कलावती परशुराम बांडुरकर दिल्ली में है। आज उसका दिल्ली में दूसरा दिन है। इसको नहीं पहचान रहे हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता। अरे देश के सबसे ताकतवर परिवार के नए पावर सेंटर राहुल बाबा की कलावती। राहुल बाबा संसद में खड़े हुए थे परमाणु करार पर सरकार का पक्ष रखने और लगे बोलने कलावती के बारे में। वैसे तो संसद में हंसोड़ों की कमी नहीं है लेकिन, परमाणु करार के बीच आई कलावती पर किसी को भी हंसी आ सकती थी। लेकिन, राहुल गांधी ने सबकी हंसी बंद कर दी थी ये कहकर कि मैं जिस कलावती की बात कह रहा हूं वो, विदर्भ में रहती है। उसका किसान पति कर्ज के बोझ से खुदकुशी कर चुका है।
उस वक्त तो राहुल की कलावती मशहूर हो गई। कलावती के घर बिजली पहुंचाने की उम्मीद और उसके जैसी कलावतियों की बेहतर जिंदगी की उम्मीद जगाकर राहुल की पार्टी बड़े दिनों बाद पुरानी कांग्रेस जैसे अंदाज में सत्ता में आ गई। ये अलग बात है कि परमाणु करार से देश की कलावतियों के घर में बिजली और खुशहाली पहुंचाने की उम्मीद ठीक वैसी ही थी जैसी, अकबर-बीरबल के किस्से में ठंडे पानी में खड़े गरीब के लिए अकबर के महल में जल रहे दीपक की गरमी या फिर बांस की चढ़ी बीरबल की खिचड़ी की हांडी। अब अकबर को जगाने के लिए तो, चतुर बीरबल था। आज के राजा गांधी परिवार को जगाने के लिए बीरबल कहां से लाएं। क्योंकि, इस परिवार के सामने बीरबल बने तो, सारा बल चला जाएगा।
वैसे कलावती की उम्मीद में देश की सत्ता भले ही कांग्रेस और उनके साथियों को मिल गई हो। खुद कलावती के इलाके से कांग्रेस और उनकी साथी एनसीपी का बुरा हाल हुआ। अब कलावती फरियाद करने आई है राहुल बाबा से कि मेरे 9 बच्चे कैसे जिएंगे। राहुल के वादे के बाद भी न तो घर मिला, न बिजली, न खुशहाली। राहुल तो, कलावती के भरोसे हीरो हो गए कि राहुल आम आदमी का दर्द जानते हैं। बड़े आदमी से जुड़ने का कलावती को फायदा ये हुआ कि देश क्या दुनिया - अमेरिका में पक्का जान गए होंगे क्योंकि, विदेशी तो वैसे भी भारत नंगे-भूखों की ही फोटो अपने यहां भारत की पहचान के तौर पर लगाते हैं- में भी जहां-जहां राहुल गांधी का एतिहासिक भाषण पहुंचा होगा सब जाए गए। लेकिन, नुकसान ये कि उसके गांव-तहसील का छोटा सा सरकारी अफसर भी कहता है कि जाओ राहुल गांधी को कहो-बताओ अपनी परेशानी और सुलझा ले समस्या।
लेकिन, अफसरों के दुत्कारने से नहीं एक NGO के हिम्मत (दिल्ली का टिकट. दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की व्यवस्था) देने से कलावती दिल्ली में है। दो दिन से अभी तो, उसे राहुल गांधी का समय नहीं मिला है। लेकिन, अब शायद एक कलावती की बात तो कुछ बन जाए। अभी तक कलावती के बारे में टीवी-अखबार में राहुल का बोला दिखा-छपा करता था। अब राहुल नहीं दिख रहे- अब कलावती का खुद का बोला टीवी-अखबार में दिख-छप रहा है। टीवी-अखबार में बड़ी ताकत होती है वो ऐसे समाज का कितना भला कर पा रहे हैं पता नहीं। लेकिन, कभी-कभी चमत्कार हो जाता है। बोरवेल में गिरा प्रिंस असली प्रिंस हो जाता है। अरे, लालू टीवी-अखबार में दिख-छपकर मंत्री तक बनने की कोशिश कर रहे हैं। कल भी तो संसद में --- देवी अर्ज सुन लो हमारी के अंदाज में -- सोनिया मैडम के सामने खड़े हो गए थे पुराने रिश्तों की याद दिलाने।
अब शायद टीवी-अखबार एक कलावती का भला करवा दे। राहुल को भी लगेगा कि इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता है आम आदमी के साथ कांग्रेस के हाथ के नारे की मजबूती दिखाने का। दो-चार तसला मिट्टी फेंकते राहुल की टीवी पर चली तस्वीरों ने लाखों तसले मिट्टी राहुल के हाथों फेंकवा दी। टीवी-अखबारों में तो, तब से चुनाव तक तसला लिए मिट्टी फेंकते ही दिखते रहे। देखिए कब ये खबर आ जाती है कि राहुल बाबा कितने दयालु हैं कलावती के लिए खुद खड़े होकर घर बनवा रहे हैं।
Wednesday, June 10, 2009
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9 comments:
कितनी कलावतियों का उद्धार होगा इस प्रकार?
सिर्फ बतंगड़ नहीं है यह. हाँ कलावती प्रतीकात्मक राजनीति का एक उदाहरण तो है ही.
हमारा देश अभी भी प्रतीकों, मान्यताओं, प्रतिमाओं पर चल रहा है। कलावती भी एक प्रतीक बन कर उभरी है। उसके साथ जो घटित होगा वह भी उदाहरण बनेगा।
लेकिन इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि कलावती का यह प्रतीक मीडिया ने ही खड़ा किया हैं। कलावती को जो मुकाम हासिल हुआ है वह राहुल बाबा ने नहीं दिया है बल्कि मीडिया ने अता फरमाया है। जय हो।
Parmanu karar ne kam se kam 'ek' kalavati ke ghar to bijli jala hi di
संजय कुमार मिश्र
कलावती अकेली नहीं है। युवराज को समझ लेना चाहिए कि जिन जिन दलितों और गरीबों के यहां उन्होंने रात गुजारी है या फिर उनके बच्चों को कंधों पर बिठाया अब वो सभी बारी बरी दिल्ली कूच करने वाले हैंै। हालत तो यह है कि जहां जहां इन्होंने दिखावा किया वहां वहां काम देखने को नहीं मिलेगा।
गुरू समझै में नै आय रहा है कि इ आदमी सरकार चलवाय रहा है कि देश के साथ मजाक कर रहा है। कहि द्यो पीएम बन जाय नै तो बाद में इ कलावती लोग यहू लायक न छोडिहैं।
:)
http://paricharcha.files.wordpress.com/2009/06/image001.jpg
अभी आगे -आगे देखिये होता है क्या ? उम्दा पोस्ट .
चलिये एक कलावती का उध्दार तो हो ही जायेगा इसी बहाने । कभी कभी मीडिया भी अच्छे काम कर ही लेता है ।
Chunav Khatam, Satyanarain ki katha bhi khatma. Prashad lijiye, Ghar ka rasta napiye. Kaun Kalawati, Kahan ki kalawati. Ab Kya zaroorat hai kalawatiyon ko yaad karne ki Rahul Baba ko.
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