जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है – ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।
भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।
जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।
जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-
पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।
अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।
और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।
साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।
कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।
कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।
बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।
अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।
भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।
जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।
जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-
पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।
अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।
और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।
साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।
कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।
कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।
बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।
अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।

