ये आरक्षण की कहानी थोड़ी तो ठीक करनी ही होगी

अब दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रेस भोपाल झांसी के रास्ते घूमकर नहीं आएगी-जाएगी। क्योंकि, आरक्षण की मांग लेकर दूसरी कई मांगे जो, गुर्जरों ने उठाईं थीं वो, सब सरकार ने मान ली हैं। गुर्जरों के नेता वही कर्नल बैंसला हैं जो, कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मुस्कुराते हुए विजयी भाव से गुर्जरों को समझा रहे हैं। यहीं बैंसला पहले ऐसा ही प्रकोप बीजेपी की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के सामने भी दिखा चुके हैं।

गुर्जरों की 14 मांगें मानी गई हैं वो, ये हैं कि राजस्थान सरकार विशेष पिछड़ी जातियों के सर्वे का काम छे महीने में पूरा कराएगी। इन जातियों में गुर्जर, रैबारी, गाडिया लुहार और बंजारा शामिल है। अगर सर्वे में कुछ और जातियां जुड़ती है तो आरक्षण बढ़ाया जाएगा। ये सर्वे कराने का आदेश राजस्थान हाईकोर्ट ने पहले ही दिया था लेकिन, समय एक साल का दिया था। अब बस यही समय छे महीने का हो गया है। अहम मांग ये सरकार ने मानी है कि वो, अदालत में एक समीक्षा याचिका डालेगी जिसमें सर्वे पूरा होने तक गुर्जरों को पांच प्रतिशत आरक्षण की मंजूरी मांगी जाएगी। और, मांगें ऐसी नहीं हैं जिसकी चर्चा की जाए कि गुर्जरों के उत्थान के लिए सरकार और क्या-क्या करने जा रही है। सवाल ये है कि अगर यही मांगें थीं तो, राजस्थान सरकार ने 17 दिन तक किस बात का इंतजार किया। चलिए सर्वे के लिए तो, छे महीने का समय मिल गया है। लेकिन, अब अगर फिर से राजस्थान सरकार पांच प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण गुर्जरों को देने से मना कर दे तो, क्या होगा। यानी ये आग सिर्फ कुछ समय के लिए ठंडी हुई है।

इन ओबीसी गुर्जरों को और नीचे के आरक्षण की श्रेणी में कैसे शामिल करा पाएगी सरकार। सबसे बड़ा सवाल तो यही है। ये सवाल कई सालों से है। और, गुर्जरों का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े तो सरकार छे महीने बाद बताएगी लेकिन, गुर्जरों को देखकर तो नहीं लगता कि वो, सामाजिक-आर्थिक तौर पर ऐसे कमजोर हैं कि वो, ओबीसी से भी नीचे के आरक्षण की श्रेणी में जोड़ दिए जाएं। ये जाने कितने दिनों तक रेल गाड़ियों से लेकर सड़कों तक को अपने हिसाब से चलाते हैं। ये हजारों लीटर दूध ठसके से बहा देते हैं वो, भी किसलिए आरक्षण के लिए जरिए सुविधा चाहने की लड़ाई में।

ये लड़ाई देखकर तो यही लगने लगता है कि अब जातियां खत्म हो रही हैं। और, जातियों की बजाए आरक्षण की श्रेणी के आधार पर पहचान हो रही है। और, एक बात और उल्टी हो रही है। जातियां थीं तो, लोग ऊपर की जाति के बराबर होना चाहते थे। अब आरक्षण मिलने लगा तो, लोग नीचे की श्रेणी में आरक्षण चाहने लगे। नीचे जाने की लड़ाई ऐसी हो गई है कि राजस्थान में 2007 की गर्मियों में गुर्जर और मीना समुदाय के करीब 30 लोगों ने शहादत दे दी। ये लोग इसे भी शहादत कहते हैं। हो सकता है कि इन शहीदों की गुर्जर-मीना बहुल गांवों में मूर्तियां भी लगी हों। इन जातियों के नेता इसे शहादत बताकर औऱ जानें लेने-देने को भी अस्मिता से जोड़े रहते हैं।

नीचे गिरने की इस लड़ाई को जरा और आसान भाषा में समझिए। गुर्जर पहले से ही ओबीसी हैं लेकिन, उनका कहना है कि ओबीसी में जाटों के भी शामिल होने से उन्हें आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। और, एसटी श्रेणी में होने की वजह से मीना जाति के लोगों का सामाजिक स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है।

दरअसल सच्चाई ये है कि राजस्थान में समय-समय पर जलने वाली आरक्षण की आग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चूल्हे में बचा कर रखी थी। कभी कोई हवा मारकर आग की आंच तेज कर देता है कभी दूसरा। 2003 के विधानसभा चुनाव में राजे ने हर रैली में गुर्जरों को भरोसा दिलाया कि वो चुनाव जीतते ही उन्हें ओबीसी से एसटी बना देंगी। लेकिन, चुनाव जीतने के बाद साफ कह दिया कि ये केंद्र का मसला है इसमें वो कुछ नहीं कर सकतीं।

एक नजर अगर राजस्थान के जातीय समीकरण पर डालें तो, ये साफ हो जाएगा कि राजस्थान में ये आरक्षण की आग समय-समय पर इतनी आसानी से क्यों भड़कती रहती है। राज्य में गुर्जर करीब 6 प्रतिशत हैं, मीना करीब 13 प्रतिशत और जाट करीब 10 प्रतिशत। यानी वोट बैंक के लिहाज से तीनों जातियां ऐसी हैं कि इन्हें नाराज करके कोई तपते रेगिस्तान में सत्ता का पानी नहीं पी सकता। और, इसी सत्ता के लिए बीजेपी ने 1999 के लोकसभा चुनाव के पहले जाटों को ओबीसी श्रेणी का लाभ दे दिया। जाट ओबीसी श्रेणी पाने के लिए काफी समय से हिंसा पर उतारू थे। और, पहले से ही शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर संपन्न जाटों ने ओबीसी कोटे का 25 से 70 प्रतिशत तक लाभ लेना शुरू कर दिया। और, गुर्जरों को ये बात खटकने लगी।

अब तक गुर्जर और मीना जातियों के लोगों में काफी सामंजस्य था। लेकिन, एसटी में शामिल मीना जाति के लोग पुलिस कॉन्सटेबल से लेकर आईपीएस/आईएएस होने लगे तो, बगल में अब तक मीना के साथ चाय-पानी करने वाले गुर्जरों को मीना के एसटी श्रेणी में होने से ही जलन होने लगी। जबकि, अगर आरक्षण देने की बात की जाए तो, राजस्थान में मीना, गुर्जर या जाट तीनों में से कोई भी जाति आरक्षण की हकदार नहीं है। मीना और अब अपने लिए एसटी कोटा मांग रहे गुर्जर तो, एसटी में शामिल किसी भी तरह से नहीं हो सकते। राजस्थान में ये दोनों जातियां बड़े गांवों में अच्छे घरों में संपन्न तरीके से रह रही हैं। इन जातियों में परिवार के एक-दो लोग नौकरी में हैं। राजस्थान में व्यापार में भी ये तीनों जातियां इतनी प्रभावी तो हैं ही कि इन्हें किसी भी तरह से एसटी (शेड्यूल्ड ट्राइबल) श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। क्योंकि, इस श्रेणी में शामिल होने के लिए जरूरी शर्तों में से सबसे जरूरी ये है कि एसटी में शामिल होने वाली जाति का लोगों से संपर्क न जुड़ा हुआ हो। जीवन की सामान्य जरूरतें इनकी पूरी न हो पा रही हों। और, ऐसा कम से कम मीना और गुर्जरों के साथ तो नहीं है।

वैसे इन जातियों के आरक्षण ने राजस्थान में हमेशा से एक दूसरे विरोधी रहे ब्राह्मण और राजपूतों को भी साथ ला दिया है। लेकिन, राजनीतिक तौर पर अब न ये सुने जाते हैं और न ही ओबीसी, एससी/एसटी कोटे की असली हकदार जातियां गड़िया लोहार, बंजारा और नट। सच्चाई ये है कि राजस्थान में अगर किसी को आरक्षण अब मिलना चाहिए तो वो गड़िया लोहार, बंजारा और नट जातियां ही हैं।

लेकिन, राजस्थान में आरक्षण श्रेणी बदलने को लेकर किए जा रहे इस आंदोलन ने देश में जनरल, ओबीसी, एससी/एसटी कोटे वाली जातियों के नए सिरे से वर्गीकरण की जरूरत तय कर दी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो, अछूत से ब्राह्मण बनने की लड़ाई आजादी के तिरसठ साल बाद अब बड़ी, पिछडी सभी जातियों के जल्दी से जल्दी अछूत बनने की लड़ाई में बदल जाएगी। और, ये सिर्फ राजस्थान में ही नहीं है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों में भी यादव, कुर्मी जातियों को कब तक अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा जाएगा ये भी बड़ा सवाल है।

वरना किसी न किसी जाति का कोई नेता खुद के लिए आरक्षण की मांग करेगा और टीवी चैनल पर चिल्लाकर ये बयान देगा कि देश देखेगा कि कोई जाति किस तरह से देश के लिए कुर्बान हो सकती है। कुल मिलाकर जरूरत ये समझने की है कि देश की आजादी के समय दस सालों के लिए लागू हुआ आरक्षण कब तक अलग-अलग जातियों के लोगों की जान लेता रहेगा। शायद इसका एक मात्र तरीका यही है कि जातियों का आरक्षण खत्म करके सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए और वो भी दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं।