Friday, May 27, 2022

सरकारें जंगल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण क्यों नहीं करतीं ?

हर्ष वर्धन त्रिपाठी





मई महीने के दूसरे और तीसरे सप्ताह के बीच चिलचिलाती गर्मी में बना यात्राओं का संयोग कई तरह के अनुभव लेकर आया। लंबे अंतराल के बाद देहरादून जाने का संयोग बना। इंडियन स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी ने हिन्दी में लोकनीति का पाठ्यक्रम शुरू किया था और विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर इस पाठ्यक्रम की शुरुआत से ही जुड़े होने से देहरादून में होने वाली ग्रैजुएशन सेरेमनी में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। तीन दिनों के इस कार्यक्रम में तीनों दिन रहना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल दिख रहा था, लेकिन लोकनीति पाठ्यक्रम की प्रमुख डॉक्टर नीति शिखा का आग्रह टालने की स्थिति नहीं थी। पब्लिक पॉलिसी के क्षेत्र में शानदार कार्य कर रहे पार्थ के साथ थोड़ा अधिक समय बिताने का लोभ भी था, इसलिए मैंने दूसरे दिन दोपहर पहुँचकर आखिरी दिन दोपहर बाद की वापसी पर सहमति दे दी। हालाँकि, बाद में लगा कि, तीनों दिन रहते तो शायद थोड़ा समय मिल जाता और देहरादून में कुछ और लोगों से मुलाक़ात हो जाती, जिनसे 2003-04 में अमर उजाला, देहरादून में रिपोर्टिंग के दौरान संबंध बने थे। 14 मई की दोपहर की जहाज़ से मुझे दिल्ली से देहरादून जाना था और 15 मई की दोपहर देहरादून से दिल्ली की वापसी थी। मुझे अनुमान नहीं था कि, स्पाइसजेट के छोटे जहाज से दिल्ली से देहरादून की यात्रा करना है। अब सभी एयरलाइंस ने वेब चेकइन को बढ़ावा दिया है, यह तो अच्छी बात है, लेकिन लगभग सभी सीटों को अलग से 200 से लेकर 1500 रुपये अतिरिक्त लेकर चेकइन करने की स्वीकृति देते हैं। स्पाइस जेट के साथ यात्रा का यह अनुभव बेहद खराब रहा। एक भी सीट बिना अतिरिक्त भुगतान के उपलब्ध नहीं थीं, सिर्फ ऑटो का विकल्प था। मैंने वेब चेकइन में ऑटो का विकल्प चुना और उसे साफ लिखा था कि, 12 घंटे पहले आपकी ईमेल पर बोर्डिंग पास जाएगा, नहीं आया। और, एक बार ऑटो चेकइन करने के बाद अब स्पाइस जेट की वेबसाइट पर फिर से सीट चुनने का विकल्प भी नहीं रहा था। मैंने सोचा कि, थोड़ा जल्दी पहुँचकर हवाई अड्डे पर ही टिकट निकाल लेंगे, लेकिन स्पष्ट निर्देश था कि, काउंटर से ही बोर्डिंग पास लेना होगा और उसके लिए अलग से 200 रुपये देना होगा। अधिकतर एयरलाइंस अब वेब चेकइन और वेब बोर्डिंग पास को बढ़ावा दे रही हैं और यह अच्छा भी है, लेकिन सभी हवाई कंपनियाँ हवाई अड्डे पर बोर्डिंग कियॉस्क से बिना अतिरिक्त शुल्क के बोर्डिंग पास निकालने का विकल्प भी देती हैं। स्पाइस जेट में मुझे यह विकल्प नहीं दिखा। एयरपोर्ट पर एक मित्र को कहकर बोर्डिंग पास निकलवाया। उन्होंने मुझे बोर्डिंग पास का चित्र खींचकर भेजा, लेकिन सुरक्षा जाँच के लिए लगे दरवाजे पर फोन में लिए चित्र से दरवाजा नहीं खुला और फिर से बोर्डिंग पास मंगाना पड़ा तब जाकर अंदर प्रवेश हुआ। अब तक मुझे अनुमान नहीं था कि, यह छोटा वाला जहाज है। 



तय समय से थोड़ी देर के बाद हवाई अड्डे से जहाज की तरफ बढ़े, लेकिन जहाज के नजदीक पहुँचकर फिर से घोषणा हुई कि, हम क्षमाप्रार्थी हैं, आपकी यात्रा के लिए जहाज तैयार करने में थोड़ा समय लग सकता है। हमारे सामने ही चिलचिलाती धूम में विमान सेवा के कर्मचारी जहाज से सामान निकालकर और उसकी सफाई कर रहे थे। तेज धूप में एयर होस्टेस के चेहरे की पूरी साज सज्जा बिगड़ती सी दिख रही थी। आखिरकार, हमने उस छोटे विमान में प्रवेश किया। छोटे विमान से हमारी यह तीसरी यात्रा थी। उड़ान योजना के तहत लखनऊ से इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे और जयपुर से नई दिल्ली, लेकिन इससे पहले की दोनों यात्राओं में ऐसा अनुभव क्यों नहीं रहा, ध्यान में नहीं रहा। जहाज में यात्रियों को प्रवेश तो करा दिया गया, लेकिन एयरकंडीशनर शुरू नहीं किया गया। जब तक बोर्डिंग पूरी होती और जहाज़ चलने की स्थिति में आता, यात्री पसीने से तरबतर हो चुके थे। शायद विमान के पायलट और एयरहोस्टेस अत्यंत समाजवादी किस्म के थे कि, हमने गर्मी झेली तो यात्रियों को भी इसका पूरा अहसास होना ही चाहिए। यहाँ ग्राहक भगवान होता है, जैसा कोई भाव नहीं दिख रहा था। आमतौर पर जहाज में यात्रियों के आने से पहले ही वातानुकूलित कर दिया जाता हैं। उस पर जहाज के अंदर पानी माँगने पर काग़ज़ के छोटे कप में पानी गरम तवे पर पानी के छिट्टे मारने जैसा ही था। 



देहरादून पहुँचे और नये हवाई अड्डे पर सुखद अहसास हुआ। देश के अधिकतर हवाई अड्डे पिछले 8 वर्षों में इसी तरह से बेहतर हुए हैं। व्यवस्थित, चमकते हवाई अड्डे और दूसरी बुनियादी सुविधाएँ यात्रा का आनंद बढ़ा देती हैं। जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से निकलते ही यह अहसास हुआ कि, हम देहरादून गए हैं। घने जंगलों के बीच से बने रास्ते से चलते मुझे बार-बार यह लग रहा था कि, देश में हर दो शहर के बीच में कम से कम एक पाँच किलोमीटर का जंगल नहीं बनाया जा सकता क्या ? उन शहरों का पर्यावरण तो दुरुस्त होगा ही। सिर्फ जंगल और पेड़ के लिए देहरादून जैसे पहाड़ी शहरों में बसने वाले भी कम होंगे। यह दोनों तरफ से बेहतर हो सकता है। और, हर हवाई अड्डे के चारों तरफ कम से कम दो किलोमीटर का जंगल तो होना ही चाहिए। कल्पना करिए, हवाई अड्डे पर सैकड़ों जहाजों के आने जाने से इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के चारों तरफ कितनी गर्मी हो जाती होगी। सरकारें सड़क, पुल, रेलवे स्टेट, हवाई अड्डा, औद्योगिक क्षेत्र और जाने कितने विकास के कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण करती हैं। सरकारें जंगल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण क्यों नहीं करतीं ? यह प्रश्न मेरे मन में पहली बार इतनी गंभीरता से आया था। शहर बसाने और पर्यावरण पर सरकारों को सलाह देने वालों को यह छोटी सी बात क्यों समझ में नहीं आती। पर्यावरण एक्टिविस्ट का ठप्पा लगाकर दिन रात बहस करने वाले भी इस तरह की बात आगे क्यों नहीं बढ़ाते। यह भी मेरे लिए एक अनसुलझा रहस्य सा होता जा रहा है। विकास के कार्यों को रोकने के बजाय इस दिशा में शक्ति लगाने से शायद पर्यावरण सुधारने में अधिक मदद मिल सकती है। देहरादून से वापसी की यात्रा में पर्यावरण को लेकर बहुत गंभीर चिंता मुझे हुई, उसकी चर्चा वापसी में करूँगा, अभी तो देहरादून बस पहुँचा ही था। 



देहरादून शहर से थोड़ा बाहर सप्लाई रोड पर हमारा रिसॉर्ट था। नया बन रहा था। अच्छी जगह थी, लेकिन अभी दूसरी सुविधाएँ बन ही रहीं हैं। कमरा बहुत अच्छा था और पूरे रिसॉर्ट की बसावट अच्छी थी। लोकनीति पाठ्यक्रम पूरा कर चुके छात्रों ने शानदार प्रजेंटेशन दिए। और, खुद को लोकनीति विद्यार्थी से लोकनीति उपयोगकर्ता के तौर पर अच्छे से तैयार कर लिया था। हालाँकि, यह विद्यार्थी सब अपने पेशे में लंबे समय तक काम करके लोक नीति में रुचि लेने वाले थे। कोई सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था, कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट, कोई किसी मंत्री के साथ जुड़ा हुआ था। कोई पर्यावरण पर काम कर रहा था। सीएसआर में काम करते हुए किसी को और बेहतर करना था। कुल मिलाकर यह सामान्य छात्र नहीं थे। सुंदर संगीत के साथ रात के भोजन के दौरान बातचीत में तय हुआ कि, सुबह किसी पहाड़ी पर चला जाए। 



लंबे समय से मेरा सुबह सूर्योदय से पूर्व उठने का अभ्यास बना हुआ है, मुझे लगा, अच्छा है कि, यह क्रम टूटेगा नहीं। 




और, इसमें सबसे उत्साही भूमिका चार्ट्ड अकाउंटेंट राहुल गुप्ता की थी। राहुल के अलावा इंफ़ोसिस में प्रोजेक्ट मैनेजर सुमित अग्रवाल, जैस्मीन कौर, लद्दाख के रहने वाले जाकिर हुसैन, शेफाली, सहाना और बहुत कम बोलने वाले राजवंश सिंह का साथ मिला। राजवंश ने बताया कि, अपने परिवार में कॉलेज में पहुँचने वाले पहले वही हैं। अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में पढ़ने के बावजूद अंग्रेजी आने की वजह से भी शायद कम बोलते थे, खैर हम लोगों की संगत में खूब बोले। भारतीय सिविल सेवा की नौकरी छोड़कर डेवलपमेंट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे शैलेष पाठक का साथ सुबह को और सुन्दर बना गया। सुबह 6 बजे के आसपास हम सब निकल पड़े और, सामान्य सैर से रॉबर्सकेव गुच्चूपानी जाने की इच्छा बलवती हो गई। हमारे रिसॉर्ट से वहाँ की दूरी क़रीब सात किलोमीटर थी। 15 वर्ष बाद में गुच्चूपानी जा रहा था। 2003 में अमर उजाला देहरादून में रहते इस बेहद खूबसूरत प्राकृतिक स्थल से परिचय हुआ था। डेढ़ दशक बाद उसी रोमांच का अनुभव करने की कल्पना अत्यंत खूबसूरत थी और सबसे खूबसूरत था #ISPP के विद्यार्थियों के साथ उस रोमांच का अनुभव करना। सच यही है कि, पूरे जीवन हम सब विद्यार्थी रहते हैं तो उत्साह बना रहता है। कितना भी नीरस व्यक्ति हो उसके जीवन के विद्यार्थी काल की चर्चा भर हो जाए, उसे उत्साह हो जाता है। हमेशा उत्साह में रहने का यह मंत्र सब जानते हैं, मैं फिर से याद दिला रहा हूँ, विद्यार्थी बने रहिए, जीवन उत्साह, उमंग से भरपूर बना रहेगा। 







अधिकतम घुटने के नीचे तक पहाड़ों से गिर ठंडे पानी के बीच उस गुफा में टहलते जाना अद्भुत होता है। आखिर तक पहुँचते पहाड़ों से गिर रहा ठंडे पानी का झरना दिखा तो हम गंगा किनारे के लोग बिना स्नान के कैसे रह पाते। पहल मैंने की, फिर तो सब झरने के नीचे नहाने की क़तार में लग गए।

सुबह-सुबह संघ की शाखा में स्वयंसेवक पूरे जोश के साथ विभिन्न खेलों में व्यस्त थे। 
Robbers cave से निकलते एक सुखद अनुभूति हुई। कुछ लोग बात कर रहे थे कि, किसी से कहकर एक ग्रुप फोटो ले लेते हैं। मैंने कहा, लाइए, मैं लेता हूं आप लोगों का सामूहिक चित्र। मैं यह कह रहा था कि, एक सज्जन ने पूछा- आप हर्ष वर्धन त्रिपाठी जी हैं। मैंने कहां- हां और उन्होंने प्रणाम करते कहाकि, मैं आपके सामाजिक परिवार का स्थाई सदस्य हूं। इस तरह से देहरादून के मनीष छाबड़ा जी से मिलना आश्वस्त करता है कि, देश के किसी भी हिस्से में हम अकेले नहीं हैं। हवाई अड्डे पर भी गोरखपुर के एक दंपति और कानपुर के एक न्यूरोसर्जन भी आकर मिले। सामाजिक परिवार का यूं मिलना सुखद अनुभूति होता है। मनीष छाबड़ा जी ने चित्र लेकर साझा किया तो हम भी साझा कर रहे हैं।


लौटकर हम लोग आए और एक सत्र के बाद ग्रैजुएशन सेरेमनी थी, जिसके बाद हमें तुरंत निकलना था। दोपहर 3 बजकर 40 मिनट पर हमारी विस्तारा की उड़ान देहरादून से दिल्ली की थी। अच्छी बात यह थी कि, विस्तारा से वेब चेकइन का अनुभव स्पाइस जेट जैसा नहीं था। बिना किसी मुश्किल और अतिरिक्त शुल्क के वेब चेकइन हो गया और विस्तारा ने बोर्डिंग पास मेरे आईफोन के वॉलेट में डालने का विकल्प दिया, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। तकनीक का सही उपयोग कैसे जीवन आसान करता है, उसका एक बहुत छोटा उदाहरण यह था, लेकिन तकनीक से हुई इस आसानी से मिला छोटा सुख अभी बड़े कष्ट में बदलना है यह तो हमें पता ही नहीं था। भला हो कि, शैलेष पाठक भी साथ में थे तो कष्ट बड़ा नहीं छोटा लगा। हवाई अड्डे पर भागते पहुँचने पर 20 मिनट की देरी कोई कष्ट नहीं है, लेकिन अगर उड़ान तीन घंटे की देरी से आए तो कष्ट ही कहेंगे। दिल्ली वापसी की सबसे पहले की उड़ान हमारी ही थी और हमारी दोपहर 3 बजकर 40 मिनट विस्तारा की उड़ान साढ़े छह बजे आई। हमने सबको विदा किया। दूसरी उड़ानें भी देरी से रहीं थीं, लेकिन सबसे देरी से हमारी उड़ान आई। इस दौरान हमने देहरादून हवाई अड्डे का पूरा मुआयना कर लिया। भविष्य की योजना के लिहाज से जॉलीग्रांट पर तैयारी बहुत अच्छी है। दोगुना से अधिक यात्रियों तक यहाँ कोई भीड़ नहीं पता चलने वाली। देश में बुनियादी सुविधाओं में चमत्कारिक परिवर्तन के साथ शानदार सांस्कृतिक विरासत का भी सुखद अनुभव होता है। देहरादून हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर खंभों पर लिखे संस्कृत के श्लोक से आपको यह परिवर्तन बिना ध्यान दिए भी दिख जाता है। 


क़रीब तीन घंटे देरी से आई विस्तार के पायलट और उड़ानकर्मियों को भी यात्रियों के ग़ुस्से अंदाजा था, इसीलिए पहले से ही विमान के अंदर मसूरी जैसा माहौल बना रखा था। हालाँकि, विस्तारा और इंडिगो दोनों में यात्रा करना सुखद ही होता है। अभी टाटा के पास जाने के बाद से एयर इंडिया की यात्रा नहीं की है, लेकिन इस पूरी यात्रा में सबसे सुखद जान पड़ने वाला समाचार ही सबसे अधिक चिंता में डालने वाला था। विस्तारा में हमारे साथ की सीटों पर एक छह लोगों का परिवार था। रायपुर के रहने वाले थे। रायपुर से जहाज़ से दिल्ली और वहाँ से जहाज से देहरादून आए थे। केदारनाथ बाबा और बद्रीविशाल के दर्शन के लिए आए थे। उन्होंने बताया कि, देहरादून से सुबह 10 बजे उड़े और शाम को देहरादून वापस गए। देहरादून के सहसधारा से केदारनाथ और बद्रीविशाल के दर्शन के लिए हेलीकॉप्टर और छोटे जहाज उड़ते हैं। प्रति व्यक्ति 90 हजार रुपये का उनका खर्च आया, प्रसन्न थे कि, समय बच गया। दर्शन भी अच्छे से हो गया। दो लाख प्रति व्यक्ति पर हेलीकॉप्टर से चारों धाम की यात्रा का पैकेज भी मिल रहा है। सुविधा बहुत अच्छी है, समय होने पर बहुत उपयोगी है, लेकिन मेरी कल्पना में यह रहा था कि, कितने हेलीकॉप्टर, चॉपर प्रतिदिन उड़ते होंगे, कितनी गर्मी पैदा होती होगीमुझे यह बात अब और परेशान करने लगी थी कि, सरकारें जंगल बसाने के लिए भूमि अधिग्रहण क्यों नहीं करतीं। लोकनीति में इन बातों को भी प्रमुखता मिलेगी और लोकनीति उपयोगकर्ता उसे प्राथमिकता में रखेंगे, यही उम्मीद कर सकते हैं। 

देहरादून से लौटने के अगले ही दिन प्रयागराज जाना हुआ। उसकी बात अगली पोस्ट में

2 comments:

  1. राम राम दादा राम राम 🙏

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  2. Bahut dhanyavaad, apna anubhav sajha karne ke lie. Bahut achchi bhawna hai aapki, saari baten padh kar bahut achcha laga.

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