गैस की कीमत और चुनाव का गणित


भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ये पहली बार हो रहा है कि उद्योगपतियों से संबंध चुनावी मुद्दा बना हो। और इस कदर बन गया हो कि उद्योगपतियों से रिश्ते का मतलब ही चुनावी गणित को बिगाड़ने वाला दिखने लगा हो। और ये कर दिया है भारतीय राजनीति में चमत्कारिक तरीके से 49 दिन की एक केंद्र शासित राज्य की सरकार चलाने वाली अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने। अरविंद केजरीवाल भरसक ये प्रयास कर रहे हैं कि उद्योगों का चलना और उद्योगों के चलने से ही सरकार का चलना साबित हो जाए। आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी ये स्थापित करने में लगी है कि आम आदमी का हक नेता मारते हैं और उद्योगपति के हक में काम करते हैं। इसी रणनीति के तहत पहले वीरप्पा मोइली, मुकेश अंबानी और दूसरे लोगों पर गैस की कीमतों के मामले में एफआईआर दर्ज कराना उसके बाद नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर ये पूछना कि मुकेश अंबानी से रिश्ते की सच्चाई जनता को बताइए। गैस की कीमतों, उसकी खोज और पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी जैसे कठिनाई से समझ में आने वाले विषय चुनावी बहस का मुद्दा बनेंगे ये शायद ही किसी ने सोचा रहा होगा। लेकिन, चौबीस घंटे के टेलीविजन के युग में कठिन से कठिन बात सरल हो जाती है। और कोई बात सरलता से लोगों के दिमाग में टीवी चैनलों के जरिए घुस गई तो वो निकलना मुश्किल है। और उसी में से एक स्थापित तथ्य ये है कि अंबानी देश चलाता है। जो कुछ नहीं जानता उससे भी कभी भी इस विशेषज्ञ टिप्पणी की उम्मीद की जा सकती है कि अंबानी देश चलाता है। हर बात को सड़क की बात या उस तरीके से समझाने की कला के महारथी अरविंद केजरीवाल ने इसी सड़क की बात को  उठाकर संसद में पहुंचने का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया है। पिछले तीन साल से महंगाई से जूझ रही जनता को अरविंद ने बता दिया कि एक अप्रैल से गैस की कीमतें दोगुनी यानी करीब साढ़े आठ डॉलर प्रति एमएमएमबीटीयू (मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट) हुईं तो देश में महंगाई दोगुनी हो जाएगी। सबकुछ महंगा हो जाएगा। काफी हद तक अरविंद केजरीवाल की ये दलील सही भी है। क्योंकि, गैस की कीमत दोगुनी होने का सीधा सा मतलब ये हुआ कि पावर प्लांट के लिए गैस महंगी हो जाएगी यानी बिजली महंगी हो जाएगी। दूसरे भी गैस से चलने वाले प्लांट को चलाने की लागत दोगुनी हो जाएगी। 


फिर इस पर अरविंद एक और बढ़िया आंकड़ा खोज लाए कि जब बांग्लादेश में गैस भारत की अभी की भी कीमत से आधी यानी करीब ढाई डॉलर प्रति एमएमबीटीयू के लिहाज से कोई कंपनी निकालकर दे सकती है तो फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो रहा। उस पर बांग्लादेश में ढाई डॉलर प्रति एमएमबीटीयू में गैस निकालकर देने वाली कनाडा की कंपनी निको रिलायंस के केजी बेसिन में दस प्रतिशत की हिस्सेदार भी है। तो अरविंद केजरीवाल का ये सवाल बेहद जायज लगता है कि जब निको बांग्लादेश में ढाई डॉलर में गैस दे रही है तो भारत में रिलायंस पहले चार डॉलर से ज्यादा और अब साढ़े आठ डॉलर में गैस क्यों बेच रही है। लेकिन, दरअसल निको की बांग्लादेश में गैस कीमत और रिलायंस केजी बेसिन की भारत में गैस कीमत की तुलना ही गलत है। क्योंकि, निको ढाई डॉलर में जिस पैमाने पर गैस दे रही है वो मिलियन क्यूबिक फीट है जबकि, भारत में मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट का भाव चार डॉलर से ज्यादा का है। और इस लिहाज से दोनों की ही कीमत लगभग बराबर है। दूसरी जो जरूरी बात समझने की है कि दरअसल निको जिस जगह ये गैस निकाल रहा है वो जमीन पर ही मिली हुई गैस है। जबकि, रिलायंस जिस केजी बेसिन से ये गैस निकाल रहा है समुद्र में बहुत गहराई में है। और उस गहराई से गैस निकालने की तकनीक दुनिया में गिनी चुनी कंपनियों के पास है। जाहिर है इस वजह से उसकी लागत भी बहुत आती है। जबकि, निको बांग्लादेश में जिस ऑन लैंड फील्ड से गैस निकाल रही है उसको खोजना और उससे गैस निकालने का काम गहरे समुद्र की तुलना में काफी कम होता है। एक और बात ये भी कि दरअसल निको को बांग्लादेश में ये गैस फील्ड काफी पहले बिनी किसी टेंडर के दे दी गई थी। तीसरी बड़ी बात ये कि बांग्लादेश में गैस की मांग भी उस लिहाज से बहुत ज्यादा नहीं है। जबकि, भारत में अभी भी रिलायंस और ओएनजीसी के गैस खोजने के काम में तेजी के बावजूद घरेलू मांग पूरा करना मुश्किल होता है। और इस बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए जिस गैस का आयात भारत को करना पड़ता है उसकी कीमत चौदह डॉलर प्रति एमएमबीटीयू होती है। बांग्लादेश में गैस की इतनी कम कीमतों की वजह से ही सरकारी गैस कंपनियां गैस खोजने के काम से बाहर हो चुकी हैं। यहां तक कि बांग्लादेश में गैस खोजने और निकालने के काम में लागत न निकल पाने की वजह से ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने भी एकमात्र ऑफशोर फील्ड का काम बंद कर दिया। इसी वजह से बांग्लादेश की सरकार ने गैस कीमतें अठारह प्रतिशत बढ़ा दी हैं और सालाना दो प्रतिशत बढ़त का भी प्रावधान कर दिया है।

अब बात भारत में गैस कीमतों के बढ़ने की। जिस पर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के 49 दिन के मुख्यमंत्री रहने के दौरान वीरप्पा मोइली और मुकेश अंबानी सहित कई लोगों पर कानूनी मामला दर्ज करा दिया है। इस आधार पर कि मुकेश अंबानी ने यूपीए सरकार के साथ मिलकर गैस की कीमतों में हेरफेर करवाई है। इसमें कोई बहस नहीं है कि उद्योग घराने अपने हितों के लिए सरकार के भीतर-बाहर ढेर सारे गलत काम करते हैं और उसके लिए सरकार के भीतर-बाहर लोगों को साधकर रखते हैं। लेकिन, एक अप्रैल 2014 से जो गैस की कीमतें बढ़ने जा रही हैं दरअसल वो कीमतें तय करने का जिम्मा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन की अध्यक्षता वाली समिति के जिम्मे था। इसी समिति ने साढ़े आठ डॉलर प्रति एमएमबीटीयू गैस की कीमतें तय कीं और इनके लिए एक अप्रैल 2014 की तारीख तय की। साथ ही ये भी ये कीमते अगले पांच साल के लिए लागू होंगी और इन कीमतों की समीक्षा हर तिमाही की जाएगी। अब रंगराजन समिति को मुकेश अंबानी ने गैस कीमतों का फॉर्मूला लिखकर दिया होगा ये बात मानना थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि, ये फॉर्मूला दुनिया में जो कीमतें चल रही हैं और भारत को आयातित गैस मिलती है उसके बीच की औसत कीमत के आधार पर तय किया गया है। 

एक भ्रम जो ये अरविंद केजरीवाल ने बुरी तरह से आम लोगों के दिमाग में डाल दिया है कि इस बढ़ी गैस कीमत का फायदा सिर्फ निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को ही मिलने वाला है, पूरी तरह से गलत है। सच्चाई तो ये है कि रंगराजन समिति के फॉर्मूले के आधार पर बढ़ी कीमत रिलायंस के साथ ही सरकारी ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड को भी मिलेगी। अरविंद केजरीवाल गैस की कीमतों और नेता-उद्योगपति रिश्तों को जोड़कर भ्रष्टाचार के लिए दूसरी पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा, को भ्रष्टाचारी साबित कर देना चाह रहे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि गैस की कीमतों को तय करना पूरी तरह से आर्थिक फैसला है और मुकेश अंबानी या किसी दूसरे उद्योग घराने के साथ नेताओं के रिश्ते के आधार पर गलत तरीके सा फायदा पहुंचाना अलग बात। अब मुश्किल ये है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की सरकार की साख इतनी गिर चुकी है कि अरविंद केजरीवाल की एफआईआर पर सलीके से कांग्रेस या सरकार का कोई प्रवक्ता जवाब तक नहीं दे पाया। सिवाय इसके कि पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि कीमतें घटेंगी नहीं और कीमतें पूरी तरह से जायज है। सच्चाई ये है कि किसी भी आधार पर अरविंद केजरीवाल की वीरप्पा मोइली और मुकेश अंबानी पर की गई एफआईआर टिकने वाली नहीं है। लेकिन, चुनावों के समय इतनी बारीकियों में कौन जाएगा। जनता तो सामान्य बातचीत में कहती रहती है कि सरकार और उद्योगपति चोर हैं। अब उसे अरविंद केजरीवाल नाम दे देते हैं। जनता खुश है कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अरविंद केजरीवाल आ गया है। लेकिन, सच्चाई ये है कि अगर गैस कीमतों को सीधे भ्रष्टाचार से ही जोड़कर इसे खत्म किया गया तो लंबे समय में देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। देश में गैस की मांग अगले तीन सालों में दोगुनी यानी हर दिन करीब 466 मिलियन क्यूबिक मीटर हो सकती है। जिसे पूरा करना इन कीमतों के आधार पर संभव नहीं होगा। अगर ये कीमतें लागू नहीं होती है तो कोई भी कंपनी गैस खोजने या उत्पादन का काम नहीं करेगी। जिससे सिर्फ महंगी गैस आयात करने का ही विकल्प होगा और ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा। खाद और बिजली पर सरकार अभी भी सब्सिडी देती ही है। बढ़ी कीमतों का ज्यादा बोझ लोगों, किसानों पर न पड़े इसके लिए सरकार कुछ और समय तक जरूरी सब्सिडी जारी रखकर महंगाई से बचा सकती है। ये बात एकदम सच है कि मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने केजी बेसिन में जितनी गैस निकालने का भरोसा दिलाया था। उसका पांचवां हिस्सा भी नहीं निकाला। और इसकी वजह से गैस से चलने वाले ढेर सारे बिजली के प्लांट नहीं चले। गैस का उत्पादन परचेज शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर पूरा न कर पाने के लिए तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने रिलायंस पर तगड़ा जुर्माना भी लगाया था। हालांकि, रिलायंस इस मामले के खिलाफ अदालत में चला गया। आरोप ये भी लगते रहे हैं कि इसी वजह से जयपाल रेड्डी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। इसीलिए अरविंद केजरीवाल की सीधे-सीधे सरकार ने मुकेश अंबानी को फायदा पहुंचाया लोगों के दिमाग में घुस जाता है। इसीलिए नरेंद्र मोदी से अंबानी को जोड़कर अरविंद केजरीवाल ये साबित कर देना चाहते हैं कि सब भ्रष्ट हैं, चोर हैं। इसलिए जरूरी है कि गैस की कीमतों का गणित और चुनावी फायदे का गणित लोगों तक पहुंचे जिससे देश का आर्थिक गणित और खराब होने से बच सके। लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि ये करेगा कौन। क्योंकि, साख का सवाल है।