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Showing posts from January, 2015

तरक्की के मोर्चे पर चीन का मुकाबला

भारतीय शेयर बाजार इन दिनों उसैन बोल्ट से भी तेज रफ्तार से दौड़ रहा है।  इस तेजी के पीछे अगर कोई एक वजह सबसे बड़ी है तो वो ये है कि भारत चीन की  पीछे छोड़ने वाले है। चीन को लेकर सिर्फ भारत के ही लोगों का नहीं ,  दुनिया का कुछ ऐसे ही आकर्षण भाव है। इसीलिए जब आईएमएफ की ये रिपोर्ट आई  कि चीन की तरक्की की रफ्तार को भारत पीछे छोड़ने वाला है तो फिर दुनिया  भर में भारत में निवेश के लिए होड़ लग गई है। छिपाकर रखी रकम भी लोग  भारतीय शेयर बाजार में लगाने दौड़ पड़े हैं। लेकिन , आईएमएफ के इस ताजा  अनुमान को जरा सलीके से समझा जाए। आईएमएफ कह रहा है कि 2016 तक भारत की  तरक्की की रफ्तार चीन से ज्यादा हो जाएगी। इसे दूसरी तरह से समझें तो वो  ऐसे है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से तरक्की करने वाले देश अगले दो  सालों में बन जाएगा। 2016 में आईएमएफ भारत की तरक्की की रफ्तार 6.5%  देख रहा है। और साथ ही अनुमान लगा रहा है कि चीन की तरक्की की  रफ्तार घटकर 2016 तक 6.3 प्रतिशत ही रह जाएगी। ताजा आंकड़े बता रहे हैं  कि अभी चीन 7.4 प्रतिशत की रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और ये सरकार के  साढ़े सात प्रतिशत के अपने अनुमान

उस दिल्ली में मोदी इस दिल्ली में बेदी

भारतीय जनता पार्टी का ये फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। या सीधे कहें कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह और अरुण जेटली का फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। दिल्ली में हर ओर बीजेपी की ताजा-ताजा नेता से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन गईं किरन बेदी के पक्ष में माहौल बनने से पहले ही बिगड़ता दिख रहा है। टेलीविजन की स्क्रीन पर शुरुआत मनोज तिवारी के थानेदार नहीं नेता वाले बयान और हर्षवर्धन के देर से चाय पार्टी में पहुंचने से हुई। तो इसके बाद दिल्ली में आई भाजपा की सूची ने ऐसी ढेर सारी तस्वीरें टीवी न्यूज चैनलों को परोस दीं जिससे पक्का हो जाता है कि दिल्ली में नेता के तौर पर किरन बेदी को लाने का फैसला उतना बेहतर नीचे तक जाता नहीं दिख रहा। आखिर क्या जरूरत थी लगातार सफलता के ऊंचे मापदंड स्थापित करती जा रही मोदी-शाह की जोड़ी को चुनाव से ठीक पहले इस तरह का फैसला लेने की। और सबसे बड़ी बात ये कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से देश वित्त मंत्री के पद पर आसीन अरुण जेटली ने भी इस दांव को खेलने की जमीन पक्की करने में पूरी मेहनत की। किरन बेदी आईं और आकर भी अरविंद केजरीवाल की सीट से चुनाव लड़ने से बच गईं। अरव

पिताजी की बीमारी के बहाने

ये कठिन था। बेहद कठिन। पिता के किसी भी उम्र में हाथ छोड़ने की स्थिति की कल्पना भी असहज कर जाती है। इस बार जब इलाहाबाद जाना हुआ तो कुछ इसी स्थिति से मैं गुजरा। अच्छी बात ये रही कि पिताजी अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। दिमाग में खून की बूंदों के जमने का सफलतापूर्वक ऑपरेशन हो गया। लेकिन, इस बहाने से मैंने अपने जीवन की सबसे लंबी यात्रा कर ली। वो यात्रा गिनने को तो 200 किलोमीटर की ही थी। रास्ता भी बेहद जाना-पहचाना था। इलाहाबाद से लखनऊ का रास्ता। लेकिन, जब यात्रा एंबुलेंस से हो रही हो और एंबुलेंस में बीमारी की अवस्था में पिता हो तो रास्ते से पुरानी पहचान भी जरा सा भी ढांढस नहीं बंधा पाती। इलाहाबाद के अस्पताल से जब लखनऊ के लिए निकलना हुआ तो सिर्फ दो ठिकाने बताए गए। ये था लखनऊ का पीजीआई या फिर सहारा का अस्पताल। दिमाग में खून की बूंदें जमने के ऑपरेशन के लिए वैसे तो इलाहाबाद में भी कई अच्छ डॉक्टर हैं। लेकिन, मुश्किल वही कि उसके साथ लगी सुविधाओं की कमी साफ नजर आती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हर तरह से राजधानी लखनऊ के बाद सबसे बेहतर मौके वाला शहर है। वहां की ये स्थिति है। सवाल ये कि कोई भी