Tuesday, May 20, 2008

अब किसान कर्ज के बोझ से नहीं मरेंगे

किसान अब कर्ज के बोझ से आत्महत्या नहीं करेंगे। अब वो खेती के लिए पैसा न मिलने से आत्महत्या करेंगे। ये सुनने बहुत कड़वा लग रहा है। लेकिन, कड़वी सच्चाई यही है। आज के अखबारों में ये खबर है जो, कल से ही मुझे पता थी क्योंकि, मेरे चैनल पर ये स्टोरी चल रही थी। देश के सबसे बड़े बैंक (ये सरकारी बैंक है) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानी SBI ने सर्कुलर जारी करके अपनी शाखाओं को कहा है कि वो, किसानों को नए कर्ज न दें। सर्कुलर साफ कह रहा है कि सरकार ने किसानों के कर्ज माफ कर दिए हैं इसलिए नए कर्ज न दिए जाएं क्योंकि, वो वापस आने की उम्मीद नहीं है।

सूत्रों के मुताबिक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से लिए गए किसानों के कर्ज 7,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के हैं जो, वापस नहीं आने हैं। ये बैंक के कुल NPA यानी वापस न आने वाले कर्ज का 17 प्रतिशत है। लेकिन, मुझे समझ में नहीं आता कि कोई सरकारी बैंक क्या सरकार की बिना मर्जी के इस तरह से किसानों को कर्ज देना रोक सकता है। वो, भी ठीक मॉनसून के पहले। जब किसानों को कर्ज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। बुआई-खेती का ये अहम समय होता है। और अगर माननीय वित्त मंत्री चिदंबरम साहब बैंकों को किसानों की कर्जमाफी का पूरा पैसा दे रहे हैं तो, फिर बैंकों को तो, ऐसा पैसा मिल रहा है जो, वापस नहीं आने वाला था। यानी वो, NPA नहीं रह जाता। फिर, बैंक किसानों को कर्ज क्यों नहीं दे रहे हैं। इसका मतलब कि वित्तमंत्री के बजट भाषण, उसके बाद टीवी चैनलों और अखबारों में दिए गए बयान - कि बैंकों पर कर्जमाफी का कोई बोझ नहीं पड़ेगा उसकी भरपाई सरकार करेगी - में कुछ गड़बड़झाला है।

साफ है कि कांग्रेस चुनाव के ठीक पहले लोकलुभावन बजट पेश करके चार करोड़ किसानों का वोटबैंक पक्का करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कर्जमाफी का एलान कर तो दिया लेकिन, बैंकों को अब तक कर्जमाफी का पैसा बैंकों को नहीं मिला। अब सरकार की आंख इस बात पर क्यों नहीं खुल रही है कि अगर किसानों को मॉनसून के पहले खेती के लिए जरूरी पैसा नहीं मिला तो, वो कर्जमाफ होने के बाद भी बिना खेती के भूखों मर जाएंगे।

दरअसल, ये पूरी तरह से हावी होता बाजारवाद है जो, साफ कहता है कि कर्ज उसको दो जो, उस पर ढेर सारा ब्याज लगाकर उनको लौटाता रहे। ठीक सूदखोर महाजन की तरह उन्हें मूल की नहीं। उस पर आने वाले ब्याज की होती है। इसीलिए बैंक कर्ज भी या तो बहुत बड़े देना पसंद कर रहे हैं। या फिर ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत यावत जीवेत सुखम जीवेत के सिद्धांत वाले कमाऊ खर्चीले कुंवारों या फिर कमाऊ खर्चीले दंपति को ही कर्ज दे रही है।

इसीलिए देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक (देश में बैंकिंग की तसवीर बदलने वाला प्राइवेट बैंक ICICI बैंक ) ने भी चुपचाप स्मॉल टिकट लोन यानी छोटे कर्जे देना बंद कर दिया है। हां, चालाकी ये कि इसके लिए बैंक ने फिलहाल कोई सर्कुलर नहीं जारी किया है। लेकिन, लाख-पचास हजार रुपए का कर्ज अब नहीं दे रही है। इसके पीछे चिदंबरम की कर्जमाफी नहीं है। इसके पीछे है अदालतों का वो आदेश जो, आए दिन रिकवरी एजेंटों के जरिए बैंकों की होने वाली दादागिरी पर लगाम लगाने की बात कहता है। RBI ने भी साफ कहा है कि बैंक दादागिरी नहीं कर सकते। मुंबई के ICICI बैंक से पचास हजार रुपए का लोन लेने वाले प्रकाश सरवंकर को बैंक के रिकवरी एजेंटों ने धमकाया तो, सरवंकर ने आत्महत्या कर ली और मीडिया, अदालत के दबाव में बैंक को सरवंकर के परिवार को 16 लाख रुपए देना पड़ा। बस, अब बैंक छोटे कर्ज नहीं देना चाहता।

बैंकिंग एक्सपर्ट भी कहते हैं कि छोटे कर्ज वसूलना बैंकों के लिए मुश्किल भी होता है और खर्चीला भी। कभी-कभी तो, कर्ज वसूलने में बैंक का खर्च वसूले गए कर्ज से भी ज्यादा हो जाता है। इसी वजह से क्रेडिट कार्ड सबसे ज्यादा बिक रहे हैं। बैंक क्रेडिट कार्ड दिल खोलकर देते हैं। ऑफिसेज के बाहर बैंक के एग्जिक्यूटिव्स क्रेडिट कार्ड के फॉर्म का बंडल लेकर खड़े रहते हैं कि कोई ऑफिस का पट्टा लटकाए निकले और उसे एक कार्ड बेचकर अपना कमीशन पक्का और टार्गेट पूरा कर लें। इसी में एक जमात ऐसी भी पैदा हो गई है जो, क्रेडिट कार्डों के भरोसे जीना सीख गई है।

ये जमात पैसे की मोहताज नहीं है। इसे किसानों की तरह खेती के लिए या सरवंकर की तरह अपना परिवार चलाने के लिए कर्ज की जरूरत नहीं है। इसे मेट्रो में हर रोज खुल रहे मॉल्स के स्टोर्स से नया ब्रांड खरीदना है। गुची का चश्मा, मार्क एंड स्पेंसर के कपड़े, नाइके के जूते पहनने हैं। मल्टीप्लेक्स में पिक्चर देखनी है। और, ये जमात चालाक हो गई है। सरवंकर की आत्महत्या इनको हिम्मत दे गई है। ये बैंक के क्रेडिट कार्ड का कर्ज नहीं चुका रहे हैं। ये बैंक को सरवंकर की तरह आत्महत्या करने की धमकी दे रहे हैं। ये 4-4 क्रेडिट कार्ढ बनवाकर उस पर लिमिट भर का पैसा खर्च करके उसे तोड़कर फेंक रहे हैं। बैंक इनसे सलीके से बात करते हैं। क्योंकि, ये बिना जरूरत वाले कर्जधारी हैं। जरूरत वाले किसान और सरवंकर जैसे कर्जधारी बैंक के लिए NPA बन गए हैं। इसीलिए बैंक किसानों को और सरवंकर जैसे लोगों को कर्ज नहीं देंगे खामखां आत्महत्या करेंगे ये नामुराद और इज्जत जाएगी बैंक और सरकार की। क्रेडिट कार्ड लेने वाले आत्महत्या नहीं करते इसलिए इनके कर्ज अब भी बंट रहे हैं। आखिरकार चिदंबरम साहब की ग्रोथ स्टोरी बढ़ाने में ऐसे खर्च करने वाले कंज्यूमर भी तो शामिल हैं। अच्छा है अब सरवंकर और किसान कर्ज के बोझ से तो आत्महत्या नहीं ही कर पाएंगे। वाह रे चिदंबरम चमत्कार ..


मीडिया का दबाव
मीडिया में ये खबरें आने के दो दिन बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सभी अखबारों-टीवी चैनलों को रिलीज जारी करके सफाई दी कि उन्होंने ट्रैक्टर के लिए लोन न देने का सर्कुलर वापस ले लिया है। लेकिन, अभी भी ये साफ नहीं है कि खेती के लिए दूसरे कर्ज मिलेंगे या नहीं।

Monday, May 19, 2008

मुझे पता नहीं था कि कल जब मैं लिख रहा था तो, बंगाल में कई घर फूंके जा चुके थे

मुझे सपने में भी ये अंदाजा नहीं था कि जब कल मैं लोकसभा और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के पहले लोगों को आगाह कर रहा था। उस समय पश्चिम बंगाल में सबसे खूनी पंचायत चुनाव हो रहे थे। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों का तीसरा चरण था। और, पंचायती राज के जरिए सत्ता का हिस्सा लेने के लिए सीपीएम कैडर और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच हुई मुठभेड़ में 15 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। और, इतने ही लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। घायल होने वाले लोग 100 से भी ज्यादा हैं।

नंदीग्राम में SEZ के मसले पर हुए सीपीएम कैडर और पुलिस प्रायोजित हिंसा के बाद सरकारी आंकड़े के मुताबिक, 14 जानें ही गईं थीं। यानी पंचायत चुनावों का ये तीसरा चरण नंदीग्राम से भी ज्यादा खूनी रहा। मुर्सिदाबाद और बीरभूम में हुए इस खूनी पंचायत चुनाव की खबर ज्यादातर अखबारों में अंदर के पन्ने में दिख रही है। जबकि, हालात कितने बिगड़े रहे होंगे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सुबीर भद्र और आईजी सुरजीतकर पुरकायस्थ बम के हमले से बाल-बाल बचे हैं। ये इलाका पश्चिम बंगाल के पशुपालन मंत्री अनीसुर रहमान का है।

अब सीपीएम और कांग्रेस दोनों ही एक दूसरे को इस खूनी घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि सीपीएम कैडर ने पुलिस के साथ मिलकर उनके वोटर्स को घरों से निकलने ही नहीं दिया। सीपीएम नेता विमान बोस कह रहे हैं कि सब कांग्रेस ने कराया है। बोस बता रहे हैं 8 सीपीएम कैडर जान गंवा चुके हैं। कांग्रेस अपने 6 कार्यकर्ताओं की जान जाने का हल्ला मचा रही है।
और अभी तो ये शुरुआत है- पंचायत चुनाव हैं। आगे तो, कई विधानसभा और 2009 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। ये नेता वोट बटोरने के लिए पता नहीं कितने घर फूंकेंगे। कितने घरों के चिराग बुझाएंगे।

Sunday, May 18, 2008

बचिए नेता आपका घर फूंककर वोट बटोरने की तैयारी में हैं

अब चुनाव में सिर्फ एक साल बचे रह गए हैं। मई 2009 में अगले लोकसभा चुनाव होने हैं। हर पार्टी इलेक्शन मोड में आ गई है। यानी जनता के लिए सावधान हो जाने का समय है ये। सवाल ये उठ सकता है कि चुनाव तो, लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है फिर, इस पर जनता को सावधान होने की क्या जरूरत है? लेकिन, मैं तो, कह रहा हूं सिर्फ सावधान मत रहिए अपना घर बचाइए। कभी भी आपके घर में आग लग सकती है। नेता तैयार हैं जिन्हें वोट मिलते रहे हैं वो, वोट बचाए रखने और बढ़ाने के लिए, जिन्हें वोट अब तक नहीं मिले वो, वोट बनाने-बटोरने के लिए पूरी तरह से चाक-चौबंद हो चुके हैं।

हाल के कुछ राजनीतिक बयान-घटनाक्रम ध्यान से देखिए- सब समझ में आ जाएगा
मायावती ने कुछ दिन पहले कहा- राहुल गांधी यूपी में आकर दलितों के घर रुकने का दिखावा करता है फिर, दिल्ली में स्पेशल साबुन से नहाता है

आज के अखबार में फिर खबर है- अमेठी में राहुल गांधी एक दलित के घर रुके और वहीं बैठकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की समीक्षा की


भद्रजनों के प्रदेश बंगाल में एक सांसद फोन पर सीआरपीएफ के डीआईजी को चीख-चीखकर आदेश देता है। इलाका छोड़ दो या फिर अपने कैंप से बाहर मत निकलो। बावजूद इसके कि सीआरपीएफ डीआईजी आलोक राज बताते हैं कि सारी बातचीत मोबाइल पर रिकॉर्ड हो रही है। सीपीएम सांसद लक्ष्मण शेठ इसे जनता के लिए की जा रही उनकी ड्यूटी बता रहे हैं।

हम आपको ये भी बता दें कि नंदीग्राम में सीपीएम कैडर के नरसंहार के बाद डीआईजी आलोक राज को उस इलाके में कानून व्यवस्था संभालने के लिए सीआरपीएफ की टुकड़ी के साथ भेजा गया है। वहां हो रहे पंचायत चुनाव कितने निष्पक्ष हुए होंगे इसका अंदाजा लगाने के लिए सिर्फ यही एक घटना काफी है कि आलोक राज के ऊपर दो महिलाओं ने गलत व्यवहार करने का भी आरोप लगाया है।

बिहार से लालू प्रसाद यादव कह रहे हैं वो, राज ठाकरे की चुनौती स्वीकार कर रहे हैं और मुंबई के जुहू पर छठ मनाने आएंगे। पिछले दो महीने से राज ठाकरे के कृत्यों को चुपचाप समर्थन दे रहे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख भी जाग गए हैं। कह रहे हैं लालूजी के साथ छठ पूजा में वो भी शामिल होंगे।

राज ठाकरे की मुंबई से बाहरी भगाओ मुहिम अब कोंकण केंद्रित हो गई है। वो, अपील कर रहे हैं कोकण- रायगड़, रत्नागिरि, सिंधुदुर्ग के इलाके- में बाहरी लोगों को आप लोग कोई जमीन मत बेचिए।

पहले राज मुंबई में बिल्डरों से मराठियों के लिए सस्ते घर और मॉल-रिटेल स्टोर्स में मराठियों के लिए आरक्षण मांग चुके हैं। राज का कारोबार बिल्डिंग बनाने और म़ल बनाने का है। अब तक कोई भी सिर्फ मराठियों के लिए आरक्षित मॉल राज नहीं बना पाए हैं।

शिवसेना वड़ा पाव एसोसिएशन बना रही है। शिव वड़ा बिकेगा। शिवसेना वड़ा पाव को भी मराठी अस्मिता से जोड़ने की तैयारी में है।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री आर आर पाटिल कह रहे हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज का इससे बड़ा अपमान हो ही नहीं सकता। पाटिल थोड़ा और आगे बढ़ जाते हैं—ये शिव वड़ा के साथ शंभाजी भाजी भी बेचेंगे। अच्छा हुआ पाटिल मराठी हैं नहीं तो, दो मराठी अस्मिता के प्रतीक महापुरुषों के इस अपमान पर जाने क्या हो गया होता।

ये खबरें देखने में इन नेताओं का स्वभाव लगती हैं। लेकिन, जरा सोचकर देखिए चुनाव नजदीक आने पर ऐसे सुर तेज क्यों हो जाते हैं।

नहाती तो किसी अच्छे साबुन से ही मायावती भी होंगी। लेकिन, शायद थोड़ा पक्के रंग वाले दलितों को कुछ-कुछ अपने रंग वाली मायावती की ही बात सही लगेगी। लेकिन, इसी में कुछ दलित परिवारों – जिनके बच्चों को राहुल ने गोद में उठाया होगा, जिनके बुजुर्गों से राहुल ने आशीर्वाद ले लिया होगा, जिनके साथ बैठकर खाना खाया होगा- को राहुल की बात समझ में आ रही होगी। राहुल घर का बच्चा लगने लगा होगा। बस राहुल गांधी और मायावती दोनों का काम पूरा हो गया। यूपी में दलितों की बस्ती में चुनाव से पहले कांग्रेस और बसपा के झंडे लगाने को लेकर कट्टा-बम-लाठी चलने की भूमिका तैयारी हो चुकी है।

नंदीग्राम में जिस महिला ने डीआईजी पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है वो, पहले ही सीपीएम समर्पित होंगे। अब डीआईजी के खिलाफ केस लड़ने के लिए पूरी तरह से कैडर बन जाएंगे। ममता को भी लोग मिल चुके हैं, लेफ्ट कैडर तो, है ही। बस लोकसभा चुनाव का इंतजार है।

लालू बिहार से मुंबई आएंगे, देशमुख उनके साथ छठपूजा करेंगे। क्यों?

साफ है लालू लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में कांग्रेस के लिए प्रचार करेंगे शिवसेना-राजठाकरे के खिलाफ भैया लोगों को कांग्रेस के पक्ष में वोट देने के लिए तैयार करेंगे।

राज ठाकरे खुद मॉल-बिल्डिंग बनाएंगे तो, मराठियों को छोड़िए, भैया लोगों और गुजरातियों में से भी उसी को जगह देंगे जो, ज्यादा माल देगा। मराठी अस्मिता बचाने के राज के आंदोलन में पहले ही कई मराठी परिवार बरबाद हो चुके हैं।

आर आर पाटिल खुद गृहमंत्री हैं लेकिन, भड़काऊ भाषण करने वाले-बयान देने वालों के खिलाफ खुद भड़काने में लग गए हैं। क्योंकि, लोकसभा के साथ ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव भी होने हैं। लोग भड़केंगे नहीं तो, उन्हें अगले 5 सालों के लिए लोगों के भड़काऊ बयानों पर नजर रखने का अधिकार कैसे मिलेगा। वो, उपमुख्यमंत्री कैसे बनेंगे।

ये वो वर्ग है जिसे किसी भी राजनीतिक दल के सत्ता में आने से सबसे कम मिलता है। लेकिन, यही वर्ग चुनाव से पहले नेताओं की लगाई आग को जलाने के लिए कोयले, पेट्रोल का काम करता है। तो, भइया चेत जाओ क्योंकि, नेताओं की लगाई हुई जिस आग का तुम साधन बन रहे हो वो, आग तुम्हारा ही घर फूंकने वाली है।

Friday, May 09, 2008

लीजिए एक और हिंदी ब्लॉगर

मेरे मित्र है रंजय। हम लोग साथ-साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़े हैं। पढ़ने में बहुत अच्छे हैं। मुझसे तो बहुत ही अच्छे हैं। लेकिन, दुर्भाग्यवश प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो सके। और, मुझे लगता है कि अब वो उससे बेहतर ही काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के समय इन लोगों ने विजन सिक्स नाम से पॉलीटिकल कंसल्टेंसी शुरू की। और, इलाहाबाद की शहर दक्षिणी विधानसभा से भाजपा के दिग्गज प्रत्याशी केशरी नाथ त्रिपाठी के खिलाफ नंद गोपाल गुप्ता नंदी के चुनावी मैनेजमेंट का जिम्मा संभाला। नंदी अब चुनाव जीतकर मंत्री भी बन चुके हैं।

अब ये लोग विजन सिक्स के ही नाम से एक नई राजनीतिक पत्रिका भी शुरू कर रहे हैं। मेरे साथ ब्लॉगिंग में भी आ गए हैं। अभी बस शुरूआत की है। इनके ब्लॉग सरकारआपकी पर एक नजर डालिए और हिम्मत दीजिए।

समीरजी, ने एक नई शुरुआत की है। टिप्पणियों के साथ ये संदेश भी छोड़ रहे हैं। आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा किसी नये व्यक्ति से भी शुरु करवायें और हिन्दी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें.

शुभकामनाऐं.

-समीर लाल
(उड़न तश्तरी)

वैसे मैंने पहले भी कई लोगों को हिंदी ब्लॉगिंग से जोड़ा। अब समीर भाई हिंदी ब्लॉगिंग के हवाले एक और ब्लॉगर। और, मैथिलीजी से अनुरोध इन्हें भी ब्लॉगवाणी में जोड़ दें। दूसरे एग्रीगेटर भी अगर इसे खुद ही जोड़ें तो, बेहतर।

Tuesday, May 06, 2008

टिप्पणियों ने 2 पोस्ट को 7 पोस्ट बना दिया

कई बार ब्लॉगरों में ये चर्चा होती है कि हम स्वांत: सुखाय के लिए लिखते हैं। कुछ लोग कहते रहे हैं कि हमें टिप्पणियों से भी खास लेना-देना नहीं हैं। लेकिन, मेरा मानना है कि टिप्पणी एक नई ऊर्जा देती हैं जो, ब्लॉगर को आगे लिखने में मदद करता है। मैं अभी छुट्टियों में इलाहाबाद अपने घर गया था। वहां से गांव भी गया और एक मित्र की शादी में जौनपुर भी। लौटकर सोचा कि एक पोस्ट लिख मारूंगा। फिर पोस्ट लंबी होने की वजह से इसे दो कड़ियों में लिखने की सोचा। लेकिन, पहली पोस्ट पर मिली टिप्पणियां और मेरे लेख के साथ लोगों के जुड़ाव ने मुझे दूसरी, .... सातवीं कड़ी तक लिखने को प्रेरित कर दिया। अब टिप्पणियां कितनी महत्वपूर्ण हैं इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है। टिप्पणियां भी बहुत अच्छी आई हैं लेकिन, समय के अभाव के चलते टिप्पणियों और टिप्पणी करने वालों के अलग-अलग देने के बजाए मैं फिर से सातों पोस्ट के लिंक दे रहा हूं। सभी का आभार जिन्होंने मुझे ये सीरीज लिखने को प्रेरित किया।


ज्ञानदत्तजी, समीर भाई, दिनेशराय द्विवेदीजी, लावण्याजी, रवींद्र प्रभात, ममताजी, संजय शर्मा, अनिल रघुराज, सिद्धार्थजी, विमलजी, प्रमोद सिंहजी, सौरभ, अविनाश वाचस्पति, डॉ. चंद्र कुमार जैन, चंद्रभूषणजी, अभय तिवारी, नीरज गोस्वामी, रंजय, आशा जोगेलकरजी, भुवन भास्कर, अभिषेक ओझा, डॉ. अनुराग आर्या, कुश एक खूबसूरत ख्याल, चौराहा की टिप्पणियों ने मझे ये लिखने का संबल दिया।


कहीं कुछ बदल तो रहा है लेकिन, अजीब सा ठहराव आ गया है

बाजार से बदलता गांव में प्यार और दुराव का समीकरण

सरकती जींस के नीचे दिखता जॉकी का ब्रांड और गांव में आधुनिकता

टीटी-जेई सब मेरे गांव में ही रहते हैं कहीं नहीं जाते

गांवों में सूखती-सिकुड़ती जमीन का जिम्मेदार हम-आप

लखनऊ की सत्ता से गांवों में बदलती सामाजिक-आर्थिक हैसियत

यूपी रोडवेज से सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

Monday, May 05, 2008

यूपी रोडवेज का सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

(इस बार की छुट्टियों में मैं इलाहाबाद गया तो, एक मित्र की शादी में जौनपुर भी जाना हुआ। बस का सफर एक दशक पहले जैसा ही था तो, जौनपुर जैसे छोटे-ठहरे हुए शहर में मुझे कई छोटे-छोटे (सुखद) बदलाव देखने को मिले। उस दौरान के अनुभव का चित्र यहां शब्दों से खींचने की कोशिश कर रहा हूं।)

काफी लंबे समय बाद मैंने इस बार उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की सेवा का आनंद लिया। मुझे याद नहीं है कि इसके पहले मैंने सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल इलाहाबाद में कब किया था। क्योंकि, ज्यादातर मोटरसाइकिल या ज्यादा दूर जाना हुआ तो, गाड़ी से ही निकल जाते थे। लेकिन, घरेलू मित्र की शादी में मुझे एक दिन पहले ही जौनपुर जाना था और घर से सभी लोग जाने के लिए तैयार थे इसलिए दोनों गाड़ी छेड़कर मुझे सुबह की बस पकड़नी पड़ी।

मेरे मित्र मनीष ने कहाकि सुबह सात बजे पवन गोल्ड आती है उसी से आना। वो, नॉन स्टॉप है यानी इलाहाबाद से सीधे जौनपुर पहुंचाएगी- करीब तीन घंटे में। लेकिन, मेरे भाग में तो यूपी रोडवेज का असली मजा बदा था। 7 बजे वाली पवन गोल्ड छूट गई और मैं 2-3 बस छोड़ने के बाद आखिरकार एक सीट पाकर उस पर बैठ गया। बस असली मजा तभी शुरू हुआ।

एक 20-22 साल का लड़का अपनी शर्ट एक तीन लोगों के बैठने वाली सीट पर और दूसरी पर अपने बैग रखकर (छेंककर) अपने परिवार वालों को बैठाने लगा। इसी बीच धीरे से एक महिला ने उसका बैग उतारा और बैठ गई। खाली बनियान में पसीने से तरबतर लड़का तैश में आ गया। लेकिन, क्या संस्कार थे, आप खुद ही देखिए। आंटी आप नीचे उतरो इस सीट पर मेरे घर वाले बैठेंगे, कई लेडीज हैं। बताइए इतनी मुश्किल से चार बस छोड़ने के बाद तो ये जगह मिली है। आंटी भी तैश में आ गई। तो तू ही बता मैं कैसे जाऊं। तुम्हारा परिवार जाएगा तो, मैं भी तो लेडीज हूं। मैं तो, इसी सीट पर जाऊंगी। अब तक लड़के का ताव थोड़ा ठंडा पड़ चुका था क्योंकि, दूसरी सवारियों ने भी आंटी की बात में हां में हां मिलानी शुरू कर दी थीं। खैर, आधे घंटे तक सीट पर, बीच की गैलरी में और ड्राइवर के बगल की सारी जगह भरने के बाद ही बस चली।

अचानक एक साहब उछलकर किनारे खिड़की के पास जगह बनाकर बैठ गए। किसी ने पीछे से जुमला उछाला- बंबई से कमाके आए हैं का। नहीं, दिल्ली से आ रहे हैं। फिर दूसरे सज्जन ने इस बार मोरचा संभाला। तभी तो बड़ी चमक औ ऊर्जा दिख रही है। परदेस की कमाई है ना। तब तक एक नेताजी टाइन सज्जन ने कहा- थोड़ा सरकिए। भाई साहब ने आनाकानी दिखाई तो, नेताजी बोल पड़े यही समस्या है। बंबई के लोकल में कूकुर-बिलार (कुत्ते-बिल्ली) के तरह भरके रोज चलथी। लेकिन, घरे लौटिहैं तो, तनिकौ सीट देए म नानी मरि जाथ। इही से राज ठाकरेवा मारथ लातै लात तो दिमाग ठिकाने रहथ। इतना सुनने के बाद कमाकर घर लौटे भाईसाहब सीट पर थोड़ी जगह छोड़ चुके थे।

बस हर स्टॉपेज पर रुक रही थी। हाल ये था कि बाजार के अलावा भी रास्ते में कोई हाथ दे देता और बस रुक जाती। 100 किलोमीटर का सफर 3 घंटे के बजाए करीब चार घंटे में तय हुआ। अब तौ खैर इलाहाबाद से जौनपुर का रास्ता काफी बन गया है लेकिन, विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान मेरे जौनपुर के मित्र इसे कॉम्बीफ्लेम वाला रास्ता बताते थे। यानी इस रास्ते पर सफर के बाद कॉम्बीफ्लेम (दर्द की दवा) लेना जरूरी हो जाता था। खैर, मैं जौनपुर पहुंचा तो, बस अड्डे से रिक्शा लिया। और, दीवानी कचहरी के लिए चल दिया। रास्ते में एक जगह जाम दिखा तो, रिक्शे वाले ने कहा- किसी साहब की गाड़ी खड़ी है। भइया इहै है अगर कौनो साधारण आदमी होत तो, अब तक ओका पुलिसवाले उठाए के बंद कइ देहे होतेन। लेकिन, अब लाल बत्ती क गाड़ी तो, कहूं खड़ी कइद्या के रोकथ।

खैर, जाम की वजह सिर्फ बेतरतीब खड़ी लाल बत्ती की गाड़ी नहीं थी। दरअसल हम स्टेट बैंक के सामने से गुजर रहे थे और ब्रांच के बगल में ही स्टेट बैंक का एटीएम भी था। एटीएम से पैसा निकालने वालों की लाइन सड़क पर काफी दूर तक लगी थी। और, ट्रैफिक में बाधा बन रही थी। जौनपुर शहर में एटीएम की ये लाइन देखकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा था।


जौनपुर में भी दूसरे दिन सुबह मैं दाढ़ी बनवाने गया तो, नजदीक में ही एक लाइन से दो एसी सलून थे। वहां भी लाइन लगी थी। आधे घंटे-पैंतालीस मिनट की वेटिंग थी। वो तो, मित्र हमारे नेताजी थे इसलिए लाइन टूटी और दो कुर्सियां काली होते ही हम लोग उस पर आसीन हो गए। शहनाज की मसाज और ढेर सारे महानगरीय सौंदर्य प्रसाधन उसने बिना कहे ही दाढ़ी बनाने के बाद इस्तेमाल कर दिए।

ये वो जौनपुर है जहां, पता नहीं कितने सालों से कोई नई बाजार नहीं बनी है। कमाई का नया साधन नहीं बना है। अभी भी जाति की अहं सबसे ज्यादा मायने रखता है। ज्यादातर लड़के या तो बेरोजगार हैं या ठेका-पट्टा और राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ सक्रिय होकर खुद को व्यस्त रखे हैं। ऐसे जौनपुर में एटीएम के लिए लगी लंबी लाइन और एसी सलून में 12 रुपए में दाढ़ी बनवाने के बजाए 70 रुपए में मसाज किया चमकता चेहरा लेकर निकलने वाले लोग ही शायद कुछ बदलाव की राह तैयार कर पाएंगे। मुझे लगता है कि यहां परंपरागत भारत का बचत का नहीं नए इंडिया का खर्च वाला फॉर्मूला बदलाव का रास्ता तैयार करेगा।

Saturday, May 03, 2008

लखनऊ की सत्ता से गांवों में बदलती सामाजिक-आर्थिक हैसियत

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव की इस छठवीं कड़ी में आज कोशिश इस बात को समझने-समझाने की कि आखिर, राजनीतिक पार्टी की सत्ता बदलने से कैसे गांवों में समीकरण बदल जाते हैं। कैसे इज्जत से कोई फूल जाता है और कैसे कोई बाजार में मूछें ऐंठने वाला दुम दबाकर अपने घर में बैठा सरकार के बदलने का इंतजार करता है।)

गांव जब गया तो, हमारे गांव की बाजार में मेडिकल स्टोर चलाने वाले बबलू तिवारी के घर का न्यौता भी करने का इरादा बन गया। बबलू की बहन की शादी थी। लेकिन, चूंकि हम लोगों को शाम को इलाहाबाद भी लौटना था। इसलिए दोपहर में ही जाकर न्यौता देकर लौट आने पर हम लोगों में सहमति बनी। भयानक गरमी में हम लोग अपने गांव से करीब दस किलोमीटर दूर चकवड़ गांव के लिए निकले।

बाघराय बाजार से नहर के बगल-बगल गांव के लिए थोड़ा शॉर्टकट रास्ता जाता है। नहर के दोनों तरफ बबूल के पेड़ लगे थे। मैं ही गाड़ी चला रहा था। बड़ी होने की वजह से टाटा सफारी को बबूल के कांटों से बचाकर चलना थोड़ा सा दुष्कर भी लग रहा था। तभी उस चटकती धूप में गमछा बांधे यामहा मोटरसाइकिल पर आ रहे दो लोगों में से पीछे वाले ने अपनी दुनाली बंदूक हवा में लहराकर गाड़ी किनारे करने का इशारा किया। खैर, न इतनी जगह ही थी नहर की पटरी पर और न ही बंदूक लहराने का अंदाज मुझे डरा पाया कि मैं गाड़ी किनारे करता। उनके मुंह से कुछ अपशब्दों के निकलने का अंदाजा लगा तो, मैंने गाड़ी धीमी कर ली (आखिर, मेरी भी तो पैदाइश प्रतापगढ़ की थी। मैं भला उनके बंदूक के रुतबे में कैसे आ जाता।) लेकिन, वो लोग रुके नहीं। शायद उनको भी लगा होगा कि सफारी में जा रहे हैं तो, कुछ अड़बंग लोग ही होंगे।


खैर, बंदूक के रुतबे से बचते-बचाते हम चकवड़ गांव के मोड़ पहुंचे तो, अंबेडकर ग्राम का चमकता बोर्ड और गांव तक चमकती पक्की सड़क थी। हम सीधे पहुंच गए। हमारे लिए पानी पीने के लिए बढ़िया पेठा आया। तब तक बबलू बाहर निकल आए थे और उन्होंने डांटकर कहा- बरातियन बिना जउन मिठइया आइबा, ओका लावा न यार। अरे, मैनेजर साहब (मेरे पिताजी) इलाहाबाद से इही तक चला आय अहैं। बबलू का छोटा भाई बिना चप्पल पहने ही मोटरसाइकिल लिए कराह और दूसरे जरूरी सामान टेंट में रखवा रहा था। पिताजी का पैर छूने के बाद बबलू ने सीना चौड़ा करके बताया (आखिर छोटे भाई की नौकरी जो, लगवा दी थी)- चाचा महेशौ क जिंदगी बनि ग अब। डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव म मैनेजर पर होई ग बा। हमहूं सोचे रहे कि स्वामी प्रसाद के साथे लाग अही तो, छोट काम न कहब। इहै सोचे रहे होई गवा चाचा आप सबेक आशीर्वाद आ। शुरू म रामपुर जाइ क परी लेकिन, मंत्रीजी कहे अहैं कि जल्दिन इलाहाबाद या प्रतापगढ़ बोलवाए लेब।

दरअसल, ये मंत्रीजी हैं बहनजी की सरकार के बेहद ताकतवर मंत्री और निष्ठावान बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य। यही वजह थी कि ब्राह्मण बहुल गांव होने के बाद भी ये गांव अंबेडकर गांव की श्रेणी में शामिल हो गया था। चूंकि इसी गांव में स्वामी प्रसाद मौर्य का भी घर था। और, सबसे बड़ी बात ये कि स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही लखनऊ में बहुत रुतबे वाले हों। अपने गांव के आसपास वो बहुत शांति से रहते हैं, अंग्रेजी में लो प्रोफाइल। उसकी वजह भी साफ है- इसके पहले तक राजा (कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह) की हनक के आगे बेइज्जत होने से बचना चाहते थे। अब बहनजी की सत्ता आने के बाद राजा ठउरुक (शांत) होई ग अहैं। रघुराज प्रताप सिंह यूथ ब्रिगेड के बोर्ड तो पहले ही बाजारों से गायब हो गए थे अब, यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ता (रघुराज प्रताप सिंह के नाम पर प्रतापगढ़ की छोटी बाजारों में लफंगई करने वाले बेरोजगार लड़के) भी नहीं दिखते। अब इस इलाके में प्रमोद की टाटा सफारी पहचानी जाती है। राजा जैसा डर तो नहीं है लेकिन, रुतबा जबरदस्त है। बाभन तो, राज्य भर में बहनजी की सलामी बजा ही रहे हैं। यहां ठाकुर भी स्वामी मौर्य और उनके भतीजे प्रमोद के आगे सलामी बजाते हैं।

समाज बदल रहा है। अगड़े वर्ग के अगुवा बाभन की रोजी-रोटी (नौकरी) का जुगाड़ दलित (मायावती सरकार के मंत्री) की सिफारिश पर हो रहा है। अब बताइए, दलित उत्थान हो रहा है ना। वैसे, कुछ लोग दबी जुबान से ये भी कह रहे हैं कि प्रमोद बहुत बौराइ ग अहैं, ढेर उधरइहैं तो, मराइउ जइहैं। सरकार तो, आवत जात रह थे। खैर, अभी तो मायावती की ही सत्ता है और, बसपा के हाथी लगे नीले झंडे लगी गाड़ियों से उतरने वाले को सलाम-नमस्ते करने वाले ही बाजारों में ज्यादा दिख रहे हैं।

लखनऊ की सत्ता बदलते ही अचानक सबकुछ बदल जाता है। एसपी, डीएम के तबादले सुर्खियों में आते हैं। इससे बड़े लोगों को फरक पड़ता है। लेकिन, गांव में असली फरक पड़ता है ऐसे तबादलों से जिनके बारे में तो मीडिया खबर भी नहीं बनाता। लोक निर्माण विभाग(PWD), ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग(RES), फैक्सपेड, जल निगम, सिंचाई विभाग—के इंजीनियर, प्रोजेक्ट इंजीनियर के चार्ज तेजी में बदल जाते हैं। सपा की सरकार में एक साथ 5 करोड़ रुपए का काम करवा रहा ठेकेदार पैदल हो चुका है (मैं जानबूझकर नाम नहीं लिख रहा हूं), बसपा के निष्ठावान कार्यकर्ता ठेकेदार बन गए हैं (ये सतत प्रक्रिया है, यूपी में हर सरकार बदलने पर चुपचाप सबसे तेज धंधा यही होता है)।

आधी गिरी गिट्टी, डामर कोई दूसरा आकर कब्जा लेता है, काम शुरू करा देता है। पुरानी सरकार के लोगों के पेमेंट रुक गए हैं और नई सरकार के ठेकेदार सिर्फ गिट्टी गिराकर एडवांस पेमेंट पा जा रहे हैं। ये सामाजिक संतुलन है जो, एक सरकार बदलने और दूसरी सरकार बनने से बदल जाता है। यही आगे का मुनाफा पोलिंग बूथ पर अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं को अपने नेताजी के लिए गोली-बम चलाने, मतपत्र फाड़ने को उकसाता है। उत्तर प्रदेश में राजनीति का ये धंधा पूरी तरह से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलता है। और, जिस प्राइवेट लिमिटेज कंपनी (पार्टी) से जो, जुड़ा है, उसका फायदा पक्का। बहन-बेटी की शादी में दरवाजे पर सत्ताधारी पार्टी के नेता के आने भर से गांव में मेजबान की काफी दिन तक हवा-पानी बनी रहती है।

सपा नेताओं के गांव तक स्वीकृत पक्की सड़क अब बसपा नेता के गांव तक जा रही है। कांग्रेस-भाजपा के छुटभैये नेता कह रहे हैं कि भई सरकार तो, बहनजी की ही अच्छी है और किसी बसपाई से सटकर अपना छोटा-मोटा काम निकाल ले रहे हैं। कुर्ता-पाजामा तो, सफेद ही रहता है किसी पार्टी की ड्रेस तो, है नहीं, बस थोड़ी जुबान सरका देनी है बहनजी के पक्ष मे। जुबान सरक रही है, ठेका चल रहा है। नीला झंडा लहरा रहा है। दलित उत्थान हो रहा है। और, कुछ लोग अगले चार सालों के लिए राजनीति से तौबा कर चुके हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि यूपी के गांवों में तो लोकसभा चुनावों में नीला झंडा ही लहराएगा। 5 साल बाद यूपी के गांव में मुझे सामाजिक संतुलन कुछ इसी तरह दिखा।

अगली कड़ी में
यूपी रोडवेज से सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

Thursday, May 01, 2008

गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन का जिम्मेदार कौन


(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये पांचवी कड़ी। इस कड़ी में गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन और इसकी वजहों की चर्चा। अच्छी बात ये कि बरबादी के बाद थोड़ी उम्मीद की रोशनी भी दिख रही है।)


गांवों से लोग शहरों की तरफ बेतहाशा भाग रहे हैं फिर भी जमीन सिकुड़ती जा रही है। जमीन सिकुड़ती जा रही है यानी जोत का आकार छोटा होता जा रहा है। और, उस पर भी काम करने वाले लोग नहीं मिल रहे हैं। मेरे गांव के आसपास काफी उपजाऊ जमीन है। लेकिन, प्रतापगढ़ के ज्यादा इलाकों में ऊसर (बंजर) जमीन ज्यादा है। और, जिस तरह से जमीन के नीचे का जलस्तर तेजी से और नीचे जा रहा है। वो, भयावह स्थिति बना रहा है।

जलस्तर लगातार घटने के लिए ज्यादातर गांव के लोग ही जिम्मेदार हैं। पानी घटा तो, शहरों से जाकर गावों में जल संरक्षण की बात हो रही है, आंदोलन चल रहे हैं। एनजीओ संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। जब पानी ही पानी था तो, जल का अपमान किस तरह हुआ इसका बेहतरीन उदाहरण मैंने देखा है। शायद ये हर किसी को अपने गांव की कहानी लगे। मेरे गांव में तीन कुएं थे। और, गांव के अगल-बगल तीन तालाब थे। एक मेरे घर के सामने की चकरोड के पार और दो गांव के पिछले हिस्से में। तीन कुओं में से एक मेरे दरवाजे पर ही था। लेकिन, पता नहीं कौन से बंटवारे के लिहाज से पूरी जमीन तो हमारी थी लेकिन, हमरे दुआरे का कुआं सुकुलजी क रहा। औ, सुकुलजी का घर हमारे घर के पीछे है। अब सुकुलजी न तो उस कुएं से कभी पानी भरने आते थे और कुआं कच्चा होने की वजह से न तो हम लोग ही उस कुएं का इस्तेमाल करते।

पता नहीं क्या वजह थी मैंने एकाध बार पिताजी से पूछा- ये कुआं हम्हीं लोग क्यों नहीं बनवा लेते। पता चला सुकुलजी को ऐतराज है। खैर, कच्चा कुआं धीरे-धीरे भंठ गया (कुआं रह ही नहीं गया)। बचा-खुचा कुआं, कुएं के आगे की हमारी बैठकी की मिट्टी से पट गया। हमारा घर पहले ही पक्का था। मिट्टी-गारे से बनी दोनों बैठकी भी धीरे-धीरे करके खत्म हो गई। दूसरी बैठकी की ही जगह पर दादा ने नया पक्का घर बनवाया है। अच्छे कमरे बने हैं। शहरातू लैट्रिन भी बन गई है। हैंडपंप घर के अंदर लग गया है (पहले हैंडपंप बाहर था। कोई बी प्यासा राहगीर दो हाथ चलाकर अपनी प्यास बुझा लेता था)। टुल्लू लगा है जो, लाइट रहने पर टंकी भर देता है और लैट्रिन का दरवाजा बंद करने पर नल से गिरता पानी शहर में होने का अहसास दिलाता है। पहले सुबह जल्दी उठकर खेत में दिशा-मैदान जाना शहर वालों को अचरज में डालता था। अब गांव वाले भी दिशा-मैदान नहीं जाते। लैट्रिन जाते हैं। दिशा-मैदान अब तो पता नहीं कितने लोग ही समझते होंगे।

कच्ची बैठकी-कुएं क साथ दुआरे प खड़ा महुआ औ मदीना क पेडौ समय क भेंट चढ़ि ग। महुआ सूखि ग तो, दूसर लगावा नाहीं ग। औ, पिताजी-दादाजी म बंटवारा के बाद मदीना क पेड़ कटवाए दीन ग। दूसरी कच्ची बैठकी में सिर्फ दो बहुत लंबे-लंबे कमरे ( कमरे क्या बड़े से एरिया को चारों तरफ से घेरकर बीच में एक और मिट्टी की दीवार बनाई गई थी) थे। कच्ची मिट्टी के कमरे खपरैल की छत। कुल मिलाकर इस बैठकी में एक साथ 50 से कुछ ज्यादा ही चारपाई बिछ जाती थी। और, ये ज्यादातर गांव की बारात का जनवासा बन जाती थी। अब तो एक दूसरे से इतने मधुर संबंध भी नहीं रहे कि अपनी बारात रुकवाने के लिए कोई किसी दूसरे की बैठकी मांगे। अब तो, गांव में भी बरात टेंट कनात में रुक रही है।

गरमी कितनी भी हो, कच्ची बैठकी में एयरकंडीशनर जैसी ठंडक का अहसास मिलता था। और, दो महीने की गरमी की छुट्टियों में खेलकूद से फुरसत मिलने पर इसी कच्ची बैठकी में गजब की नींद आती थी। लेकिन, धीरे-धीरे गरमी की छुट्टियों में सबका जाना कम हुआ। मिट्टी-गारा की दीवार और खपरैल की छत का रखरखाव महंगा (झंझटी) लगने लगा। क्योंकि, हर साल गोबर और पिड़ोर (नदी से निकली मिट्टी) से दीवारों की पुताई करनी पड़ती थी। जिससे दीवार कमजोर न पड़े और बाहर के तापमान को संतुलित किए रहे। खपरैल भी हर दूसरी बारिश के पहले फिर से बदलवानी पड़ती थी। लेकिन, खपरा छावै वाले औ मिट्टी-गारा क देवाल बनवै वाले कम होत गएन (ज्यादातर पंजाब से लैके महाराष्ट्र तक टैक्सी, रिक्शा चलाने, फैक्ट्री में काम करने चले गए)।

घर के सामने चकरोड के पार वाले तलाव म बेसरमा क फूल (पता नहीं कितने लोग अब बेशरमा क गोदा औ ओकर फूल देके होइहैं) इतना बढ़िया खिलत रहा कि मन खुश होए जाए। 1991 में मेरी छोटी दीदी की शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग में ये तालाब ऐसे दिख रहा था जो, किसी फिल्म में खूबूसरत लोकेशन पर हीरो-हीरोइन के गाने के लिए तैयार की जाती है। इस खूबसूरत का अहसास भी हमें अच्छे से रिकॉर्डिंग का कैसेट टीवी पर देखते ही हुआ। यही तालाब था जिसकी वजह से पांडेजी लोगों के हिस्से (पड़ान) में जाने के लिए थोड़ा घूमकर जाना पड़ता था। लेकिन, इस बार मैं गया तो, चकरोड ने तालाब का कुछ और हिस्सा लील लिया था। और बचा हिस्सा जिनके सामने तलाव रहा उनकर दुआर बनि ग।

गांव के बीच के दोनों कुएं बचे तो हैं लेकिन, उनका इस्तेमाल अब ना के बराबर होता है। रस्सी में बाल्टी बांधकर पानी बांधने से बेहतर गांवावालों को हैंडपंप चलाना लगता है। गांव के पीछे के दोनों तालाब भी सूख गए हैं। इन तालाबों में मैंने भी खूब रंगबिरंगी गुड़िया पिटी है। बांसे क कैनी से गुड़ियां पीटै म खुब मजा आवत रहा।

वैसे, अब पड़ान घूमके जाए क जरूरत नाहीं तालाब पटि ग। दुआरे प मदीना क फूल से गंदगी नाहीं होत। महुआ बिनै वालेन से झगड़ा नाही करै क परत। मिट्टी-गारा क दीवार पोतावै औ खपरा छवावै से मुक्ति मिली। सब बड़ा अच्छा होइ ग। बस गरमी कुछ बढ़ि ग। नवा हैंडपंप म पानी अब 70 मीटर नीचे मिलत बा। 10 साल पहिले तक 30 मीटर पर बढ़िया मीठा पानी मिल जात रहा।

उम्मीद की रोशनी
मैं गांव गया तो, एक निमंत्रण में दिन में ही जाकर लौटा तो, एक बाघराय बाजार से एक नहर के रास्ते जाना था। इस तरफ कुछ ज्यादा ही बंजर जमीन है। दूर-दूर तक ऊसर जमीन की सफेद मिट्टी दिखती है। लेकिन, उसके बीच-बीच में कुछ छोटे-छोटे चौकोर गड्ढे खुदे दिख रहे थे। जहां सरकारी बोर्ड लगा हुआ था। मौसी के लड़के ने जो, रहता तो, इलाहाबाद में है लेकिन, अक्सर गांव आता-जाता रहता है। उससे मैंने पूछा तो, उसने बताया कि सरकारी नियम आए ग बा। जे तलाव भंठवाए के दुआर बनै लेहे रहेन या घर बनवाए लेहे रहे उनकै घर तोड़वाए क तलाव बनावावा जात बा। और, दूसरी जगहों पर भी छोटे-छोटे गड्ढे खुदवा दिए गए हैं कि बारिश में इन तालाबों में कुछ जल संरक्षण हो जाए। जल संरक्षण के जरिए गांव की तकदीर बदलने की एक कहानी मैंने गुजरात के एक गांव में देखी है। अब गुजरात के मुकाबले तो, यूपी के खड़ा होने में बहुत टाइम लगेगा। लेकिन, अगर ये मुहिम कुछ रंग लाई तो, फिर से मीठा पानी तो तीस मीटर पर मिल सकेगा।

अगली कड़ी में गांवों में राजनीति के सहारे बनती-बिगड़ती आर्थिक-सामाजिक हैसियत

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...