Monday, January 17, 2022

पिताजी कहे- सबके दुइ हाथ और दुइयै गोड़ (पैर) होथ

हर्ष वर्धन त्रिपाठी



हमें किसी भी बात से भय नहीं होता है। किसी व्यक्ति से भय नहीं होता है। कोई घटना हमें भयभीत नहीं करती है। काफ़ी हद तक यही सच है, लेकिन ऐसा क्या है मेरे भीतर कि, मुझे कुछ भी डराता नहीं। जीवन में हमेशा निडर रहता हूँ तो इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे पिताजी स्वर्गीय श्री कृष्ण चंद्र त्रिपाठी ही हैं। हालाँकि, अभी भी मुझे लग रहा है कि, मैं उनके लिए स्वर्गीय कैसे लिख रहा हूँ, मेरे इर्द गिर्द ही तो हैं, मुझे धकिया रहे हैं। मैंने अपने जीवन में किसी की परवाह नहीं की और अगर बेपरवाह रह सका तो इसके शक्तिपुंज हमारे पिताजी ही थे, तब भी, जब मुझे दिख जाता था और तब भी, जब मैं बिल्कुल यह समझता रहता था कि, मैंने कुछ शक्ति अर्जित की है। मेरे कई मित्र अक्सर मुझसे पूछ लेते हैं कि, तुम इतने बेपरवाह कैसे रहते हो, पैसे, नौकरी या अपनी स्थिति को लेकर। मेरा जवाब होता था कि, मेरे मिज़ाज का हिस्सा है। मेरे खाते में 6000 रुपया बचा हो और मेरी बेरोज़गारी कट रही हो, फिर भी मन मिज़ाज मस्त रहा। मेरे खाते में सिर्फ़ दो महीने की EMI बची हो और दूर-दूर तक किसी आर्थिक स्रोत का ज़रिया दिख रहा हो, तब भी मैं मस्त मगन रहता था। जाने कैसे, लेकिन कभी आर्थिक चिंता हमारे जीवन का हिस्सा रही। अब समझ आता है कि, ऐसा इसीलिए था क्योंकि पिताजी थे। कई बार अकड़ में भी रहता था कि, सब अपने से करूँगा। यह अपने करूँगा, इतना तक था कि, हमने जाने कब तय कर लिया था कि, अपनी तनख़्वाह से ही हवाई यात्रा करूँगा और सीएनबीसी आवाज़, मुम्बई की नौकरी के लिए जब दो बार टिकट कराने पर भी राजधानी एक्सप्रेस में टिकट कन्फर्म हो सका तो एयर इंडिया की टिकट करा लिया। खाते में कुल रक़म का तीन चौथाई हिस्सा हवाई उड़ान के टिकट में चला गया था। अब समझ रहा है कि, पिताजी थे, इसीलिए हम कभी भयभीत नहीं होते थे। और, भयभीत होना हमारे स्वभाव में ऐसे बसा था कि, सिर्फ़ आर्थिक तौर पर ही नहीं, मुझे गुंडा बदमाश भी भयभीत नहीं करते। कितना भी बड़ा, प्रभावशाली व्यक्तित्व हो, मुझे भयभीत नहीं करता। अब ध्यान में आता है कि, अपने व्यवहार से पिताजी ने मेरे लिए भय के सामने ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी थी कि, भय अगर रावण भी हो जाता तो उस लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर सकता था और, उनके रहते तो कभी भी भय का रावण मेरे भीतर उनकी खींची लक्ष्मण को पार करके नहीं सका। 

कैसे पिताजी का व्यवहार-बात बच्चों पर प्रभाव डालती है, एक छोटा सा क़िस्सा सुनाता हूँ। पिताजी बैंक मैनेजर थे, यूनियन के नेता थे, लेकिन उनके स्वभाव में था कि, किसी का ग़लत बर्दाश्त नहीं करते थे। मुँह पर कहते थे। गाँव से लेकर घर-परिवार तक उनके संबंध सबसे ऐसे ही थे कि, सबको पता था कि, ग़लत करके उनके पास गए तो हड़काए ही जाएँगे। कभी उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि, किसी को कड़वा सच कहा तो वो नाराज़ हो जाएगा। ग़लत पर उनको ग़ुस्सा बहुत आता था। एक बार किसी विवाद के सिलसिले में बात करते हुए बेहद ग़ुस्से में पिताजी ने कहाकि, अस अहै, सबके दुइ हाथ और दुइयै गोड़ (पैर) होथ। जउन होई देख लीन जाई। मुझे लगता है कि, बरसों पहले पिताजी की कही इसी एक पंक्ति ने मुझे आजीवन निर्भय कर दिया है। उनके कहने का आशय यही था कि, हर किसी के दो हाथ और दो पैर ही होते हैं, मतलब प्रकृति ने सबको एक समान क्षमता का बनाया है। बाक़ी क्षमता तो आपको ख़ुद ही विकसित करना है। निर्भयता का यह मंत्र मुझे आज भी याद रहता है। पता नहीं किस फ़िल्म में, यह डायलॉग बहुत बाद में मैंने सुना कि, गोली मारना तो बेटा मार ही  डालना नहीं तो बच गए तो तुम बचोगे। पिताजी के कहे, अस अहै, सबके दुइ हाथ और दुइयै गोड़ (पैर) होथ- के सामने यह बड़ा हल्का और कम प्रभावी लगता है। इसीलिए किसी को भयभीत करना और किसी से भयभीत होना, यह मेरे स्वभाव का स्थाई भाव बन गया है। अब अच्छे से समझ रहा है कि, हम भयभीत क्यों नहीं होते। अब पिताजी सशरीर नहीं रहे, लेकिन भय के रावण के सामने उनकी खींची लक्ष्मण रेखा स्थाई है। अब इस लक्ष्मण रेखा को अगली पीढ़ी के सामने बढ़ाना है तो पिताजी के सशरीर रहने पर भी मैं भयभीत नहीं हो सकता, काहे से कि, सबके दुइ हाथ और दुइयै गोड़ (पैर) होथ।

9 comments:

  1. बहुत ही सशक्त वणॅन है पिता जी के जीवन की बातो का
    सादर अभिवादन।

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  2. सादर श्रद्धांजलि 🙏

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  3. आपने इस लेख के जरिए बहुत ही कड़वे सच्चाई से कुछ पल के लिए अवगत करा दिया, हृदयपूर्वक श्रद्धांजलि, ओम शांति.

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  4. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-01-2022) को चर्चा मंच     "कोहरे की अब दादागीरी"  (चर्चा अंक-4314)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  5. उस महान आत्मा को नमन

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  6. प्रभु से दिवंगत आत्मा की सद्गति की प्रार्थना करता हूं।ओम शांति ओम।

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  7. शानदार व्यक्तित्व से विरासत में मिले निडरता और प्रसन्नचित रहने के भाव।
    सुंदर अभिव्यक्ति।

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  8. वाक़ई यदि निर्भयता के संस्कार बचपन से मिल जायें तो उमर भर साथ रहते हैं, भगवद गीता में ज्ञानी का पहला गुण अभय ही कहा गया है।

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