Tuesday, July 18, 2023

गठजोड़ का नाम INDIA रखने से विपक्षी दलों को जनता का भरोसा मिल पाएगा?

Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी



 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने पाएं, इस पर सहमत विपक्षी दलों के समूह की दूसरी बैठक बेंगलुरू में सम्पन्न हो गई। उस गठजोड़ का नाम इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलाउंस रखा गया है। यूनाइटेड वी स्टैंड के सूत्र वाक्य तले बेंगलुरू में हुई यह बैठक इस लिहाज से भी महत्व की है कि, कांग्रेस पार्टी को कर्नाटक जीतने के लिए किसी विपक्षी पार्टी के साथ की आवश्यकता नहीं पड़ी। दिल्ली और, पंजाब को बिना नारा दिए कांग्रेस मुक्त सा कर देने वाले अरविंद केजरीवाल को साथ लेने के लिए उनकी शर्तों पर कांग्रेस झुक गई, लेकिन जिस कर्नाटक में विपक्षी एकता की बैठक हुई, उसी कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर को साथ लेना कांग्रेस ने एकजुटता के लिहाज से आवश्यक नहीं समझा। दरअसल, बेंगलुरू की बैठक से जनता दल सेक्युलर को बाहर रखने के कांग्रेस के निर्णय से ही स्पष्ट हो जाता है कि, नरेंद्र मोदी हटाओ मंच का असली संकट क्या है, जिसे सभी विपक्षी पार्टियों के गठजोड़ के आवरण में कांग्रेस सहित इसमें शामिल विपक्षी पार्टियाँ ढँकना चाहती हैं। कांग्रेस जहां मजबूत है, वहाँ किसी और, क्षेत्रीय दल को रंच मात्र स्थान नहीं देना चाहती, ठीक उसी तरह से क्षेत्रीय दल भी अपने हिस्से से रंच मात्र भी कांग्रेस को नहीं देना चाहते हैं। विश्वास के घनघोर संकट को और अच्छे से समझने के लिए नरेंद्र मोदी हटाओ मंच की पहली बैठक के घटनाक्रम को याद करना आवश्यक है। पहली बैठक पटना में नीतीश कुमार के संयोजन में तय हुई थी, लेकिन 12 जून को राहुल गांधी और, मल्लिकार्जुन खरगे के आने से रद्द हो गई। उसके बाद लालू प्रसाद यादव ने अपने पुराने सहयोगी और, बाद में पक्के वाले राजनीतिक दुश्मन बन गए नीतीश कुमार को जल्दी से जल्दी बिहार से बाहर करने के लिए पूरी शक्ति लगाई और, 23 जून को पटना में नरेंद्र मोदी हटाओ मंच की पहली बैठक हो गई। 15 दल पटना में जुटे। हालाँकि, पटना में जुटान के प्रस्ताव पर कांग्रेस पहले ही थोड़ा ना-नुकुर वाले अंदाज में थी। कांग्रेस ने कहाकि, शिमला में बैठक कर लेते हैं। शिमला में बैठक के प्रस्ताव के पीछे कांग्रेस की मंशा बड़ी स्पष्ट थी कि, नये बन रहे गठजोड़ की पार्टियाँ भी यूपीए की ही तरह कांग्रेस के ही पीछे खड़ी हों। अब बेंगलुरू में यूनाइटेड वी स्टैंड लिखे नारे पर जो चित्र हैं, उससे स्पष्ट है कि, सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और, राहुल गांधी के नीचे ही नीतीश कुमार, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी और, अरविंद केजरीवाल सहित सभी नेता हैं। इन पार्टियों के एक-दूसरे के साथ भयानक विरोध की वजहें हैं और, इनका जनमत भी एक दूसरे के विरोध में ही खड़ा है। ऐसे में राजनीतिक सेनापतियों का सहभोज और, सान्निध्य इनकी सेनाओं को भी सह अस्तित्व के लिए तैयार कर पाएगा, उस पर संदेह गहरा जाता है।  

अभी जितनी भी विपक्षी पार्टियाँ एकजुट हो रही हैं, उनमें से अधिकतर ऐसी पार्टियाँ हैं, जिन्होंने जनमत को ठेकेदारी सा समझ लिया था। और, बदलते राजनीतिक परिदृश्य में जनता की परवाह करने वाले राजनीतिक दल धीरे-धीरे सत्ता से बाहर होते चले गए। अपना स्थापित, पारंपरिक मतदाता समूह भी ऐसी पार्टियाँ खोती चली गईं। नरेंद्र मोदी हटाओ मंच के अगुआ नेता नीतीश कुमार इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। जिन नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने सुशासन की आस में बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया था, वही नीतीश कुमार लगातार मुख्यमंत्री भले बने रहे, लेकिन अब जनता से ठुकराए नीतीश कुमार कभी भारतीय जनता पार्टी और, कभी लालू प्रसाद यादव और, उनके पुत्र की कृपा से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए हैं। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा वाले अंदाज में गठजोड़ बनाकर सत्ता पर काबिज होने की राजनीति की समाप्ति भी इसी का संकेत है कि, जनता अब भरोसा करके किसी एक दल या गठजोड़ को चुनाव के पहले ही पूर्ण बहुमत देती है, लेकिन जब सत्ता में आने पर वह दल या गठजोड़ उस तरह से व्यवहार नहीं करता है, पलटी मारता है तो, जनता उसे उठाकर फेंक देती है। भारतीय जनता पार्टी के तीन सबसे पुराने सहयोगियों ने उससे किनारा कर लिया। बिहार में नीतीश कुमार, पंजाब में सुखबीर बादल और, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बाहर जाने के बाद कांग्रेस के लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसी स्थिति बन गई। संन्न्यास मुद्रा में अध्यक्षी छोड़कर गए राहुल गांधी फिर मैदान में गए। कांग्रेस पार्टी पर अभी भी जनता भरोसा नहीं कर पा रही थी। कांग्रेस ने एक माहौल तैयार करना शुरू किया कि, नरेंद्र मोदी तानाशाह हो गए हैं और, उनके सबसे पुराने सहयोगियों को भी समाप्त कर देना चाह रहे हैं। मोदी विरोधियों को यह सबसे अच्छा हथियार लगा। भतीजे तेजस्वी और, तेज प्रताप से पलटू चाचा की उपाधि पाए नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने की महत्वाकांक्षा एक बार फिर से हिलोरे लेने लगी। नीतीश कुमार को भले ही पलटू चाचा कहकर तेजस्वी, तेज प्रताप ने नामकरण कर दिया हो, लेकिन सच यही है कि, नरेंद्र मोदी के विरुद्ध एकजुट हो रहा लगभग पूरा विपक्ष ही पलटू है। और, इसी वजह से इन पार्टियों के बीच भी विश्वास नहीं है और, इन पर जनता का विश्वास भी कम हो रहा है। सबसे पहले इस पूरे आयोजन के शुरुआती कर्ता धर्ता नीतीश कुमार की ही बात कर लेते हैं, जिनकी वजह से आज भारतीय राजनीति में पलटू होना भी मुख्यमंत्री पद का पक्का होना हो गया है।नीतीश कुमार ने पलटी मारकर उन्हीं लालू प्रसाद यादव जी का साथ दो बार पकड़ लिया, जिनके ऊपर गंभीर भ्रष्टाचार और, जंगलराज का आरोप लगाकर भाजपा के साथ डेढ़ दशक से अधिक सत्ता में रहे। पलट-पलटकर भी नीतीश कुमार भाजपा के साथ हों या भाजपा के विरोध में, एक बड़े नेता के तौर पर दिखते हैं। ऐसे ही महाराष्ट्र में शरद पवार सबसे बड़े नेता दिखते हैं क्योंकि, उनका भी पलटने का इतिहास अद्भुत रहा है। शरद पवार तथाकथित सेक्युलर राजनीति करते भी महाराष्ट्र विधानसभा में 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बचा चुके हैं। उस चुनाव में शिवसेना और भाजपा अलग-अलग लड़े थे और, भारतीय जनता पार्टी 122 सीटों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी थी। 288 की विधानसभा में शिवसेना के 63 और, एनसीपी के 41 विधायक जीतकर आए थे। तब शरद पवार के विश्वस्त प्रफुल्ल पटेल ने भाजपा को समर्थन का प्रस्ताव दे दिया था। इसी दबाव में भाजपा से अलग राह तलाश रहे उद्धव ठाकरे को मजबूरी में भाजपा के साथ आना पड़ा। शरद पवार ने विदेशी मूल के मुद्दे पर ही कांग्रेस तोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई थी। फिर पलटे और, अब सोनिया गांधी के पीछे खड़े होकर राजनीति कर रहे हैं। बल्कि, अब यह भी कह सकते हैं कि, किसी तरह से अपनी राजनीति बचा रहे हैं। भतीजे अजित पवार ने चाचा से पलटी मारने का कौशल बखूबी आत्मसात कर लिया है। हालाँकि, पहली बार मुँह अंधेरे देवेंद्र फडणवीस के साथ सरकार बनाने में रह गए और, शरद पवार ने उसे भी अपना राजनीतिक कौशल बताकर मोदी-शाह को कमतर बताने के तौर पर किया। उसका बदला अमित शाह ने एनसीपी को दो फाड़ करके ले लिया। अब चाचा शरद पवार अल्पमत के साथ बेंगलुरू बैठक में शामिल होने भले गए, लेकिन उनका आत्मविश्वास बुरी तरह से हिला हुआ है और, उनके ऊपर नरेंद्र मोदी हटाओ मंच के नेताओं का भरोसा भी बुरी तरह से हिल गया है। 

पटना की बैठक में अध्यादेश पर चर्चा नहीं हुई और, कांग्रेस ने स्पष्टता नहीं दी तो आम आदमी पार्टी कांग्रेस पर आरोप लगाने लगी कि, संविधान बचाने में कांग्रेस हमारा साथ नहीं दे रही है। आखिरकार, कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के सामने झुकना ही पड़ गया और, एक दूसरे के साथ किसी भी सूरत में जाने की क़समें खाने वाले अरविंद केजरीवाल बेंगलुरू पहुँच गए और, सोनिया गांधी, राहुल गांधी के नेतृत्व वाली बैठक में शामिल हुए। जबकि, इसी दौरान दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व दिल्ली की बाढ़ के लिए केजरीवाल सरकार की अकर्मण्यता को दोषी ठहरा रहा था। और, सिर्फ दिल्ली का प्रदेश नेतृत्व ही नहीं, कांग्रेस सोशल मीडिया प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कहाकि, दिल्ली की बाढ़ मानव निर्मित है और, तंग कसा कि, लगता है, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दिल्ली को झीलों का शहर बनाने का जो वादा किया था, उसे कर दिखाया। मसला सिर्फ दिल्ली का ही नहीं है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और, भ्रष्टाचार के आरोपों में कांग्रेसी शासनकाल में पूर्व उप मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया गया और, चरनजीत सिंह चन्नी पर भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में गिरफ़्तारी की तलवार लट रही है, लेकिन इन घटनाओं को एक सप्ताह समय भी नहीं बीता और, कांग्रेस-केजरीवाल साथ बैठे हैं। पलटी मारने वाली राजनीति 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले चरम पर पहुँच रही है। क़रीब एक सप्ताह पहले ही कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी चीख रहे थे कि, तृणमूल के गुंडों ने लोकतंत्र का हरण कर लिया है। पंचायत चुनावों में हमारे लोगों को सत्ता संरक्षित गुंडे मार रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ता बंगाल में मारे जा रहे थे और, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन को साहस नहीं हुआ कि, पश्चिम बंगाल में हुई बर्बरता के लिए ममता बनर्जी को जवाबदेह ठहरा सकें। हिंसा गलत है, कहकर कर्तव्यों की इतिश्री हो गई। कम्युनिस्ट भी मुँह बांधे बैठे हैं। सोचिए, जिन पार्टियों की अलग-अलग राज्यों में प्रचंड बहुमत की सरकारें हैं। उनको भी जनता पर भरोसा नहीं है कि, लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को हराने के लिए उसी जनता का साथ मिलेगा। विश्वास करने से ही विश्वास बढ़ता है और, शंका एक बार पैदा हो गई तो विषबेल की तरह बढ़ती ही जाती है। नरेंद्र मोदी हटाओ मंच के हर नेता को दूसरे पर शंका है और, उनको जनता पर भी शंका है, इसीलिए एक साथ आकर जनता को कह रहे हैं कि, हम नरेंद्र मोदी से बड़े हो गए हैं, लेकिन इससे जनता के मन में ऐसे पलटी मारने की राजनीति करने वाले नेताओं के लिए अविश्वास बढ़ता ही जा रहा है। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने की नरेंद्र मोदी की राह आसान होती जा रही है। 

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