Wednesday, April 20, 2022

हिन्दू पर्वों पर हमले के पीछे का मनोविज्ञान समझना आवश्यक है

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी



रामनवमी के चार दिन बाद और हनुमान जयंती के दो दिन पहले गुस्साई भीड़ ने हमला बोल दिया। अत्याधुनिक सूचना तंत्र और हथियारों के साथ तैनात पुलिस हालात को नियंत्रित करने में असफल रही। पुलिस वाहन पर हमलावर भीड़ ने धावा बोल दिया। अलग-अलग शहरों में पुलिस की कई गाड़ियों को जला दिया गया। 12 पुलिस वालों को गम्भीर चोटें आईं। सोशल मीडिया पर तोड़फोड़ के वीडियो में पुलिस कार तोड़ने वाला अल्ला हू अकबर का नारा लगाता दिखा, लेकिन इस दंगे का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद की हिन्दू नववर्ष, राम नवमी और हनुमान जयंती पर निकाली शोभा यात्राओं से कोई लेना देना नहीं है। दरअसल, यह घटना स्वीडन में हुई है। जहां शरणार्थी मुसलमानों के खिलाफ वहाँ की दक्षिणपंथी पार्टी के प्रदर्शन के बाद दंगे हो गए। यूरोप के अलग-अलग देशों में शरणार्थी के तौर पर आए मुसलमान वहाँ की कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। कमाल की बात यह भी है कि, जिस इस्लामिक कट्टरता की वजह से उन्हें अपनी ज़मीन, अपना मुल्क छोड़ना पड़ा, उसी कट्टरता से भरकर शरणार्थी मुसलमान यूरोप के देशों, वहाँ के नागरिकों के लिए चुनौती खड़ी कर रहे हैं। तो इन देशों में हिन्दू नववर्ष मनाया जा रहा था, राम नवमी पर या हनुमान जयंती पर कोई शोभायात्रा निकल रही थी। भारत की तरह विश्व हिन्दू परिषद या बजरंग दल वहाँ है भी नहीं। फिर भी पिछले एक सप्ताह में दुनिया के कई देशों में मुसलमानों की भावनाएँ आहत हुईं और वहाँ दंगे हो गए या दंगे जैसे हालात बन गए। 

देश की राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे राज्यों में भी दंगे हुए या दंगे जैसी स्थितियाँ बन गईं। इसकी शुरुआत राजस्थान के करौली से हुई। जहां हिन्दू नववर्ष के दिन निकली शोभायात्रा पर मुस्लिम बहुल क्षेत्र में घरों से और यहाँ तक कि, मस्जिदों से भी पत्थरबाजी की गई, इसके बाद हालात बिगड़े और हिंसा, आगजनी की वजह से करौली में कर्फ़्यू लगाना पड़ा। मस्जिद में या घरों की छत पर पत्थर, पेट्रोल से भरी बोतलें क्यों रहती हैं, इसका जवाब पुलिस को ज़रूर खोजना चाहिए। मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी की शोभायात्रा मुस्लिम बहुल क्षेत्र में पहुँची और उस पर जनकर पत्थरबाज़ी हुई। पेट्रोल बम और धारदार हथियारों से हमला हुआ। राम नवमी पर मध्य प्रदेश के खरगोन में पुलिस सतर्क थी, एहतियातन पुलिस बल भी साथ था, फिर भी हिंसा, आगजनी हुई और अराजकता करने वालों का दुस्साहस था कि, एसपी पर भी हमला कर दिया। खरगोन में पुलिस अधीक्षक और एक इंस्पेक्टर घायल हुआ। दंगों में घायल 16 वर्षीय शिवम जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा है। राम नवमी 10 अप्रैल को थी और एक सप्ताह के भीतर ही 16 अप्रैल को हनुमान जयंती थी। हनुमान जयंती पर भी देश भर के हनुमान मंदिरों में भव्य कार्यक्रम के साथ ही आस्थावान हिन्दू शोभायात्रा निकालता है, लेकिन इस दिन भी देश के कई हिस्सों में मुसलमानों की भावनाएँ भड़क गईं। हनुमान जयंती पर कर्नाटक के हुबली में अराजकता, उपद्रव का ऐसा मामला सामने आया है. जिसे देख सुनकर भी विश्वास नहीं होता। हुबली में करीब एक हजार लोगों ने ओल्ड हुबली पुलिस थाने पर हमला कर दिया। इस हमले में 12 पुलिसवाले घायल हुए। क़रीब 50 लोगों की गिरफ़्तारी इस मामले में हुई है। हनुमान जयंती पर ही आंध्र प्रदेश के कुरनूल के होलागुंडा से भी मिलता जुलता मामला सामने आया है। होलागुंडा में हनुमान जयंती पर जुलूस निकल रहा था और मस्जिद में इफ़्तार चल रहा था। इफ़्तार कर रहे लोगों ने शोभायात्रा में बज रहे गाने पर एतराज़ जताया और विवाद बढ़ गया। पत्थरबाज़ी शुरू हो गई। उत्तराखंड में भी हरिद्वार ज़िले के भगवानपुर के एक गाँव में निकल रही शोभायात्रा पर पथराव हुआ। पुलिस ने समय रहते हालात नियंत्रण में कर लिया। गुजरात के आणंद और हिम्मतनगर में राम नवमी की शोभायात्रा पर हमला हुआ। पश्चिम बंगाल के बाँकुरा में भी राम नवमी की शोभा यात्रा पर पथराव हुआ। राम नवमी के दिन जेएनयू में भी विवाद हुआ और मारपीट हुई। 

स्वीडन के शहरों से भारत की राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे राज्यों में हर जगह मुसलमानों की भावनाएँ आहत हुईं और उन्होंने पत्थरबाजी, हिंसा, आगज़नी शुरू कर दी। एक बार शुरुआत होने के बाद कौन कितना गलत और कौन कितना सही, इस पर सिर्फ अंतहीन बहस ही की जा सकती है और, इस समय देश में वही हो रहा है। दिल्ली के जहांगीरपुरी में भी हनुमान जयंती पर स्पष्ट तौर पर सामने रहा है कि, सी ब्लॉक की मस्जिद के सामने जुलूस पहुँचा और पहले से तैयारी से बैठे लोगों ने हमला कर दिया। दो दर्जन से अधिक आरोपियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है। कौन दोषी है या कितना दोषी है या निर्दोष है, इसका निर्णय न्यायालय को ही करना है। निर्दोष पुलिस की गिरफ़्त में आया होगा तो न्यायालय से उसे अवश्य न्याय मिलेगा, लेकिन पकड़े गए लोगों में अंसार, असलम और सलीम, यूनुस जैसे आरोपी भी शामिल हैं जो पहले से ही चोरी, लूट से लेकर सट्टेबाजी और हत्या के प्रयास तक के अपराध में कई बार जेल जा चुके हैं। पहले से अपराधों में शामिल रहने की वजह से ही पुलिस पर भी गोलियाँ चलाने में उनको संकोच नहीं हुआ। हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर पत्थरबाजी मस्जिद पर भगवा झंडा लहराने की प्रतिक्रिया में हुई, यह बात भी पूरी तरह से झूठी निकली। एक राष्ट्रीय चैनल ने एक मौलाना के हवाले से यह ख़बर चला दी और एक अंग्रेज़ी अख़बार की पत्रकार ने इसी को आधार पर बनाकर कई ट्वीट किए, जिससे इस बात को बल मिल गया कि, हनुमान जयंती की शोभायात्रा में शामिल लोगों ने उत्पात शुरू किया, लेकिन अब जब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है, फिर भी सेक्युलरिज्म का हवाला देकर मुस्लिम तुष्टीकरण में नेताओं के साथ देश के बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का भी एक वर्ग जिस तरह से झूठी ख़बरें फैलाने में लगा हुआ है, यह देश और मुसलमानों के लिए भी बेहद ख़तरनाक है। इससे पहले भी नागरिकता क़ानून विरोधी प्रदर्शन और कृषि क़ानून विरोधी प्रदर्शनों में देश विरोधी तत्वों के शामिल होने को भी ऐसे पत्रकार और बुद्धिजीवी लगातार नकारते रहे। मुसलमान और किसान भावनाओं का हवाला देकर राष्ट्र विरोधी तत्वों की आड़ बने रहे। उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों से लेकर लाल किले पर हुआ उत्पात और उसमें दिल्ली पुलिस के सैकड़ों सिपाहियों के घायल होने पर भी गम्भीर चर्चा होने दी गई। नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदख़ल करने में नाकामयाब विरोधी दल इन आंदोलनों में राष्ट्र विरोधी तत्वों की उपस्थिति लगातार देखते, जानते भी आग को हवा देते रहे। पंजाब के चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर खालिस्तानी समर्थक भावनाएँ भड़काने के आरोप लगे तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी के तत्कालीन पार्षद मोहम्मद ताहिर हुसैन को ही उत्तर पूर्वी दिल्ली के दंगों का मुख्य साज़िशकर्ता पाया गया। इसी मामले में ताहिर हुसैन और उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे फैलाने वाले आरोपी जेल में बंद है। पहले आम आदमी पार्टी का पार्षद रहा ताहिर हुसैन और अब जहांगीरपुरी में अंसार, करौली में कांग्रेस समर्थित पार्षद मतलूब अहमद। स्पष्ट दिख रहा है कि, धार्मिक भावनाएँ भड़काने के साथ दंगे भड़काने में राजनीतिक दलों के लोग सीधे तौर पर शामिल हैं। 

जहांगीरपुरी की जिस सी ब्लॉक की मस्जिद के सामने से पत्थरबाजी शुरू हुई और बाद में बड़े संघर्ष का रूप ले लिया, उसी स्थान पर नागरिकता क़ानून के विरोध में भी प्रदर्शन हुए थे। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट कहती है कि, शाहीनबाग के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए नियमित तौर पर यहाँ से कई बसों में क़रीब 300-400 लोग भरकर जाते थे। जहांगीरपुरी जैसे इलाक़े देश के लगभग हर शहर में हैं। कबाड़ का बड़ा कारोबार भी यहाँ से होता है। लगभग हर घर में यहाँ अवैध हथियार होने की बात कही जाती है। एक राष्ट्रीय टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में जहांगीरपुरी के एक निवासी ने बताया कि, हथियार तो यहाँ हर घर में है। ऐसे में अंसार, असलम, सलीम और यूनुस जैसे लोगों के लिए दंगे भड़काना बेहद आसान हो जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी वजह वही है, जिसकी वजह से नागरिकता क़ानून लागू करने का विरोध हो रहा है। सूचना प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार पत्रकार कंचन गुप्ता ने लिखा कि, मैंने जहांगीरपुरी हिंसा के वीडियो देखे और एक वीडियो को मैंने इयरफोन लगाकर सुना तो समझ में आया कि, एक विशेष तरह से वीडियो में दिख रहे लोग बंगाली बोल रहे हैं। दरअसल, इस पूरे इलाके में अवैध रूप से बसे बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों के होने की बात बार-बार सामने आती है और अब तो दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदेश गुप्ता भी कह रहे हैं कि, अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्या मुसलमानों की बस्तियों में अरविंद केजरीवाल की सरकार बिजली-पानी दे रही है, लेकिन आदेश गुप्ता यह भूल जाते हैं कि, केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और दिल्ली की पुलिस, क़ानून व्यवस्था का ज़िम्मा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ही पास है। जिस नागरिकता क़ानून को लागू करने की बुनियाद पर एक वर्ग सवाल खड़ा कर रहा था, हाल की घटनाओं के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि, देश में तुरंत प्रभाव से नागरिकों की पहचान करके उनका एक रजिस्टर बनाना आवश्यक हो गया है। अवैध घुसपैठिए दुनिया भर में समस्या बन गए हैं। और, भारत में एक बड़ समस्या यह भी हो गई है कि, भारत के मुसलमान अरब और तुर्की से सबक ले रहे हैं। इसीलिए लोकतांत्रिक, बहुसंख्यक भारत में यह सवाल आसानी से खड़ा कर दिया जाता है कि, मस्जिद के सामने से हनुमान जयंती, रामनवमी या फिर हिन्दू नववर्ष की शोभायात्रा निकालकर मुसलमानों की भावनाएं क्यों भड़काई जा रही हैं। जहांगीरपुरी की एक मुस्लिम महिला बेहद ग़ुस्से में बोलती दिखी कि, तुम हमारी मज्जिद के सामने से तेज-तेज डीजे बजाओगे, जय श्री राम का नारा लगाओगे तो कोई बर्दाश्त नहीं करेगा और किसी ने बर्दाश्त नहीं किया। राम की भूमि, देश में राम का नाम भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है। वैसे, यह कोई नई बात नहीं है, बरसों बरस न्यायालयों में लड़ने के बाद भगवान रामजन्मभूमि पर मंदिर बन पा रहा है। हनुमान और राम का नाम सिर्फ़ जहांगीरपुरी में ही नहीं, देश के कई राज्यों में मुसलमानों के बर्दाश्त के बाहर हो गया और उन्होंने हिन्दू उत्सव पर शोभायात्राओं पर पत्थरबाज़ी, हमला कर दिया। लंबे समय से सेक्युलरिज्म के नाम पर यही होता रहा है, इसलिए अब चौंकाने वाला नहीं कह सकते, लेकिन फिर भी है तो चौंकाने वाला ही कि, लोकतांत्रिक भारत में नमाज के समय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के भाषण रोक देने के वीडियो को सांप्रदायिक सद्भाव, सौहार्द की मिसाल के तौर पर बताने वाले लोग भी शातिराना मासूमियत के साथ सवाल पूछते हैं कि, मस्जिद के सामने से डीजे बजाते, जय श्री राम का नारा लगाते या हनुमान चालीस गाते जाने की ज़रूरत ही क्या थी। हिन्दू आराध्यों पर अमर्यादित टिप्पणी करने वाले जेएनयू के कम्युनिस्टों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेक्युलरिज्म की दुहाई देकर बढ़ावा देना और मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर बड़े से बड़े अपराध को छिपाने का पाप करने वालों की पहचान करना और उन्हें दंडित किए बिना भारत में सांप्रदायिक सद्भाव और सौहार्द संभव नहीं है। और, उसके लिए आवश्यक है कि, देश के नागरिकों की पहचान करके अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर करने का रास्ता तलाशा जाए और तब तक उन्हें भारतीय लोकतंत्र में मिले अधिकारों का दुरुपयोग करने की स्वीकृति मिले। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह बहुत बड़ा ख़तरा बन गया है। 

(यह लेख 20 अप्रैल 2022 को दैनिक जागरण में छपा है)

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