिख रही है। हम दुनिया के भरोसे हैं। लेकिन, भारत सरकार की मौजूदा अर्थनीति को देखकर एक लाइन जो मेरे दिमाग में सबसे पहले आती है वो ये कि हम अगर दुनिया के ही भरोसे हैं तो, दुनिया फिर हमारा भरोसा क्यों करे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि अमेरिका, यूरोप में जब जबरदस्त मंदी आई तो हमारी सरकार ने कहाकि हम इसी वजह से कमजोर हो रहे हैं और अब जब खबरें आ रही हैं कि अमेरिका के बाजार सुधर रहे हैं तो हमारी अर्थव्वस्था में कमजोरी की वजह फिर से यही बन रही है। 

वैसे सच्चाई ये भी है कि 2008-09 में जब अमेरिका, यूरोप बर्बादी के कगार पर था तो चीन और भारत की ने ही अपनी 10 प्रतिशत के आसपास वाली तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था से दुनिया को बचाया था। तो अब मुश्किल कहां है। अमेरिका, यूरोप जब टूटे तो हमारी सरकार ने तेजी से नए बाजार खोजे जिससे एक्सपोर्ट बेहतर हो। लेकिन, ये समस्या का हल नहीं था। डॉलर ऐसे नहीं आएगा।  दरअसल जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूटी तो वहां के निवेशकों ने भारत और चीन जैसे बाजारों में डॉलर झोंक दिया। क्योंकि, दुनिया में सबसे बेहतर मुनाफा विदेशी निवेशकों को भारत, चीन जैसे देशों में ही मिल रहा था। लेकिन, इस मौके का इस्तेमाल भारत सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में नहीं कर पाई। और, डॉलर के आने को भारत की असल ताकत समझने लगी। जबकि, वो भारत की ताकत नहीं थी जैसे ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधरनी शुरू हुई तो वहां के निवेशकों ने फिर से डॉलर निकालना शुरू कर दिया। उसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। उसका असर ये है कि जनवरी 2008 में 21000 का जादुई आंकड़ा पार करने वाला सेंसेक्स 2010 की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग में ही उस आंकड़े को दोबारा छू पाया। और अब तो 18000 के आसपास लहराते सेंसेक्स के लिए 21000 का आंकड़ा दिवास्वप्न सा दिखने लगा है। वजह साफ है कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था, पूरा बाजार डॉलर डीलरों के इशारों पर नाचता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था कमजोर होने पर वो हमारे यहां निवेश करके मुनाफा कमा जाते हैं और फिर हमारे बाजार अर्थव्यवस्था को कमजोर करके हमारे रुपये पर ऐसा दबाव बना देते हैं कि हमारी सरकार फिर डॉलर डीलरों के आगे भीख मांगने वाली मुद्रा में व्यवहार करने लगती है। जबकि, सरकार अगर दुनिया के इस सबसे बड़े बाजार को दुनिया के रहम के बजाय अपने नियमों के लिहाज से चलाने लगे तो बात बन जाए।

अभी जब रुपये की जोरदार गिरावट हुई उसके बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एलान किया कि निवेश पर बनी कैबिनेट समिति ने करीब दो लाख करोड़ के बुनियादी प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। लंबे समय से रुके हुए 36 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सड़क, बिजली जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के हैं। ये एक अच्छा कदम है लेकिन, शायद इस अच्छे कदम को चलने में सरकार ने समय बहुत ज्यादा ले लिया है। इतना ज्यादा कि सरकार की लालफीताशाही (नियमकों की बाधाएं पढ़िए) की वजह से देश में करीब सात लाख करोड़ रुपए की योजनाएं अंटकी पड़ी हैं। इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने जितनी रकम खर्च करने की योजना बनाई है ये उसकी लगभग आधी रकम है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि सरकार देश की जो ताकत है उसको बढ़ाने के बजाय डॉलर डीलरों के भरोसे बैठी हुई है। सरकार देश की बुनियादी परियाजनाओं को लेकर कितनी गंभीर है इसका अंदाजा कुछ तथ्यों से लगाया जा सकता है। बीओटी यानी बनाइए चलाइए और सौंप दीजिए- इस आधार पर दिए जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के सिर्फ 1933 किलोमीटर के प्रोजेक्ट सरकार दे पाई है। पिछले आठ सालों में ये राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए दिया जाने वाला सबसे कम ठेका है। और ये ऐसा नहीं है कि सिर्फ ठेके देने में ही सरकार पिछड़ रही है। योजनाओं में अमल में देरी की वजह से कम से कम 3300 किलोमीटर के 25 राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट हैं जो रुके हुए हैं। और देरी की वजह है भूमि अधिग्रहण। हालांकि, सरकार खाद्य सुरक्षा बिल के बाद भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराने में कोई कसर हीं छोड़ेगी लेकिन, फिर भी संदेह है कि इस वित्तीय वर्ष में 3500 किलोमीटर से ज्यादा के राष्ट्रीय राजमार्ग लोगों के सफर के लिए तैयार हो पाएंगे। 

बुनियादी क्षेत्र की सभी परियोजनाओं का हाल ऐसा ही है। देश के 80 प्रतिशत थर्मल पावर प्रोजेक्ट रेगुलेटरी क्लियरेंस के अभाव में रुके पड़े हैं या बहुत देरी से चल रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने निजी क्षेत्र के कोयला आधारित बिजलीघरों से 44000 मेगावॉट बिजली उत्पादन का अनुमान लगा रखा था वो अब सिर्फ 7000 मेगावॉट ही पूरा होता दिख रहा है। मुंबई देश का आर्थिक राजधानी है। लेकिन, इस आर्थिक राजधानी में बुनियादी परियोजनाओं के हाल से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के आर्थिक हालात क्यों गड़बड़ हैं। मुंबई मेट्रो रेल का दूसरा चरण हो, मुंबई की पहचान बन चुके बांद्रा-वर्ली सी लिंक का विस्तार हो, मोनोरेल के नए रूट की बात हो या फिर नवी मुंबई का प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। सब के सब अभी कागजों में ही हैं। कई सालों के बाद भी अभी ये जमीन पर नहीं दिख रहे हैं। दुखद ये कि हाल ही में मुंबई के महत्वाकांक्षी मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के लिए 5 चुने गए कंसोर्शियम में से किसी ने बोली नहीं लगाई। और इसके पीछे वजह ये कि वो लागत और उसके लिहाज से मुनाफे को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। साथ ही उन्हें राजनीतिक दखलंदाजी भी परेशानी में डालती है। 

दरअसल ये राजनीतिक दखलंदाजी ही है जो असल वजह है इस देश की अर्थव्यवस्था के बुरे हाल का। अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक अच्छा कदम था धीरे-धीरे पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी हटाना। लेकिन, जरा देखिए- सरकार ने असल में क्या किया। सब्सिडी हटाई 25 जून 2010 को तेल कंपनियों को पेट्रोल की कीमत तय करने का पूरा अधिकार भी दे दिया। अभी धीरे-धीरे डीजल के दाम भी तय करने का अधिकार दे रहे हैं। लेकिन, 25 जून 2010 के बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव जब-जब आए राजनीतिक नफे के लिए अपनी नीति को रोक दिया। अभी भी सरकार वही कर रही है पेट्रोल के दाम कुछ एक रुपये के आसपास 15 अगस्त की रात बढ़ जाने चाहिए थे लेकिन, संसद सत्र चल रहा है इसलिए पेट्रोल और डीजल की बढ़त पर रोक लगा दी गई। तेल कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है और घाटे को ब्याज सहित तेल कंपनियां संसद सत्र खत्म होने के तुरंत बाद वसूल लेंगी। और, फिर डीजल के दामों की तेज बढ़त महंगाई को आसमान पर पहुंचा देगी। ब्याज दरें पहले ही ऊंचे स्तर पर हैं। यानी इस सरकार की नीति ही पक्की नहीं है। हर काम वोट के लिहाज से करती है। अब लोगों को लगता होगा कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था सुधारने को लेकर चिंतित है लेकिन, सरकार को असल चिंता 2014 की है। इसलिए मनरेगा की कामयाबी का प्रयोग खाद्य सुरक्षा बिल के जरिए किया जा रहा है। भले इससे देश की आर्थिक सुरक्षा पर खतरा आ जाए। डॉलर डीलरों को ऐसे प्रयोग डराते हैं। वो सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता बताने वाली सरकार के साथ कारोबार क्यों बढ़ाए। सरकार के ये प्रयोग ऐसे हैं कि लड़कर लागू कराया रिटेल में विदेशी निवेश का फैसला भी काम नहीं आ रहा। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई लागू हो गया लेकिन, अब तक एक भी ऐसी दुकान देश में नहीं खुल सकी है जिसे दिखाकर सरकार विदेशी निवेशकों को भरोसा जीत सके। अब तक रिटेल में विदेशी निवेश की खुलकर वकालत करने वाले फ्यूचर ग्रुप के कर्ताधर्ता किशोर बियानी अब उस रास्ते को इतना कारगर नहीं मान रहे हैं। हालांकि, वो ये कह रहे हैं आर्थिक कमजोरी के हालात कम से कम उनके बिग बाजार को अब तक प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन, वो डर रहे हैं कि नौकरियां जाने लगेंगी, लोगों की जेब की रकम घटने लगेगी तो मुश्किल बढ़ेगी। उनका ये डर बेवजह नहीं है। जून में पिछले नौ महीने में सबसे कम कारें बिकी हैं। 

सरकार चुनावी चिंता में भारत निर्माण के विज्ञापन जमकर चला रही है। लेकिन, असल में भारत निर्माण की तरफ ध्यान नहीं दे रही है। वो इसके जरिए चुनाव जीतना चाहती है और डॉलर डीलरों को आकर्षित करना चाहती है। लेकिन, अगर अर्थव्यवस्था का यही हाल रहा तो चुनाव जीतना मुश्किल होगा साथ ही डॉलर डीलरों के लिए भी भारत आकर्षण की जगह नहीं रह जाएगा। समय अब बहुत कम बचा है लेकिन, फिर भी अगर सरकार तेजी से देश के घरेलू बाजार की ताकत को पहचानकर उसे मजबूत करे। बुनियादी परियाजनाओं को तेजी से चालूकर अगले 3-4 महीने में उसे अमल में लाकर दिखाए। उद्योगों के लिए और लोगों के लिए कर्ज सस्ता करे तो शायद कुछ बात बने। अच्छी बात ये है कि त्यौहारों के देश भारत में त्यौहारों का वक्त शुरू हो चुका है। लोग त्यौहारी रंग में डूबे हैं। बचत की रकम से कपड़ा खरीदेंगे ही, अच्छा खाएंगे ही, मौज मनाएंगे ही। सरकार हिंदुस्तानियों की मौज के इन तीन महीने का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में कर ले तो अर्थव्यवस्था की चिंता भी दूर होगी और चुनावी चिंता भी। वरना दोनों पर खतरा बढ़ रहा है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...