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Saturday, July 23, 2016

देश की सबसे बड़ी सेवा के अधिकारी शाह फैजल के लिखे में देश, भारत कहां है?

22 जनवरी 2016 दैनिक जागरण
2009 के आईएएस टॉपर शाह फैजल के दर्द भरे लेख को पढ़ लेने वाले देश के अधिकांश लोगों के मन में ये अहसास गहरा सकता है कि दरअसल भारत सरकार ने कश्मीर के साथ संवाद का गलत तरीका अपनाया है। शाह फैजल ने अपने लेख में लगातार बताया है कि गलत तरीके से हो रहे संवाद से कश्मीर लगातार भारत से दूर होता जा रहा है। शाह का लेख दरअसल एक कश्मीरी की भावनाओं को सामने लाता है। लेकिन, ये भावनाओं से ज्यादा उस डर को ज्यादा सामने लाता है, जिसमें कश्मीर के आतंकवाद, अलगाववाद के खिलाफ बोलने से हर कश्मीरी की जिंदगी जाने का खतरा है। शाह फैजल अपने एक साल के बेटे के साथ अपनी कहानी जोड़कर भी बताते हैं कि कैसे कश्मीर घाटी में रहने वाला हर नौजवान परेशान है। हर कोई भारत के साथ खड़ा होने से डर रहा है। ये स्वीकारोक्ति कितनी खतरनाक है। इसका अंदाजा लगाइए कि ये बात शाह फैजल कह रहा है जो, भारत सरकार की सबसे बड़ी सेवा आईएएस का टॉपर है। और अभी जम्मू कश्मीर की सरकार में शिक्षा निदेशक के पद पर काम कर रहा है। इसका मतलब समझना बहुत जरूरी है। हालांकि, सारा मतलब सलीके से शाह फैजल का लिखा ही समझा देता है। शाह फैजल का सारा गुस्सा पता नहीं टेलीविजन पर घाटी में फैल रहे अलगाववांद, आतंकवाद की बदसूरत सच्चाई सामने आने से ज्यादा है या फिर इस बात से कि टीवी पर आतंकवादी बुरहान वानी के साथ तुलना करने से उनकी जान पर खतरे से है। शाह फैजल कह रहे हैं कि भारत सरकार को टीवी चैनलों को राष्ट्रहित परिभाषित करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। यहां तक कि शाह फैजल इसे लेकर मीडिया को संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति के अधिकार पर भी सवाल खड़ा कर देते हैं। शाह फैजल कई टीवी चैनलों का नाम लेकर लिखते हैं कि इन चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है, इससे भारत संवाद वाली सभ्यता से एक गूंगी, कुतर्की सभ्यता में बदल सकती है। शाह जब इस तरह से लिखते हैं, तो कई बार राष्ट्रहित, राष्ट्रवाद, देश कश्मीरियत की चिंता में धुंधला सा होता दिखता है। कश्मीरियत सबसे पहले होनी चाहिए लेकिन, भारत की सबसे बड़ी सेवा के अधिकारी होने का नाते कश्मीर और देश की चिंता भी दिखती, तो ज्यादा बेहतर होता।  

शाह फैजल के मुताबिक, सारे टीवी चैनल का प्राइम टाइम सिर्फ कश्मीर घाटी को और ज्यादा उत्तेजित करने वाला, कश्मीरियों को भारत के खिलाफ खड़ा करने वाला है। शाह कहते हैं कि इससे राज्य सरकार की मुश्किल और बढ़ने वाली है। शाह कह रहे हैं कि टीवी चैनल सिर्फ झूठी, लोगों को बांटने वाली, घृणा पैदा करने वाली और लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता को खत्म करने वाली खबरें दिखा रहे हैं। शाह लिखते हैं कि मुझे एक अनजान फोन कॉल से पता चला कि एक न्यूजचैनल कैसे उनकी और बुरहान वानी की तुलना कर रहा है। यहां तक लगता है कि शाह फैजल दरअसल मुश्किल का समाधान खोजने की बात कर रहे हैं। लेकिन, इसके बाद की लिखी पंक्तियां मुझे डरा रही हैं कि अपनी जान जाने के डर से एक अमनपसंद कश्मीरी ऐसे व्यवहार करने लगा तो राष्ट्रहित सरकार क्या किसी हाथ में भी सुरक्षित नहीं रहेगा। शाह कह रहे हैं कि बुरहान वानी से उनकी तुलना उनकी जान को खतरा तो है ही। साथ ही वो लिखते हैं कि 50 हजार रुपये महीने की नौकरी और 50 लाख रुपये के घर कर्ज के साथ कैसे वो सफल कश्मीरी नौजवान बताए जा सकते हैं। शाह यहीं नहीं रुकते। वो लिखते हैं कि जब महानता का पैमाना किसी के अंतिम संस्कार में उमड़ने वाली भीड़ हो तो, क्या कोई 50 हजार रुपये महीने के लिए ऐसे ही मर जाना चाहेगा। इसमें कश्मीर की चिंता कहां दिखती है। हां, यहां एक अमनपसंद कश्मीरी, उस पर भी एक आईएएस का डर टीवी स्टूडियो की बहस से ज्यादा भावनाएं भड़काने वाला हो जाता है। शाह के लेख के दर्द, भावनाओं के उफान में शायद ही इन पंक्तियों पर ज्यादा चर्चा हो लेकिन, क्या ये देश की सबसे बड़ी सेवा को सिर्फ 50 हजार की नौकरी कहकर अपमानित करने जैसा नहीं है। देश को चलाने का भरोसा जिन अधिकारियों पर होता है उनका नैतिक बल कमजोर करने जैसा नहीं है। शाह को तो फक्र होना चाहिए था कि देश के चैनल ये बता रहे हैं कि देखिए सारी विसंगतियों के बाद एक कश्मीरी कैसे देश की सबसे बड़ी सेवा में सर्वोच्च है। एक कश्मीरी भारत की सबसे बड़ी सेवा में सर्वोच्च होने को गलत तरीके से कैसे देखा जा सकता है। इतने बेहतर उदाहरण के जरिए आतंकवाद की तरफ आकर्षित होने वाले नौजवानों को रोकने से बढ़िया तरीका क्या हो सकता है। लेकिन, शाह फैजल ने तो उल्टा कर दिया। अंतिम यात्रा में भीड़ उमड़ने की बात कहकर तो एक तरह से घोषित आतंकवादी बुरहान वानी की तरफ ही कश्मीरी नौजवानों को धकेल दिया। शाह फैजल का लिखा ये ज्यादा खतरनाक इसलिए भी हो जाता है कि क्योंकि, शाह अभी भी जम्मू कश्मीर के शिक्षा विभाग में निदेशक हैं।


शाह फैजल लिखते हैं कि भारतीय परंपरा में राज्य अपने लोगों से अनुकूलन के जरिए संवाद बनाता है उग्र भाषण के जरिए नहीं। लोगों की भलाई के काम के जरिए संवाद बनाता है, हिंसा से नहीं। अब शाह फैजल ने यहां क्यों नहीं बताया कि भारत सरकार ने कितनी बार मध्यस्थों के जरिए सबसे बात करने की कोशिश की और इस कोशिश को किन लोगों ने नाकाम किया। लोगों की भलाई का, कश्मीर में आई बाढ़ के दौरान केंद्र और राज्य सरकार के काम से बड़ा उदाहरण क्या सकता है। सेना हर हालत में हर कश्मीरी को बचा रही थी। कहां से हिंसा आ गई। आतंकवादी के जनाजे के बाद हिंसा हो और पुलिस, सेना को मारने की कोशिश हो, तो संवाद कैसे होगा। ये भी शाह फैजल को बताना चाहिए। शाह मुस्लिम पंरपरा का हवाला देते हुए भी लिखते हैं कि संवाद सच, धैर्य और आग्रह के आधार पर होता रहा है। यहां भी शाह ये बताने से बच गए कि संयोग से केंद्र की सरकार और राज्य की सरकार एक दूसरे अनुकूलन का ही काम कर रहे हैं। तो फिर सच, धैर्य और आग्रह की संवाद की मुस्लिम परंपरा कौन खत्म कर रहा है। शाह ये भी चिंता जता रहे हैं कि भारतीय राज्य कश्मीर के मुद्दे को तथाकथित बौद्धिकों, राजनीतिक अवसरवादियों, मौकापरस्तों, सुरक्षा एजेंसियों और सबसे ज्यादा राष्ट्रहित के स्वघोषित रक्षकों के हाथ में छोड़ने का जोखिम नहीं ले सकता। शाह फैजल की इस बात से एकदम सहमत हूं। लेकिन, सिर्फ चार टीवी चैनलों को छोड़कर लगे हाथ तथाकथित बौद्धिकों, राजनीतिक अवसरवादियों, मौकापरस्तों के बारे में भी खुलकर आ लिखते, तो बेहतर होता। शाह फैजल लिख रहे हैं कि आप किसी भी किशोर से पूछिए तो वो बताएगा कि भारत सरकार बरसों से कैसे फर्जी चुनाव, चुनी हुई सरकारों को गिराने, एनकाउंटर और भ्रष्टाचार के जरिए कश्मीरियों से संवाद कर रही है। शाह का ये लिखा भावनाओं को भड़काने के लिए टीवी चैनलों की प्राइमटाइम बहस से भी ज्यादा खतरनाक है। फर्जी चुनाव और चुनी हुई सरकार को गिराना दोनों एक सांस में सही कैसे कहा जा सकता है। फिर शाह ने ये क्यों नहीं बताया कि अटल बिहारी बाजपेयी के समय में हुए 2002 के चुनावों के बाद जम्मू कश्मीर में ज्यादातर निष्पक्ष चुनाव हुए हैं। भ्रष्टाचार भारत के हर राज्य में है। इसका मतलब क्या ये समझा जाए कि हर जगह आतंकवाद हो जाना चाहिए। एनकाउंटर कई बार निर्दोषों के भी हुए हैं। और ये भारतीय सरकार, सेना को कठघरे में खड़ा करता है। लेकिन, क्या कश्मीरियों को ये नहीं समझना होगा कि भारत सरकार, सेना कश्मीर की पीढ़ियों को आतंकवाद से बचाने के लिए ही लगी है। लेकिन, आतंकवादियों को अगर कश्मीरी थोड़ा भी समर्थन देगा तो, भेद करना मुश्किल होता है। और फिर एक दूसरे पर भरोसा न करने की बुनियाद मजबूत होती जाती है। शाह फैजल लिखते हैं कि कश्मीरी बेहद संवेदनशील लोग हैं। लेकिन, वो शक्की भी बहुत हैं। मैं मानता हूं कि कश्मीरी बेहद संवेदनशील, लंबे समय के बुरे अनुभव की वजह से हर किसी पर संदेह करने वाले हैं लेकिन, वो बेहद उम्दा लोग हैं। बशर्ते वो कश्मीरी ही रहें। अगर वो पाकिस्तान के झंडे हाथ में थामते हैं, तो कश्मीरी नहीं हो सकते। कश्मीरी कभी पाकिस्तानी नहीं हो सकता। कभी जनमत संग्रह की नौबत आई, तो जम्मू कश्मीर के लोग ये बताएंगे कि वो क्या चाहते हैं। वैसे चुनाव भी जनमत संग्रह होता है। और इस बार के नतीजे ने तो साफ किया है कि हिंदू-मुसलमान की खाई को जम्मू-कश्मीर के लोग पाटना चाहते हैं। बीजेपी-पीडीपी का गठजोड़ जनमत के दबाव की मजबूरी में हुआ है। ये इतनी छोटी सी बात राजनीतिक विद्वान लोग क्यों नहीं समझना चाह रहे हैं। जैसे घर में किसी वजह से पिछड़े बच्चे को घर का हर मजबूत सहारा देता है। वैसे ही भारत ढेर सारी विसंगतियों की वजह से पिछड़ गए कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में लाना चाहता है। भारत ये एहसान नहीं कर रहा। लेकिन, ये बात कश्मीर को भी समझना होगा। और आखिर में मैं शाह फैजल वाली बात में एक पंक्ति जोड़कर दोहरा रहा हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये महत्वपूर्ण काम सीधे तौर पर अपने जिम्मे ही लेना होगा कि भारत की कश्मीर में और भारतीय कश्मीर की दुनिया में छवि बेहतर हो। 

Sunday, July 17, 2016

शाह फैजल, मुनव्वर राणा और मुसलमान

शाह फैजल Shah Faesal की ताजा चिट्ठी मुझे अवॉर्ड वापसी के समय #मुनव्वरराणा के टीवी पर सम्मान लौटाने की याद दिलाती है। हालांकि, मैं शाह और राणा की तुलना नहीं कर रहा हूं। क्योंकि, राणा अपनी जिंदगी में अपने हुनर से सब हासिल कर चुके हैं और शाह को अभी अपना हुनर बहुत दिखाना बाकी है। शाह की चिट्ठी का दर्द जायज है। लेकिन, इन दोनों को एक साथ रखना मुझे इसलिए जरूरी लगा कि मुसलमान पर कितना दबाव है #नरेंद्र_मोदी सरकार के खिलाफ कुछ तो करने का। जिन्होंने भी शाह और Burhan Wani #बुरहान की तुलना की। क्या गलत किया? यही लिखा ना कि एक के पिता को आतंकवादियों ने मार डाला वो, आज भारत की सबसे ऊंची सेवा का अधिकारी है और दूसरा आतंकवादी। शाह का दर्द अपनी जगह लेकिन, मुसलमानों का, किसी भी मौके पर अपने चमकते चेहरे को दबाव में धकेलना, कहां तक जायज। मुनव्वर राणा ने अपने शुभचिंतकों को बताया कि मुल्ले पीछे पड़े हैं कि सम्मान वापस करो। खबरें बता रही हैं कि फैजल को अपना फोन बंद करना पड़ गया है। किनकी वजह से। सरकार की वजह से, हिंदुओं की वजह से या मुसलमानों की वजह से। इसकी जानकारी भी फैजल दे देते तो, काफी कुछ साफ हो जाता। कहीं इस चिट्ठी को आधार बनाकर घाटी में शाह फैजल के पोस्टर लगाकर अलगाववादियों ने नौजवानों को भड़काना शुरू कर दिया तो, शाह फैजल क्या कहेंगे या कुछ कहेंगे ही नहीं। फिलहाल कश्मीर घाटी में बहुत सी जगहों पर कर्फ्यू जारी है।

Tuesday, November 17, 2015

बाजार बड़ा भला कर सकता है

गीता प्रतियोगिता की विजेता मरियम सिद्दीकी
बाजार की बात करिए और एक सांस में कोई भी बाजार की बुराई ही बुराई गिना देगा। वो भी जो बाजार में सिर से पांव तक डूबा है। वो भी जो बाजार के बिना जी नहीं सकता। वो भी जो बाजार की हर सुविधा के लिए सारी जिंदगी कसरत करते रहते हैं। खैर, मैं तो आमतौर पर बाजार का समर्थक ही हूं। बाजार की सुविधाओं का भी। हां, ये भी उतना ही दृढ़ विश्वास है कि बाजार में भी दूसरी सारी व्यवस्थाओं की तरह ढेर सारी कमियां हैं। जिसे सुधारते रहना जरूरी है। इस रविवार को स्टार प्लस पर आने वाला आज की रात है जिंदगी शो देख रहा था। अमिताभ बच्चन हैं, तो आकर्षण बढ़ जाता है। और अमिताभ बच्चन की तराकी भी अद्भुत है। खैर, मैं जो शो देख रहा था। उसमें गीता प्रतियोगिता जीतने वाली मरियम सिद्दीकी थी। मरियम है तो सिर्फ 13 साल की लेकिन, मरियम का ज्ञान किसी बड़े विद्वान का आभास दे रहा था। 13 साल की उम्र में मरियम कह रही थी कि किसी को चोट लगे और हिंदू मुसलमान पूछकर उसका इलाज हुआ तो, इंसानियत मर जाएगी। 

मरियम के माता-पिता
और शो में जब अमिताभ बच्चन ने मरियम के पिता आरिफ सिद्दीकी से पूछा कि उन्हें क्यों लगा कि बेटी को इस तरह के धार्मिक ग्रंथों को पढ़ाना चाहिए। आरिफ का जवाब आया कि एक दिन स्कूल से लौटकर बेटी ने पूछा कि हमारे साथ ज्यादातर बच्चे हिंदू क्यों हैं। इसके बाद लगा कि बच्ची को धर्म की समझ होनी जरूरी है। कमाल ये है कि इस उम्र में मरियम ढेर सारे धर्मग्रंथ पढ़ चुकी है। अब वो गुरुग्रंथ साहिब का अध्ययन कर रही है। ढेर सारा ज्ञान, पढ़ाई और दबाव भी शायद ही उतने लोगों पर असर करे जितना उस दिन स्टार प्लस पर आज की रात है जिंदगी देखने वालों पर हुआ होगा। जाहिर है ये धर्मार्थ नहीं हो रहा है। दूसरे मनोरंजन चैनलों को मात देने के लिए ये कार्यक्रम स्टार प्लस ने बनाया है। लेकिन, इतने सुंदर तरीके से कोई क्या धर्म बताएगा। इसलिए बाजार को खारिज मत कीजिए। मैं तो बाजार को लेकर इतना आशावादी हूं कि कश्मीर की सारी मुश्किलों का हल इसी बाजार में देख रहा हूं। 

Thursday, July 09, 2009

जरदारी की सरदारी में ही भला है

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है – ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।


भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।


जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।



जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-


पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।

अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।

और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।



साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।


कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।


कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।


बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।


अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।

Monday, August 25, 2008

देश और शरीर में बड़ा फरक है

कश्मीर मसले को भारतीय लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाना नामुमिकन है। भारतीय लोकतंत्र की इतनी मजबूरियां हैं कि वो, कोई फैसला नहीं ले सकता। इस लोकतंत्र के 60 साल सिर्फ सहमति बनाने की चिरकुटाई में बीत गए। वो, भी सहमति बनाने की कोशिश उनसे जो सहमत तो हो ही नहीं सकते। क्योंकि, सहमत होने के बाद उनकी हैसियत ही नहीं रह जाएगी।

अब इस देश का मीडिया, मीरवाइज उमर फारुक, फारुक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती के साथ कांग्रेस, बीजेपी नेताओं को स्टूडियो में बैठाकर सहमति बनाने की कोशिस कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को इतनी आजादी है कि वो, स्टूडियो में देश के किसी हिस्से को देश से आजादी की मजे से वकालत कर लेते हैं। वकालत नहीं तो, निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया दिखने की कोशिश में उस प्रेशर ग्रुप में शामिल हो गए हैं। जो, कश्मीर की आजादी का हिमायती है।

मैंने भी कश्मीर के हालात से दुखी होकर 14 अगस्त को ये लिख मारा था कि आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। मैंने वो, लेख दरअसल देश जबरदस्त तौर पर उबाल मार रही उस भावना के तहत लिख मारा था कि – एक छोटी सी जन्नत के लिए पूरे देश को दोजख बनाना कहां तक ठीक है। और, ये तो पाकिस्तान, अलगाववादियों-आतंकवादियों के लिए अच्छी ही होगा कि हम खुद ही अपने जन्नत को पाकिस्तानी जमीन (दोजख) में शामिल करवा दें। लेकिन, क्या देश के अहम हिस्से कश्मीर को आजाद कर देने से देश को दोजख बनाने की प्रक्रिया रुक जाएगी। क्योंकि, देश कोई शरीर तो है नहीं कि किसी हिस्से में बीमारी या सड़ांध हो जाए तो, उसका ऑपरेशन करके निकाल दीजिए। पूरा शरीर स्वस्थ रहेगा।

दरअसल, कश्मीर इस देश की ऐसी बीमारी है जिसका ऑपरेशन करके उसके अंदर भरी मवाद तो निकाली जा सकती है। लेकिन, उसे काटकर निकालने से ये बीमारी देश के दूसरे हिस्सों में और तेजी से फैल जाएगी। अब इस ऑपरेशन को करने का माद्दा ऐसे डॉक्टरों में तो नहीं ही हो सकता। जिनके हाथ इतने भर से कांपने लगते हों कि मरीज के कुछ बददिमाग (मरीज को हमेशा बीमार देखने की चाहत रखने वाले) घरवाले, नाते-रिश्तेदार ऑपरेशन असफल होने का डर दिखाकर डॉक्टर को धमका रहे हों। और, ये ऑपरेशन तो और भी मुश्किल हैं क्योंकि, कश्मीर नाम के मरीज के ऑपरेशन का जिम्मा भारतीय लोकतंत्र की मजबूरी से पैदा हुए चिरकुट नेताओं के पास है।

दरअसल, एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने करीब 62 साल पहले जो, कश्मीर में तुष्टीकरण के कांटों की खेती लगाई थी। नेहरू की उस फसल को बढ़िया खाद-पानी दिया- पाकिस्तान, अलगाववादी, देश के धर्मनिरपेक्षता के लंबरदार नेता, कश्मीर को बपौती की तरह इस्तेमाल कर रहे मुफ्ती, अब्दुल्ला परिवारों ने। फसल खूब बढ़िया हुई इतनी कि कश्मीर पंडितों की तो, कौम ही शरणार्थी शिविर के संग्रहालय भर में पाई जाती है। या कहीं-कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे पड़ी है ये कौम।

सवाल सिर्फ कश्मीरी पंडितों का ही नहीं है। हमारे देश में होने के बावजूद हम कश्मीर या तो जाते नहीं हैं- जाते भी हैं तो, डर-डरकर। इस पीड़ा का जवाब कहां से मिलेगा-कौन देगा। जम्मू की श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के आर्थिक नाकेबंदी को आधार पर बनाकर कश्मीर की आजादी और अलगावादियों से सहानुभूति सबको हो रही है। बासठ सालों से पूरा देश जो, पीड़ा झेल रहा है, उसका जवाब कौन देगा-उसका हल किस शांति बैठक से मिल पाएगा।

टीवी चैनलों पर सज-धजकर आए मीरवाइज, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती- चिल्लाकर कह रहे हैं कि आप घाटी में एक भी मुसलमान बताइए जो, अमरनाथ यात्रा के खिलाफ हो। ये तो, मैं भी जानता हूं। और, कश्मीर में चार दिन में मुझे ये अनुभव मिला था कि सबकी सेब बेचकर ही नहीं चल रही, जैसा- मुजफ्फराबाद चलों का नारा देने वाले साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। अरे, अब्दुल्ला, मुफ्ती और मीरवाइजों- अमरनाथ यात्री कश्मीर जाते हैं तो, कुछ लेकर नहीं आते। देकर आते हैं- कश्मीर को रोजगार-कमाई।

और, यही रोजगार-कमाई है जो, कश्मीर का हल निकाल सकता है। लेकिन, रोजगार-कमाई के लिए बाजार को कश्मीर में जगह बनाने की मौहाल बनाने देना होगा। उस माहौल के लिए अगर कुछ समय के लिए कश्मीर में खोखले लोकतंत्र की बलि चढ़ानी पड़े तो, गुरेज नहीं होना चाहिए। मेरी पहली पोस्ट में मैंने साफ लिखा था कि बाजार ही कश्मीर में बंदूक को बरबाद कर सकता है।

फिर, ये सवाल क्यों उठाकि सौ एकड़ जमीन पर बनने वाले अस्थाई इंतजामों से राज्य की डेमोग्राफी बदल जाएगी। हिंदू बढ़ जाएंगे। कश्मीर से तो, वहां के मूल निवासी कश्मीरी पंडित मारकर भगा ही दिए गए। और, बताइए ना, जहां हिंदू ही ज्यादा हैं उस जम्मू में इतने बड़े आंदोलन के बावजूद में एक भी मुसलमान को नुकसान पहुंचा हो। या देश भर में बताइए ना कहां ऐसा है कि मुसलमान होने की वजह से किसी को मारा-भगाया जा रहा हो। फिर, ये नेहरू की कांटे की फसल के खाद-पानी (मुफ्ती, अब्दुल्ला, मीरवाइज), टीवी स्टूडियो में ऐसा बोलने का साहस भी कैसे कर पाते हैं जैसे, वो दूसरे देश से आए राजनयिक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से हों।

पिछले कुछ सालों से कश्मीर में चुनी गई सरकार चल रही थी तो, पूरे देश में ये भ्रम फैल रहा था कि आतंकवादी-अलगाववादी कमजोर हो गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कश्मीर में शांति दिख भले रही थी। पूरे देश में आतंकवादी-अलगाववादी हर रोज बरबादी की नई इबारतें लिख रहे थे। आरडीएक्स-बम धमाके-गोलियां, कश्मीर से निकलकर पूरे देश में लोगों की जान ले रहे थे। और, जब इस सरकार के जाने के दिन आए तो, फिर इन नेताओं ने कश्मीरियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। एक टीवी चैनल पर बहस में महबूबा मुफ्ती ने उमर अब्दुल्ला पर आरोप लगाया कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर राज्य की डेमोग्राफी बिगड़ने का हल्ला सबसे पहले आप ही ने मचाया था।

मतलब साफ है कि देश में एक दूसरा देश बसा हुआ है जो, स्वाभाविक है मौका मिलते ही आजादी की कोशिश करेगा। इसलिए सबसे पहले तो, कश्मीर को देश का हिस्सा बनाना होगा। यानी पूरे देश के जैसे कानून लागू करने होंगे। कश्मीर के मुसलमान देश भर में बसें और मजे से बसें। कश्मीर में देश के दूसरे हिस्से के हिंदू न सही शुरू में कम से कम मुसलमान ही बसना शुरू करें। यानी कुल मिलाकर एक देश जैसा लगने लगे। तभी बात बनेगी।

और, ये दलील देने वाले चूतियापे की बात कर रहे हैं कि कश्मीरी भारत से अलग होना चाहते हैं। कश्मीर अगर अलग होना चाहता तो, वो कांग्रेस को इतनी ताकत क्यों देता कि वो, सरकार बना सके। मुफ्ती के अलावा उमर अब्दुल्ला भी कभी पाकिस्तान के खेमे में जाने की या आजादी का नारा बुलंद करने की बात नहीं करते उसे क्यों, विधानसभा में सबसे ज्यादा सीट जिताते। मतलब साफ है कि लोकतांत्रिक राय भी कश्मीरियों की यही है कि हम भारत के साथ हैं। अब अगर कश्मीरियों की इस लोकतांत्रिक राय का सम्मान करने के लिए तानाशाही की भी जरूरत पड़े तो, करनी चाहिए। और, इन गोली-बंदूक से बात करने वाले अलगाववादियों को, देश के दूसरे किसी हिस्से के अपराधी-देश द्रोहियों की ही तरह जेल में ठूंस देना चाहिए। सिर्फ इतने से बात न बने तो, जितने से बने वो करना चाहिए।

Thursday, August 14, 2008

आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए

हिंदुस्तान मुर्दाबाद, मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) चलो। भारत की सरकार हमारे लोगों पर जुल्म ढा रही है। भारतीय सेना के लोग हमें मार रहे हैं। प्रताड़ित कर रहे हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं। कश्मीर में पिछले कुछ समय से कुछ इसी तरह की भारत विरोधी भावनाएं फिर से उफान पर हैं। क्या सचमुच कश्मीर (जम्मू-लद्दाख छोड़कर) के लोगों के साथ भारत सरकार और भारतीय सेना इसी तरह का व्यवहार कर रही हैं। क्या सचमुच भारत ने जबरदस्ती कश्मीर पर कब्जा कर रखा है। कश्मीर का एक चक्कर लगाकर आइए तो, आपको ये बात और मजबूती से समझ में आएगी।

फिर, दुनिया में गुटनिरपेक्ष, शांति के प्रतीक और मानवता के सबसे बड़े पक्षधर देश भारत को ये क्यों नहीं समझ में आ रहा कि कब्जा, भारत और भारतीयों के मूल स्वभाव में नहीं है। इसलिए वो, ये काम तो मजबूती से कर ही नहीं सकते। हमारे देश में चीन की तरह तानाशाह शासन तो है नहीं कि जो, फैसला हमने लिया उस पर अमल कर सकें। हमारे पास इतनी भी सैन्य ताकत नहीं है कि हम हर दिन भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों और उनकी शह से भारत में आतंक मचाने वालों का बाल भी बांका कर सके। चीन और पाकिस्तान अवैध कब्जा भारत की जमीन पर किए हैं उसे हम छुड़ा नहीं पा रहे हैं फिर, हम क्यों कश्मीर को कब्जे में रखे हुए हैं। बेवजह देश की सेना की वहां आहुति दे रहे हैं, देश के लोगों की मेहनत की कमाई घाटी में झोंक रहे हैं। विदेश में पढ़कर लौटे और भारत के लोकतंत्र की वजह से ही सत्ता की मलाई काट रहे अब्दुल्ला और मुफ्ती के बेटे-बेटी भी कह रहे हैं कि भारत की सरकार कश्मीरियों पर जुल्म ढा रही है।

हुर्रियत और दूसरे अलगाववादी तो पहले से ही ये बात गला फाड़कर कह रहे हैं कि कश्मीर, ऐसी समस्या है जिसका हल निकालने के लिए भारत को कश्मीरियों के साथ पाकिस्तान या किसी तीसरे पक्ष को भी बिठाना होगा। श्रीनगर की रैलियों में पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते हैं। पाकिस्तान जिंदाबाद और हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगते हैं। मैं जब शादी के बाद कश्मीर घूमने गया था तो, घाटी में बहुत बढ़िया माहौल था फिर भी, मैं जिस बोट में रुका था उसके, मालिक ने कहाकि- हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारी, कश्मीर का सेब न बिके इसके लिए सेना और सरकार के साथ मिलकर कश्मीर में आतंकवादी गतिविधि चला रहे हैं। बेहद वाहयात तर्क हैं लेकिन, आप-हम कुछ नहीं कर सकते। उनको भारतीय सेना पर, भारत सरकार पर भरोसा ही नहीं है। सेना के सामने कश्मीर के लोग ठीक वैसे ही नारे लगाते हैं जैसे- शायद आजादी के आंदोलन के समय कश्मीर से लेकर कन्याकुमार तक के भारतीय अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाते थे।

कश्मीर से वो पाकिस्तान जाने की तैयारी करते हैं तो, उनकी करते वक्त जो मरा वो, एक आतंकवादी था। और, द इकोनॉमिक टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर Pushing Kashmir toward Pakistan में स्वामीनाथन अय्यर कह रहे हैं कि जम्मू के आंदोलन की वजह से कश्मीर, पाकिस्तान के नजदीक जा रहा है। स्वामीनाथन साहब खुद ही अपने लेख की शुरुआत में, पुराने वाकये में एक कश्मीरी अधिकारी के हवाले से कहते हैं कि, पाकिस्तान के साथ उनका व्यापार ज्यादा स्वाभाविक है। अब स्वामीनाथन साहब कहीं भी ये नहीं बताते कि जब 60 साल से कश्मीरियों की सारी गलत (अलगाववादी पढ़ें) हरकतों के बाद भी जम्मू में कभी एक भी मुसलमान के सिर की पगड़ी नहीं उछली तो, भी क्या कश्मीर के अलगाववादी कश्मीर को पाकिस्तान के पास नहीं ले जा रहे थे।

कश्मीर के सेब व्यापारी करीब पंद्रह दिनों से सेब से भरा ट्रक लिए खड़े जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर खड़े रहे गए तो, वो पाकिस्तान में सेब बेचने चल पड़े। लेकिन, शायद ही कोई एक वाकया सुनने मिला हो कि देश के किसी भी हिस्से में किसी कश्मीरी मुसलमान ने एक पल भी दहशत में गुजारा हो। लेकिन, जब श्रीनगर, पहलगाम और गुलमर्ग के आसपास अलगाववादियों ने तांडव मचा रखा तो, मेरे परिवार जैसे जाने कितने धरती के स्वर्ग पर डरे सहमे थे कि- अब घर सही-सलामत लौट पाएंगे या नहीं।

दरअसल सच्चाई ये नहीं है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने या उसे वापस लेने से ये सारा हंगामा घाटी में चल रहा है। सच्चाई वो है जो, मशहूर कश्मीरी गायक गुलाम मोहम्मद बताते हैं गुलाम मोहम्मद जम्मू में रहते हैं वो, कहते हैं कि, ये लड़ाई हिंदू-मुसलमान की है ही नहीं। ये लड़ाई है जम्मू के अधिकारों की। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि चाहे अंग्रेजी में J&K कहो चाहे देसी जुबान में जम्मू-कश्मीर, आता जम्मू ही पहले है। लेकिन, विडंबना देखिए कि जम्मू के लोग भारत माता की जय बोलते हैं, 60 सालों में कभी देश के लोगों को डराकर नहीं रखा। कभी कोई धार्मिक आधार पर हिंसी नहीं की। फिर भी भारत सरकार से तवज्जो नहीं पाते।

जबकि, कश्मीर के लोग लगातार भारत पर कब्जे का आरोप लगाते रहते हैं। हिंदुस्तान के खिलाफ नारे लगाते हैं, पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं, हिंदुस्तानी झंडे को आग लगाते हैं। अभी कल के अखबारों में भी श्रीनगर से मुजफ्फराबाद जाने वालों के हाथ में भारत को बंटवाकर पाकिस्तान बनवाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के फोटो थे। आज 14 अगस्त है। आज ही के दिन 1947 में पाकिस्तान आजाद हुआ था यानी भारत से बंटा था। अब मुझे तो आज के हालात देखने के बाद लगता है कि कश्मीर को आजाद कर देना ही भारत के लिए सबसे बेहतर होगा।

कश्मीरियों की भाषा में भारत सरकार कश्मीर पर जबरी कब्जा जमाए हुए है। और, उसका खामियाजा पूरे देश के लोग तो भुगत ही रहे हैं। सबसे ज्यादा जम्मू-लद्दाख के वो, लोग भुगत रहे हैं जो, अलगाव की धमकी भरी भाषा नहीं बोलते। जहां, सचमुच धरती पर स्वर्ग जैसा माहौल रहता है। लेकिन, हमारी सरकार तो, धमकी ही भाषा सुनती है। और, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को भी पाकिस्तान के थोड़ा और नजदीक जाकर ही भारतीय लोकतंत्र की अहमियत समझ में आएगी।

Tuesday, July 01, 2008

इसके बिना बात पूरी नहीं होगी

मेरे घर वाले कश्मीर से लौट आए हैं। मैंने पिछले लेख में बात यहां खत्म की थी कि अगर राजनीति इसी तरह से घाटी को दहशत के माहौल में धकेलती रहेगी। तो, कैसे कोई दुबारा किसी को कश्मीर घूमने जाने की सलाह दे पाएगा और बेरोजगार कश्मीरी महबूबा, उमर अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद की बात समझेगा या फिर आतंकवादियों की।

लेकिन, आज जब मेरी घर वालों से बात हुई तो, उन्होंने जिस तरह से अपने कैब ड्राइवर की तारीफ की। उससे साफ है कि कश्मीरी बहुत सच्चे और साफ दिलवाले हैं। और, घाटी में एक दशक से जो कुछ शांति आई है। और, इससे वहां जिस तरह से मौके और रोजगार मिल रहा है वो, उसे आसानी से नहीं गंवाएंगे। गुलमर्ग से लौटते समय जब राजनीति दलों की क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने वाले मुट्ठी भर बहके लोग और जाने-अनजाने आतंकवादियों के हितों को पूरा कर रहे लोगों ने गाड़ी रोककर उसे तोड़ने-जला देने की धमकी दी तो, कश्मीरी टैक्सी ड्राइवर ने मेरे घरवालों को भरोसा दिलाया मेरी लाश से गुजरने के बाद ही ये लोग आपको छू सकेंगे। मुसलमान टैक्सी ड्राइवर पर मेरे घर वालों को भरोसा कुछ इतना हो गया था कि जिस दिन वो लोग कहीं घूमने नहीं जा पाए थे तो, भी वो बोट पर घरवालों के साथ था। इस जज्बे को सलाम औऱ उम्मीद यही कि घाटी में मुसलमान कैब ड्राइवर जैसे लोग ज्यादा मजबूत होंगे।

और, मेरा भरोसा फिर से मजबूत हो गया है कि कश्मीर को बंदूक और बारूद की आग से बाजार ही बचा पाएगा।

Tuesday, April 10, 2007

कश्मीर में बंदूक को मात दे रहा है बाजार

कश्मीर में अमन है। पहली नजर में देखने में ये अमन बंदूक के खिलाफ बंदूक की ताकत का अमन दिखता है। जम्मू स्टेशन पर उतरने के बाद श्रीनगर यानी धरती पर जन्नत मेंहर तरफ बंदूक के साथ चौकस सुरक्षाबल के जवान इस बात का भरोसा तो दिलाते हैंकि कश्मीर में अमन है लेकिन, साथ ही दहशतका अहसास भी दिलाते रहते है असल में दहशतगर्दी को यहां बंदूक ने नहीं बाजार ने मात दे दी है।

जम्मू से कटरा के लिए टेढ़ीमेढ़ी पहाड़ियों पर चढ़ते हुए कटरा से मां वैष्णो देवी के दरबार के लिए साढ़े बारह सौ रुपए में जाने वाले हेलीकॉप्टर के विज्ञापन के साथ ही कुटॉन्स शर्ट के भी बड़े-बड़े विज्ञापन नजर आ जाते हैं। साफ है बिना मुनाफे के विज्ञापन नहीं हो सकता। यानी बड़ी-बड़ी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए मांवैष्णो देवी के दरबार में आने वाले भक्तों पर भरोसा है।ये बाजारका वो पक्ष है जो, अक्सर इसका विरोध करने वालों को कभी नजर नहीं आता। पिछले दो दशकों से आतंकवाद की वजह से जमाने पुरानी जिंदगी जी रहे लोगों को बाजार ने नई रंगत दे दी है।

जम्मू से श्रीनगर के लिए फ्लाइटका सफर शुरू होते ही एक बार फिर सुरक्षा की कड़ी जांच इस बात का अहसास दिलाती है कि हवा में कुछ दहशत है। लेकिन, श्रीनगर हवाईअड्डे पर उतरने के बाद टैक्सी में इस दहशत को दूर करता है फिर वही बाजार। लेकिन, बाजार यहां प्रोडक्ट बेचने के बजाए सुरीले रस घोलता है।बिग 92.7 एफएम पर सबकी आंखों का तारारेडियोजॉकी सारा आपकोनए पुराने सुनाकर कश्मीर की फिजां को और खूबसूरत बनाती है।

जनवरी -फरवरी का समय कश्मीर के लिए पीक सीजन नहीं होता यानी धरती की जन्नत जाने के लिए लोग ये समय कम चुनते हैं। लेकिन, असल कश्मीतो, सर्दियों में कश्मीर की डल लेकके किनारे की सड़क पर शाम को हल्की बर्फबारी में घूमकर ही देखाजा सकता है। डल गेट से लेकर शंकराचार्य मंदिर और मशहूर मुगल गार्डन जाने वाली सड़क पर बंदूक की आंखों से लोगों की पहचान करते सुरक्षाकर्मी सिर्फ इतनी दूरी पर होते हैं कि एक की तेज पुकार दूसरे तक पहुंच जाए।

यहां डल गेट पर बाजार फिर हाजिर है। डल लेक में पांच से छे सौ हाउसबोट में ज्यादातर हाउसबोट के नाम बड़े शहरों में दुकानों के साइनबोर्ड की ही तरह किसी न किसी विज्ञापन के साथ चमक रहेहोते हैडल लेक का मजाशिकारे की सैर के बिना बेकार है और इस शिकारे के चलते ही बाजार साथ चलने लगता है। शिकारे को आगे बढाने के लिए चलने वाले हर दसवें चप्पू पर कोई न कोई नई कश्ती शिकारे के बगल में आकर कुछ बेचने की कोशिश करती है।

कश्मीर के खास केसर और शिलाजीत से कश्मीरी हैंडीक्राफ्ट तक। चलती फिरती फोटो शॉप भी है और कश्मीरी कहवा से आगे कोल्डड्रिंक का विज्ञापन भी साथ लजे और कुरकुरे तो होंगे ही। वैसे तो, कश्मीर में अॉटो से पुरानी बाजार तक जाने के पचास रुपए से कम नहीं लगते। लेकिन, हो सकता है कि कोई अॉटो वाला सिर्फ दस रुपए में आपको बाजार की सैर कराकर वापस पहुंचाने को तैयार हो जाए। इसकी वजह भी बाजार ही है।ये अॉटो शॉप की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का हिस्सा है। आप पर ये भी दबाव नहीं होगा कि आप कुछ खरीदें हीं। पसंद आए खरीदिए नहीं तो, कोई बात नहीं दस रुपए में ही अॉटो वाला वापस डल गेट छोड़ देगा। बाद में वहां से कुछ खरीदने का जी करे तो, फोन कीजिए दस रुपए वाला अॉटो हाजिर है।

मैंने सुन रखा था कश्मीर में शाकाहारी खाना मिलना मुश्किल है। लेकिन, डल लेक के किनारे ढाबे से लेकर दिल्ली के नाथू स्वीट्स के रेस्टोरेंट तक सब मिलेगा। बाजारके साथ प्रोफेशनलिज्म अपने आप आ जाता है। गुलमर्ग की बर्फ के बीच में भी बाजारचुपचाप अपना काम कर रहा है। स्लेज गा़ड़ी खींचने वाले को रोजगार मिला है तो, नए जोड़ों को उनके हनीमून ट्रिप की यादगार वीडियो हाथ के हाथ देनेवाले भी अपनी दुकान चला रहे हैं। कश्मीर में अमन है इसलिए गुलमर्ग से पहले तंगमर्ग कस्बे के रियाज को गाइड का काम भी आसानी से मिल रहा है। दो बहनों की पढ़ाई और घर का खर्च इसी अमन की वजह से ही चल रहा है।

कश्मीर में अब लोगों को जेहाद के नारे से ज्यादा बिग एफएम की सारा की बकबक ज्यादा अच्छी लगती है। लेकिन, कश्मीर के अमन कादुश्मन है कि सरकार पर यहां के लोगों का भरोसा नहीं बन पाया है। दो दशकों से इतने खुशहाल और समृद्ध राज्य को आतंक से बरबाद कर देने वालों से अभी भी यहां के कुछ लोगों को सहानुभूति है। वैसे बाजार के विरोध ये दहशतगर्द भी हैं क्योंकि रेडियो के गाने गोलियों की आवाज की दहशत कम करते हैं। डल लेक के किनारे देर शाम तक टहलते नए जोड़े भी दहशतगर्दी को चिढ़ाते हैं। यहां बाजार ही काम कर रहा है अमन लाने में। बाजार का सीधा फायदा यहां दिख रहा है। यहां सरकार और बाजार को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। सरकार ने बाजार के चलने का पुख्ता इंतजाम कर लिया तो, अमन अपने आप जन्नत में लोगों को न्यौता दे रहा होगा। अब आप भी बाजार का शुक्रिया अदाकर जन्नत घूमने जा सकते हैं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...