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Showing posts from July, 2009

ये फैसला थोड़ा और सही होना मांगता है

सड़क किनारे या किसी सार्वजनिक स्थान पर कोई भी धार्मिक स्थल न बने। मतलब ये कि ऐसी किसी जगह पर मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा न बने जो, रास्ते के बीच में हो। आम लोगों के लिए परेशानी की वजह बन जाए। सुप्रीमकोर्ट ने आज ये फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकार से चार हफ्ते में इस पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है। ये फैसला आया है गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुनवाई के दौरान। गुजरात हाईकोर्ट ने रास्ते में सार्वजनिक स्थल पर लोगों के लिए परेशानी की वजह बनने वाले सभी अवैध मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च तोड़ने का आदेश दिया है। जिसे लागू कराने की वजह से नरेंद्र मोदी विश्व हिंदु परिषद और अपने ही सहयोगियों के निशाने पर हैं। लेकिन, आज सुप्रीमकोर्ट का जो फैसला आया है उसमें अभी के ऐसे स्थलों को छूट दे दी गई है। सिर्फ इस दलील की वजह से कि अभी अवैध धार्मिक स्थलों को तोड़ने में कानून व्यवस्था की दिक्कत हो सकती है। लेकिन, मुझे लगता है कि इतने अच्छे फैसले में बस यही खामी रह गई है। क्योंकि, देश के लगभग हर शहर में ऐसे मंदिर, मस्जिद या दूसरे धार्मिक स्थल कही सड़क के बीच में तो, कहीं बस अड्डे के पास या फिर रे

हमें गिरते जाना है

क्या ये सच नहीं है कि एक बड़े पत्रकार की विधवा आपके न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी वाले घर में करीब 2 साल रही और उसको अपने साथ पत्नी की तरह रखते थे क्या ये भी सच नहीं है कि उस महिला के साथ आपके रिश्ते खराब होना तब शुरू हुए जब आपने उसकी बेटी पर भी बुरी नजर डालनी शुरू कर दी एक सच ये भी है कि आप बाराखंभा रोड के सूरी अपार्टमेंट में अकसर जंगल विभाग, राजबाग के एक कर्मचारी की विधवा से मिलने जाते हैं क्या ये सच नहीं है कि एक पूर्व न्यायाधीश की बेटी आपके साथ आपके बारामूला वाले घर में करीब दो महीने रहती थी दिल्ली के एक सिनेमाघर के मालिक के बहन के साथ क्या आपके अवैध रिश्ते नहीं थे। जब आप दिल्ली जाते हैं तो, उसके दरियागंज वाले घर में रहते हैं क्या आपने अपनी भतीजी को करीब 6 सालों तक अपने साथ companion बनाकर रखा था ये सवाल किसी सच का सामना शो में किसी एंकर ने किसी सेलिब्रिटी या फिर किसी आम आदमी या औरत से नहीं पूछे हैं। ये सवाल पूछे गए हैं जम्मू कश्मीर विधानसभा में PDP नेता मुजफ्फर बेग से। सवाल पूछने वाले थे नेशनल कांफ्रेंस के विधायक नाजिर अहमद गुराजी। यहां कोई पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं था। ये सवाल पब्ल

जो कुछ किया सिर्फ हमने किया

करगिल भारतीय इतिहास का ऐसा पड़ाव है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इस महान विजय दिवस को 10 साल पूरे हो गए और मीडिया ने जिस तरह से करगिल के शहीदों, जवानों पर खास कार्यक्रम पेश किए उससे निश्चित ही देश में देशप्रेम की भावना उफान मार रही होगी। मीडिया ने तो अपना काम बखूबी किया। लेकिन, मैंने कल और आज (26 और 27 जुलाई) के सारे अखबार देख डाले उसमें कहीं भी एक छोटा सा भी विज्ञापन सरकार की ओर से शहीदों की याद करने वाला नहीं दिखा। अखबारों में आधे से ज्यादा पेज पर रविवार, सोमवार दोनों ही दिन करगिल के शहीदों की याद दिलाने वाली खबरें छपी थीं। टीवी चैनलों (हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही) पर तो शनिवार से ही करगिल के हर पहलू को याद दिलाने वाले खास शो चल रहे हैं। जिन्हें करगिल कम याद होगा। वो, भी उससे जुड़ गए होंगे। फिर क्या वजह है कि सरकार इसे याद करने से भी बच गई। हमें क्या सबको ही ये अच्छे से दिखता होगा कि कैसे गांधी परिवार में किसी की भी पुण्यतिथि हो तो, जाने कितने मंत्रालयों की तरफ से विज्ञापनों की कतार लगी होती है। अरे छोटी सी उपलब्धि किसी मंत्रालय की होती है तो, एकाध पेज का विज्ञापन तो ऐसे ही चल

तुम लोग बेवकूफी की बात कब बंद करोगे

तुम लोगों के पास थोड़ी भी अकल है या नहीं। या पुराना फंसा हुआ रिकॉर्ड हो गए हो तुम मीडिया वाले। जहां अंटक गए उसके आगे बढ़ ही नहीं पाते। दरअसल तुम लोगों का दोष भी नहीं है। तुम लोग क्या जानो कानून के बारे में। लेकिन, मैं तो जानता हूं इसलिए मेरी बात सुनो। और, अब तो मैं गृहमंत्री भी हूं। बड़ा वकील हूं बड़ा मंत्री हूं। अब दुबारा मत पूछना कि अफजल को फांसी देने में हमारी सरकार देर क्यों कर रही है। चलो तुम बेवकूफों को मैं समझा देता हूं। अफजल गुरु को जब फांसी की सजा सुनाई गई है। और, अभी तक कुल फांसी के 28 मामले हैं। उन 28 मामलों में अफजल का नंबर 22वां है। तो, जाहिर है हमारी सरकार कानून तोड़कर तो अफजल को फांसी देगी नहीं। पहले 21 लोगों को फांसी चढ़ने दीजिए फिर अफजल की बात करिएगा। अब कसाब का भी ट्रायल चल ही रहा है। कसाब के कबूलनामे के बाद भी विशेष अदालत के न्यायाधीश महोदय पता नहीं क्यों कह रहे हैं कि फैसला अभी नहीं सुनाया जाएगा। फैसले के लिए कसाब का कबूलनामा रिकॉर्ड के तौर पर रखा जरूर जाएगा। बड़ा एहसान मुंबई हमले में कसाब और दूसरे उसके साथी आतंकवादियों की गोली से मारे गए लोगों के परिजनों पर

तर्क नहीं बस इस सवाल का जवाब दे दीजिए

राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा दिया कि उन्हें कॉण्टिनेंटल एयरलाइंस ने कोई माफीनामा नहीं भेजा है। अभी तक तो ये था कि कलाम साहब से एयरलाइंस ने माफीनामा मांग लिया है। लेकिन, ये भी बता दिया है कि आगे भी वो उनकी सुरक्षा जांच करने से बाज नहीं आएगी। अब तो लीजिए साहब ये साफ हो गया कि कलाम से एयरलाइंस ने माफी भी नहीं मांगी। इस पर विपक्ष ने खूब हंगामा मचाया। एयरलाइंस का लाइसेंस रद्द करने की मांग तक कर डाली। लेकिन, अपने देश में अब विपक्ष की बात पर सत्ता पक्ष तो क्या कोई भी लोड नहीं लेता। नया फंडा है सिर्फ हंगामा करने के लिए कर रहे हैं। लोगों को ये बड़ा मुद्दा भी नहीं लगता। सुरक्षा जांच के नाम पर कलाम साहब के जूते उतरवाने और लाइन में खड़ा रखने की खबर पर मीडिया ने नया सवाल उछाला। क्या ये वक्त नहीं आ गया है कि VIP को सुरक्षा जांच से छूट मिलनी बंद होनी चाहिए? अमेरिकी एयरलाइंस कुतर्क कर रही है कि 'वो ट्रांसपोर्ट सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के नियमों के मुताबिक, एयरक्राफ्ट में चढ़ने से ठीक पहले एयरोब्रिज पर सुरक्षा जांच जरूरी है। और, अमेरिका से दुनिया भर में जाने वाली सभी उड़ानों में ये नियम

दलितों के बलात्कार की कीमत मिलती रहेगी

माफ कीजिएगा मैं ये लिखना नहीं चाहता था। लेकिन, न्यूज एजेंसी PTI पर आई इस खबर के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया। अपनी बहनजी की ही सरकार में दलितों का सम्मान बच नहीं पा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने तो एक बयान देकर खुद का और पार्टी का काम फिट कर लिया। लेकिन, उस बयान का झटका (अंग्रेजी में Aftereffect) एक के बाद एक लगता ही जा रहा है। अब सुनिए जरा यूपी के गृह सचिव महेश कुमार गुप्ता क्या कहा रहे हैं। मैं PTI पर आया उनका बयान वैसे का वैसा ही छाप रहा हूं- "Now, District Magistrates in presence of concerned SP and DIG will hand over cheques to Dalit rape victims"। यानी प्रदेश सरकार दलितों की इज्जत नहीं बचा पाएगी। इसीलिए दलितों के बलात्कार को वो एक सामान्य घटना मान रही है जो, होती रहेगी और इसीलिए इस पर कानून बना दिया कि अब पीड़ित दलितों को चेक जिलाधिकारी ही दे दिया करेंगे। यानी दलितों के साथ व्यवहार वैसा ही होता रहेगी जिसके खिलाफ लड़झगड़कर, मायावती के पीछे जय भीम-जय भारत का नारा लगाकर इन्होंने मायावती को राज्य का 'मुख्तार' बना दिया है। यानी इनकी पूज्य बहनजी इनके

सूर्यग्रहण के बहाने

360 साल बाद ... यानी अगर मैं अपने पूर्वजों की उम्र औसत 60 साल भी मानूं तो, मेरे पिताजी के पहले की 5 पीढ़ी ऐसा ग्रहण नहीं देख पाई होगी। और, अब आगे ये दिखेगा 123 साल बाद ... यानी मेरे बाद की कम से कम 2 पीढ़ी ऐसा सूर्यग्रहण नहीं देख पाएगी। खैर, मैं टीवी युग में हूं इसलिए मजे से अपने शहर इलाहाबाद (प्रयागराज) और बगल के वाराणसी (काशी) से लेकर बिहार के तारेगना और चीन तक का सूर्यग्रहण देख लिया। पत्नी ने उठा दिया। सुबहै से बइठे-बइठे चैनल परिक्रमा के जरिए बहुत कुछ देखा। देखा कि कइसे तारेगना में बेचारे बस तारे ही गिनते रह गए-बादल के आगे न सूरज दिखा और न उसका गहन। पता नहीं कल ही सारे चैनलों पर ये स्टोरी खूब चली कि कैसे तारेगना देश का क्या दुनिया का एक बड़ा पर्यटन स्थल बन गया है। खैर मैं तो चाहकर भी रोज सुबह जल्दी नहीं उठ पाता। आज सूर्यग्रहण के बहाने उठ गया। सुबह उठकर ब्लॉगरी का कोई इरादा नहीं थी। लेकिन, टीवी पर रवीश की कुछेक लाइनों ने पोस्ट लिखने की जरूरत पैदा कर दी। एनडीटीवी पर अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलाते-चलाते रवीश अचानक कुछ ज्यादा ही आलोचक अंदाज में आ गए। बोल दिया कि घाट पर बैठने वाल

कांग्रेसी राजनीतिज्ञ, कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, राष्ट्रवादी सोच वाला नेता

रविवार की छुट्टी और जबरदस्त गर्मी की वजह से पूरा दिन घर में बिताया। और लगे हाथ टीवी पर फिल्म देख डाली। फिल्म को बीच से देख पाया। काबुल में कहीं नेताजी भटक रहे थे। भारत से भागने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस किस तरह से अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुंचते हैं। और, कैसे भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं के पत्र और आश्वासन के बाद भी नेताजी को सोवियत संघ अपने यहां आने की इजाजत नहीं देता। फिल्म में तथ्य कितने सही थे-कितने गलत पता नहीं। लेकिन, जितना भी खोज पाए होंगे bose the forgotten hero फिल्म बनाने वालों ने सही ही दिखाया होगा। मैंने बहुत पहले एक कितना भी पढ़ी थी नेताजी पर। उसके और फिल्म के तथ्य काफी मिल रहे थे। मैं यही सोच रहा था कि आखिर उस समय कैसे एक नेता ने बिना जरूरी संचार माध्यमों, लोगों तक पहुंच और गांधी के प्रभाव के खिलाफ जाकर देश के लिए लोगों का जनमानस अपने लिहाज से तैयार किया होगा। अपने देश में अपने देश के लोगों को देश के लिए तैयार करने की क्षमता नेताओं में नहीं दिख रही है। ऐसे हालात में नेताजी ने दुनिया के अलग-अलग देशों के भारतीय युद्धबंदियों और दूसरे देश में गए हिंदुस्तानियों क

ई आजकल नाम भी कइसे-कइसे होते हैं

अब नाम कितना महत्वपूर्ण है ये तो, देश के राजनेताओं से कोई पूछे। लेकिन, नामों की राजनीति पर राजनेताओं से न इन बेचारों में पूछने का साहस है और न पहुंच तो, ये चिलचिलाती धूम में होर्डिंग पर दिख रहे नामों पर ही अपनी राय देते, मुस्कियाते, ठेलियाते चले जा रहे हैं। दिल्ली-हापुड़ हाईवे पर जाम में फंसे दो ट्रॉलीवाले। जाम में फंसे औ कह रहे हैं कि आजकल का नाम रखा रहा है फिल्मों का। साथी को होर्डिंग की तरफ दिखाकर कहता है-कमबख्त इश्क। लेकिन, नाम से बहुत कुछ होता है। राजनीति में नाम वंशवादी राजनीति और अपने परिवार का ठप्पा आगे बढ़ाने के काम आता है। तो, फिल्मी नाम आज के जमाने की नब्ज बता रहा है। भइया अब इश्क तो कमबख्त ही है। ट्रॉली वाला का जाने। उसको तो इश्क का टैम ही नहीं मिला होगा। तो, ऊ का जाने बेचारा। धीरे-धीरे खिसकते ट्रैफिक पर बगल से गुजरते स्थानीय राहगीरों की टिप्पणी थी- मजा तो बस एसियै (एयरकंडीशनर कार) म है। मैं भी कार में था लेकिन, मेरी भी कार में एसी नहीं थी। ट्रैफिक जाम में फंसे पसीना सिर के बालों से चुहचुहाते, चश्मे के नीचे से आंख में घुसकर रास्ता बनाते मूंछों के कोने से धार लेकर सरकता

एक बयान से काम बन गया

मायावती को लगता है कि एक प्रेस कांफ्रेंस हर मर्ज की दवा है। उनकी सरकार कितना भी नरक कर दे वो, समझती हैं कि एक बार टीवी-अखबार के जरिए जो, उन्होंने बोल दिया। जनता उसे संत वचन की तरह आखिरी सत्य मान लेगी। लेकिन, अब बहनजी माफ कीजिएगा- आप गलती कर रही हैं। गलती ये कि कांग्रेस जो चाह रही है वही आप कर रही हैं। कांग्रेस चाह रही है कि आप रीता 'बहुगुणा' जोशी को जेल में बंद कर दें। ज्यादा दिन तो भारतीय कानून की कोई धारा है नहीं जो, नेताओं को जेल में रख सके। वो, आपने कर दिया है। अब अगर रीता बहुगुणा जोशी जेल में 14 दिन बिता देती हैं तो, ये 14 दिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए दिए गए स्टिमुलस पैकेज से भी ज्यादा कारगर साबित होगा। मैं इस बहस में तो पड़ना ही नहीं चाहता कि कौन कितना सभ्य-असभ्य है। उत्तर प्रदेश की खराब कानून व्यवस्था के खिलाफ मुरादाबाद में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भाषण दे रही थीं। कांग्रेसी कार्यकर्ता आजकल फिर जरा ज्यादा जुटने लगे हैं, जुट गए। भाषण की हर लाइन पर ताली पीट दे रहे थे। रीताजी खांटी नेता है ये तो मैं निजी तौर पर जानता हूं, बहुत

ये सब जनता की भलाई के लिए है!

सुप्रीमकोर्ट ने नोएडा में बन रही मायावती की मूर्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सुप्रीमकोर्ट का कहना है कि वो तब तक इसमें दखल नहीं दे सकती जब तक ये साबित न हो जाए कि इसमें जनता के पैसे का गलत इस्तेमाल हो रहा है। अब मुझे समझ में नहीं आता कि जनता के पैसे से सैकड़ो हाथी और मूर्तियां बनवाना दुरुपयोग नहीं तो क्या जनता की भलाई है? लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिए - पत्थर के सनम

जरदारी की सरदारी में ही भला है

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है – ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो, 62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं। भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था। जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, ताल

ये पिछड़ने का ब्लू प्रिंट है

तनाव, मुकाबला, आगे निकलने की दौड़, पिछड़ने की पीड़ा ये सब खत्म होने वाली है। न कोई आगे निकलने पर अब शाबासी देगा, न पिछड़ने पर कोई पीड़ा होगी। सब बराबर हो जाएंगे। तनाव तो बिल्कुल नहीं होगा। तनाव नहीं होगा तो, आत्महत्या भी नहीं होगी। ये फॉर्मूला है हमारे नए कानूनविद शिक्षामंत्री कपिल सिब्बल जी का। सिब्बल साहब शिक्षा में बड़े-बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं। और, सबसे पहले जो, सबसे बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं वो, देखिए। हाईस्कूल (10वीं) की बोर्ड परीक्षा खत्म कर दी जाए। क्योंकि, 10वीं की परीक्षा से बच्चे और उनके माता-पिता तनाव में आते हैं। ये तनाव इतना बढ़ जाता है कि कई बच्चे तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। इसका सीधा सा तरीका सिब्बल साहब ये लेकर आ गए कि परीक्षा होगी ही नहीं या वैकल्पिक होगी। जरा मुझे कोई बताए न कि 10वीं में कितने बच्चे होंगे जो, परीक्षा देने के लिए परेशान रहते हैं। जहां तक 10वीं की परीक्षा में फेल होने के तनाव और उससे बच्चे और उनके माता-पिता के तनाव में रहने की बात है तो, इसमें कोई संदेह-बहस नहीं है कि ये संवेदनशील मामला है और बच्चों को फेल होने से रोकने की कोशिश होनी चाह

नाम की राजनीति

बांद्रा-वर्ली सी लिंक, राजीव गांधी ब्रिज—ये दोनों नाम एक ही पुल के हैं। पहला नाम बांद्रा-वर्ली सी लिंक- वो, है जो पुल बनने की योजना बनने के समय से लोगों के जेहन में दर्ज है। भौगोलिक, स्थानीय आधार पर देश के पहले समुद्री पुल की असली पहचान बताता है। दूसरा- राजीव गांधी ब्रिज वो, नाम है जो सिर्फ इसलिए रखा गया कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सत्ता है। केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार है। स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी सोनिया और उनका बेटा राहुल देश के सबसे ताकतवर लोग हैं। यही वजह है जो, मुंबई की नई पहचान पर राजीव गांधी का नाम लिख दिया गया। अब ये राजनीति के लिए ही नाम रखा गया है तो, इस पर राजनीति तो होनी ही है। शिवसेना-बीजेपी इस पर राजनीति शुरू कर चुके हैं। लेकिन, उनकी राजनीति सिर्फ मीडिया में कुछ दिन दिखेगी-दब जाएगी। कांग्रेस की राजनीति पुल पर अमिट छाप छोड़ चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे बेवजह देश के हर छोटे-बड़े शहर, हर छोटे-बड़े विकास की पहचान पर गांधी परिवार का नाम खोद दिया गया है। नामों से भारत की पहचान बने तो, पूरा भारत गांधी परिवार के राजवंशीय शासन की तरह दिखता है। बीजेपी MLC ने तो

बस ऐसे ही

जनता का अब कोई दबाव नहीं है। और, सरकार को अगले 5 साल तक कोई खतरा नहीं है। इसलिए साढ़े तीन चार साल तक तो सरकार कड़े फैसले ले सकती है। कड़े फैसले मतलब जनता को जो पसंद नहीं आते। जैसे आज रात 12 बजे से पेट्रोल 4 रुपए और डीजल 2 रुपए लीटर महंगा हो जाएगा। अब सरकार बहुमत में न होती। कभी भी चुनाव होने का खतरा होता तो, सरकार ये खतरा तो मोल न ही लेती। लेकिन, अभी सब ठीक है। खैर, पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ तो, हम टीवी चैनल वालों ने जनता के हित के लिए फ्लैश कर दिया कि आज आधी रात से पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाएंगे। हम गाड़ी का वाइपर बदलवाने निकले थे। हमें पता चला तो, हमने भी सोचा चलो तेल भरवाते ही लौटते हैं। खैर, नजदीक के पेट्रोल पंप तक पहुंचे और तेजी से कार लगा दी। लेकिन, हम फंस चुके थे। आगे गाड़ियों की लंबी कतार थी और जब तक सोच पाते पीछे भी कारों की लंबी कतार लग चुकी थी। कोई कार वाला आगे निकलकर टैंक फुल न करा ले ये सोचकर हर कोई गाड़ी एक दूसरे से सटाए चल रहा था। एकदम मौका नहीं चूकना चाहता था इसलिए किसी की भी गाड़ी का इंजन बंद नहीं हुआ था। एक कार को तेल भराने में आधे से एक घंटे तो लग ही रहे थे। अब सोचिए