अयोध्या पर झूठ का पर्दाफाश

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 14 नवम्बर 2019 को छपा लेख
कानूनी लड़ाई में एक शताब्दी से कम समय से, लेकिन कई हजार वर्षों से सीता माता का श्राप झेल रही अयोध्या को आज मुक्ति मिल गयी। श्रीरामललाविराजमान रहेंगे, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, अगले मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायाधीश एस ए नजीर, न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश अशोक भूषण की खंडपीठ ने विश्व इतिहास के सबसे कठिन विवाद पर अपना निर्णय सुनाया तो अयोध्या को माता सीता के श्राप से मुक्ति मिल गयी। किंवदन्ति है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने प्रजा के प्रश्न पर माता सीता को अयोध्या से निकाला और अयोध्यावासी माता सीता के साथ नहीं खड़े हुए तो माता सीता ने उन्हें श्राप दे दिया और आज हजारों वर्ष बाद आज की अयोध्या, भारतवर्ष, की प्रजा और न्याय व्यवस्था ने अपने आराध्य राम की अयोध्या को श्राप मुक्त कर दिया। राजा रामचंद्र के जन्मस्थान में अवधवासियों की अगाध आस्था ने ही अवधपुरी को सियावर रामचंद्र के राज वाली अयोध्या बनाने का मार्ग प्रश्स्त कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा है कि बाबरी मस्जिद के वहां बनने और होने के दौरान भी हिन्दुओं की आस्था, श्रद्धा में एक क्षण के लिए भी कमी नहीं आई थी, नियमित तौर पर पूजा-अर्चना हो रही थी।
संयोग देखिए कि जब यह फैसला आया तो देवोत्शान एकादशी बीती है और अयोध्या में श्रद्धालु भवसागर पार करने की कामना लेकर पंचकोसी और चौदहकोसी परिक्रमा कर रहे थे। और, कितने वर्षों से राम की अयोध्या में परिक्रमा होती चली आ रही है, लेकिन इस सबके बावजूद शापित अयोध्या विवादों में रहने की वजह से दरिद्रता का प्रतीक बनी रही। और, भला आराध्य को दरिद्र बनाकर कोई व्यक्ति, समाज, देश कैसे समृद्ध हो सकता है। यही वजह रही कि एक समय में विश्व में समृद्धि का सबसे बड़ा भूभाग भारत पश्चिमी देशों के विकास के रास्ते पर पीछे-पीछे चलने को मजबूर होता गया। हम हिन्दू-मुसलमान के विवाद में फंसकर राम पर प्रश्न खड़ा करते रहे और संपूर्ण विश्व में हमारे ऊपर प्रश्नचिन्ह बड़ा होता गया। वामपंथी इतिहासकारों के फेर में पड़कर राम को इमामे हिन्द कहने वाला मुसलमान भी राम पर प्रश्न लगाता रहा और उसकी परिणति यह रही कि अयोध्या और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र धीरे-धीरे दरिद्रता की ओर बढ़ता गया। देश का सबसे बड़ा प्रदेश और ढेर सारे बड़े शहरों के होने के बावजूद उत्तर प्रदेश पिछड़े और बीमारू राज्य में सबसे आगे स्थिर हो गया। अयोध्या से लेकर चित्रकूट तक राम के निशानों को ही सलीके से सहेज पाता तो उत्तर प्रदेश विश्व के समृद्ध स्थानों में शामिल हो जाता, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका और देश की आजादी के बाद पाकिस्तान के विभाजित होकर मुस्लिम राज्य बन जाने के बाद भी भारत में राजा रामचंद्र की प्रजा को यह बात समझ न आई। हिन्दुत्व को निशाने पर लेकर राममंदिर आन्दोलन को भी एक उन्मादी और मुसलमानों के विरोध वाले आन्दोलन के तौर पर चिन्हित करने की कोशिश भी वामपंथी इतिहासकारों के झूठे तर्क, गढ़े तथ्य की बुनियाद पर मजबूत की जाती रही और राजा रामचंद्र की समावेशी संस्कृति, संस्कार वाले देश में फर्जी गंगा-जमुनी तहजीब का नारा गढ़कर देश की जीवदायिनी नदियों को भी हिन्दू मुसलमान में बांटने की खतरनाक साजिश की गई, लेकिन हर झूठ की एक तय आयु होती है और इस झूठ की भी तय आयु थी और अपने झूठ के ही बोझ तले यह खतरनाक साजिश भी दब गई। इसका पहली बार अहसास तब हुआ जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुत्व को संकीर्ण दायरे में बांधने की कोशिश करने वालों को करारा जवाब दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुत्व पर अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि हिन्दुत्व एक जीवनपद्धति है। हिन्दू भारत ने 30 मई 2010 के निर्णय के बाद और आज सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी यह स्थापित किया है।
पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट और दूसरे प्रमाणों, ज्ञात इतिहास, भारत आए विदेशी पर्यटकों के बताए से स्पष्ट हुआ था कि श्रीरामललाविराजमान के जन्मस्थान पर किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं है और अब उसी को सर्वोच्च न्यायालय के 5 न्यायाधीशों की खंडपीठ के सामूहिक निर्णय ने भी साबित किया है। अब केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनने वाले न्यास को चाहिए कि अयोध्या में एक भव्य राममंदिर का निर्माण करे, जिससे विश्व को राम और हिन्दू होने का अहसास सही मायने में हो सके। लगातार विवादों में रहने की वजह से रामभक्त अयोध्या कम आ पाते थे और रामललाविराजमान के दर्शन भी नहीं कर पाते थे। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में रामललाविराजमान  के खाते में महीने के बमुश्किल सात-आठ लाख रुपये ही आते थे। फिर से मैं वही बात दोहराता हूं कि जब हम अपने आराध्य को दरिद्र रखेंगे तो हमारी समृद्धि भला कैसे हो पाएगी। अब विवादों से मुक्त, सीता माता के श्राप से मुक्त अयोध्यानगरी सही मायने में श्रीराम के रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या वापसी वाली दीपावली मना सकेगी और इसकी रोशनी से संपूर्ण भारत आलोकित हो सकेगा। हिन्दुत्व समावेशी वाली एक जीवन पद्धति है, यह इससे भी प्रमाणित हुआ जब हिन्दू एकता के सबसे बड़े पैरोकार संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहनरराव भागवत ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को हम पूरी तरह से मानेंगे और व्यक्ति निर्माण के कार्य को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाएंगे। इस निर्णय के बाद भारतवर्ष, श्रीराम के संस्कार, संस्कृति, पहचान वाले समृद्ध, गौरवशाली भारत के बनने की दिशा में आगे बढ़ चला है। अब इस बात का विशेष ध्यान हम भारतवासियों को रखना होगा कि प्रजापालक राम के राज में प्रजा ही सर्वोपरि थी और राजा रामचंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम थे। भगवान राम का भव्य मंदिर तो अयोध्या में अब बन ही जाएगा, साथ ही विश्व के सबसे मर्यादित राष्ट्र के तौर पर हमारा व्यवहार इस निर्णय को संपूर्ण करेगा। 

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