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Tuesday, March 16, 2010

हरामखोर, कमीने सिर्फ एक गर्लफ्रेंड, ब्वॉयफ्रेंड के साथ जिंदगी ... नामुमकिन है

किसी भी समाज की पहचान वहां के साहित्य और आसपास के माध्यमों की रंगत देखकर पहचाना जा सकता है। अकसर हम इस बात की चर्चा तो करते रहते हैं कि देश में हर क्षेत्र में गिरावट आ रही है। क्या नेता, क्या पत्रकार, क्या न्यायपालिका, क्या प्रशासन, व्यापारी और क्या .. कोई भी, सबका स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। अब सवाल ये है कि जिसे हम समाज की गिरावट मानकर चल रहे हैं कि उसे क्या सचमुच समाज गिरावट मान रहा है या ये पुराने-नए का ऐसा फर्क हो गया है कि नए के जीने के तरीके को पुराने लोग समाज की गिरावट मानकर खारिज कर रहे हों। पता नहीं हम तो पीढ़ी के लिहाज से न तो अतिआधुनिक में हैं न पुरातनपंथी। तो, सबसे ज्यादा भ्रमित भारत हम जैसे लोग ही हैं।

UTV Bindass चैनल पर एक शो आजकल आ रहा है इमोशनल अत्याचार। ये फिल्म DEV D के गाने कैसा तेरा जलवा ... कैसा तेरा प्यार .. तेरा इमोशनल अत्याचार। फिल्म में अभिनेता के इमोशनल अत्याचार में ढेर सारी लड़कियों के साथ संबंध थे तो, बिंदास के शो में लड़की या लड़का अपने प्रेमी की परीक्षा लेता है जिसमें अकसर लड़की का प्रेमी चैनल की हीरोइन के चक्कर में फंस ही जाता है। ये एक नमूना है। इसी चैनल की नई प्रोमो लाइन में एक लड़की कहती है कि बिंदास हूं इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं सबके साथ सोने के लिए तैयार हूं। ऐसी ही लड़का कहता है कि मैं बिंदास हूं इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूं।

सबसे ज्यादा सुना जाने वाले रेडियो स्टेशन का दावा करने वाला RED FM  का स्लोगन है ये आप के जमाने का रेडियो स्टेशन है, बाप के जमाने का नहीं। आप के जमाने का रेडियो स्टेशन साबित करने के लिए गाने के बीच-बीच में रेडियो जॉकी सवाल पूछता रहता है कि क्या आपको लगता है कि रियलिटी शोज हमारी संस्कृति भ्रष्ट कर रहे हैं या फिर क्या आपको बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वकील बनना है तो, काइंडली कट लीजिए क्योंकि, ये आज के जमाने का रेडियो स्टेशन है बाप के जमाने का नहीं। वैसे तो, ये सुनते वक्त बस बिंदास रेडियो जॉकी की चुहलबाजी या रेडियो स्टेशन की मस्ती भर लगती है लेकिन, थोड़ा ध्यान से सुनें तो, समझ में आता है कि ये सचमुच कैसे हंसते-गाते हमारी संस्कृति का बैंड बजा देते हैं।

RED FM पर गाने सुनते हुए मैं वैलेंटाइन डे के आसपास सफर कर रहा था। रास्ते में एक रेडियो डॉकी का नाम सुना तो, दंग रह गया। उसने चहकते हुए बताया मैं हूं हरामखोर अविनाश। वो, पूरे कार्यक्रम के दौरान लड़के-लड़कियों से अपनी हरामखोरी साबित करने को कह रहा था। और, हरामखोरी मैसेज करने के लिए नंबर भी बता रहा था साथ ही ये प्रलोभन भी कि अगर हरामखोरी जंची तो, वैलेंटइन डे पर वो, बेहतरीन हरामखोरी भेजने वाले लड़के या लड़की को स्टूडियो बुलाएगा। वैलेंटाइन डे के शो का नाम भी था लगी लव की। लव की लगती भी है ये पहली बार सुना।

विज्ञापन भी कुछ इसी तरह से बदलते जमाने के लड़के-लड़कियां तैयार कर रहे हैं। सुरीले जिंगल और प्रति सेकेंड प्लान के साथ मोबाइल बाजार में उतरा टाटा डोकोमो का विज्ञापन में एक लड़का-लड़की साथ बैठे हैं। लड़के की नजर एक दूसरी लड़की पर पड़ती है और वो, लड़की को बातों में फंसाकर दूसरी लड़की के साथ जरा मस्ती के चक्कर में उठता है जाते समय देखता है कि उसकी गर्लफ्रेंड ने दूसरा ब्वॉयफ्रेंड पकड़ लिया। थोड़ा सा वो, हतप्रभ दिखता है फिर मुस्कुराता है और नई गर्लफ्रेंड के साथ चल देता है। पीछे से टाटा डोकोमो का संदेश सुनाई देता है when everyday there is new plan then why take fix mobile plan. Tata docomo daily plan. ये नए जमाने का दर्शन हम जैसे लोगों को डरा रहा है। शायद हम पुरातनपंथी हो रहे हैं क्या पता नहीं। 

Thursday, November 29, 2007

ये असली हिंदुस्तानी हैं, ये हार नहीं मानेंगे

कई दिनों से मैं सोच रहा था कि जानवरों से भी बदतर कर्म करने वाले लोगों पर क्या लिखा जाए। जिन्होंने गुवाहाटी में अपनी ही बहन की इज्जत सरे बाजार नीलाम कर दी। जिन्होंने एक पल के लिए भी ये नहीं सोचा कि जो वो कर रहे हैं वो, तो खुद उनकी मां-बहन के साथ हो सकता है। भीड़तंत्र में वो कौन सी पिपासा मिटाना चाहते थे। मुझे पूरा यकीन है जिन नीच लोगों ने असम में एक 16 साल की लड़की को निर्वस्त्र किया, उनमें ये साहस नहीं होगा कि वो जिस समाज का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, उसके सामने भी सीना तानकर ये कह सकें कि मैंने अपने समाज की भलाई के लिए ये सब किया। और, वो भला किस समाज के हितों की रक्षा करने सड़क पर उतरे थे।

गुवाहाटी में ऑल आदिवासी स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ असम के छात्र आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्ज दिए जाने का मांग को लेकर शनिवार को रैली कर रहे थे। उस दौरान जो हादसा हुआ उसे पूरे देश ने देखा। 16 साल की एक लड़की को कुत्सित मानसिकता के लोगों ने निर्वस्त्र किया और उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। शर्मनाक ये है कि ये सब मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के आवास से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर हुआ। फिर भी उस लड़की को बिना कपड़ों के आधा किलोमीटर तक अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा और पुलिस उस लड़की की मदद के लिए नहीं आ सकी।

एक तो मुझे लगता है कि अब संविधान से आदिवासी शब्द को पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए। ये असली हिंदुस्तानी हैं। इन्हें आदिवासी कहकर क्यों राजनीति करने की कोशिश की जा रही है। आज तक मुझे देश के किसी भी हिस्से में एक भी घटना ऐसी सुनने को नहीं मिली कि कहीं आदिवासियों ने तथाकथित सभ्य समाज के लोगों के साथ कोई भी ऐसी हरकत की हो। हां, सभ्य समाज के पहरेदारों ने जरूर बार-बार इन असली हिंदुस्तानियों के साथ छलावा किया, धोखा किया है। अखबारों-टीवी चैनलों में भी मानवता को शर्मसार कर देने वाली तस्वीरें जमकर चलीं लेकिन, आज जब मैंने कोशिश की ये देखने कि किसी अखबार में मुझे इसकी खबर मिल जाए तो, इंडियन एक्सप्रेस के अलावा किसी भी अखबार में ये खबर मुझे नहीं मिली।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर पढ़ने के बाद मेरा ये भरोसा और पक्का हुआ कि ये असली हिंदुस्तानी हैं ये हार नहीं मानने वाले हैं। सरकार, मीडिया किसी के सहारे की इन्हें जरूरत नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने उस लड़की के घर जाकर उससे और उसके परिवार वालों से बातचीत की। और, लड़की का पहला जवाब था। मैं इस घटना के बाद और मजबूत हुई हूं। मेरा सबसे पहला लक्ष्य दसवीं की परीक्षा पास करना है। अगले साल उसकी बोर्ड की परीक्षा है। वो, लड़की कम से कम ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करना चाहती है। जिसके बूते वो, तथाकथित सभ्य समाज के लोगों से अपने हक की लड़ाई आसानी से लड़ सके। गुवाहाटी से 240 किलोमीटर सोनितपुर जिले के एक छोटे से गांव से वो जागरुक लड़की अपने समाज के लोगों को हक दिलाने की रैली में शामिल होने गई थी। शनिवार को होने वाली रैली के लिए वो लड़की अपने भाइयों और साथियों के साथ सारी रात सफर कर गुवाहाटी पहुंची थी।

इतने मजबूत इरादों वाली लड़की का अपने समाज में तो आदर्श बनना तय ही था। ऑल आदिवासी महिला समिति की नेता लता लाकड़ा साफ कहती हैं कि ये लड़की आदिवासी समाज (असली हिंदुस्तानी) के दावे को और मजबूत करती है। लड़की के पिता को चिंता है कि अगर उनके तीन बेटों को नौकरी नहीं मिली तो, आठ बीघे जमीन पर धान की खेती से इतने बड़े परिवार का जीवन कैसे चल पाएगा। लड़की की मां पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन, पढ़ी-लिखी मांओं से ज्यादा समझदार है। अपनी बेटी के साथ खड़ी है, कह रही है- मुझे ये पता है कि मेरी बेटी के साथ बहुत बुरा हुआ। लेकिन, मुझे गर्व है कि उसने बहादुरी के साथ लड़ाई लड़ी है।

पिछले तीन दिनों से उस लड़की के घर पहुंचने वालों की लाइन लगी हुई है। वो, देखना चाहते हैं कि बांस के तीन कमरे के छोटे से घर में उसे इतने मजबूत हौसले कहां से मिले। उस लड़की ने ये भी बताया कि भीड़ के नरपिशाचों ने उसके साथ मानवता को शर्मसार कर देने वाला काम किया। लेकिन, निर्वस्त्र अवस्था में सड़क पर आधा किलोमीटर भागी लड़की को एक स्थानीय दुकानदार भागीराम बर्मन ने अपनी शर्ट उतारकर पहना दी। साथ ही उसे पुलिस तक पहुंचने में भी मदद की। बर्मन भी उसी समाज से है।

पिछले कई दिनों से लगातार मैं इस विषय पर लोगों के आक्रोश भरे, चेतावनी देने वाले लेख पढ़ रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या लिखूं। आज उस लड़की के बयान ने मेरा मानस साफ कर दिया कि ये असली हिंदुस्तानी हैं ये, हार नहीं मानेंगे। ये अपनी लड़ाई जीतकर दिखाएंगे। लोग मार-काट की बात कर रहे हैं। वो, लड़की ग्रेजुएट होने की बात कर रही है। अपने हक को लेकर वो कमजोर नहीं हुई है। और, मजबूत हुई है। वो, अपना हिस्सा छीनने आ रही है। वो, दूसरों की मां-बहन की इज्जत लेने की बात नहीं कर रही। तथाकथित सभ्य समाज के लोगों अपनी इज्जत, अपनी असली पहचान बचानी है तो, इन असली हिंदुस्तानियों को गले लगा लो। इनसे माफी मांगो। इनके पैरों पर गिरकर गिड़गिड़ाओ, प्रायश्चित करो। इनका हक जो, बरसों से तुम छीनकर खा रहे हो इन्हें वापस दो।


(इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता से लड़की के परिवार वालों ने निवेदन किया कि कृपया लड़की का असली नाम न छापें। मेरी आप सबसे अपील है कृपया अब उस लड़की की वो तस्वीर न दिखाएं जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है।)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...