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Thursday, March 25, 2010

रामनवमी के बहाने

रामनवमी के दिन हमारे पूरे सेक्टर में इसी तरह से छोटी बच्चियों का हुजूम घूमता दिख रहा था। ये हमारे सेक्टर की लड़कियां नहीं थीं। ये नोएडा के अतसंपन्न सेक्टरों के अगल-अगल बसे गांवों के परिवारों की बच्चियां थीं। जिन्हें अभाव की आदत होती है। ये बच्चियां हर घर की घंटी बजाकर पूछ रही थीं कि क्या कन्या खिलाना है।

दरअसल वैसे तो, देश के ज्यादातर हिस्सों में पुण्य की तलाश में 9 दिन व्रत रहने वाले कन्याओं को खिलाते हैं। इलाहाबाद में तो, मोहल्ले के लोग एक दूसरे के घर में कन्याओं को भोजन के लिए भेज देते थे। लेकिन, नोएडा के इन सेक्टरों में रहने वालों की मुश्किल ये है कि ये अपने घर की बच्चियों को किसी के यहां खाना खाने नहीं भेजना चाहते। बस बुरा लगता है और क्या। लेकिन, कन्या भोजन कराकर पुण्य भी कमाना है तो, इनकी इस दुविधा को खत्म करती हैं ये कम कमाई वाले परिवारों की बच्चियां।

अच्छा है कि इसी बहाने इन बच्चियों को रामनवमी के दिन बढ़िया पकवान के साथ कुछ दक्षिणा भी मिल जाती है। अब ये पता करने की बात है कि क्या कन्याओं को देवी समझकर ये संभ्रांत परिवार के लोग इन गरीब बस्ती की कन्याओं का पैर भी छूते हैं या नहीं।


Sunday, August 10, 2008

क्या आपके यहां बेटी का पैर छुआ जाता है

आप लोगों में से कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है। यानी, मां-बाप अपनी बेटी से पैर छुआते नहीं हैं। बल्कि, खुद उनका पैर छूते हैं। सामान्य तौर पर हो सकता है कि मां-बाप बेटी के पैर न छूते हों। लेकिन, याद करके बताइए शादी के समय जब पिता लड़की का कन्यादान करता है तो, क्या उसके बाद पिता, बेटी और दामाद का पांव पूजता है।

और, कितने लोगों के यहां ये और आगे जाता है। यानी शादी के बाद भी लड़की-दामाद का पैर छूते हैं। आप सभी लोगों से मैं जानना चाहता हूं कि आपके ये रस्म किस तरह से है। शादी की सबसे जरूरी रस्म कन्यादान के बाद पांव पूजने की रस्म होती है या नहीं। बताइएगा जरूर। क्योंकि, उसके बाद मैं अपनी अगली पोस्ट में इस पर और विस्तार से चर्चा करने वाला हूं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...