Monday, September 30, 2013

हे राजन ये तुमने क्या किया !



स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन प्रतीप चौधरी की मानें तो १५ जुलाई को जो फैसला उन्हें लेना था वो उन्होंने १५ सितंबर के बाद किया। यानी पूरे दो महीने इंतजार करने के बाद देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रतीप चौधरी किस बात का इंतजार कर रहे थे। हमारी समझ ये कहती है कि प्रतीप चौधरी को इंतजार था कि डी सुब्बाराव के जाने के बाद नया गवर्नर जो आएगा वो शायद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के फोकस का एजेंडा बदलेगा। क्योंकि, जो बातें नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में चर्चा में थीं वो ये कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ग्रोथ पर फोकस करना चाहते हैं जबकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव सरकार के इशारे के बाद भी ब्याज दरों में कटौती करने या कटौती करने के संकेत देने तक को तैयार नहीं हैं। ये लगभग तय था कि जब चार सितंबर को डी सुब्बाराव की गवर्नर पद से विदाई होगी तो, कोई ऐसा व्यक्ति ही पद संभालेगा जो वित्त मंत्रालय के सुर के साथ ताल मिला सके। यानी ब्याज दरें कम करके तरक्की की रफ्तार बढ़ाने पर फोकस कर सके। क्योंकि, चुनावी साल में महंगाई को फोकस बताने वाला रिजर्व बैंक अभी की सरकार की संभावनाओं को धूमिल करेगा। इसीलिए अनुमानों के मुताबिक पहले से ही सरकार के सुर के साथ ताल मिलाने का अभ्यास कर चुके रघुराम राजन को रिजर्व बैंक का काम सौंपा गया।

प्रभावशाली, सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी रघुराम राजन ने डी सुब्बाराव की जगह ली तो सबको लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। काफी हद तक ठीक भी हुआ। चार सितंबर को रघुराम राजन ने दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक के वित्त मंत्रालय के सलाहकार वाला पद छोड़कर मुंबई के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर का पद क्या संभाला कमजोर हुआ रुपया भी ताल ठोंकने लगा। दे दनादन बाजार में भी तेजी के सारे संकेत मिलने लगे। अठारह हजार के आसपास लहरा रहा सेंसेक्स तेजी से बीस हजार के पार चला गया। लग रहा था कि रुपया सत्तर के पार अब गया कि तब गया लेकिन रघुराम राजन के साथ से रुपये ने तेजी से मजबूती हासिल की और डॉलर के मुकाबले करीब दस रुपये तक चढ़ गया। रुपये की लीकेज यानी जहां जहां डॉलर लेने के लिए रुपया देने वाली स्थितियां थीं उनको कम करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे। लगे हाथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भी अच्छी खबरें आने लगीं। रुपया मजबूत हो रहा था और कच्चा तेल भी धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा था। रघुराम राजन के गवर्नर का पद संभालने के ठीक एक दिन पहले जो कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल के ऊपर था वो एक सौ सात डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। लेकिन, दबे छिपे एक गड़बड़ हो रही थी। वो गड़बड़ ये थी कि बैंकों के कर्ज धीरे से महंगे हो रहे थे। एक सुबह मुझे भी झटका लगा जब मेरे बीस साल यानी दो सौ चालीस महीने के कर्ज की सीमा मेरे निजी बैंक ने बढ़ाकर दो सौ पचपन महीने यानी इक्कीस साल से ज्यादा कर दी। असल खतरा यही था। और सरकार की सामाजिक वोट बैंक की जरूरत पूरी करने के लिए निजी बैंक भला क्यों इंतजार करते। लेकिन, सरकारी बैंक के नाम में ही सरकार है तो वो इंतजार कर रहे थे। यही वो इंतजार था जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रमुख प्रतीप चौधरी कर रहे थे। उनको लग रहा था कि बीस सितंबर की रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी में कम से कम चौथाई प्रतिशत की कमी तो होगी ही। लेकिन, रघुराम राजन की नीति से शॉर्ट टर्म में रुपया बाजार भले खुश हुआ। राजन का इरादा लंबे समय के लिए कर्ज लेने वाले भारतीयों को खुश करने का कतई नहीं थी। इसीलिए राजन ने जब ये संकेत दिए कि कड़वी दवा भी पीनी पड़ेगी तो मिडटर्म रिव्यू के ठीक एक दिन पहले ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। निजी बैंक तो पहले ही ये काम कर चुके थे। यानी महंगे कर्ज का दौर अभी लंबा चलेगा इसके लिए भारतीयों को तैयार रहना होगा।

महंगाई का दौर जारी रहेगा। इसके लिए सिर्फ बैंकों का कर्ज जिम्मेदार नहीं है। हमारी-आपकी हर तरह की महंगाई बढ़ रही है। खाना सबसे महंगा हो रहा है। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं ये खबरें मीडिया में आने के तुरंत बाद ही बिचौलयों ने मोर्चा संभाल लिया। नासिक से लेकर दिल्ली तक हर जगह प्याज की कमी थी। और कमी की खबरों के साथ तेजी से बढ़ रही प्याज की कीमतों की भी खबर थी। इसने साहसी रघुराम राजन के सारे साहस की हवा निकाल दी। महंगाई से तरक्की पर फोकस ले जाने की बात करने वाले रघुराम राजन भी महंगाई को बैंक की प्राथमिकता में ले आए। प्याज की हॉरर स्टोरी ने उनके अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर दिया। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ गए। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आने से हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।  क्योंकि, अगस्त के भाव सितंबर में भी भाव बढ़ा चुके हैं। सितंबर की भी महंगाई दर अब घटेगी नहीं। फिर त्यौहारों के सीजन में तो हम भारतीय कर्ज लेकर भी मस्त रहते हैं। रघुराम राजन के पास अच्छा मौका था। रुपया काबू में था। बाजार भरोसे में दिख रहा था। जिनकी छींक से हमारे बाजार को निमोनिया हो जाता है वो, अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अच्छी बातें कर गया था। सेंसेक्स इक्कीस हजार की दिशा में जा रहा था। लेकिन, रघुराम राजन ने इस अच्छे मौके को बेकार कर दिया। दो हजार अंकों से ज्यादा चढ़े सेंसेक्स ने फिर उल्टी दिशा पकड़ ली है। रघुराम राजन का पहला दिन जितना एतिहासिक इस मामले में रहा कि तेजी से सब सुधरता दिख रहा है। रघुराम राजन की पहली मौद्रिक नीति का एलानठीक इसके उलट दिशा में जा रहा है कि अभी सब बिगड़ा ही रहेगा। वैसे भी पॉलिसी ही कह रही है कि महंगाई अनुमान से ज्यादा ही रहेगा। अब सारा कुछ दारोमदार इस साल की दूसरी छमाही में बुनियादी परियोजनाओं को कितनी तेजी मिली इस पर निर्भर होगा। लेकिन रघुराम राजन के रेपो रेट बढ़ाने के फैसले पर देश यही कह रहा है कि हे राजन ये तुमने क्या किया।


Friday, September 27, 2013

आमदार, खासदार, मंत्री तो मरेगा नहीं?

अभी ताजा रिपोर्ट आई है डॉक्टर रघुराम राजन की। नए तरीके से इस रिपोर्ट में राज्यो के आर्थिक हालात को समझा गया है। जब रघुराम राजन वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे तब सरकार ने इनको ये महत्वपूर्ण काम सौंपा था। 26 सितंबर को ये रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को सौंप दी गई है। इसमें प्रति व्यक्ति उपभोग, अमीरी-गरीबी अनुपात और दूसरे सामाजिक-आर्थिक मानकों पर राज्यों की दशा दिशा कैसी है ये बताया गया है। चौंकाने वाली बात ये है कि इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र तो Relatively Developed श्रेणी में है। लेकिन, गुजरात Less Developed श्रेणी में है। इसके राजनीतिक मायने भी देखे जा रहे हैं। क्योंकि, Least Developed राज्यों में उड़ीसा, बिहार के बाद सबसे खराब स्थिति मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की है। सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। कमाल ये है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी गुजरात को Less Developed और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ को Least Developed रखने से दुखी होंगे। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अतिप्रसन्न हैं कि उनका राज्य अतिपिछड़ा है। अब वहां की जनता सोचे जो इसीलिए नीतीश का गुणगान करने लगी थी कि लालू राज से अतिपिछड़े के ठप्पे को नीतीश राज में बदलाव का मौका मिला। लेकिन, नीतीश तो अतिपिछड़े कहे जाने से खुश हैं कि अब केंद्र से ज्यादा रकम मिलेगी।

दरअसल डॉक्टर रघुराम राजन की ये रिपोर्ट वित्त मंत्रालय को प्रस्ताव है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना में राज्यों को धन इसी आधार पर मिले। हालांकि, अभी इस रिपोर्ट को पूरी तरह से माना जाएगा या टुकड़ों में ये तय होना बाकी है। सरकार इस पर फैसला करेगी। लेकिन, इस रिपोर्ट के आधार पर Relatively Developed श्रेणी वाले महाराष्ट्र के सबसे चमकते शहर मुंबई में चार साल रहा हूं। और मुंबई की मस्त मिजाजी है कि बुनियादी सुविधाओं की बात कम ही होती है। जबकि, सच्चाई यही है कि अभी भी बुनियादी सुविधाओं के मामले में मुंबई बहुत पीछे है। हां, यहां बड़ा पैसा है। माया है। इसलिए सब मस्त रहते हैं। लेकिन, मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे से पुणे तक जाकर आप भले ही महाराष्ट्र को Relatively Developed श्रेणी में रखने का साहस कर पाएं। लेकिन, अगर गलती से विदर्भ की ओर जाएं तो हकीकत समझ में आ जाती है। अभी फिर से महाराष्ट्र के इस आत्महत्या वाले इलाके की तरफ जाने का मौका मिला। नागपुर मस्त शहर है। यहां तक तो हवाई जहाज भी जाते हैं और राजधानी भी। लेकिन, हमें थोड़ा और आगे जाना था। वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय तक। बैंगलोर राजधानी से नागपुर तक पहुंचने के बाद यात्रा कार से होनी थी। डॉकटर रघुराम राजन के Relatively Developed श्रेणी वाले राज्य महाराष्ट्र के Least Developed क्षेत्र से गुजरा। नागपुर से वर्धा करीब सत्तर किलोमीटर है। इसी रास्ते पर आगे यवतमाल, नांदेड़ के भी तीर दिख रहे थे। मतलब आगे यही रास्ता उन जगहों पर भी जाता है। सत्तर किलोमीटर की दूरी हमने अनुमान लगाया अधिकतम डेढ़ घंटे। ड्राइवर ने कहा- सर दो घंटे लग जाएगा। नागपुर से दस पंद्रह किलोमीटर बाहर निकलते ही ड्राइवर की बात सही लगने लगी।

थोड़ा ही चलने पर एक वैगन आर दुर्घटनाग्रस्त मिली। ड्राइवर ने स्थानीय लहजे में पूछा। बताया कि 5 मिनट पहले ही दुर्घटना हुई है। फिर बड़े कड़वे बोला। पता नहीं क्यूं आमदार, खासदार, मंत्री कभी नहीं मरता। ये सुनने में बुरा लगा कि ड्राइवर विधायक, सांसद औऱ मंत्रियों के मरने की कामना कर रहा है। लेकिन, यही जनभावना है। क्यों वो ऐसा चाह रहा था इसकी वजह भी अगली लाइन में मिल गई। आगे पीछे पुलिस वाला गाड़ी रहता है तो वो क्यों मरेगा। लेकिन, हम लोगों के तो रोज मरने का खतरा रहता है। ये समाज के तंत्र से समाज के आम आदमी की चिढ़ थी। वही आम आदमी या महात्मा गांधी वाला लाइन में खड़ा आखिरी आदमी टाइप। महात्मा गांधी इसलिए भी ज्यादा याद आ रहे हैं कि मैं वर्धा ही जा रहा था। उनके नाम पर बने विश्वविद्यालय और वर्धा में ही वो सेवाग्राम आश्रम है जहां गांधी जी ने काफी समय बिताया था।

नागपुर से वर्धा और फिर आगे नांदेड़, यवतमाल जाने वाले इस रास्ते पर जबरदस्त यातायात है। लेकिन, सड़क दोहरी भी नहीं है। बस एक रास्ता जाने के लिए, एक आने के लिए। और, तेज रफ्तार में जब ये बड़े-बड़े ट्रक बगल से गुजरते हैं तो अहसास बस यही कि यमराज बस इस बार छोड़ गए। इसके अलावा सड़क पर इतने बढ़िया से बने गड्ढे मिलेंगे कि सड़क खोजने में गाड़ी कभी भी बगल के खेत में चली जाए। इन विशालकाय ट्रकों के अलावा वही हर राज्य में पाई जाने वाली राज्य परिवहन की बसें सूखी उल्टी के निशान के साथ तेजी से निकलती जा रहीं थीं। अब मेरी समझ में ये नहीं आता कि ये डॉक्टर रघुराम राजन की रिपोर्ट में महाराष्ट्र Relatively Developed कैसे हो गया। क्या सिर्फ मुंबई, नागपुर और पुणे पर ये रिपोर्ट बनी है।

नागपुर से वर्धा के कष्टप्रद रास्ते पर टोल बूथ
और ये आगे भी ऐसे ही Relatively Developed रहेगा क्योंकि, डॉक्टर रघुराम राजन की रिपोर्ट अगर पूरी तरह मान ली गई तो आगे यानी 12वीं पंचवर्षीय योजना में इस इलाके के लिए धन नहीं आएगा। क्योंकि, डॉक्टर राजन यही कह रहे हैं कि इसी आधार पर सबको फंड दो। आर्थिक मोर्चे पर सरकार के लिए संकटमोचक बने राजन की ये रिपोर्ट यूपीए-2 को राजनीतिक राहत भी दे रही है। भले राज्यों के विकास का गणित इससे पूरी तरह गड़बड़ा जाए। समझ में ही नहीं आता कि योजनाओं की प्राथमिकता कैसे तय होती है। जितना ट्रैफिक बड़ी-छोटी गाड़ियों का इस रास्ते पर है वो साफ दिखाता है कि यहां रकम लगाने की जरूरत है। और कोढ़ में खाज ये कि इस बेहद कष्टप्रद रास्ते पर चमकीले हाईवेज पर दिखने वाले टोलबूथ भी है। 27 रुपया एक तरफ का। दोनों तरफ का एक साथ 40 रुपये में। ये है भारत निर्माण।

Thursday, September 26, 2013

वर्धा में जेएनयू !

महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा दूसरी बार जाना हुआ। करीब दो साल पहले पहली बार वर्धा जाना हुआ था। नागपुर से वर्धा पिछली बार रेलमार्ग से ही गए थे। इस बार सड़क के रास्ते गए। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। लेकिन, इस पोस्ट में बात सिर्फ वर्धा की। वर्धा वैसे तो महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इसकी प्रसिद्धि में एक और वजह जुड़ गई है महात्मा गांधी गांधी के नाम पर बना अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। दुनिया में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ये केंद्रीय विश्वविद्यालय बना है। जैसा मुझे पता है कि करीब चालीस करोड़ रुपए का बजट है। जब दो साल पहले हम यहां सोशल मीडिया पर बात करने के लिए गए थे तो विषय था- हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता। जाहिर है जब ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया है तो किसी तरह की आचार संहिता की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। सिवाय स्वनियंत्रण के। लेकिन, कुछ बातें तय हुईं। उस समय हम लोगों को फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में रुकने का अवसर मिला था। क्योंकि, तब विश्वविद्यालय के पास और कोई बेहतर जगह नहीं थी। ये छात्रावास विदेशी छात्रों के लिए है जो यहां रहकर हिंदी पर परास्नातक या शोध की पढ़ाई करना चाहते हैं।

2 साल पहले की तस्वीर पीछे छात्रावास बनने के क्रम में
विश्वविद्यालय तब बनने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ रहा था। पहाड़ियों पर बसे इस विश्वविद्यालय में जिस तरह से प्रशासनिक भवन, छात्रावास, सभागार बना था। वो काफी खींचने वाला था। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास से मुख्य द्वार की तरह जाएं तो दाहिने मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बना रास्ता गांधी हिल्स की तरफ ले जाता है। गांधी हिल्स चढ़ने से पहले बाएं नजर डालेंगे तो नजीर हाट नजर आएगी। दो साल पहले  नजीर अकबराबादी के नाम पर बनी नजीर हाट नहीं थी। रही भी होगी तो, बस शुरुआत हुई थी। इस बार वो काफी व्यवस्थित बनी थी। उसमें हर जरूरत के सामान की दुकान थी। और, हिंदी में लिखे नाम आकर्षित करते हैं। एक दुकान पर कुंतल लिखा देखकर मैं भी सोच में पड़ गया कि ये किस काम की दुकान है। बाद में पूछकर समझा कि ये नाई की दुकान है। वहीं पर भरे पूरे दूध वाली कॉफी स्टील के बड़े मग जैसे कप में निपटाई गई।

मुंशी प्रेमचंद मार्ग घुमाव लेते हुए ऊपर चढ़ता है तो गांधी हिल्स पर पहुंचता है। अच्छा पार्क है। यहां गांधी जी की प्रतीक वस्तुओं से सजा पार्क बना हुआ है। ये सब दो साल पहले भी था। पार्क के द्वार पर ही लिखा है कि कृपया जूते-चप्पल उतारकर अंदर जाएं। हालांकि, सीमेंटेड खुरदुरी जमीन होने से ज्यादातर लोग (खासकर नियमित आने वाले छात्र) तो जूते चप्पल पहने ही अंदर आते हैं। हमने लिखे को पढ़ा, पढ़कर पालन किया। जूते-चप्पल उतार दिए।
हम ऐसे समय पहुंचे थे कि शाम धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। दोनों तस्वीरें गांधी हिल की खूबसूरती बयां करती हैं। गांधी जी की प्रतीक झोपड़ी, गांधी जी का चश्मा, तीनों बंदर और दूसरी प्रतीक वस्तुएं भी बड़े सलीके से सजाई गई हैं। शाम गहराने लगी तो पार्क में लगे लैंप भी जल गए। हालांकि, तब तक शाम से रात नहीं हुई थी। लेकिन, इस गहरी शाम में जो चित्र आया वो भी अच्छा दृष्य पैदा कर रहा है ।


इस बार भी वर्धा में मिले हिंदयुग्म वाले शैलेष भारतवासी ने कहा कि कोई हिमांशु हैं यहीं शोध कर रहे हैं। उनसे मिलने का प्रयास काफी देर बाद सफल हुआ। क्योंकि, शैलेष उनके लखनऊ के नंबर पर प्रयासरत थे। काफी प्रयास के बाद हम मिले तो पता चला कि वहां का एक स्थानीय मोबाइल नंबर भी है। लेकिन, लखनऊ वाला नंबर जिंदा रखे हुए हैं। हम लोग नजीर हाट में मिले। उसके बाद मुख्य द्वार के बाहर की चाय की दुकान पर चर्चा चकल्लस का क्रम बढ़ा। टीन के डिब्बे चाय की दुकान पर बेंच कुर्सी की शक्ल में मिले। बैठे तो उन्होंने ये अहसास नहीं होने दिया कि वो असल में क्या हैं। हिमांशु नवल किशोर प्रेस के राष्ट्रीय चेतना में योगदान पर शोध कर रहे हैं। उर्दू भी सीख रहे हैं जो शोध के लिए जरूरी है। हिमांशु तहलका के लिए लिखते रहे हैं। इस चाय की दुकान से और हबीब तनवीर सभागार तक एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती रही कि यहां के बच्चे जाग रहे हैं। चेतना जागृत है। और इतनी कि जो ब्लॉगर साथी गए थे उनकी चेतना भी जगा रहे थे। इसीलिए किसी भी विश्वविद्यालय केंद्र पर जाना मुझे बहुत खींचता है। पता चला कि अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अलग-अलग विषयों पर पढ़ने शोध के काम में एक हजार से ज्यादा छात्र हो गए हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय छात्रों की उपस्थिति अभी कम है। इस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुलपति विभूति नारायण राय को काम करने की जरूरत है।

वैसे विभूति नारायण राय इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि 2 साल में ही उन्होंने विश्वविद्यालय का कायाकल्प कर दिया है। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में इस बार हम लोगों को छात्रों के कमरे घेरने की जरूरत नहीं पड़ी। हमें नई बनी नागार्जुन सराय में रुकाया गया। किसी होटल के कमरे जैसे अतिथि कक्ष थे। बाहर से एक तस्वीर ली थी वही यहां लगा रहा हूं। वहां विनोद कुमार शुक्ल जी से भी मुलाकात हुई। हम लोग जब सोशल मीडिया पर बात करने पहुंचे थे उसके ठीक पहले दुनिया भर के कवियों का जमावड़ा हुआ था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही ढेर सारे मेरी पहचान में न आ पाने वाले कवियों की तस्वीरें चिपकी थीं। हालांकि, न पहचान का दोष मेरा है। क्योंकि, कविता और कवियों से मेरा वास्ता कम ही है।

तस्वीर में वो बात नहीं काफी बेहतर प्रस्तुति
हम लोगों की संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। और ये भी समझ में आया कि विश्वविद्यालय के छात्रों की रचनात्मकता जिंदा है। आकार प्रकार भी इस विश्वविद्यालय का पहाड़ियों पर बसे होने की वजह से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तरह है। और, काफी कुछ गतिविधियां भी। हालांकि, JNU दिल्ली में है। और लंबे समय से विशुद्ध वामपंथ का जमावड़ा रहा है। वैसे अच्छा ये होगा कि सिर्फ वामपंथ का जमावड़ा बनकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय न रह जाए। जवानी में जितना वामपंथ हर किसी में होता है उतना तो जरूरी है। लेकिन इसे छोड़ भी दें तो और मामलों में भी वर्धा जेएनयू बनने की पूरी संभावना रखता है। इसका बड़ा श्रेय कुलपति विभूति नारायण राय को जाता है जो गालियां खाकर भी सोशल मीडिया वालों को बुलाने से बाज नहीं आते।  दो साहसी कदम कुलपति विभूति नारायण राय को और उठाने चाहिए। पहला रात दस बजे की छात्राओं पर पाबंदी हटाने की और दूसरा विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की शुरुआत करने की। उम्मीद करें कि एक और बेहतर विश्वविद्यालय तैयार होगा। 

Tuesday, September 24, 2013

इसके लिए रेल बजट का इंतजार क्यों करें ?

सोशल मीडिया को लेकर प्रधानमंत्री ने चिंता जताई है। कहा है कि आजादी भी बनी रहे और इसका दुरुपयोग भी न हो। हालांकि, दुखद ये है कि इस मीडिया को लेकर चिंताएं ज्यादा जताई जा रही हैं। ये कम ही बताया जा रहा है कि आखिर इस सोशल मीडिया या जिसको मैं नागरिक मीडिया कहना ज्यादा पसंद करूंगा वो कितना बेहतर है। और समाज को कितना बेहतर कर रहा है। अब मैं टीवी पत्रकार हूं लेकिन, टीवी के लिए खबर करने के लिए कई ढेर सारी औपचारिकताओं के बाद ही कोई खबर की जा सकती है। फिर समय भी अनुकूल हो ये भी देखना होगा। जैसे रेलवे की खामियों पर बात करनी है तो रेल बजट के आसपास ही ये खबर बेहतर बनेगी। क्योंकि, ट्रेन में गंदगी होती है। खाना ठीक नहीं मिलता। चद्दर, कंबल गंदे होते हैं इसे जानते सब हैं इसकी चर्चा रेल बजट के आसपास ही ठीक रहेगी। यानी रेलवे की कमियों को दूर करने का दबाव पारंपरिक मीडिया सिर्फ रेल बजट के आसपास ही बनाता है कुछ बहुत अलग हटकर न हो जाए। मतलब कोई बड़ी दुर्घटना या ऐसी ही मिलती जुलती खबर। लेकिन, सोशल मीडिया के जरिए हर कोई हर दिन दबाव बनाने में मदद कर सकता है। नागरिक मीडिया है तो उसके लिए पत्रकार होने की भी जरूरत नहीं।

शानदार सेवा की गारंटी देने वाला पैकेट
अभी दो संगोष्ठी-कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। पहले भोपाल मीडिया चौपाल में और फिर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा। दोनों ही जगह बात सोशल मीडिया पर ही थी। और संयोग ये भी कि भोपाल से लौटते समय और नागपुर जाते समय बैंगलोर राजधानी की यात्रा करनी पड़ी। चादर वाली पैकेट पर इतनी अच्छी बातें लिखी थी कि लगा राजधानी का मजा ही कुछ और है। वैसे तो चार साल मुंबई-दिल्ली खूब राजधानी का मजा लिया और लगा कि अगर ऐसी राजधानी हो जाए तो देश में लोगों की यात्रा कितनी सुखद हो जाए। ऐसा ही अनुभव इलाहाबाद जाने में दिल्ली से हावड़ा जाने वाली सारी राजधानियों में भी लगा। लेकिन, बैंगलोर राजधानी ने राजधानी की शानदार यात्रा का सारा भ्रम तोड़कर रख दिया। पहले भी करीब दो साल पहले बैंगलोर राजधानी का सफर अंग्रेजी का सफर हो गया था। भोपाल से दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के लिए हो या हजरत निजामुद्दीन से नागपुर के लिए दोनों ही यात्रा एक ही जैसी खराब अनुभव वाली रही। ट्रेन में बैठने के बाद चाय मांगने पर उसका जवाब आया सारी भट्ठियों पर खाना बन रहा है तो मुश्किल है चाय मिलना। वो मुश्किल ऐसा रहा कि सुबह के पहले चाय नहीं मिली। खाने की क्वालिटी को लेकर तो मुझे दूसरी राजधानियों में शिकायत रही है लेकिन, बैंगलोर राजधानी का खाना तो न खाने लायक है। राजधानी के चिर परिचित मोटे पराठे की जगह पतली रोटी दिखी तो खुशी हुई। लेकिन, खुशी काफूर हो गई। क्योंकि, रोटी कच्ची थी। पहले कौर के बाद गले से नीचे उतारने की हिम्मत नहीं हुई। चावल सब्जी खाई। दही खाई।

बैंगलोर राजधानी की दाग वाली चादर

पैकेट में से चद्दर निकाली कि अब सोया जाए तो चद्दर सफेद कहने को ही थी। उसे पीलिया सा हुआ लग रहा था। सर्विस करने वाले को बुलाया तो उसने पहले तो अचरज जताते हुए कहा कि ये कहां गंदा है। फिर जब मैंने गुस्से में चादर बदलने को कहा तो उसने पैकेट बदलकर दे दिया। लेकिन, नतीजा खास नहीं निकला। बदली हुई चद्दर की तस्वीर यहां लगा रहा हूं। लगता ऐसे था जैसे हर बार बस प्रेस करके उसे फिर से पैक करके यात्रियों को राजधानी में दे दिया जाता था। ये यात्रा थी भोपाल से हजरत निजामुद्दीन की। कंबल से ऐसे धूल गिर रही थी जिसे देखकर समझने के लिए दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं थी। मतलब जब खरीदा गया था तबसे कभी उसकी साफ सफाई की जरूरत नहीं समझी गई। और, सबसे बड़ी बात कि जब मैं इन बातों पर नाराज हो रहा था। तो, दूसरी ट्रेनों से ज्यादा टिकट की रकम देकर बैंगलोर राजधानी में चलने वाले यात्रियों के माथे सिकुड़ रहे थे कि ये क्यों बेकार में बहस कर रहा है रात भर की तो यात्रा है। यही यात्री होंगे रेल बजट के समय टीवी कैमरे पर गजब का गुस्सा दिखा रहे होंगे।

खैर कुछ खाने से पहले जब ट्रेन के टॉयलेट की तरफ गया तो मन और अच्छा हो गया। सामान्य ट्रेनों के स्लीपर क्लास में तो इस तरह की गंदगी आमतौर पर दिख जाती है। लेकिन, किसी राजधानी में इस तरह की गंदगी मैंने इसके पहले नहीं देखी। देखी भी थी तो दो साल पहले बैंगलोर राजधानी में ही। टॉयलेट के सामने काफी गंदगी दिख रही थी। और टॉयलेट के अंदर जाने के साहस को कम कर रही थी। लेकिन, कुछ शंकाएं ऐसी होती हैं जिनका समय पर निवारण होना जरूरी होता है।
इसलिए खराब होते मन के साथ ट्रेन के टॉयलेट का दरवाजा खोलकर उसमें घुस गया। अंदर से टॉयलेट बंद करने की कोशिश की तो देखिए क्या हुआ। ये राजधानी का टॉयलेट था। अब चादर देना, सफाई का काम और खाना-चाय, ये सब तो रेलवे ने पूरी तरह से निजी हाथों में दे रखा है। कुछ भी कहने पर ठेकेदार से बात कीजिए। हम क्या करें का रुदन सेवा करने वाले लोग दे देते हैं। लेकिन, टॉयलेट भी क्या पूरी तरह से रेलवे ने ऐसा निजी हाथों में दे रखा है कि तय मानक वाली सिटकनी भी न लगे।

अब ये सब टीवी-अखबार वाली मीडिया में तो रेल बजट के समय ही लिखा-दिखाया जाएगा। और काफी संसाधन भी इस स्टोरी को करने पर खर्च होगा। सोशल मीडिया या नागरिक मीडिया में मेरी तरह हर कोई ये रिपोर्टिंग रोज कर सकता है। रोज-रोज इसकी रिपोर्टिंग होगी तो शायद कुछ असर भी हो। शायद ऐसे ठेकेदारों का ठेका भी रद्द हो। बैंगलोर की कोई अकांक्षा एंटरप्राइजेज के पास इसका ठेका अभी है। चादर कंबल वाला पैकेट किसी पैरामाउट गारमेंट से आया था। ये भी बैंगलोर की ही थी। मुझे ये भी आश्चर्य हो रहा था कि आखिर राजधानी में चलने वाले लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते। इस मामले पर अराजक क्यों नहीं होते।

नागपुर से वापसी में ये समझ में आ गया। वापसी में मेरा आरक्षण केरल एक्सप्रेस में था। सेकेंड एसी में होने से मैं आश्वस्त था कि यात्रा सुखद रहेगी। बोगी में घुसते ही गंदगी ने मेरा स्वागत किया। मेरी सीट एकदम दरवाजे के पास थी। और, दरवाजे के पास जाने कहां से या शायद एसी से ही निकलकर पानी चू रहा था और लोगों के आने जाने से अच्छी कीचड़ वाली गंदगी दरवाजे पर ही जमा हो गई थी। सीट और उसके आसपास फिर सफाई की उम्मीद ही दिमाग में नहीं रह गई थी। और, इस नाउम्मीदी को पूरी तरह से केरल एक्सप्रेस की गंदगी ने समर्थन किया। खैर टीटीई आया। टिकट चेक कराया। मैंने स्टेशन पर पता कर लिया था कि केरल एक्सप्रेस में पैंट्री कार है। आश्वस्त था कि खाना मिल जाएगा। लेकिन, ट्रेन की हालत देखकर दोबारा आश्वस्त होना चाहा। टीटीई ने कहा - अरे अब तो सब बंद हो गया होंगा। फिर थोड़ा रुककर बोला नहीं अभी तो साढ़े आठ ही बजा है ना मिलेंगा-मिलेंगा। अभी वो ऑर्डर लेने आएगा।
केरल एक्सप्रेस के टॉयलेट की छत
लेकिन, थोड़ी देर बाद ही दोबारा आश्वस्त होना भी भ्रम साबित हो गया। चिप्स का पैकेट और कोल्डड्रिंक की बोतल लिए आ रहे यात्री ने बताया कि कुछ बचा नहीं है। बस यही है। स्टेशन पर फ्लेवर्ड मिल्क तो पी लिया था लेकिन, वो खाने की जगह तो ले नहीं सकता था। इसलिए जल्दी से पैंट्री कार की तरफ बढ़ा। सेकेंड एसी के दो डिब्बे फिर थर्ड एसी के कई डिब्बे फिर स्लीपर के दो डिब्बे और फिर पैंट्री कार। पैंट्रीकार में पुलिसवाले पैंट्री वालों से मुफ्त का खाने के लिए लड़ रहे थे। दारू फुल थी। मामला दोनों ओर से टाइट था। पैंट्रीवाला भी दारू के नशे में पुलिस की वर्दी के रोब में जरा भी आने को तैयार नहीं था। खत्म होते सामान में से चिप्स, बिस्किट, पानी और एक जूस की बोतल लेकर मैं जल्दी से अपने कूपे में आ गया। और जब केरल एक्सप्रेस के टॉयलेट में गया तो साफ हो गया कि आखिर इसी रूट पर बैंगलोर राजधानी में यात्रा करने वाले खुशी से सफर क्यों करते हैं। अराजक क्यों नहीं होते।

Monday, September 23, 2013

नितिन गडकरी नागपुर से चुनाव लड़ेंगे?

जमीन पर रहना-जाना जरूरी होता है। न्यूजरूम से जो पता चलता है वो न्यूजरूम जैसा ही होता है। मतलब चमकता और उस चमक में हकीकत अकसर साफ-साफ दिख नहीं पाती। अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के बुलावे पर वर्धा गया था। हिंदा ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी थी। मेरा विषय था सोशल मीडिया और राजनीति।  इस संगोष्ठी और वर्धा विश्वविद्यालय की चर्चा आगे की पोस्ट में। अभी बात राजनीति की।
नागपुर में संघ मुख्यालय परिसर में
लौटते समय सोचा कि नागपुर कई बार आकर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय तक जाना नहीं हो पा रहा है। इसलिए स्टेशन से पहले पहुंच गए रेशमबाग के संघ मुख्यालय यानी केशवराव बलिराम हेडगेवार स्मृति परिसर। शानदार परिसर। बहुत बड़ी इमारत। और परिसर में हेडगेवार की चमकती मूर्ति। रात का समय था और मोबाइल से तस्वीरें लीं। इसलिए उसकी भव्यता का उतना अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। परिसर में जो सभागार है उसका नाम महर्षि व्यास सभागार है। शाम के आठ बज रहे थे। महर्षि व्यास सभागार के अंदर से आवाजें आ रहीं थीं। झाककर देखा तो शाखा लगी हुई थी। तस्वीर उतारने का मोह नहीं छोड़ पाया। ठीक-ठाक संख्या थी।

महर्षि व्यास सभागार में चल रही सायं शाखा
नागपुर संसदीय क्षेत्र में नागपुर दक्षिण पश्चिम, नागपुर दक्षिण, नागपुर पूर्व, नागपुर मध्य, नागपुर पश्चिम, नागपुर उत्तर- कुल 6 विधानसभा आती हैं। देवेंद्र फडनवीस नागपुर दक्षिण पश्चिम से विधायक हैं और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। नागपुर दक्षिण से विधायक दीनानाथ देवराव पडोले हैं जो कांग्रेस हैं। नागपुर पूर्व से विधायक कृष्णा खोपड़े हैं ये भी सीट बीजेपी के पास है। नागपुर मध्य से भी बीजेपी के ही विकास शांकरराव कुंभारे विधायक हैं। नागपुर पश्चिम पर भी भारतीय जनता पार्टी की कब्जा है विधायक हैं सुधाकर शामराव देशमुख और नागपुर उत्तर पर कांग्रेस पार्टी के विधायक हैं नितिन काशीनाथ राउत। (स्रोत- विकीपीडिया) लेकिन नागपुर संसदीय क्षेत्र की 6 में से 4 विधानसभा सीटें जीतने के बाद भी नागपुर ने सांसद कांग्रेस का चुना है। कांग्रेस के विलास मुत्तेमवार यहां से सांसद हैं। इसीलिए नागपुर सीट संघ के लिए छवि और प्रतिष्ठा का विषय है। इस बार चर्चा भी इस बात की है कि बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यहां से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। इस बात की संभावना भी पूरी है।

लेकिन, नागपुर से दिल्ली लौटते समय केरल एक्सप्रेस में मिले गजानन कोषटवार ने मेरी और देश में जाहिर इस आम धारणा को तोड़ने की कोशिश की। गजानन कोषटवार नागपुर के मनीष नगर में रहते हैं, बीजेपी समर्थक हैं। बीना में रिफाइनरी में काम करते हैं। कहते हैं पिछले कुछ समय से वोट भी कर रहे हैं। लेकिन, वो कह रहे हैं कि नितिन गडकरी चुनाव नहीं लड़ेंगे। वजह। उन्होंने जो वजह बताई वो चौंकाने वाली और अविश्वसनीय है। गजानन का कहना था कि वो बीजेपी के भले हैं लेकिन, जब वोट देना होगा तो बनिया जाति के विलास मुत्तेमवार को ही वोट देंगे। हल्की मुस्कुराहट के साथ उन्होंने कहा कि यही हकीकत है। गजानन यहां तक कह गए कि विलास मुत्तेमवार और नितिन गडकरी के बीच बहुत गहरे संबंध हैं। मुश्किल है कि नितिन गडकरी विलास मुत्तेमवार के सामने चुनाव मैदान में आएं। मतलब या मुत्तेमवार लड़े तो गडकरी बीजेपी से प्रत्याशी नहीं होंगे। और, अगर नितिन गडकरी चुनाव लड़ते हैं तो विलास मुत्तेमवार कांग्रेस से टिकट नहीं लेंगे। हालांकि, उनकी ये दलील मेरे गले नहीं उतरती। क्योंकि, वो लगे हाथ ये भी कहते हैं कि इस बार नरेंद्र मोदी की वजह से समीकरण बीजेपी के पक्ष में हैं। इसलिए नितिन गडकरी के चुनाव न लड़ने की बात तो मुझे समझ में नहीं आती और एक आदमी की राय पर कुछ तय मानना पूरी तरह से गलत होगा। लेकिन, जब योगेंद्र यादव इतने सर्वे गलत करने के बाद अपनी पार्टी #AAP को खुद सर्वे करके जिता देते हैं और उसका जमकर प्रचार-प्रसार होता है तो, मुझे लगता है कि मेरा तो इसमें कोई हित नहीं जुड़ा इसलिए इसे लिख रहा हूं। हो सकता है सही हो।

Friday, September 20, 2013

भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया

मगांअंहिंविवि में सोशल मीडिया व राजनीति सत्र का संचालन करते हुए
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी और कार्यशाला में पहले दिन का आखिरी सत्र सोशल मीडिया और राजनीति पर। इस सत्र के संचालन मुझे ही करना है तो बहुत सी बातें जो मेरे दिमाग में हैं वो शायद पूरी तरह से कहना संभव नहीं होगा। इस लिहाज से मैंने जो लेख तैयार किया था। उसे यहां चिपका रहा हूं।

बहुत समय से भारत में ये बात बार-बार उठ रही थी कि क्या भारत में भी चुनावों में अमेरिकी चुनावों की तर्ज पर नेताओं को आमने सामने बहस करनी चाहिए। लेकिन, ये बात जितनी मजबूती से उठती थी उतनी ही मजबूती से खारिज भी हो जाती थी कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव का तरीका अलग है। यहां विधानसभा और संसद सदस्यों के चुनाव से आखिर में कोई राज्य का मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुना जाता है। सभी दल इस छद्म व्यवहार को ही असलियत का जामा पहनाने की हर संभव कोशिश करते हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री घोषित करने की परंपरा नहीं रही भले ही वो लगभग तय होता हो। लेकिन, तकनीक ने इन छद्म व्यवहार करने वाले राजनीतिज्ञों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। ये तकनीक आई सोशल मीडिया की। जिसे ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग या दूसरे प्रचलित सामाजिक माध्यमों के जरिए जाना जाता है। ये सोशल मीडिया राजनीति का नक्शा बदलने के लिए तैयार है। और, कांग्रेस बार-बार ये स्थापित करने की कोशिश करती रहती है कि स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते @pitrodasam की दूरदृष्टि ही थी जिसने भारत को इक्कीसवीं सदी में पहुंचाया। इक्कीसवीं सदी में पहुंचाने से उनका मतलब कंप्यूटर युग में था। हालांकि, इक्कीसवीं सदी अब कंप्यूटर के माउस को कब का दरकिनार करके स्मार्टफोन और टैबलेट के जरिए देखी जा रही है। और इसे इस्तेमाल करने वाला वो नौजवान है जो पिछले 2 दशकों में राजनीति के लिए तैयार तो हो गया था (उम्र 18 के पार जा पहुंची) लेकिन, राजनीति के लिए तैयार नहीं था न ही वोट डालने के लिए। लेकिन, इंटरनेट से युक्त स्मार्टफोन और टैबलेट राजनीति बदलने का साधन बनते दिख रहे हैं औऱ इसे बदलने के लिए आगे आ रहा है वही सोया हुआ नौजवान।

कांग्रेस भले ही ये स्थापित करने की कोशिश करे कि इक्कीसवीं सदी में वही देश को लेकर गई। लेकिन, इक्कीसवीं सदी में पहुंचे देश के नौजवान को सबसे सलीके से साधने में कामयाब होते दिख रहे हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। नरेंद्र मोदी देश के ऐसे राजनेता बने जिन्होंने नौजवान को उसके मौज मस्ती वाले अड्डे यानी सोशल मीडिया पर जाकर धर लिया और ऐसा पकड़ा कि देश के ज्यादातर राजनेताओं को नौजवानी के मस्त अड्डे सोशल मीडिया पर जाना पड़ रहा है। हालांकि, कांग्रेसी नेता और यूपीए मंत्री शशि थरूर नरेंद्र मोदी से पहले से ट्विटर पर हैं और यूनाइटेड नेशंस में अहम पद पर रहे शशि थरूर की फॉलोइंग भी भारतीय नेताओं में सबसे ज्यादा थी। लेकिन, शशि थरूर का ट्विटर अकाउंट बेहद निजी था। उसे अभियान के तौर पर राजनीतिक इस्तेमाल करना सीखा नरेंद्र मोदी ने। और यही वजह रही कि जब शशि थरूर से ज्यादा फॉलोअर नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट के हुए तो बीजेपी और नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया समर्थकों ने इसका जमकर जश्न मनाया। अभी नरेंद्र मोदी के ट्विटर पर बीस लाख से ज्यादा समर्थक हैं। और, शशि थरूर के करीब 18 लाख। ये फर्स्ट मूवर एडवांटेज यानी शुरू में ही इस अड्डे पर अपने राजनीतिक फायदे के लिए पहुंचने का फायदा @narendramodi को होता दिख रहा है। @narendramodi इस सोशल मीडिया के अड्डे पर पहले पहुंचे साथ ही वो तेजी से बदलती तकनीक के साथ खुद की पहुंच बढ़ाने के लिए भी ढेर सारे बदलाव करते रहे। मोदी ट्विटर पर अब हिंदी, उर्दू के अलावा मराठी, उड़िया, बांग्ला, तमिल, असमिया, कन्नड़, मलयालम में ट्वीट करते हैं। जाहिर है इसके लिए उनकी एक पूरी आईटी आर्मी है जो ये काम करती है। इसके अलावा नरेंद्र मोदी फेसबुक पर अब रिकॉर्ड बनाने के लिए मोदी के सोशल मीडिया रणनीतिकार उनके समर्थन में बने अलग-अलग पन्नों को एक साथ जोड़ देने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए वो फेसबुक के मुख्यालय में बात कर रहे हैं जिससे मोदी के समर्थकों की प्रभावी संख्या एक ही पन्ने पर नजर आने लगे। सोशल मीडिया राजनीति बदल रहा है इसके तरीके भी। पहले चुनाव आते ही शानदार नारे गढ़े जाने लगते थे। एक-दो शानदार नारे से पूरे चुनाव की नैया पार हो जाती थी। लेकिन, सोशल मीडिया की लड़ाई एक दो नारों से नहीं चल सकती। हालांकि, इसमें भी कोई एक दो सटीक हैशटैग लड़ाई को शानदार बना देते हैं। राहुल गांधी के लिए बीजेपी समर्थक ट्विटरबाजों के #pappu के इस्तेमाल से परेशान कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम ने नरेंद्र मोदी के लिए #feku हैशटैग को प्रचलित करने की कोशिश की और ये दोनों कोशिशें सोशल मीडिया की राजनीति में जमकर सफल हुई हैं। ये आज के सबसे चर्चित हैशटैग हैं। और, ये चरम पर तब पहुंचा था जब देश के दो सबसे बड़े उद्योग संगठनों CII और FICCI ने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को हफ्ते भर के भीतर ही अपने मंचों पर बुलाया। राहुल गांधी CII की एजीएम में आए तो, नरेंद्र मोदी FICCI की महिला शाखा के कार्यक्रम में।

सोशल मीडिया के जरिए राजनीति कैसे बदल रही है इसका अंदाजा सरकारों को भी लग रहा है। देश की ज्यादातर सरकारें अब सोशल मीडिया के जरिए तुरंत अपनी उपलब्धि या फिर अपने खिलाफ दुष्प्रचार को खारिज करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए मौनी बाबा जब सरकार की छवि को गर्त में पहुंचाने लगा तो, प्रधानमंत्री कार्यालय का सोशल मीडिया अवतार हुआ और @PMOIndia के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय से सरकार की उपलब्धियों का जमकर बखान किया जाने लगा। हालांकि, @PMOIndia विवादों में भी रहा कि कई ट्विटर अकाउंट्स को उसने इसलिए ब्लॉक कर दिया कि वो सरकार के लिए अप्रिय स्थितियां पैदा कर रहे थे। हाल ये कि @PMOIndia के ब्लॉक करने को भी कई ट्विटरबाज अपने ट्विटर प्रोफाइल पर किसी सम्मान जैसा चमकाए रखे हैं। सरकार के हर मंत्रालय की उपलब्धियां उस मंत्रालय के ट्विटर हैंडल के अलावा @PIB_India पर भी चमकने लगी हैं। प्लानिंग कमीशन का ट्विटर हैंडल @PlanComIndia तो बाकायदा नौजवानों को जोड़ने के लिए उनसे पंचवर्षीय योजना पर टिप्पणियां मांगने लगा।

राजनीति में सोशल मीडिया का महत्व किस कदर बढ़ गया है इसका अंदाजा एक छोटी सी बात से लगाया जा सकता है। यूपीए 2 के एक बेहतर मंत्री अजय माकन चुनाव से ठीक पहले इस्तीफा दे देते हैं। अजय माकन अब कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के इंचार्ज हैं। @ajaymaken के ट्विटर प्रोफाइल पर ये दर्ज है। नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया अभियान को रोकने के लिए अजय माकन की कांग्रेसी सोशल मीडिया ब्रिगेड हरसंभव कोशिश में लगी है। हैशटैग्स के जरिए नारों की तरह सोशल मीडिया की लड़ाई में हैदराबाद रैली के दिन कांग्रेसी ब्रिगेड #FaekuExpress को टॉप ट्विटर ट्रेंड में दर्ज कराने में कामयाब रही। हालांकि, इसके जवाब में बीजेपी आईटी सेल ने #PappuPassenger को भी ट्विटर ट्रेंड बनाने की भरसक कोशिश की। नरेंद्र मोदी समर्थकों के लिए सुकून की बात ये थी कि ज्यादातर समय ट्विटर का नंबर वन ट्रेंड #NaMoInHyd ही रहा। लेकिन, नरेंद्र मोदी जब हैदराबाद की रैली के बाद हर तरफ से तारीफ पा रहे थे तो अजय माकन का ये दिलचस्प ट्वीट आया

Why is #fakuexpress trending at number one? Has it something to do with some other wrong figures and lies feted out in hyderabad today?

अजय माकन के इस ट्वीट को 128 रीट्वीट मिले और 23 लोगों का ये पसंदीदा ट्वीट बना। लेकिन, जरूरी नहीं कि सारे रीट्वीट अजय माकन के साथ ही हों। 128 रीट्वीट में से एक दिलचस्प जवाब सुन लीजिए-

Interesting @ajaymaken’s role has been reduced to checking twitter trends. That’s  what happens when all that u do is to please 1 dynasty.

हैदराबाद की इस रैली का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार भी सोशल मीडिया पर ही हुआ। आंध्र प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष और अंबरपेट विधानसभा से चुने गए जी किशन रेड्डी @kishanreddybjp ने कई महीने पहले से ही नरेंद्र मोदी की हैदराबाद रैली के लिए समां बांधना शुरू कर दिया था। किशन रेड्डी खुद भी ट्विटर पर अत्यंत सक्रिय हैं। जिस तरह से धरातल की राजनीति में किसी बड़े नेता के नीचे उससे कम प्रभाव वाले नेताओं की उसी लिहाज से सीढ़ी बनती है। वैसा ही सोशल मीडिया के राजनीतिक धरातल पर हो रहा है। नरेंद्र मोदी या फिर कांग्रेस समर्थकों की फॉलोअर संख्या ये बताती है कि कौन कितना तगड़ा प्रचार इस जमीन पर चला पा रहा है और उसको कितना समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा राजनेताओं को नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के बाद लगा। कई लेखों में तो 2014 के चुनाव से पहले ही नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया का प्रधानमंत्री तक कह दिया गया। लेकिन, अब नरेंद्र मोदी या दूसरे नेताओं को सोशल मीडिया प्रभाव के अलावा तथ्य भी जुड़ने लगे हैं। एक सर्वे कह रहा है कि देश की 160 संसदीय सीटों पर सोशल मीडिया यानी वही 18 साल से ऊपर का स्मार्टफोन, टैबलेट वाला नौजवान तय करेगा कि संसद कौन पहुंचेगा। यही वजह थी कि गोवा में बीजेपी की लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनने के बाद जब पहली बार नरेंद्र मोदी मुंबई पहुंचे तो, उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से साफ कहा कि उन्हें 48 लाख सोशल मीडिया आईडी चाहिए। महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटें हैं। यानी हर लोकसभा सीट से एक लाख सोशल मीडिया आईडी। यानी एक लोकसभा में एक लाख लोगों तक मोदी एक झटके में अपनी बात पहुंचाने की तरकीब का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल करना चाहते हैं।

सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा पिछले कुछ समय से सबको लग रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव तब दिखा था जब अप्रैल 2011 में पहले जंतर मंतर और उसके बाद रामलीला मैदान से अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई छेड़ी थी। उस समय टीम अन्ना का सबसे बड़ा चेहरा अरविंद केजरीवाल थे। और भारतीय इतिहास में ये सबसे बड़ा आंदोलन साबित हुआ जो पूरी तरह से सोशल मीडिया की जमीन पर पाला पोसा गया था। हालांकि, उस समय इस आंदोलन के पूरी तरह से सामाजिक होने की बात थी। जो मेरा खुद का भी अनुमान था। लेकिन, धीरे-धीरे अरविंद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने अन्ना हजारे के सामाजिक आंदोलन को अकेला कर दिया। उसके पीछे की बड़ी वजह भी यही रही कि अन्ना हजारे की अपील थी है लेकिन, अन्ना अपनी बात उस वर्ग तक नियमित पहुंचाने का साधन नहीं खोज पाए जो उनके लिए रामलीला मैदान में 13 दिन तक डटा रहा था। और जब सोशल मीडिया के जरिए आने वाली भीड़ बंद हुई तो टीवी का कैमरा और अखबार की कलम भी अन्ना से हट गए। भारतीय राजनीति को उसी समय सोशल मीडिया की जोरदार अहमियत का अंदाजा हुआ था। अन्ना की टीम से राजनीति के मैदान में पूरी तरह से कूद चुके अरविंद केजरीवाल की असल ताकत अभी भी भी सोशल मीडिया पर अपने लोगों तक पहुंचना और जुड़े रहना है।

सोशल मीडिया पर राजनीति का वाकया जम्मू कश्मीर से भी जुड़ा है जब आडवाणी ने ब्लॉग पर धारा 370 के खिलाफ लिखा। ट्विटर पर पूरी तरह से सक्रिय कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लालकृष्ण आडवाणी को चुनौती देने वाले अंदाज में आ गए। उसके बाद अभी किश्तवाड़ में हुई हिंसा की भी असल खबरें पहले सोशल मीडिया के जरिए ही आईं। उसके बाद ही मुख्य धारा के मीडिया में ये खबरें दिखनी शुरू हुईं। ट्विटर पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बीच विवाद टीवी चैनलों की सुर्खियां बना और अगले दिन अखबारों की। फास्ट फूड वाली जेनरेशन के समय सोशल मीडिया नौजवानों के लिए फास्ट फूड की तरह है। फास्ट फूड जैसे हर चौराहे पर वैसे ही सोशल मीडिया की खबर हर स्मार्टफोन, टैबलेट पर।

जिस तरह से असल राजनीति में कीचड़ उछालने और छवि खराब करने का खेल चलता है वो यहां सोशल मीडिया में भी है। जो पसंद नहीं या जिसकी छवि खराब करनी हो उसके नाम से एक आईडी बनाओ और उसी से उसका मजाक बनाओ। कांग्रेसी खेमे खासकर राहुल, सोनिया को सबसे ज्यादा परेशान करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ट्विटर पर भी यही काम जोर शोर से कर रहे हैं। अब @swamy39 बीजेपी में शामिल हो गए हैं। तो, कांग्रेस खेमे ने @BJPShooSwamy के नाम से एक अकाउंट बनाकर उनका छवि बिगाड़ने का अभियान छेड़ रखा है। कुल मिलाकर सोशल मीडिया भारतीय राजनीति को बदल रहा है लेकिन, बहुत सी बातें पुरानी राजनीति की यहां नए रंग में देखने को मिलेंगी।

Wednesday, September 18, 2013

ब्लॉगर, स्वतंत्र वेबसाइट संचालक की पत्रकारिता को मान्यता मिले ?



मेरे बाएं प्रो. हेमंत जोशी, प्रो. बी के कुठियाला
भारत सरकार और राज्य सरकारें पत्रकारों को मान्यता देती हैं जिससे कि उन्हें खबरों के संकलन में सहूलियत हो सके। पहले प्रिंट मीडिया और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (टीवी, रेडियो) के लिए ये गाइडलाइंस तैयार हुईँ और उसी के आधार पर सरकारें पत्रकारों से मान्यता देती हैं। इस मान्यता से उन्हें खबरों के संकलन के लिए सरकारी प्रेस कांफ्रेंस और मंत्रालयों में बिना किसी अड़चन के प्रवेश करने की इजाजत होती है। साथ रेलवे की ओर से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को किराए में भी आधी छूट मिल जाती है। साथ ही राज्य की बसों में भी काफी छूट मिलती है। इस बार भोपाल की मीडिया चौपाल में ये विषय आया कि कैसे ब्लॉगरों, स्वतंत्र वेबसंचालकों को सरकारी मान्यता मिल सकती है। इस बारे में आए सारे सुझावों को संकलित करके इसकी विस्तृत रूपरेखा अनिल सौमित्र तैयार करके आगे बढ़ाएंगे। इसे रखते हुए मैंने इसी बात से शुरुआत की कि जैसे मैं अभी एक टीवी चैनल में हूं और ब्लॉगिंग भी करता हूं तो मुझे ब्लॉगर के नाते सरकारी मान्यता का हकदार नहीं होना चाहिए। ऐसे ही सुझावों में ये भी भी सुझाव आया कि सरकार ब्लॉगरों, स्वतंत्र वेबसंचालकों या कहें नागरिक मीडिया के पत्रकारों को मान्यता देने के लिए अलग गाइडलाइंस तैयार करे। ये इसलिए कि सभी प्रिंट टीवी के समूहों की वेबसाइट है और अभी जो सरकारी नियम हैं उसमें सिर्फ वही फिट होते हैं। ऑनलाइन मीडिया के लिए प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ने जो शर्तें तय की हैं वो स्वतंत्र ब्लॉगरों, नागरिक मीडिया के पत्रकारों के लिए लगभग न पूरी कर सकने वाली शर्तें हैं। वो चाहे रेवेन्यू की हो या फिर दूसरी कई शर्तें। अभी ऑनलाइन मीडिया को लेकर सरकार भी साफ नहीं है। इसका अंदाजा इसी से लगता है कि अभी तक शर्तें पूरी कर लेने वाले ऑनलाइन मीडिया के कितने पत्रकारों को सरकारी मान्यता मिलेगी ये भी साफ नहीं है। PIB की वेबसाइट पर लिखा है गाइडलाइंस अंडर प्रॉसेस। PIB वेबसाइट पर ऑनलाइन मीडिया के लिए जो अभी तय शर्तें हैं वो चिपका रहा हूं।

Online Media
1) The general terms and conditions prescribed for the representatives of print and visual media will also be applicable in case of online editors, correspondents, camerapersons .

2) A news site / portal means a website which has at least 1/3rd of its visible content related to news & current affairs originally reported by its own correspondents.

3) The publications on behalf of which accreditation has already been given will accommodate their online journalists within their existing quota.

4) The site should have paid subscribers. However, it should not be insisted on the subscribers right now but some preference will be given to the news sites having subscribers.

5) Online news agencies will be governed as per the existing rules prescribed for news
Agencies

6) The site should have a minimum annual revenue of either Rs.20 lakhs from its
news portions only OR Rs.2.5 crores from the entire website including its news
portion.

7) The site should be updated regularly and at least 6 times daily.

8) The news portal should be observing the laws of the land in terms of content, service, promotions, finances and any other aspect of functioning.

9) The news site should have been functioning for at least one year.

10) The domain name of the site should be registered for at least the next 5 years
from the date of application.

11) The site should have at least 10,000 page views per day of its news-portion.

12) The issue of determining the authenticity of the site may be decided in consultation
with VSNL in case of any doubt.

13) In the event of a website/portal found involved in any activity perceived as
cyber crime now or in future, all acreditations given to representatives of
that website/portal will be withdrawn at the discretion of the Pr.DG(M&C).


SCHEDULE OF QUOTAS FIXED FOR VARIOUS CATEGORIES OF
ELECTRONIC MEDIA

Online Media
(Guidelines under process)

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...