Thursday, December 25, 2008

बहिनजी गलती हो गई माफी कैसे मिल पाएगी

उत्तर प्रदेश की जनता को कर्कश आवाज में मुलायम के जंगलराज के खिलाफ चीखकर मायावती ने ठग लिया है। जिन दलितों के दबे होने को लेकर वो सत्ता में आई अब वही दलित होना मायावती के लिए इतना बड़ा हथियार बन गया है कि पूरा उत्तर प्रदेश दलित बन गया है। मनुवाद को गाली देने वाली मायावती सबसे बड़ी मनुवादी हो गई है।

मायाराज- जंगलराज का समानार्थी शब्द लगने लगा है। लेकिन, दरअसल ये जंगलराज से बदतर हो गया है। क्योंकि, जंगल का भी कुछ तो कानून होता ही है। 24 अगस्त को मैंने बतंगड़ ब्लॉग पर लिखा था कि गुंडे चढ़ गए हाथी पर पत्थर रख लो छाती पर लेकिन, अब ये जरूरी हो गया है कि हाथी पर चढ़े गुंडों को पत्थरों से मार गिराया जाए। क्योंकि, पहले से bimaru उत्तर प्रदेश की बीमारी अब नासूर बनती जा रही है। शुरू में जब अपनी ही पार्टी के अपराधियों को मायावती ने जेल भेजा तो, लगा कि मायाराज, मुलायम राज से बेहतर है। लेकिन, ये वैसा ही था जैसा नया भ्रष्ट दरोगा थाना संभालते ही पुराने बदमाशों को निपटाकर छवि चमकाता है और अपने बदमाश पाल-पोसकर बड़े करता है। पता नहीं अभी up (उल्टा प्रदेश) को और कितना उलटा होना बाकी है।

और, सच्चाई तो यही है कि जब जनता ने मुलायम को पलटकर माया को सत्ता दिया था तो कोई बहुत माया की काबिलियत पर नहीं दिया था। मुलायम की कारस्तानियों पर दिया था। लेकिन, अब तो उत्तर प्रदेश की जनता बस यही कह रही है कि बहिनजी गलती हो गई माफ कर दो। लेकिन, इतने बड़े पाप की सजा अब 5 साल के पहले उत्तर प्रदेश की जनता को कहां मिल पाएगी।

Sunday, December 21, 2008

Nawaz does an antulay on Zardari … I don’t think so .. what do u think

मेरे शीर्षक का पहला हिस्सा शनिवार को मुंबई के the free press journal की हेडलाइन थी जिस पर मुझे भयानक एतराज है। और, ये एतराज इसलिए भी बढ़ जाता है कि सिर्फ तुक ताल बिठाने के लिए फ्री प्रेस जर्नल ने ये हेडलाइन ठेल दी। वैसे तो, फ्री प्रेस जर्नल कितने लोग पढ़ते हैं इसका मुझे पता नहीं है लेकिन, फिर भी जाहिर है कुछ लोग तो ऐसे होंगे ही जिन्होंने इस हेडलाइन को पढ़कर नवाज शरीफ के साथ गैरशरीफ अंतुले को भी एक खांचे में डाल दिया होगा।

अब जरा एक नजर डालें कि आखिर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और यूपीए सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने क्या ऐसा किया कि मीडिया उनमें समानता खोजने लगा है। ऊपर से तो, दरअसल सिर्फ एक समानता दिखती है वो, ये कि ये दोनों अपने देश की सरकारों को सांसत मे डाल रहे हैं। और, इन दोनों के बयानों से- अंतुले के बयान से पाकिस्तान और शरीफ के बयान से भारत को- पड़ोसी देश को आरोप में मजबूती मिली है और इन दोनों के अपने देश का पक्ष कमजोर हुआ है।

अब सवाल ये है कि दिक्कत क्या है लोकतंत्र है और दोनों देशों में ऐसे सुर रखने वाले लोग हैं ये, क्या कम है। लेकिन, दरअसल सच्चाई बड़ी भयावह है। मैंने पिछले लेख में जब लिखा था कि जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है तो, कई लोगों ने सवाल खड़ा किया था कि जरदारी पर भरोसा हम कैसे कर लें। लेकिन, मैंने उसी लेख के आखिर में चुनाव के समय और अंतुले जैसी जमात का भी जिक्र किया था जो, बासठ सालों से इसी तरह की बेतुकी बयानबाजी से ही अपना दानापानी चला रहे हैं और स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र की निशानी मानकर कुछ जनता इनके बकरी से मिमियाने को शेर की दहाड़ और फिर इन्हें सवा सेर बनाती गई।

जब विपक्ष के नेता और हिंदुत्व के पुरोधा कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी और कम्युनिस्ट नेता मोहम्मद सलीम आतंकवाद को देश के खिलाफ जंग मानकर सरकार के साथ बिना किसी शर्त के खड़े थे तो, उस समय अब्दुल रहमान अंतुले को एटीएस चीफ हेमंत करकरे की हत्या मालेगांव धमाकों का सच छिपाने की साजिश के तहत की गई लगने लगी। वो, इतने से ही बस नहीं माने। उन्होंने ये भी कह डाला कि ये हिंदू आतंकवाद का हिस्सा हो सकता है। अंतुले ये बयान तब दे रहे थे जब ये साफ हो चुका है कि कितनी बड़ी साजिश के तहत मुंबई पर हमला पाकिस्तानी जमीन से तैयार हुआ। वो, सारे पाकिस्तानी थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि अब अंतुले इतनी बड़ी बेवकूफी को ढोल पीटकर सच करवा लेना चाहते हैं कि हिंदू आतंकवाद की साजिश का पता न चले इसके लिए पाकिस्तानी मुसलमान आतंकवादी, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और लश्कर जैसे संगठनों ने साजिश रची।

करकरे जिस तरह आतंकवादियों की गोली का निशाना बने उसमें ये साबित हो चुका है कि कोई सामान्य सिपाही भी होते तो, उन्हें आतंकवादियों की गोलियां न पहचानतीं। और, मुझे तो डर लगता है कि कहीं ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा न हो। क्योंकि, हर मोरचे पर पिटती सरकार जब आतंकवाद पर पिटी और उसी के साथ चुनाव हुए तो, जनता ने ये साफ कर दिया कि वो, आतंकवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं लेकिन, इस पर राजनीति वो बर्दाश्त नहीं करेंगे। और, शायद यही वजह थी कि आडवाणी हों या फिर कोई और संसद में सब एकसुर में आतंकवाद को कुचलने के लिए एक साथ तेज आवाज में सरकार के साथ बोले।

लेकिन, अंतुले तब भी अलग बोल रहे थे। वो, कह रहे थे कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और unlawfull prevention act पास हुआ तो, इससे अल्पसंख्यकों के हित मारे जाएंगे। अब जब ये बिल आतंकवाद को कुचलने के लिए है तो, हिंदुस्तानी मुसलमान का हित कैसे मारा जाएगा। अंतुले जैसे लोग हिंदुस्तानी मुसलमानों को किस खांचे में खड़ा करना चाहते हैं मैं समझ नहीं पा रहा हूं। थोड़ा दबे-दबे में लालू प्रसाद यादव से लेकर दूसरे बासठ सालों से इसी तरह की तुष्टिकरण की राजनीति पर जिंदा लोग भी अंतुले की खिलाफत करने से बच रहे थे।

लेकिन, जब सोनिया गांधी के विश्वस्त कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहाकि कि अंतुले ने क्या गलत कह दिया। तब मेरा संदेह और पक्का हो गया कि ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस कड़ी बयानबाजी और पाकिस्तान के खिलाफ दबाव बनाकर देश को ये संदेश देना चाहती है कि हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए सबसे काबिल हैं। साथ ही अंतुले, दिग्विजय जैसों की फौज अल्पसंख्यक वोट बटोरने के अभियान में लगा दी जिससे मुलायम, माया जैसों का वोट कटे और लोकसभा में कुछ सीटें बढ़ जाएं। विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस, मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक तीनों ये मान चुके हैं कि लोकसभा चुनावों में आतंकवाद का मुद्दा तो नहीं चलेगा।

अंतुले इतने पर भी बस नहीं हुए। अब वो कट्टरपंथी मौलाना की तरह बोलने लगे हैं। उन्होंने कहाकि वक्फ की जमीन अल्लाह की जमीन है और इस पर अगर किसी ने कब्जा किया है तो, उसके खिलाफ जेहाद जायज है। यानी अंतुले गृहयुद्ध की बुनियाद और पुख्ता कर रहे हैं। अब अगर इसकी प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक भी उसी अंदाज में आया तो, हाल क्या होगा। जब मौका था कि मजबूरी में फंसे पाकिस्तान पर दबाव डालकर आतंकवाद की जड़ में मट्ठा डाला जा सकता था। जब मौका था कि भारत-पाकिस्तान को साथ लेकर अपनी तरक्की बेहतर कर लेता तो, अंतुले, दिग्विजय की कांग्रेस अपनी वोटबैंक पॉलिटिक्स को भुनाने में जुट गई है।

नवाज शरीफ अपने देश के राष्ट्रपति के खिलाफ बोले तो, वो सच्चाई है कि मुंबई हमले में पकड़ा गया आतंकवादी अजमल कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का है। नवाज शरीफ का ये इंटरव्यू जिस पाकिस्तानी जियो न्यूज चैनल पर दिखाया गया उसने वहां के गांव वालों का इंटरव्यू तक प्रसारित किया जिससे ये और पुष्ट होता है। इससे तो, अंतुले का बयान वैसे ही खारिज हो जाता है। लेकिन, अंतुले जैसी राजनीति को पालपोसकर बड़ा करने वाली कांग्रेस अब शायद अंतुले को बुढ़ापे में अपने पुनर्जीवन के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहती है। इसीलिए मैं फिर से कह रहा हूं कि खुली आंख से जरदारी, शरीफ पर भरोसा ठीक है। आंखबंदकर देश में बैठे लोगों की कारस्तानियों पर भरोसा ठीक नहीं है।

Wednesday, December 17, 2008

मुंबई में जिंदगी की रफ्तार से तेज दौड़ रही है दहशत



मुंबई में जिंदगी की रफ्तार कुछ ऐसी है कि छोटे शहरों से आया आदमी तो यहां खो जाता है। उसे चक्कर सा आने लगता है। इस रफ्तार को समझकर इसके साथ तो बहुतेरे चल लेते हैं। लेकिन, इस रफ्तार को कोई मात दे देगा ये, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। पर 16 दिसंबर को रात 8 बजे की करी रोड से थाना की लोकल ट्रेन में सफर के दौरान दहशत मैंने अपने नजदीक से गुजरते देखी।

करी रोड से स्टेशन पहुंचकर रुकी तो, अचानक हवा में कुछ आवाजें सुनाई दीं कि कोई लावारिस बैग पड़ा है। 30 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे कि ठसाठस भरी ट्रेन में एक दूसरे के शरीर से चिपककर पिछले 40 मिनट से यात्रा कर रहे यात्री एक दूसरे से छिटककर प्लेटफॉर्म पर पहुंच गए। फर्स्टक्लास का पूरा कंपार्टमेंट खाली हो गया था। शायद ये मुंबई की लोकल में चलने का लोगों का अभ्यास ही था कि लोग क दूसरे से रगड़ते 30 सेकेंड में ट्रेन के डिब्बे से बाहर हो गए और कोई दुर्घटना न हुई।


4-5 मिनट रुकने और पुलिस की जांच के बाद ट्रेन चल दी और फिर ट्रेन में नशे में धुत एक आदमी की इस बात से कि- कौन साला इस मारामारी की जिंदगी को ढोना चाहता है-जब मरना होगा तो, मरेंगे ही। क्या बाहर मौत नहीं है- मुंबई स्पिरिट जिंदा हो गया। डिब्बे में ही खड़े-खड़े ताश की गड्डी भी खुल गई और सब घर भी पहुंच गए। लेकिन, दरअसल आतंक की जमात का काम बिना कुछ किए पूरा हो चुका है। अब मुंबई ऐसे ही चौंक-चौंककर अनदेखी और देखी दहशत से डरेगी।

Monday, December 15, 2008

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है


पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर लेना चाहिए। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद इसमें पाकिस्तानी धरती के इस्तेमाल के साफ सबूत के बाद इस तरह की आवाजें तेज हो गई हैं। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ही सभी पार्टियों के नेता सड़क पर बयान दे रहे हैं। हां, अच्छी बात ये है कि संसद के भीतर आतंकवाद पर हुई चर्चा में बरसों बाद भारतीय नेता की ही तरह सारी पार्टियों ने बात की। कांग्रेस-भाजपा-लेफ्ट के चिन्हों से भले ही जनता उन्हें अलग नहीं कर पा रही है। अब सवाल ये है कि उस दिन की चर्चा के बाद क्या।

पाकिस्तान और भारत की सरकारें लगभग एक जैसे सुर में बात कर रही हैं। दोनों अपने देश के लोगों का भरोसा खोना नहीं चाहते। दोनों देशों की सरकारों को अब आतंकवाद नासूर बन गया दिख रहा है। और, उस नासूर का मवाद इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शरीर का अंग कटने की नौबत आ गई है। वैसे, इस नासूर को पालने-पोसने में 1947 के बाद से दोनों देशों की सत्ता संभालने वालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत धार्मिक बुनियाद पर नहीं बंटा था, सब रंग मिले थे इसलिए खूनी रंग हम पर बहुत कम चढ़ा और इसकी वकालत करने वाले अकसर सामाजिक तौर पर अलग-थलग हो जाते थे। लेकिन, इसने भारत में एक ऐसी जमात खड़ी कर दी जो, सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर अपने सारे दुष्कर्मों को निपटा देना चाहती है।

ऐसी जमात का काम चलता भी रहा। ये जनता के गुस्से का शिकार होते थे। लेकिन, फिर पलटी मारकर स्वभाव से शांति प्रिय भारतीय जनता की आधी-अधूरी, लूली-लंगड़ी ही सही लेकिन, लोकतांत्रिक पसंद बन जाते थे। और, उधर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का हाल ये कि चाहे तानासाह हो या फिर लोकतांत्रिक हुक्मरान- सबको ये लगता था कि बिना हिंदू-हिंदुस्तान को गरियाए, भारत में आतंकवाद फैलाए उनकी सत्ता बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। सबको जेहाद इस्लाम का सबसे जरूरी हिस्सा लग रहा था और ये भी लगता था कि भारत के मुसलमानों से भी कम आबादी वाला ये देश ही दुनिया में इस्लाम का झंडा उठाकर चल सकेगा। इस चक्कर में पाकिस्तान में जमात ही जमात खड़ी हो गई। ये जमातें पाकिस्तानी तानाशाहों और लोकतांत्रिक सरकारों के सरदारों से बड़ी हो गईं। और, हाल ये हो गया कि अवाम की चुनी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो निपट गईं।

इसके बाद पत्नी विरह ने आसिफ अली जरदारी को शायद इतनी नजदीक से आतंकवाद का मतलब समझाया। जरदारी और उनका विदेश में पढ़ रहा बेटा पाकिस्तान के अमन पसंद लोगों के साथ ही दुनिया के लिए आतंकवाद के खिलाफ एक हथियार की तरह दिखने लगे। लेकिन, ये आतंकवाद इतना कमजोर तो था नहीं। इसे तो, अमेरिका ने ही अपना काम मजे से चलाने के लिए तैयार किया था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मे तालिबान और दूसरे आतंकवादी कैंपों को सुहराकर-फुसलाकर-पुचकारकर अमेरिका ने ही बढ़ाया था। लेकिन, जब इसी जेहाद से अमेरिकी की फटी तो, वो विश्वशांति के बहाने इराक को बरबाद करने का लाइसेंस जबरी ले गया। अगर सबको याद हो तो, पाकिस्तान से बेहद खराब संबंधों के बावजूद भारत की हर तरह की जनता- धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी- बुश को विलेन और सद्दाम को हीरो मानकर चल रही थी। साफ है पाकिस्तान से हमारी लड़ाई-अदावत धर्म की वजह से कम सीमा जुड़ी होने-पड़ोसी होने से ज्यादा है।

कमाल ये है कि मुंबई पर हुए हमले के बाद अपनी पश्चिमी दासता से प्रेरित मानसिकता की वजह से हम सबने इसे भारत का 9/11 बताकर तुरंत अमेरिका के इराक हमले जैसे ही एक्शन की उम्मीद करनी और उस उम्मीद को पूरा करने के लिए सरकार को दबाव में डालने की कोशिश शुरू कर दी। अब सवाल ये है कि क्या हम अमेरिका जैसे हैं। अमेरिकी जनता तो, खुद को दुनिया का दादा समझती है इसलिए उसकी इज्जत बची रहे इसके लिए 2-4 देश बरबाद कर देने वाले शासकों को वो ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन, क्या भारत की जनता का ये मिजाज है। क्या अमेरिका की तरह हम पाकिस्तान से लड़कर जीत सकते हैं। क्या अमेरिका और इराक की लड़ाई में जैसे इराक बरबाद हो गया और अमेरिका का नुकसान बहुत कम रहा। हम भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में वैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।

अब जो लोग ये कह रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान या फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर हमला बोल देना चाहिए। उनके बुद्धि के संतुलन पर मुझे भरोसा एकदम नहीं है। क्योंकि, वो दो तरह के लोग हैं- पहले बेहद चालाक हैं सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक नफे-नुकसान के बयान दे रहे हैं, खुद भीतर से डरे रहते हैं कि हालात इतने न बिगड़ें। दूसरे सचमुच के भावनात्मक बेवकूफ हैं। जो, सच्चे भारतीय हैं लेकिन, आजादी के बासठ सालों में नाकारा सरकारों से इतने नाराज हैं कि उन्हें लगता है कि अब आर या पार हो ही जाना चाहिए।


फिर अगर लड़ाई नहीं तो हम करें क्या। मुझे लगता है कि हमें जरदारी पर भरोसा करना चाहिए। आंखमूंदकर नहीं। जरदारी उतना ही आतंकवाद का मारा है जितना भारत। जरदारी सीधे-सीधे भारत सरकार के सामने झुक नहीं सकता ये उसकी राजनीतिक मजबूरी और कट्टर इस्लामी ताकतों का डर भी है। लेकिन, शायद ये जरदारी का रणनीतिक साथ ही हो सकता है जो, इस समय में भारत को इस मसले पर काफी राहत दे सकता है। जरदारी दबाव में ही सही लेकिन, आतंकवादी संगठनों के ऑफिस पर ताले लगवा रहा है। उन्हें भूमिगत होना पड़ रहा है। अच्छी बात ये है कि इस समय भारत को अमेरिका का रणनीतिक समर्थन भी हासिल है। और, भारत की दुनिया के नक्शे पर बढ़ती ताकत की वजह से दुनिया की दादा संस्थाएं यूनाइटेड नेशंस, सुरक्षा परिषद, वर्ल्ड बैंक, IMF भी भारत की सुन रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को विपक्ष का भी समर्थन हासिल है। क्योंकि, ताजा चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि आतंकवाद का हल जनता चाहती है इस पर राजनीति तो बिल्कुल भी नहीं।

अब बस मुश्किल एक ही है कि चुनाव का समय नजदीक है। लाख सरकार और विपक्ष संसद मे चिल्लाकर बोल चुके हैं कि सब एक साथ हैं। लेकिन, सभी इसका राजनीतिक फायदा लेना चाहेंगे। सरकार ने अगर थोड़ी कार्रवाई को अपनी कामयाबी के खाते में जोड़कर वोट बटोरने की कोशिश की तो, विपक्ष तुरंत ही सरकार के बहीखाते के आतंकवाद पर नाकामी के किस्सों को मंच से चढ़कर चिल्लाने लगेगा। तब जरदारी को भी राहत मिलेगी, आतंकवादियों को भी फिर से मौका मिलेगा। वैसा ही जैसा हम पिछले बासठ सालों से देते आ रहे हैं।

Thursday, November 27, 2008

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आता कि जेल में बंद आतंकवादियों को किसके लिए बचाकर रखा हुआ है। क्या फिर किसी खूंखार आतंकवादी के लिए देश के कुछ लोगों को बंधक बनाया जाएगा तब। अब अगर मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल को कुछ घंटों के लिए ही सही बंधक बना सकते हैं। तो, साफ है कि देश बंधक है। औऱ, हमारे कमीने नेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता सता रही है। उसको भड़का दूसरा इसका वोट ले लेता है। ये इसको भड़काकर उसका वोट ले लेता है।


संसद पर हमले के अलावा अब तक आतंकवादी चोरी-छिपे बम रखकर निर्दोष हिंदुस्तानियों की जान लेते थे। अब नपुंसक सरकार के राज में इनका साहस ऐसा बढ़ गया है कि ये दौड़ा-दौड़ाकर हमारी जान ले रहे हैं। इधर,हमारा नपुंसक गृहराज्य मंत्री शकील अहमद जानकारी देने के बजाए टेलीविजन चैनल पर एंकर से झगड़े कर रहा था। उधर, मुंबई में एंबुलेंस में हमारी लाशें लदकर हॉस्पिटल पहुंच रही थीं।

Monday, November 17, 2008

मन के सुकून के लिए

मेरे मित्र रवीश इस बार बहराइच गए तो, उन्हें दर्दनाक खबर सुनने को मिली। उनके दोस्त की हत्या कर दी गई जिसे पुलिस दुर्घटना बता रही है। पत्रकार होने के बावजूद वो, बहराइच में कुछ खास नहीं कर पाए। उन्होंने ये वाकया मेरे पास भेजा जिसे में ब्लॉग पर छाप रहा हूं। कोई और मदद तो हम दूर बैठकर शायद नहीं कर सकते। लेकिन, आवाज तो उठा ही सकते हैं।

अब जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कम से कम राकेश की मौत ने यह बता दिया...मैं पिछले दिनों अपने शहर बहराईच गया था वहीं पता चला कि मेरे दोस्त राकेश साहू का क़त्ल हो गया....हालांकि पुलिस ने बताया कि उसकी हत्या नहीं बल्कि दुॆघटना हुई...लेकिन मौके-ए-वारदात और मेरे दोस्त महेद्र के प्रयासों के चलते हम यह समझाने में कामयाब रहे कि राकेश का बाकायदा क़त्ल किया गया है....राकेश रंगकॆमी..साहित्यकार..और मददगार शख्श था...हमेशा हंसते हुए वो दूसरों की मदद करता था लेकिन पैसों से नहीं बल्कि साथ खड़े होकर..मैं जब भी अपने घर से वापस दिल्ली या कहीं और जाने लगता तो वह कोशिश करके मुझे छोड़ने रोडवेज तक आता था..और बाद में नम आंखों से हाथ हिलाता रहता तब तक जब तक मेरी बस उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाती

...जब उसकी मौत की खबर मुझे पता चली तब मैं कोतवाली से लेकर लोकल अखबार के दफ्तरों के चक्कर काटता रहा कि शायद उसके क़ातिलों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी दिखाए..लेकिन अखबार ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिस को नाखुश न ही किया....और वही छापा जो पुलिस बता रही थी..लेकिन बाद में एसपी चंद्रप्रकाश से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि यह मॆडर और हम जल्द ही वॆक आउट कर लेंगे....लेकिन २० दिन बीतने को है कोई भरोसा पैदा करने वाला काम पुलिस ने नहीं किया..ऊपर से जो राकेश शहर के लिए बेगाना नहीं था उसकी लाश को पुलिस ने लावारिश बनाकर जला डाला...बहराईच में मेरे जैसे उसके दोस्त,साहित्यकार और रंगकॆमी सब उसके क़ातिलों को सजा दिलवाना चाहते हैं..लेकिन कोई पचड़े में नहीं पड़ना चाहता है

...मैं जब तक शहर में था तब तक उसके लिए भाग दौड़ करता रहा लेकिन जैसे ही मैं दिल्ली आया लोगों का उत्साह ठंडा पड़ गया... जब भी सोचता हूं कि क्या राकेश का यही हश्र होना चाहिए क्या राकेश को चार अदद कंधे भी उस शहर में नहीं मिल पाया जिसके बारे में उसने बहुत कुछ सोच रखा था....जब मैं बहराईच जाता था तो अक्सर हम मिलते खाते-पीते और बड़ी बातें करते लेकिन सोचता हूं राकेश के मामले में कितना असहाय हो गया हूं...मीडियाकॆमी होने के नाते ज्यादा कोफ्त से मन भर जाता है..कभी..कभी अवसाद से सिर भिन्नाने लगता है....

राकेश के बारे में अगर मैं आपको बताऊं तो वह बहराईच का ब्लैक बेल्ट था...रंगकॆमी था....साहित्यकार था..और अधिकतर कस्बाई लड़कों की तरह थोड़ी आवारागॆद भी था...उसने झटके में प्यार किया फिर शादी भी की...लेकिन झटके में ही शादी टूट भी गई..उसने कभी खुल कर बताया नहीं कि आखिर जिसे इतना प्यार करता था उससे इतनी नफ़रत क्यों हो गई लेकिन एक बार झोंके में उसने कहा था कि पत्नी की मां ठीक नहीं है

..हमने इसलिे ज्यादा पूछा नहीं कि घरेलु मामला है..लेकिन फोन पर अक्सर कहता था कि रवीश भाई मेरी जान को ख़तरा है मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं दूंगा..लेकिन वो राकेश से छुटकारा चाहती है...उसका क़त्ल क्यों हुआ..कैसे हुआ..नहीं मालूम है....लेकिन उसकी लाश का जब फोटो मैंने देखा तो उसका गला कटा था....कमीज़ और जूते मोजे गायब थे...जेब से मोबाइल और पॆस नदारद था..कैसे हो सकती है राकेश की हत्या .....आरुषि को कवर करते हुए मैने जाना कि ब्लाइंड मॆडर किसे कहते हैं....लेकिन इतना ब्लाइंड होगा राकेश के मामले में मुझे अंदेशा नहीं था..
प्लीज अगर कुछ कर सकते हों तो करिए......

रवीश रंजन शुक्ला

Monday, November 03, 2008

लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी हम ऐसे ही रहेंगे

हमारा पिटना, मरना देश भर की चिंता की विषय बना हुआ है। देश (कहने भर को ही है-हर मुद्दे पर तो बंटा है) पता नहीं ऐसे सोच रहा है कि नहीं लेकिन, हम ऐसे ही सोच रहे हैं। क्योंकि, हम आजादी के बाद से (और, मुझे तो लगता है कि उत्पत्ति के साथ ही) ही ये मानने लगे हैं कि हम कमजोर होते हैं तो, देश कमजोर होता है। हम मजबूत रहते हैं तो, देश मजबूत होता है। ये अलग बात है कि जब हमसे कोई पूछता है कि हमने देश की मजबूती के लिए कभी कुछ किया क्या। तो, जवाब आता है- हमहीं तो, देश चलाते हैं- दिमाग चलाते हैं। और, दिमाग चलाना तो, बड़ा काम है। अब जो, दिमाग नहीं चला पाए 60-62 सालों में अब वो सब हम पर लात-जूते गोली चला रहे हैं। फिर भी हम दिमाग चला रहे हैं- रिरिया रहे हैं थोड़ा लात कम चलाओ भाई।

हम कहते हैं कि हम देश को ढेर सारे प्रधानमंत्री, रेलमंत्री से लेकर पता नहीं कौन-कौन त मंत्री और बड़े-बड़े ब्यूरोक्रैट देते हैं। हम कहते हैं कि हम देश के हर हिस्से में जाकर वहां का उत्थान करते हैं। हम कहते हैं कि हम किसी भी हालात में रह सकते हैं किसी भी हालत तक पहुंच सकते हैं। हमारी वजह से देश के दूसरे राज्यों के उद्योग-धंधे चल रहे हैं। हम गए तो, दूसरे राज्य चौपट हो जाएंगे। हम कहते हैं कि हमने जितने बड़े आंदोलन किए उससे देश की सामाजिक दशा-दिशा सुधरी। कुल मिलाकर हम कुछ इस तरह से जीते हैं कि इस देश में जो कुछ भी हैं- हम हैं।

हमें सबकी बड़ी चिंता है। अब हम पूरे देश को अपना मानते हैं इसलिए देश भर में कहीं भी जाकर रहते हैं। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की है- इसलिए दुनिया के किसी भी कोने में बस चार रोटी के जुगाड़ में निकल पड़ते हैं। बाकी सब जहां जाएंगे वहां हमारे भाई-बंधु तो, कुछ न कुछ चिंता करेंगे ही। हम रेलगाड़ियों-बसों में जानवरों की तरह एक के ऊपर एक लदकर सफर करते हैं। अब तक तो आप सबने हमें पहचान ही लिया होगा। हां, हम बिहारी हैं। जो, विस्तार योजना में अब उत्तर भारतीय कहे जाते हैं। वैसे इस बिहारी या उत्तर भारतीय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भइया-बाबू को हम नहीं जोड़ पाए हैं। ई हम जो हैं ना सिर्फ बिहार से लेकर गोरखपुर के रास्ते उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़-जौनपुर तक ही पाए जाते हैं।

लेकिन, इधर थोड़ी मुश्किल हो गई है। अब हम परोपकारियों को कोई आने नहीं दे रहा है। सब हम जैसी बातें करने लगे हैं। सब कह रहे हैं कि हम खुदही बना लेंगे चलो भइया-बाबू लोगों निकल लो यहां से। लेकिन, हम तो वसुधैव कुटुंबकम वाले हैं। हम देश बाहर जाकर बसे और सूरीनाम मॉरीशस में हम लोग राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री बनके वहां के लोगों का भला कर रहे हैं तो, हम इनकी बेवकूफों की बातों में कैसे आते। इन सब बेवकूफों को क्या पता कि हम नहीं रहेंगे तो, इनके यहां की राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति कैसे चलेगी। ये सब तो दिमाग वाले काम हैं। लेकिन, ई ससुरे सुनी नहीं रहे हैं। कह रहे हैं सीधे से नहीं मानोगे तो, मारने-पीटने लगे। राम-राम हम तो इनका भला कर रहे हैं- इनकी गारा-मजदूरी से लेकर रात भर जागके चौकीदारी और चर्चगेट से ठाणे-वाशी, मीरा-भायंदर प्रेम से हमहीं तो लेकर जाते हैं। फिर भी ई हमको मार रहे हैं। हम अब फिर रिरिया रहे हैं- सबको मना थोड़ी न है तुम भी यही सब करो। अब उनके दिमाग तो है नहीं अपने पागल नेता के बवकावे में आ गए हैं कह रहे हैं कि ये सब भागेंगे तो खुदै ज्यादा काम मिलेगा।

उनके नेता को पागल हम नहीं कहे हम तो, उनके साथ बंबई में रहते हैं (उनका नेतवा बंबई सुनेगा तो, फिर मारेगा)। लेकिन, हमारे नेता तो, पटना-बिहार-दिल्ली रहते हैं। ऊ कहे कि हमरे अलावा सबका नेता पगला है। हमरे नेता को नहीं पहचाने। अरे वही जो, करीब पंद्रह साल राज करके हमको इतना (ना)लायक बना दिए कि हमको लगा कि चलो अब वसुधैव कुटुंबकम को चरितार्थ करके ही कुछ हो पाएगा। बिहार में ई करने के बाद अब रेल में यही कर रहे हैं। अब लेकिन, रेल तो देश भर में चलती है। बस यही पंगा हो गया।

हमने बड़ा चेत के-मशक्कत करके इनको हटाए। लेकिन, हम कहे न हम दिमाग वाले हैं। तो, सोचिए हम पर राज करने वाला नेता (जो, दूसरे नेताओं को बुड़बक-पागल कहके बेईज्जती करता है और पटना युनिवर्सिटी के जमाने से उसी पागलपन-बुड़बकई को ब्रांड बनाके मेहररुवौ को मुख्यमंत्री बना दिया) कितना दिमागदार होगा। अब ऊ कह रहा है कि हम पर खतरा है यानी साफ है देश पर खतरा है। इसलिए हमारे सारे लोग राजनीति बंद करें और इस्तीफा दे दें। क्योंकि, राजनीति करने का आजीवन पट्टा तो, ऊ हमारे कान में बड़े-बड़े बाल वाले नेताजी के ही पास है। ऊ कह रहे हैं कि उनके पटना युनिवर्सिटी के दिन वाले साथी और उसके बाद से परम विरोधी (बीच-बीच में हंस बोल लेते हैं तो, गलत संदेश न समझ लीजिएगा) नेताजी देश को गलत संदेश दे रहे हैं। इस्तीफा नहीं दे रहे हैं।

काहे लिए इस्तीफा। इसलिए कि हमको बंबई में पीटा गया। हममें से एक को गोली मार दी गई। हमारे उस एक का गुनाह कोई थोड़ी न था। उ तो, बस थोड़ा गुस्सा दिखा रहा था। बेचारे के पास लाइसेंसी नहीं थी तो, देसी कट्टा टाइप रिवॉल्वर जुगाड़ करके किसी तरह मुंबई आया और गुस्से में चीखा। एकाध फायर इधर-उधर किए बेचारा बार-बार कहता रहा कि हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। बस राज ठाकरे को मारना चाहते हैं पुलिस कमिश्नर से मेरी बात करा दो। अब क्या उसे इतना भरोसा था कि कमिश्नर उसे साथ ले जा कर राज को गोली मारने में मदद करेगा।
खैर कमिश्नर की जगह कम पढ़े-लिखे दरोगा-सिपाही आए। और, बेवकूफ हममें से उस एक ज्यादा दिमाग वाले की बात नहीं समझ सके। और, उसे गोली मार दी। बस इसके बाद हमारे सारे नेता (क्योंकि, हम तो अब भी यही मानते हैं कि नेतागिरी करने का दिमाग वाला काम तो बस हमारे ही वश का है) एक साथ खड़े होकर एक सुर में दूसरे पागल नेता के खिलाफ जुटे। पीएम-मैडम के सामने रिरियाए। कान में बड़े बाल वाले नेता बाहर निकले तो, समझ में आया कि अरे अभी तो हमारी सत्ता हमारे विरोधी के पास है। बस वितंडा कर दिया।

अब उनसे कोई राज्य की बात करता है तो, ऊ साध्वी प्रज्ञा की चर्चा करने लगते हैं। बटला में आतंकवादी मारे जाते हैं। तो, उनके दूसरे फोटोकॉपी नेताजी (अरे वही जो थोड़ा तुतलाकर बोलते हैं फिर अमर सिंह विस्तार से मीडिया को बयान समझाते हैं, यहां तक कि जो, ऊ नहीं भी बोले होते हैं ऊ भी समझा देते हैं) की पार्टी के हमारे लोग प्रदर्शन करते हैं। कहते हैं नाहक अल्पसंख्यक भाई परेशान किए जा रहे हैं। नेताजी खुद रक्षामंत्री रह चुके हैं लेकिन, इनके सिपहसालार पुलिस-फौज का मनोबल तोड़ने वाला हर बयान दे डालते हैं।

लेकिन, इस सबके बाद भी हम गाना गा रहे हैं हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया। हमको समझ में नहीं आ रहा है कि हम मुंबई से सटे ठाणे स्टेशन पर जब हमको पिटते देखते हैं तो, इतना गुस्सा गए कि बंबई हत्या करने चले। लेकिन, पटना से गोरखपुर स्टेशन पर जब उससे भी गंदा करम होता है तो, किसी राहुल राज का खून नहीं खौलता। ऊ घर छोड़कर दूसरी जगह सुख-शांति तलाश लेता है। सालों से हमारे हरामखोर नेता हमारा खून चूस लिए-हमारी इज्जत फालूदा बनाके कुल्फी के साथ खा गए- हमारा खून नहीं खौला। हमें हमारे घर से निकाल बाहर किया इन कमीनों ने और हम इनके पीछे झंडा-डंडा लेकर खड़े हैं कि हम तो महान हैं हमारा काम तो, सिर्फ राज करना है। हम लात-गोली मुंबई में खा रहे हैं। हम असम में काटे जा रहे हैं। और, ई हरामखोर बुद्धिमान सबको बांटके राज करने के जतन ढूंढ़ रहे हैं। अब एक राज भी राज करने के लिए इनसे सबक सीखके उस्ताद बन रहा है।

पता नहीं किसी राहुल राज को नजदीकै में इनको मारने जितना गुस्सा क्यों नहीं आया। 2000 किलोमीटर का सफर करके आने तक गुस्सा बना रहा। 10-5 किलोमीटर की रेंज में चारो तरफ घूमते बड़े-बड़े कमीने क्यों नहीं दिखते। एक बार बाहर निकले तो, हम सड़ी-गली जिंदगी जीकर भी घर लौटना नहीं चाहते। लेकिन, हम गुस्सा हैं उनसे जिनके घर में हैं। हम उनसे गुस्सा नहीं हैं जिनकी वजह से हम बेघर हो रहे हैं। हम बंबई कट्टा लेकर किसी को डराने-धमकाने चले जाते हैं लेकिन, जहां हैं जिससे डरके रहते हैं उसके लिए गंगाजल का इस्तेमाल नहीं कर पाते। हां, फिल्म में तो हम ताली खूब बजाते हैं। यही वजह है कि राजेंद्र यादव मुंबई मिरर में बिहारी ब्रांड पर लिख मारते हैं कि बिहारी सबसे पहले बिहार से डिटैच होता है। लेकिन, जहां रहता है वहां बिहारी ही रहता है। अब ई यादवजी को कौन समझाए हम डिटैच मन से नहीं मजबूरी में हो रहे हैं। लेकिन, हम तो बस यही सोचकर डरे जा रहे हैं कि ये मजबूरी खत्म होके कभी हमारे मन का भी काम होगा या हम लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी ऐसे ही रहेंगे। हम गाना गाते रहेंगे हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया।

Tuesday, October 28, 2008

आइए दीपावली पर भारत को कंजरवेटिव बनाने का संकल्प लेते हैं

मेरी याद की पहली दीवाली है जिसका उत्साह कम से कम मीडिया के जरिए तो काफी ठंडा नजर आ रहा है। कई चैनलों पर तो लुढ़कते शेयर बाजार की वजह से काली दीवाली तक चमकता नजर आया। मुंबई में नौकरियां जाने के बाद हंगामा करते डेंटेड-पेंटेड जेट के कर्मचारी चैनलों पर काली दीवाली की नींव पुख्ता कर रहे थे। ये अलग बात है कि नरेश गोयल की आत्मा की आवाज ने फिर से मंदी में नौकरी जाने की स्टिंग के विजुअल में से इन कर्मचारियों को निकालने पर मजबूर कर दिया।

ये दीवाली ऐसी आई है कि दुनिया के सबसे जवान देश के चेहरे की झुर्रियां और गहरी होती जा रही हैं। अखबारों-चैनलों की खबर की शुरुआत कुछ इस तरह से हो रही है कि बुरी खबरों का सिलसिला अभी बंद नहीं हुआ है.. एक और बुरी खबर ये है.. अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगातार बुरी खबरें आ रही हैं.. घरेलू मोरचे से भी बुरी खबरें आ रही हैं.. । हाल कुछ ऐसा कि जवान भारत अगर मीडिया के जरिए अपनी (बीमारी) के बारे में पता करना चाहता है तो, उसे लगता है कि देश तो, ICU में जाने लायक हो गया है।

कभी-कभी तो बीमारी लाइलाज लगने लगती है। 60 साल में बेकारी-बदहाली का मर्ज भी इतना खतरनाक नहीं लगा जितना एक अंकल सैम की बीमारी ने 60 साल के जवान भारत को बीमार कर रखा है। बेरोजगारी के आंकड़े अमेरिका में आते हैं तो, भारत में अच्छा भला लाख-पचास महीने पाने वाला भी डरने लगता है। इसी साल की 11 जनवरी तक उत्साह से सेंसेक्स के पचीस हजार जाने और रिलायंस को 3500 रुपए के भाव पर खरीदने की सलाह देने वाले बाजार के जानकार (पता नहीं कितना) कह रहे हैं बाजार के बॉटम का अंदाजा लगाना मुश्किल है। अब, भइया जब इतने बुड़बक थे तो, ऊपर वाला लेवल कहां से ले आए थे।

लीमन ब्रदर्स डूबते हैं तो, ICICI बैंक के डूबने का कयास हम खुद लगा लेते हैं। AIG लाइफ इंश्योरेंस का अमेरिका में दिवाला निकलता है तो, AIG के साथ भारत में इंश्योरेंस का कारोबार शुरू करने वाले टाटा की साख पर बट्टा लगने लगता है। किसी को टाटा की कई पीढ़ियों के कारोबारी कौशल पर भरोसा ही नहीं रह जाता। ये भी नहीं सोचते कि यही टाटा- कोरस से लेकर जैगुआर-लैंड रोवर तक टाटा का फौलादी ठप्पा जड़ चुके हैं।

6 महीने तक अर्थशास्त्र के विद्वानों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह-वित्तमंत्री पी चिदंबरम-योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, की तिकड़ी ये भुलावा देती रही कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल बहुत मजबूत हैं उसे कोई खतरा नहीं। अब ये तो बड़े जानकार हैं फिर भी इन्हें पता नहीं कैसे समझ में नहीं आया कि फंडामेंटल जिस वजह से मजबूत थे उन्हीं वजहों की जब बुनियाद दरक रही है तो, फंडामेंटल मजबूत कैसे रह जाएंगे। खैर, ये इनको नहीं समझ में आया आम आदमी को समझ में गया। ये आम आदमी (भारत का नहीं शेयर बाजार में इसे रिटेल इन्वेस्टर कहते हैं) कौड़ियों के भाव पर भी मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों के शेयर खरीदने को तैयार नहीं हुआ।

बाजार गिर रहा है, लोकसभा (कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी) चुनाव सिर पर हैं, नौकरियां जा रही हैं, कंपनियों के नतीजे खराब हो रहे हैं जो, अच्छे भी हैं वो, बाजार की उम्मीदों से कम हैं (बाजार की उम्मीद दूल्हे का लालची बाप हो गया है जिसको कितना भी दहेज कम लगता है), बाजार की इसी उम्मीद पर खरे न उतरने की वजह से कंपनियां अपनी बढ़ने की योजना रोक रही हैं, कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं, 2 साल में 3 गुना मुनाफा दने वाली प्रॉपर्टी इधर 6 महीने में बढ़ने को छोड़िए रुपए में चवन्नी कम हो गई, प्रॉपर्टी से मुनाफा कमाने की इच्छा रखने वाले की चवन्नी घटी तो, उसे प्रॉपर्टी में चवन्नी लगाने का इरादा भी त्याग दिया, खरीदने वाले मन मारकर बैठ गए लेकिन, घर बनाने वाले लगे पड़े रहे इंडिया ग्रोथ स्टोरी के चक्कर में, फिर आधे पड़े प्रोजेक्ट को बैंकों ने कर्ज देने से मना कर दिया, अमेरिका का गोलमाल भारत में आकर गोलमाल रिटर्न हो गया। एक नजर में तो भारत का हाल एकदम अमेरिका जैसा दिख रहा है। उनकी तरक्की में हम उनके जैसे नहीं बन पाए। बदहाली में उनके इशारे पर ता-ता- थैया कर रहे हैं। बड़ी मुश्किल से अमेरिकी भी ये मानने लगे हैं कि उनके नीति नियंता कुछ गलत भी करते हैं।

मैं भी मुंबई में एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूं। मैंने भी शेयर बाजार में पैसे लगाए हैं। मैं भी इंडिया ग्रोथ स्टोरी से प्रभावित हूं। मैं भी मीडिया के जरिए देश की अर्थव्यवस्था का हाल देखता-समझता हूं। मैं डर गया हूं। लेकिन, 34 घंटे के मुंबई से इलाहाबाद के सफर ने मेरा डर खत्म कर दिया। अरे, भई मैं राज ठाकरे के डर से मुंबई से इलाहाबाद नहीं आया। इलाहाबाद मेरा घर है और मैं यहां अपनी दीवाली हमेशा की तरह रोशन करने आया हूं।

मुंबई में प्रॉपर्टी मार्केट क्रैश हो रहा हैं। यहां अब भी जमीन महंगी ही हो रही है। यहां किसी ने घर करोड़ो में खरीदकर ताला नहीं बंद किया है। यहां 10-20-50 लाख का जो, भी घर खरीदा या तो उसमे रह रहे हैं या किराए पर उठा है। सिविल लाइंस में कार्निवाल (मेला) लगा है तो, रामबाग के सेवा समिति विद्या मंदिर में वर्ल्ड फन फेयर लगा है। धनतेरस के दिन सिविल लाइंस में गाड़ियों की कतारों से जाम लगा हुआ था। दूसरे दिन अखबार में खबर थी – धनतेरस पर साढ़े आठ करोड़ की कारें, चार करोड़ की मोटरसाइकिलें बिकीं। धनतेरस के बहाने साल भर से मिक्सी, फ्रिज से लेकर बाइक, कार- सबका प्लान रुका हुआ था। ये कंजरवेटिव भारत है जो, जरूरत की चीज साल भर टाल देता है। धनतेरस पर घर में आया नया सामान सबको खुश कर देता है।

मुंबई में बड़ी प्लाज्मा टीवी किसी भी दिन अचानक आ जाती है। विलासिता का एक सामान जुड़ता है लेकिन, खुशी नहीं आती। इलाहाबादी बड़ी टीवी खरीदकर मेगा इलेक्ट्रॉनिक्स से टीवी पैक करते-करते ही दोस्तों-रिश्तेदारों को बता देता है धनतेरस पर बड़ा टीवी लिया। बस पैक कर रहा है बस दुई मिनट में घर पहुंच रहे हैं। 125 करोड़ के आसपास के तरक्की वाले भारत में सिर्फ 2 करोड़ से कुछ ज्यादा लोग शेयर बाजार के जरिए तरक्की कर रहे थे। बचा 123 करोड़ कंजरवेटिव भारत है। अब इसी कंजरवेटिव भारत के सहारे ICICI बैंक के CEO&MD के वी कामत को भी भरोसा है कि हम पर खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि, हम बहुत कंजरवेटिव सिस्टम में काम करते हैं। ये बात उन्होंने सीएनबीसी आवाज़ संपादक संजय पुगलिया से खास मुलाकात में कही।

मैं भी मुंबई के मुक्त बाजार से इलाहाबाद के कंजरवेटिव भारत आ गया हूं। कोई डर नहीं लग रहा- सब मस्त हैं। कंजरवेटिव भारत में सब ठीक चल रहा है। न तो, किसी कमर्शियल या रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट के धीमे होने की खबर है ना तो, किसी की नौकरी जाने की खबर है। बल्कि, कंपनियां तो, अब कंजरवेटिव भारत से कारोबार जुगाड़ने के लिए URGENT PLACEMENT की मुद्रा में धड़ाधड़ नियुक्तियां कर रही हैं। दीपावली पर उतनी ही आतिशबाजी-धूम-पटाका है। सबके घर में छोटी-बड़ी लक्ष्मी गणेशजी की मूर्तियां आई हैं। दीवाली पर सिर्फ रोशनी है।

इस रोशनी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह-वित्तमंत्री पी चिदंबरम-योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, की तिकड़ी के भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल मजबूत होने के दावे सही लगने लगे हैं लेकिन, ये इस तिकड़ी के ग्लोबल विलेज का हिस्सा बने भारत की वजह से नहीं है। ये कंजरवेटिव भारत की ग्रोथ स्टोरी है। ये सचमुच बहुत मजबूत हैं और उसे कोई खतरा नहीं। सबको शुभ दीपावली और आइए इस दीप पर्व पर ये संकल्प लें कि, कंजरवेटिव भारत को इतना तो बचाए ही रखेंगे कि अमेरिका की सेहत खराब होने से हम ICU में न पहुंच जाएं।

Monday, September 01, 2008

जहां हर पांचवा पर्यटक भारतीय है

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। चौथी और आखिरी कड़ी में वहां भारतीय पर्यटकों पर नजर

मेघा सम्पत बता रहीं थी कि हर साल पूरी दुनिया से दक्षिण अफ्रीका जाने वाले पर्यटकों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत से आते हैं। यहां से भारत जाने की संख्या लगभग बराबर ही है। बालीवुड के निमार्ताओं को भी जोहांसबर्ग, केपटाउन और डरबन की लोकेशन काफी रास आ रहीं हैं। गांधी और किक्रेट ऐसे दो बिंदु है, जो दो देशों को आपस में जोड़ते हैं। मेघा सम्पत साउथ अफ्रीका टूरिज्म की इंडिया के लिए कंट्री मैनेजर हैं। केपटाउन के होटल मिलेनियर्स में एक शाम हम सब बैठे थे। अपने शक-सुबह और सवालों पर आपस में बातें कर रहें थे।

मेघा जिस समय यह बता रहीं थी, पास की दूसरी टेबिल पर बैठे दो काले लोगों से मैं पूछता हूं। शाम के साढ़े सात बजे हैं, मैं बाहर अकेले घूमने जाना चाहता हूं। दोनों मिलकर मुझे रोकते हैं। बाहर हो सकने वाले संभावित खतरे से मुझे आगाह करते हैं। इससे एक दिन पहले पहले दोपहर जब मैं बेलेबेले मार्केट में मोबाइल पर बात करता हुआ पैदल टहल रहा था। तभी मुंबई से यहां आकर बस गए किशोर भाटिया ने मुझे टोंका था। अकेले सडक़ पर यूं मत निकला कीजिए कोई भी मोबाइल छीन लेगा। मेघा हों, होटल के दो दक्षिण अफ्रीकी या किशोर भाटिया सभी अपनी जगह सही हैं। दक्षिण अफ्रीका में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। बेहतर कानून व्यवस्था का विश्वास अगर अंतराष्ट्रीय जगत को मिल जाए तो यह तरक्की कई गुना बढ़ सकती है। अच्छी बात यह है कि दक्षिण अफ्रीका ऐसी कोशिशें कर रहा है।

दक्षिण अफ्रीका में बाजार और परिवार दोनों को मिलाकर एक खास किस्म की पर्यटन संस्कृति विकसित की है। देश के दर्शनीय स्थलों को घूमने के साथ वहां के समाज से आत्मीय संवाद का सुख मन को छू जाता है। लोगों ने अपने घर में कुछ कमरे विशिष्ट सुख-सुविधाओं वाले बना रखे हैं। वे जिसका इस्तेमाल गेस्ट हाउस के तौर पर करते हैं। केपटाउन की वाइन वैली से लौटते समय दोपहर भोज के लिए हम वुल्फकाफ नाम के एक गेस्टहाउस कम रेस्ट्रां में दोपहर भोज के लिए रूके थे। खाने की तैयारी के बीच हमारा परिचय हाउस लेडी रोनीफा से कराया गया। बताया गया कि इनकी देखरेख में ही खाने की पूरी तैयारी हुई है। ये जो स्पेशल चाकलेट केक है, इसे इन्होंने खुद बनाया है। भारतीय शैली में अभिवादन के लिए हाथ जोड़े लगातार चेहरे पर मुस्कुराहट लिए रोनिफा हमारे बीच थी। हम उसके खाने की तारीफ कर रहे थे। किसी-किसी डिश की रेसेपी या उसमें क्या पड़ा है, जानने की कोशिश भी। उस हाउस लेडी ने बैगन का भरता बनाने की बात कही थी। खाते समय बैगन तो था, भरता जैसा कुछ भी नहीं बन सका था। हम सब उसकी भावनाओं की कद्र करते हुए सब खा गए थे। यह पारिवारिकता का ही अहसास था, जहां हमने बाजार की तरह कोई टोंका-टाकी नहीं की। उस लेडी ने भारत आने-जाने के सहेज कर रखे गए अपने बोर्डिंग पास जब हमें दिखाए और स्वदेश फिल्म की सीडी भी।

जंगल और संपन्न वन्य जीवन दक्षिण अफ्रीका में पर्यटकों को सर्वाधिक आकर्षित करता है। इधर निजी क्षेत्रों ने जंगल खरीदकर बहुत बड़े-बड़े गेम शेयर एरिया विकसित किए हैं। माबूला, भारतीय उद्योगपति विजय माल्या का 12 हजार हेक्टेयर के जंगल को घेरकर बना गेम शेयर। भारतीयों के लिए इसकी लोकप्रियता का अंदाजा यहां की गेस्ट रिलेशन मैनेजर अनीता बब्बर के इस दावे से लगाइए कि कोई भी भारतीय हस्ती जोहांसबर्ग के पास से भी होकर गुजरे और यहां न आए, ऐसा बहुत कम ही होता है।
जोहांसबर्ग हो कि कैपटाउन या दूसरा कोई शहर। जैसे आप अपनी पहचान पर्यटक के तौर पर देते हैं, वैसै ही आपको सवालनुमा सुझाव मिलेगा, सन सिटी गए कि नहीं। जोहांसबर्ग से 130 किलोमीटर पहले। अठारवीं शताब्दी के मध्य में भूकंप से तबाह हो गई एक बस्ती के अवशेष 1920 में तलाशे गए। इस समय अगर आप वहां जाएं तो पाएंगें कि उसे दुनिया के आधुनिकतम और विकसित शहरों के टक्कर में खड़ा कर दिया गया है। अब वहां बस्ती तो नहीं है, पूरा क्षेत्र बाजार में बदल गया है, लेकिन चमक-दमक के शौकीन इस शहर से कई दिन रूके बिना जाना नहीं चाहेंगे। सनसिटी में एक पुराना शहर इतनी बारीकी से नकली तरीके से बनाया गया है कि हर जगह पर चौंक जाता है कि ये भी अनुकृति है क्या? नकली समुद्र है, जिसमें निधारित समय पर रोज लहरें उठती हैं। नकली पहाड़ के भीतर बने विशाल बाजार में रोज तकनीकी स्तर पर मनोरंजन के लिए भूकंप आता है।

बतौर भारतीय दक्षिण अफ्रीका में गांधी के देश का होने की एक पहचान स्वाभाविक तौर पर मिल जाती है। दक्षिण अफ्रीका के काले लोग उन्हें अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाला पहला सिपाही मानते हैं। गांधी के महत्व को आप यूं समझिए कि वहां पर्यटन के लिए टुअर आपरेटर गांधी पैकेज बताते हैं, उनमें गांधी से जुड़े सारे इलाकों तक ले जाया जाता है। इस तरह का दूसरा पैकेज नेल्सन मंडेला से जुड़ा है। भारतीयों के लिए नेल्सन मंडेला से जुड़े स्थान भी यात्रा के अनिवार्य पड़ाव होते हैं। जिस जेल से नेल्सन मंडेला 27 साल की कैद से मुक्त होकर बाहर आए थे, जेल के उस गेट पर भी पर्यटकों की भीड़ बनी रहती है।

दक्षिण अफ्रीका का पर्यटन विभाग यहां के बढ़ते अपराध को दुष्प्रचार और मीडिया की देन मानता है। केप वाइनलैंड के मेयर के जानसन भी कहते हंै कि आपस में मारपीट अलग बात है, पर्यटकों के साथ होने वाले हादसे यहां बहुत कम हैं। यहां से कई गुना ज्यादा खतरा लंदन और न्यूयार्क में है। गुजरे 2007 में 20-20 क्रिकेट विश्वकप यहां हुआ। हजारों की तादात में भारतीय दर्शक आए। एक भी घटना कहीं से रिपोर्ट नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में पर्यटकों को सुरक्षा का भाव देने के लिए हर रेस्टोरेंट और गेस्टहाउस पर कम्युनिटी पुलिसिंग व्यवस्था या फिर सिक्योरिटी एजेंसी के द्वारा 24 घंटे कवर्ड होने का बोर्ड लगा है। प्रतिष्ठानों और संस्थानों के अलावा नगरीय क्षेत्र में रहने वाले अभिजात्य दक्षिण अफ्रीकी न्यूनतम 900 रैंड यानि 5400 रूपए महीने की फीस सुरक्षा एजेंसियों पर खर्च करते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में 2010 में फुटबाल विश्वकप फीफा की तैयारियां चल रही हैं। सरकार खेल के इस उत्सव को पर्यटन के विकास में इस्तेमाल करना चाहती है। भारतीय पर्यटकों पर इस बार भी खास नजर है। इस कारण पूरे देश में भारतीय खाने के 100 से अधिक ठिकाने का एक फूड 222.ह्यशह्वह्लद्धड्डद्घह्म्द्बष्ड्ड.ठ्ठद्गह्ल पर अपडेट किया गया है। भारत के कई शहरों में छोटे-बड़े उत्सव की तैयारी है,ताकि रिश्तों की कड़ी को और मजबूत बनाया जा सके।

Thursday, August 28, 2008

लीजिए साहब हैसियत सामने आ गई

हम ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हम कैसा देश बनें। लेकिन, हमारे देश की अभी क्या हैसियत है। इस कड़वी सच्चाई का अक्सर दूसरे-चौथे रोज सामना करना पड़ जाता है। अखबार के पन्ने पर बॉक्सर विजेंदर कुमार और पहलवान सुशील कुमार के साथ सोनिया गांधी की मुस्कुराती तस्वीर के ठीक नीचे से असलियत कुछ वैसे ही झांक रही थी जैसे, परदा कहानी में परदा गिरते ही सारी लाट साहबी की सच्चाई पठान के सामने आ जाती है।

अखबार के पहले पन्ने पर सबसे बोल्ड फॉण्ट में खबर है कि दुनिया के एक तिहाई गरीब सिर्फ हमारे महान देश भारत में पाए जाते हैं। यानी, दुनिया के सबसे ज्यादा खतरनाक बीमारी से ग्रसित लोग भारत में ही हैं। गरीबी दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है इससे भला किसी को क्या इनकार होगा। और, इस बीमारी से पीड़ित मरीज हमारे देश में अफ्रीका के उन इलाकों से भी ज्यादा हैं जहां की गंदी तस्वीरें दिखाकर BBC WORLD और CNN दुनिया (खासकर धनाढ्य देशों) को ये बताते हैं कि गरीब नाम के बीमार ऐसे होते हैं। लगे हाथ ये भी बताने से नहीं चूकते कि ये प्रजाति विलुप्त होने के बजाए बढ़ रही है लेकिन, अमरीका-लंदन जैसी जगहों पर शायद ही इनके कुछ अवशेष बचे हों।

और, कल जो मैं बीजिंग ओलंपिक में पदकों की तालिका में भारत और चीन की तुलना करने की गुस्ताखी कर रहा था। उसे और आगे बढ़ा रहा हूं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 1980 में चीन में 835 मिलियन यानी 83 करोड़ पचास लाख, उस समय की चीन की कुल आबादी के 83 प्रतिशत लोग, गरीबी की महामारी से पीड़ित थे। भारत के 42 करोड़ 10 लाख लोग, 60 प्रतिशत, गरीबी की महामारी की चपेट में थे। 2005 का आंकड़ा देख लीजिए। चीन में 20 करोड़ 80 लाख, कुल आबादी के 16 प्रतिशत लोग, गरीबी की महामारी के जाल में फंसे रह गए। जबकि, भारत में उसी समय 45 करोड़ 60 लाख लोग, आबादी के 42 प्रतिशत, गरीबी की महामारी से पीड़ित ही रहे।

और, दुनिया क्यों एशिया में भी हमसे ज्यादा गरीबी का तमगा नेपाल के ही सिर सज रहा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि गरीबी के मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका भी हमसे बेहतर है। यही वजह है कि कल मैं एक टीवी चैनल पर चीन स्पेशल देख रहा था। तो, एक चीनी का पैराडब (चीनी भाषा से हिंदी) सुनाई दे रहा था कि भारत के बारे में तो वो, लोग चर्चा भी नहीं करते। हां, भारत की छवि ये है कि वो, गरीबों-टूटी-फूटी सड़कों वाला देश है। और, वो ठसके से ये भी बता रहा था कि हम सिर्फ वोट ही तो नहीं दे सकते (कुछ इस अंदाज में अच्छा रहने-खाने को मिले तो, लोकतंत्र जाए ठेंगे पे)। हमारे यहां की शानदार सड़कें, ऊंची इमारतें और बहुत कुछ है हमारे पास बताने को। अब बस आगे फिर— ये तो कोढ़ जैसा है जब कुरेदा जाता है फिर कीड़े बाहर निकल आते हैं।

Wednesday, August 27, 2008

हम कैसा देश बनें

बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बादशाह बीजिंग से बोलेगा।

खैर, मैं देश की बात कर रहा था तो, सोवियत संघ उधर टूट और इधर हमारे देश के नेताओं का आदर्श भी नहीं रह गया। अब हम अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं। कमाल ये कि इस पर संघी-भाजपाई से लेकर कांग्रेसी तक सब सहमत हैं। नए समाजवादियों को भी अमेरिका का ही साथ अच्छा लग रहा है। सिर्फ कम्युनिस्ट भाई चीन जैसा बनाना चाहते हैं देश को। ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट भाइयों की जिन दो राज्यों में बपौती है उसे, चीन तो क्या चीन के पिद्दी बराबर भी नहीं बना पा रहे हैं।

अमेरिका, रूस बनने के समय तो मैं इतना जाग्रत ही नहीं था कि कुछ बनाने में अपनी बहुमूल्य राय दे पाता। लेकिन, अब देश कैसा बने इसमें मेरी बहुमूल्य राय काम आ सकती है। चीन जैसा देश बनने में मुझे जाग्रत होने के साथ ही चिढ़ होनी शुरू हो गई थी। उतनी ही जितनी कोई अगर पाकिस्तान जैसा बनने की वकालत कर दे।

इसकी सीधी-सीधी कई वजहें थीं
चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा जमा रखा है।
चीन ने तिब्बत पर जबरी कब्जा जमाया हुआ है। घिघियाए दलाई लामा भारत में हैं, उनसे अनायास सहानुभूति है।
कम्युनिस्ट चीन में तानाशाही है।
हमारे देश में जो, कम्युनिस्ट बने घूम रहे हैं वो, सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करके काम चला रहे हैं।
कम्युनिस्ट राज्यों के पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो, बता सके कि चीन जैसा ही बनना चाहिए। एक पश्चिम बंगाल थोड़ा बहुत था वो, भ्रम भी शीशे की तरह टूटकर चुभ रहा है।


इतनी वजहें दिमाग में ऐसे घर किए हुए हैं कि जब मैं देहरादून, अमर उजाला में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA) में पासिंग आउट परेड कवर करने गया तो, जॉर्ज फर्नांडिस से लगभग भिड़ सा गया था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, पासिंग आउट परेड के मुख्य अतिथि थे। POP भाषण के दौरान उन्होंने चीन का जिक्र किया और उसकी जमकर तारीफ की। मंच से उतरते ही दूसरे पत्रकारों के साथ मैंने उन्हें घेर लिया। और, कड़े लहजे में सवाल दागा- क्या आप भारत में चीन मॉडल की वकालत कर रहे हैं। फर्नांडिस ने कहा- मैं सिर्फ चीन के विकास की बात कर रहा था। लेकिन, मैं तो भरा हुआ था। फिर से मैंने वही सवाल किया। फर्नांडिस इतने झल्ला गए कि उन्होंने प्रेस से बात करने मना कर दिया। कहा- आप मेरे मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश कर रहे हैं।

खैर, मैंने देहरादून छोड़ दिया। और, मुंबई आ गया-मन में कहीं न कहीं बचपन से था कि मुंबई जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। लेकिन, मायानगरी में आते ही इसकी फिल्मी छवि टूट सी गई। मरीन ड्राइव के क्वीन्स नेकलेस से मैं मुंबई को पहचानता था। जहां पुरानी-नई मॉडल की शानदार गाड़ियों में बड़े लोग घूमते हैं। यहां एयरपोर्ट (अब तो, कम से कम एयरपोर्ट शानदार हो ही गया है) से उतरते ही झुग्गियों से गुजरकर होटल तक पहुंचा। समझ में आ गया मैं अपने पैतृक प्रतापगढ़ के गांव से निकलकर देश के सबसे बड़े गांव में आ गया।

गांव में सड़कें कच्ची-पक्की हो सकती हैं लेकिन, कोई भी दूरी तय करने में साइकिल से जितना समय लगता है उससे ज्यादा समय मुंबई में ट्रैफिक के बीच फंसी कारों से लग जाता है। गांव में खेत में लोग दिशा-मैदान जाते हैं तो, यहां भी रेलवे ट्रैक के किनारे लोग लैट्रिन करते मिल जाएंगे। झुग्गियों में तो लोग गांव से भी बदतर हालात में रह रहे हैं। हां, झुग्गी में भी एयरकंडीशनर जरूर लगा है। अपने गांव देश की लंबी-चौड़ी जगह और शानदार हवा-पानी को छोड़कर लोग तरक्की तलाशते नाले के ऊपर-सड़क के किनारे-रेलवे ट्रैक के किनारे बदबूदार जगह में एक चारपाई की जगह में झुग्गी बनाकर तरक्की वाले देश में रह रहे हैं।

फिर, कभी-कभी लगता है कि दिल्ली जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। और, दिल्ली इधर जिस तेजी से बदल रही है—कि हर महीने भर पे भी दिल्ली जाओ तो, नई सी लगती है, ढेर सारे फ्लाईओवर, चमचमाती सड़कें- उससे और लगता है कि देश, दिल्ली जैसा ही हो जाए। फिर, लगा कि नहीं यार इतनी सड़कों-फ्लाई ओवरों पर दिल्ली वाले तो, मजे से चल ही नहीं पा रहे हैं। ऑफिस के टाइम में तो, मुंबई से थोड़ा ही भले रह पाते हैं। फिर भी दिल्ली देश की अकेली वर्ल्ड क्लास सिटी लगती है।

और, लीजिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में होने वाला है। उसकी तैयारी की वजह से ये दिल्ली का साज-सजावट ज्यादा तेजी से हो रही है। बड़ी मुसीबत है भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे देश के बगल में होना। पाकिस्तान रोज हम पर बिना वजह गोली बरसाता रहता है-धमाके करता रहता है। निर्दोष मारे जाते हैं। तो, चीन की तरक्की से हम ऐसे ही मरे जा रहे हैं। चीन 5 SEZ बनाता है तो, हम 500 SEZ के प्रस्ताव पास कर देते हैं। जबकि, हमें ये अच्छे से पता है कि हमारे लिए SEZ मॉडल काम का नहीं है। और, देखिए हमें भी 108 साल में ओलंपिक में रिकॉर्ड बनाने के लिए चीन की राजधानी बीजिंग ही एक जगह मिली थी।

रिकॉर्ड भारत ने भी बनाया और चीन ने भी। भारत देश की अब तक की जिंदगी का पहला और अकेला निजी स्वर्ण पदक मिला। चीन के खिलाड़ी 51 स्वर्ण पदक लटकाए घूम रहे हैं। हम कुल जमा तीन गिनती में पहुंचे तो, चीन ने पदकों की सेंचुरी मार दी। लीजिए, साहब अब चीन से कुछ तुलना बची क्या। स्वर्ण पदक के लिहाज से चीन हमसे 51 गुना आगे, अपना कांसा भी मिला लें तो, भी चीन तीस गुना आगे। अब मैं सोच रहा जॉर्ज फर्नांडिस गलती से ही सही कह रहे थे हमें चीन जैसा बनना चाहिए। वो, भी उन जवानों की पासिंग आउट परेड में जो, हो सकता है चीन की उसी सीमा पर तैनात कर दिए जाएं। जहां चीन ने लंबे भारतीय क्षेत्र पर चीनी झंडे लगाकर नई सीमा बना दी है।

अब मुझे भी लगता है कि हम चीन जैसा ही देश बनें। कांग्रेसी-कम्युनिस्ट तो, खुश होंगे ही। संघी भी खुश होंगे बस उन्हें ये नहीं बताना है कि हम कम्युनिस्ट चीन जैसा बन रहे हैं। वैसे, संघियों को भी गुजरात एक देश बनाने का मॉडल मिल गया है। लेकिन, फिर वही बात कि हम चीन तो हैं नहीं थ्येन आन मेन चौक पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले छात्रों का नरसंहार करने वाली रेड आर्मी किसी को याद तक नहीं है। चीन की तरक्की सबको याद है। अब एक चुनाव विकास के मुद्दे पर जीतने वाले नरेंद्र मोदी भी शायद तरक्की से सब ढंक दें। लेकिन, गुजरात में है तो, लोकतंत्र ही ना। तानाशाही तो है नहीं कि बस एक ही पार्टी, एक ही राज। फिर, तो हम चीन भी नहीं बन पाएंगे। वैसे, मेरे स्वर्गीय बाबा श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री मुझकों अक्सर समझाते हुए एक श्लोक सुनाते थे जो, मुझे अब याद नहीं है। लेकिन, उसका मतलब मुझे याद है कि हाथी के पैर में सबका पैर समा जाता है। यानी इतने बड़े बनो कि सारी गलतियां उसमें छिप जाएं। अब भारत की पहचान भले दुनिया में हाथी के तौर पर होती है लेकिन, हम हाथी नहीं बन पा रहे हैं।

लीजिए, मैं चीन, गुजरात जैसा बनते-बनते फिर से हाथी यानी भारत बनने लगा। दिमाग में बाप-दादाओं का दिया भरा हुआ है ना। अरे, अब तो मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा। क्या हम बिना चरित्र के ही देश रह जाएंगे। ए भाई, किसी को समझ में आ रहा हो तो, बताओ ना- हम कैसा देश बनें। और, देश के वीरों ये सलाह मत देना कि हमें किसी की नकल की जरूरत नहीं हम भारत हैं और भारत ही बनेंगे। क्योंकि, आजादी के करीब बासठ सालों बाद भी हम भारत जैसा बनते-बनते बिना किसी चरित्र के रह गए हैं। प्लीज, बताइएगा जरूर, हम ही नहीं देश मानसिक उलझन में है।

Monday, August 25, 2008

हाथी और ड्रैगन की लड़ाई

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। तीसरी कड़ी में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के बाजार में चीन और भारत की जंग का नजारा दिखाया है।

जोहांसबर्ग की सडक़ों के किनारे भारतीय कंपंनियों की होर्डिंज्स देखते ही छाती फूल जाती है। यह जानने पर कि भारतीय कंपंनियां यहां इतना बेहतर कर रही हैं कि उनका मुकाबला चीन और दूसरे संपंन्न राष्ट्रों से किया जाता है, भीतर का सुख दोगुना हो जाता है। अपने देश में हम इन उद्यमयिों को लेकर भले ही तरह-तरह के सवाल खड़े करते रहे हैं। दूर देश में लेकिन उनकी तरक्की के किस्से सुनना कानों को प्रिय लगता है।

आप किसी भारतीय मूल के दक्षिण अफ्रीकी से सिर्फ ये पूछिए कि यहां कौन-कौन सी भारतीय कंपंनियां क्या कर रही हैं? एक सांस में वो आपको गिना देगा। ताजातरीन एमटीएन अधिग्रहण का जिक्र सबसे पहले आएगा। दक्षिण अफ्रीका की प्रमुख मोबाइल कंपनी के अधिग्रहण को लेकर अंबानी बंधुओं में जंग चल रही है। शुरूआत में भारती टेलीकाम के सुनील भारती मित्तल की कंपनी के एमटीन पर काबिज होने की खबरें आई थीं। टाटा दक्षिण अफ्रीका में छठवीं बड़ी निवेशक है। टाटा, एल एंड टी, महेद्रा, रेनबैक्सीस, किंगफिशर, सुकैम आदि कंपंनियों के बारे में यहां लोग भलीभांति जानते हैं। इसी तरह रतन टाटा, मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, विजय माल्या, अजय गुप्ता और जयेश रामचंद्रन वे नाम हैं जो यहां अमूमन लोगों को याद हैं। इनमें अजय गुप्ता जोहन्सबर्ग में रहते हैं।

सहारा कम्प्यूटर कंपंनी के मालिक अजय गुप्ता को मंहगी जीवन शैली और सिने स्टार फिल्म स्टार शाहरूख खान का दोस्त होने के नाते भी जाना जाता है। शाहरूख जब भी जोहांसबर्ग में होते हैं तो अजय के घर ही ठहरते हैं। जयेश रामचंद्रन दक्षिण अफ्रीका में भारतीय ïव्यंजन के रेस्टोरेंट की एक चेन राज रेस्टोरेंट की मालिक हैं। हीरे की खदानें दक्षिण अफ्रीका में हैं, लेकिन उनकी पालिशिंग का शत-प्रतिशत काम भारत में होता आ रहा है। केजीके डायमंड ने पिछले बरसों में यहां 400 करोड़ रूपए का निवेश किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि गुणवत्ता के मामले में भी भारतीय कंपंनियों ने अपनी साख बरकरार रखी है।

भारतीय कंपंनियों के बारे में ये सब मैं इतने अधिकार नहीं कह पाता अगर मैं डेविड मैकग्रा से मेरी मुलाकात न होती। मैकग्रा दक्षिण अफ्रीका की एक बड़ी कोरियर कंपंनी न्यू एरा कोरियर के मालिक हैं। दुनिया के तमाम देशों में उनके दफ्तर हैं। अंतराष्ट्रीय कारोबार पर उनकी अपनी समझ है। केपटाउन से जोहान्सबर्ग आते समय विमान में हमारी मुलाकात हुई। पचास-पचपन साल के मैकग्रा ने पहले मुझे दो बार चाकलेट आफर किया। मैने समझ लिया कि वे मुझसे बातें करना चाहते हैं। मैं अपनी सीट से उठकर उनके पास जाकर बैठ गया। मुझे अपने एक सहयात्री से बात करते देख वो जान गए थे कि मैं भारत से आया एक पत्रकार हूं। भारत की ढेर सारी तारीफें करने के साथ वो एक सांस में चीनी कारोबारियों को कोसने लगने हैं।

मैकग्रा कहने लगे कि चीनी ज्यादातर हमारे घरेलू बाजार की कमर तोडऩे पर लगे हैं। भारत ठीक है, आटोमोबाइल, कम्युनिकेशन, पावर, कांस्ट्कशन, हास्पिटलिटी, मेडिसन के क्षेत्र में काम कर रहा है। चीनी हमारे लिए कहीं से स्वाभाविक साथी नहीं है। वो अंगरेजी नहीं बोलते। अपनी अलग बस्ती में रहना पसंद करते हैं। भारतीय हमारे समाज का एक हिस्सा है। वो मुझे भारत का प्रतिनिधि मानते हुए ही बोलते जा रहे थे कि आप लोग आओ। चीनियों से पहले। यह आपके साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका के भी हक में है।
एक दिन पहले मैं पिक एंड पे नाम के एक रिटेल चेन शोरूम में गया था। वहां ज्यादातर माल चीन के ही भरे हुए थे। उसी वक्त लगा था कि यहां के बाजार में चीन ने अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। हम अपने देश से तुलना करने लगे, जहां के छोटे-छोटे बहुत से उद्योग चीनी उत्पादों के चक्कर में खत्म हो गए हैं। दक्षिण अफ्रीका में तो हालत और भी खराब दिखी।

खाने के सामान के साथ रेडीमेड कपड़ों के ब्लाक पर भी चीन के लेबल नजर आ रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में बने सामान खरीदने की बात की तो वो थोड़े से जूस और आयुर्वेदिक सामान ही दिखा पाया। अंतराष्ट्रीय स्तर पर बिकने वाले ब्रांडस के अलावा चीन की ही धूम थी। मैकग्रा की बात से मुझे 1996 के आसपास का साल याद आया, जब बाजार मे आई एक गिरावट से कोरिया और दूसरे कई देशों के बाजार पर बहुत बुरा असर पड़ा था। लेकिन भारत को उस समय कोई बड़ा झटका नहीं लगा था।

अर्थशास्त्री भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना हाथी से करते रहे हैं। वो आकार में भारी है, बलशाली है। आगे बढ़ रहा है, गति थोड़ा कम है, लेकिन खतरा भी कम से कम है। वही चीन को हमेशा ड्रैगन की पहचान से जोडक़र देखा जाता है। वहां की लोककथाओं से लेकर हालीवुड की फिल्मों तक चीन को ड्रैगन से जोडक़र देखा जाता है। इस तरह दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में देखने पर मुझे हाथी और ड्रेगन की लड़ाई नजर आती है। एक अपनी गति और शक्ति से आगे बढ़ रहा है, एक सबकुछ अपने कब्जे में कर लेना चाहता है। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच सन 2004 में 180 करोड़ डालर का कारोबार हुआ। सन 2006-07 में यह दोगुने से उपर बढक़र 470 करोड़ डालर तक पहुंच गया। आने वाले 2010 में यहां फुटबाल का विश्वकप फीफा होने वाला है। साउथ एशिया टूरिज्म की इंडिया कंट्री हेड मेघा सम्पत्त का मानना है कि अगले पांच साल में यहां बहुत अधिक भारतीय निवेश बढऩे वाला है। 2010 तक भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच 1200 करोड़ डालर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

दक्षिण अफ्रीका के इस औद्योगिक विस्तार के बीच जब यह मालूम चलता है कि यहां के श्रम कानूनों की हालत बहुत सख्त और बेहतर है । हालांकि जो बताता है वह आलोचनात्मक पक्ष रखता है कि तीन महीने के ट्रायल के बाद किसी को निजी नौकरी से भी निकाला जाना आसान नहीं है। बताने वाला नियोक्ता था, वहां के ट्रेड यूनियन और स्थानीय प्रशासन के दखल की बात करता है। लेकिन एक दक्षिण अफ्रीकी के अधिकारों के मद्देनजर देखें तो लगता है कि औद्योगिीकरण की प्रक्रिया में इतना ध्यान रखने की जो दृष्टि नेल्सन मंडेला ने दी वो आगे भी बनी रहे तो बेहतर है।

दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के रिश्ते के वे दिन भी याद आए जब रंगभेद के आरोपों के चलते सन 1948 में रिश्ते तोड़ लिए थे। देश में लोकतंत्र की बहाली के साथ 1994 से फिर नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। संभवानाओं की किताब में अभी बहुत से पन्ने रिक्त हैं। गुजरे 14 वर्षों में जो दर्ज किया गया है वो कारोबारी और भारत-दक्षिण अफ्रीका रिश्तों के लिए सुखद रहा है।

देश और शरीर में बड़ा फरक है

कश्मीर मसले को भारतीय लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाना नामुमिकन है। भारतीय लोकतंत्र की इतनी मजबूरियां हैं कि वो, कोई फैसला नहीं ले सकता। इस लोकतंत्र के 60 साल सिर्फ सहमति बनाने की चिरकुटाई में बीत गए। वो, भी सहमति बनाने की कोशिश उनसे जो सहमत तो हो ही नहीं सकते। क्योंकि, सहमत होने के बाद उनकी हैसियत ही नहीं रह जाएगी।

अब इस देश का मीडिया, मीरवाइज उमर फारुक, फारुक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती के साथ कांग्रेस, बीजेपी नेताओं को स्टूडियो में बैठाकर सहमति बनाने की कोशिस कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को इतनी आजादी है कि वो, स्टूडियो में देश के किसी हिस्से को देश से आजादी की मजे से वकालत कर लेते हैं। वकालत नहीं तो, निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया दिखने की कोशिश में उस प्रेशर ग्रुप में शामिल हो गए हैं। जो, कश्मीर की आजादी का हिमायती है।

मैंने भी कश्मीर के हालात से दुखी होकर 14 अगस्त को ये लिख मारा था कि आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। मैंने वो, लेख दरअसल देश जबरदस्त तौर पर उबाल मार रही उस भावना के तहत लिख मारा था कि – एक छोटी सी जन्नत के लिए पूरे देश को दोजख बनाना कहां तक ठीक है। और, ये तो पाकिस्तान, अलगाववादियों-आतंकवादियों के लिए अच्छी ही होगा कि हम खुद ही अपने जन्नत को पाकिस्तानी जमीन (दोजख) में शामिल करवा दें। लेकिन, क्या देश के अहम हिस्से कश्मीर को आजाद कर देने से देश को दोजख बनाने की प्रक्रिया रुक जाएगी। क्योंकि, देश कोई शरीर तो है नहीं कि किसी हिस्से में बीमारी या सड़ांध हो जाए तो, उसका ऑपरेशन करके निकाल दीजिए। पूरा शरीर स्वस्थ रहेगा।

दरअसल, कश्मीर इस देश की ऐसी बीमारी है जिसका ऑपरेशन करके उसके अंदर भरी मवाद तो निकाली जा सकती है। लेकिन, उसे काटकर निकालने से ये बीमारी देश के दूसरे हिस्सों में और तेजी से फैल जाएगी। अब इस ऑपरेशन को करने का माद्दा ऐसे डॉक्टरों में तो नहीं ही हो सकता। जिनके हाथ इतने भर से कांपने लगते हों कि मरीज के कुछ बददिमाग (मरीज को हमेशा बीमार देखने की चाहत रखने वाले) घरवाले, नाते-रिश्तेदार ऑपरेशन असफल होने का डर दिखाकर डॉक्टर को धमका रहे हों। और, ये ऑपरेशन तो और भी मुश्किल हैं क्योंकि, कश्मीर नाम के मरीज के ऑपरेशन का जिम्मा भारतीय लोकतंत्र की मजबूरी से पैदा हुए चिरकुट नेताओं के पास है।

दरअसल, एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने करीब 62 साल पहले जो, कश्मीर में तुष्टीकरण के कांटों की खेती लगाई थी। नेहरू की उस फसल को बढ़िया खाद-पानी दिया- पाकिस्तान, अलगाववादी, देश के धर्मनिरपेक्षता के लंबरदार नेता, कश्मीर को बपौती की तरह इस्तेमाल कर रहे मुफ्ती, अब्दुल्ला परिवारों ने। फसल खूब बढ़िया हुई इतनी कि कश्मीर पंडितों की तो, कौम ही शरणार्थी शिविर के संग्रहालय भर में पाई जाती है। या कहीं-कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे पड़ी है ये कौम।

सवाल सिर्फ कश्मीरी पंडितों का ही नहीं है। हमारे देश में होने के बावजूद हम कश्मीर या तो जाते नहीं हैं- जाते भी हैं तो, डर-डरकर। इस पीड़ा का जवाब कहां से मिलेगा-कौन देगा। जम्मू की श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के आर्थिक नाकेबंदी को आधार पर बनाकर कश्मीर की आजादी और अलगावादियों से सहानुभूति सबको हो रही है। बासठ सालों से पूरा देश जो, पीड़ा झेल रहा है, उसका जवाब कौन देगा-उसका हल किस शांति बैठक से मिल पाएगा।

टीवी चैनलों पर सज-धजकर आए मीरवाइज, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती- चिल्लाकर कह रहे हैं कि आप घाटी में एक भी मुसलमान बताइए जो, अमरनाथ यात्रा के खिलाफ हो। ये तो, मैं भी जानता हूं। और, कश्मीर में चार दिन में मुझे ये अनुभव मिला था कि सबकी सेब बेचकर ही नहीं चल रही, जैसा- मुजफ्फराबाद चलों का नारा देने वाले साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। अरे, अब्दुल्ला, मुफ्ती और मीरवाइजों- अमरनाथ यात्री कश्मीर जाते हैं तो, कुछ लेकर नहीं आते। देकर आते हैं- कश्मीर को रोजगार-कमाई।

और, यही रोजगार-कमाई है जो, कश्मीर का हल निकाल सकता है। लेकिन, रोजगार-कमाई के लिए बाजार को कश्मीर में जगह बनाने की मौहाल बनाने देना होगा। उस माहौल के लिए अगर कुछ समय के लिए कश्मीर में खोखले लोकतंत्र की बलि चढ़ानी पड़े तो, गुरेज नहीं होना चाहिए। मेरी पहली पोस्ट में मैंने साफ लिखा था कि बाजार ही कश्मीर में बंदूक को बरबाद कर सकता है।

फिर, ये सवाल क्यों उठाकि सौ एकड़ जमीन पर बनने वाले अस्थाई इंतजामों से राज्य की डेमोग्राफी बदल जाएगी। हिंदू बढ़ जाएंगे। कश्मीर से तो, वहां के मूल निवासी कश्मीरी पंडित मारकर भगा ही दिए गए। और, बताइए ना, जहां हिंदू ही ज्यादा हैं उस जम्मू में इतने बड़े आंदोलन के बावजूद में एक भी मुसलमान को नुकसान पहुंचा हो। या देश भर में बताइए ना कहां ऐसा है कि मुसलमान होने की वजह से किसी को मारा-भगाया जा रहा हो। फिर, ये नेहरू की कांटे की फसल के खाद-पानी (मुफ्ती, अब्दुल्ला, मीरवाइज), टीवी स्टूडियो में ऐसा बोलने का साहस भी कैसे कर पाते हैं जैसे, वो दूसरे देश से आए राजनयिक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से हों।

पिछले कुछ सालों से कश्मीर में चुनी गई सरकार चल रही थी तो, पूरे देश में ये भ्रम फैल रहा था कि आतंकवादी-अलगाववादी कमजोर हो गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कश्मीर में शांति दिख भले रही थी। पूरे देश में आतंकवादी-अलगाववादी हर रोज बरबादी की नई इबारतें लिख रहे थे। आरडीएक्स-बम धमाके-गोलियां, कश्मीर से निकलकर पूरे देश में लोगों की जान ले रहे थे। और, जब इस सरकार के जाने के दिन आए तो, फिर इन नेताओं ने कश्मीरियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। एक टीवी चैनल पर बहस में महबूबा मुफ्ती ने उमर अब्दुल्ला पर आरोप लगाया कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर राज्य की डेमोग्राफी बिगड़ने का हल्ला सबसे पहले आप ही ने मचाया था।

मतलब साफ है कि देश में एक दूसरा देश बसा हुआ है जो, स्वाभाविक है मौका मिलते ही आजादी की कोशिश करेगा। इसलिए सबसे पहले तो, कश्मीर को देश का हिस्सा बनाना होगा। यानी पूरे देश के जैसे कानून लागू करने होंगे। कश्मीर के मुसलमान देश भर में बसें और मजे से बसें। कश्मीर में देश के दूसरे हिस्से के हिंदू न सही शुरू में कम से कम मुसलमान ही बसना शुरू करें। यानी कुल मिलाकर एक देश जैसा लगने लगे। तभी बात बनेगी।

और, ये दलील देने वाले चूतियापे की बात कर रहे हैं कि कश्मीरी भारत से अलग होना चाहते हैं। कश्मीर अगर अलग होना चाहता तो, वो कांग्रेस को इतनी ताकत क्यों देता कि वो, सरकार बना सके। मुफ्ती के अलावा उमर अब्दुल्ला भी कभी पाकिस्तान के खेमे में जाने की या आजादी का नारा बुलंद करने की बात नहीं करते उसे क्यों, विधानसभा में सबसे ज्यादा सीट जिताते। मतलब साफ है कि लोकतांत्रिक राय भी कश्मीरियों की यही है कि हम भारत के साथ हैं। अब अगर कश्मीरियों की इस लोकतांत्रिक राय का सम्मान करने के लिए तानाशाही की भी जरूरत पड़े तो, करनी चाहिए। और, इन गोली-बंदूक से बात करने वाले अलगाववादियों को, देश के दूसरे किसी हिस्से के अपराधी-देश द्रोहियों की ही तरह जेल में ठूंस देना चाहिए। सिर्फ इतने से बात न बने तो, जितने से बने वो करना चाहिए।

Sunday, August 24, 2008

गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे

सब अलटा-पलटी हो गया है। एक अमेरिका के साथ परमाणु करार की बात ने देश के सारे राजनैतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। दुनिया के दादा अमेरिका की खिलाफत के मुद्दे पर देश में कुछ लोगों को ये भ्रम हुआ कि इस मुद्दे से देश का दादा बना जा सकता है। उसमें बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, अमर सिंह जैसे दलाल ! (ये अमर सिंह खुद स्वीकारते हैं कि ये काम वो सबसे बेहतर करते हैं और अब तो, बाकायदा सुर्खियां इसी से बनती हैं) से पटकनी खाए गुस्से से लाल करात और दलितों की मसीहा बहन मायावती सबसे आगे चल रहे थे।

देश का संवैधानिक दादा यानी प्रधानमंत्री बनने की इस इच्छा ने और कुछ किया हो या न किया हो। अलग-अलग राज्यों में बाहुबली सांसदों (असंवैधानिक दादाओं) का बड़ा भला कर दिया। और, इसमें मदद मिली अदालतों से। आप में से कितने लोगों को याद होगा कि अदालत से दोषी करार दिए गए लोगों को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए बात चल रही थी। लेकिन, जब देश में दादागिरी का मुकाबला चल रहा हो तो, भला छोटे-मोटे दादाओं के दुष्कर्म रोकने की चिंता भला किसे होती। बस यूपी-बिहार के दादा लोगों को जेल से सम्माननीय सांसद (लोकसभा में चुने जाने के बाद तो सम्माननीय ही हुए ना) की हैसियत से लोकसभा लाया गया।

और, इस अप्रत्याशित सम्मान से सबसे ज्यादा पलटी हुई है उत्तर प्रदेश में। मायावती जिन्हें मरवाना चाहती थीं (ऐसा भगोड़े अतीक अहमद ने पहली बार टीवी आने के बाद बोला था) अब वही अतीक अहमद हाथी पर सवार होकर लोकसभा में पिर पहुंचना चाहते हैं। जिससे कम से कम लोकतंत्र को बंधुआ बनाए रखकर उसके जरिए अपने दुष्कर्मों को जनता की इच्छा कहने का माद्दा बना रहे। मायावती के खासमखास मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी इलाहाबाद की नैनी जेल में मिलकर अतीक के साथ इलाहाबाद और आसपास की लोकसभा सीटों को जीतने की योजना बना रहे हैं। यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करने के बाद अतीक के सारे करीबीयों (इलाहाबाद के छंटे बदमाशों) पर मामले हल्के किए जा रहे हैं। मायावती जब सत्ता में आई तो, चिल्ला-चिल्लाकर सपा के जंगलराज और जंगलराज चलाने वाले बदमाशों के सफाए की बात कह रही थीं।

वैसे अब माहौल जरा बदल गया है। इसका अंदाजा सिर्फ दो नारों से लग जाता है--
यूपी विधानसभा चुनाव के समय बसपा कार्यकर्ता नारा लगाते थे---
चढ़कर गुंडों की छाती पे, मोहर लगेगी हाथी पे
जो, बसपा को नहीं चाहते थे वो, भी सपा को हराने के लिेए नारा लगाते थे ---
पत्थर रख लो छाती पे, मोहर लगाओ हाथी पे

और, उत्तर प्रदेश का नया नारा है ---
गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे


चलिए एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाशों की एक लिस्ट देखते हैं-
अतीक अहमद (फूलपुर, इलाहाबाद), मुख्तार अंसारी (गाजीपुर अब मऊ से विधायक), रघुराज प्रताप सिंह (विधायक, कुंडा, प्रतापगढ़), धनंजय सिंह (विधायक, रारी, जौनपुर), हरिशंकर तिवारी (हारे विधायक, चिल्लूपार, गोरखपुर)। इन पांचों की हैसियत ये है कि निर्दल चुनाव जीतते हैं या जीतने का माद्दा रखते हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने से पहले ये मुलायम के खासमखास थे। मुख्तार पर भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और अतीक अहमद पर बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप है। मायावती ने सत्ता में आते ही सबसे पहले इन्हीं लोगों की नकेल कसी। लेकिन, अब ये दोनों हाथी की सवारी की तैयारी में हैं। मुख्तार को मऊ से बसपा टिकट मिल रहा है।

कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह अपने प्रताप से प्रतापगढ़ की सीट भी समाजवादी पार्टी को जिता चुके हैं। अब राजा के भी कस-बल ढीले पड़ रहे हैं। सुनते हैं कि वो, भी मायाजाल में फंसना चाहते हैं। तो, मऊ से विधायक मुख्तार अंसारी के भाई गाजीपुर से सपा सांसद हैं। मायाजाल में फंसने वालों की लिस्ट में नया नाम है जौनपुर की रारी विधानसभा से विधायक धनंजय सिंह का। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान धनंजय गुंडई में पारंगत हुए। अब संसद में पहुंचना चाहते हैं जो, अकेले के बूते का नहीं लगता। इसलिए मायावती से हाथी (चुनाव चिन्ह) मांग रहे हैं। जौनपुर, लोकसभा सीट के लिए हाथी मिलना पक्का भी हो गया है। धनंजय को बहनजी की ही सरकार ने 50 हजार रुपए का इनामी बदमाश बनाया था।

एक जमाने में उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाश हरिशंकर तिवारी भी किनारे-किनारे से हाथी की सवारी कर रहे हैं। छोटा बेटा विनय शंकर भले ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे के हाथों हार गया। बड़ा बेटा भीष्म शंकर खलीलाबाद से, बसपा सांसद बन चुका है। अब बताइए मायावती गुंडों की बिग बॉस हुई या नहीं (दुर्भाग्य ये कि वो, देश के प्रधानमंत्री बनने की जबरदस्त दावेदार हैं)। दरअसल यही वो दीमक है जो, इस देश के लोकतंत्र को अंदर से काफी हद तक खोखला कर चुका है। देश का संवैधानिक दादा (प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री) बनने के लिए बड़े नेता जिस तरह के कुकर्म (जाने-अनजाने) कर गुजरते हैं। उसी पर खुद बाद में रोते भी रहते हैं। इन बदमाशों के पुनर्जीवन के लिए आखिर मायावती, लालकृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी कितने जिम्मेदार हैं। क्या इसका जवाब कभी खोजा जाएगा। और, ये कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, पूरे देश की है।

Saturday, August 23, 2008

बिग बॉस के घर में सबके पाप धुल जाएंगे

आखिरकार बिग बॉस के घर में देश के छंटे हुए लोगों का पहला हफ्ता बीत गया। बिग बॉस की नजर सब पर थी। इसलिए संजय निरुपम को ही जाना था और वो, बिग बॉस के घर से बाहर गए। मुझको तो वजह भी साफ दिखती है। बिग बॉस के घर में रहकर जितनी नौटंकी-कमीनापन और नंगई करनी है वो, संजय कर नहीं पा रहे थे। कम से कम परदे पर बिग बॉस की नजरों के सामने तो नहीं ही कर पा रहे थे (परदे के पीछे तो नेता सब करते ही हैं ये, तो जनता जानती है और मानती भी है)। और, संजय का काम भी हो चुका था-बिग बॉस का भी।

पहले बिग बॉस के काम की बात करें तो, वो ये कि देश में छोटे परदे पर सबसे ज्यादा लोग नई बिग बॉस (शिल्पा शेट्टी) को जानें। और, इससे परदे के पीछे के बॉसेज (प्रोडक्शन हाउस और कलर्स चैनल) को सबसे ज्यादा कमाई हो। वो, दोनों काम तो होने शुरू हो गए हैं। और, बिग बॉस के घर के बादशाह (कमीनतम व्यक्ति) का नाम सबके सामने आते-आते ये काम काफी हद तक पूरा हो चुका होगा।

अब बात संजय निरुपम के काम की। तो, दरअसल ये सिर्फ संजय निरुपम का ही काम नहीं है। बिग बॉस के घर पहुंचे सभी मेहमानों की आखिरी ख्वाहिश (जैसी फांसी पर लटकने से पहले किसी मुजरिम की होती है) पूरी होने जैसा है। बिग बॉस के चरित्रों को अगर ध्यान से देखिए तो, ये ज्यादातर लोग अपना कोई न कोई पाप धुलने के लिए बिग बॉस का चरण-चांपन करने पहुंचे हैं। जिनके पाप नहीं हैं वो, पापियों की जमात में बहती गंगा में हाथ धोने जैसा पहुंचे हैं।

कैसे, देखिए- चलिए संजय निरुपम से ही शुरू करते हैं। संजय पता नहीं कब से मुंबई में हैं (उनसे पूछना पड़ेगा) लेकिन, अभी भी बिहारी हैं (शिवसेना भी उनका इस्तेमाल मारपीट में ही करती रही, अब कांग्रेस में रहकर भी बस राज ठाकरे के खिलाफ मोर्चा निकालने का काम करके मीडिया में दिखते हैं)। तो, उनको अपनी इमेज इस मायानगरी मुंबई के लिहाज से कुछ फिच करवानी थी। उनको बाहर करने की वोटिंग में केतकी ने सबसे बड़ी वजह भी यही बताई कि वो, हम कलाकारों (मायावी) के बीच कंफ्यूज थे।

नेता के बाद बात नेतापुत्र की। बिग बॉस शुरू होने के पहले एक खबर मुंबई मिरर में छपी थी जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह से थी कि अपने समय में प्रमोद महाजन भले ही किसी को भी बॉलीवुड स्टार या पॉलिटिक्स स्टार बनाने की हैसियत रखते हों। उनके बेटे राहुल महाजन को बिग बॉस अपने घर का मेहमान बनाने को तैयार नहीं हैं। बाद में राहुल के एक दोस्त के हवाले से ये खबर साफ हुई कि बड़ी मुश्किल से उन्हें बिग बॉस के घर में एंट्री मिली। पिता की दर्दनाक मौत के बाद गम भुलाने के लिए थोड़ा नशा पत्ती (हां, पांच सौ की पत्ती पर रखकर) ही तो किया था, पत्नी को इतना प्यार किया था तो, थोड़ा दो-चार हाथ नसे में जड़ दिए तो, जमाने ने बेचारे की पूरी इमेज ही बिगाड़ दी। अब इस सब पर सच्चाई जमाने को बताने के लिए और सब भुलाकर छवि साफ करने के लिए बिग बॉस के घर से बेहतर जगह कौन हो सकती थी। शिल्पा को राहुल cute लगता है।

एक और पापी (राम-राम बेचारी पाक साफ बच्ची के ऊपर किस-किस तरह के आरोप लगे)। देश के मोस्ट वॉन्टेड डॉन्स में से एक अबू सलेम से बेचारी ने प्रेम क्या किया। पूरे मीडिया समाज ने उसे और उसके मां-बाप को जिल्लत भरी जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया (ये सब मोनिका बेबी ने रो-रोकर खुद बिग बॉस के घर में बताया)। दिल की साफ-सच्चा मोनिका बेबी ने तो परदे पर ही लगे हाथ छवि सुधारने में मदद के लिए बिग बॉस का शुक्रिया भी अदा कर दिया। छत न होने का हवाला (हवाले से कुछ पैसे तो मिले ही होंगे) देकर संजय निरुपम से एक घर की हामी भी भरवा ली।

संजय निरुपम को पानी पी-पीकर गाली देने वाली संभावना शेठ। संजय निरुपम के करीब-करीब बेशर्म कह देने से नाराज संभावना ने बिग बॉस के घर के हर कैमरे पर एंगल से कहा- मैं नंगी होकर तो नहीं घूमती। भोजपुरी फिल्मों की ये आइटम गर्ल हर दूसरे मिनट परदे पर ठक ठिका ठक ठिका ठक ठिका ठा... की धुन पर भौंडे तरीके से कूल्हे और बदन मटकाने लगती है। इच्छा ये कि ये ठक ठिका उसे भोजपुरी से उठाकर हिंदी फिल्मों की आइटम गर्ल बना दे।

और, संभावना जिसके कंधे पर सर रखकर रो पाती है वो, राजा। वैसे, संभावना ने राजा चौधरी के कंधे पर रोते-रोते वो बता दिया जो, पेज 3 पत्रकारों के लिए आगे बड़ी चटपटी ब्रेकिंग न्यूज होने वाली है। राहुल महाजन अपनी प्रेमिका पायल के साथ शो में है। लेकिन, वो डॉन की माशूका का हाथ थामने का कोई मौका छोड़ नहीं रहा है। अरे, राजा चौधरी को भूल गए आप लोग। जिसने अपनी पत्नी श्वेता तिवारी को जमकर पीटा था- फिर जब पूरी मीडिया इकट्ठा हो गया तो, उसने कहाकि उसने पब्लिसिटी के लिए ये सब नौटंकी की थी। अब जब राजा चौधरी मीडिया का इतनी आसानी से इस्तेमाल करने में माहिर हैं तो, फिर बिग बॉस के घर में वो क्या-क्या गुल खिलाएंगे देखते रहिए।

एहसा...............न कुरैशी हर शब्द को लंबा खींच-खींचकर लोगों को हंसाते-हंसाते थक गए थे और शायद खुद भी पक गए थे। उनका दर्द ये कि किराने की दुकान वाला भी उनको सामान देने से पहले कहता है हंसाके दिखाओ तब राशन दूंगा।

MTV ROADIES जीतकर सहारनपुर का देसी-भदेस छोरा आशुतोष भी चर्चित हो गया है। MTV ROADIES वही- कमीनेपन में अपने साथ के लोगों को पीछे छोड़ने वाला मुकाबला। अब वो, बिग बॉस जीतकर शहरी लोगों पर देहाती कमीनेपन को साबित करने की होड़ मे जुट गया है। वैसे, राहुल महाजन और आशुतोष को ही बिग बॉस के घर के कमीनेपन के मुकाबले का बादशाह माना जा रहा है।

केतकी माताजी टाइप इमेज से बाहर निकलना चाहती हैं तो, देबोजीत के पास फिलहाल कोई दूसरा रियलिटी शो नहीं है और न ही कोई म्यूजिक टूर। तो, सोचा चलो बिग बॉस के घर में ही तानपूरे पर रियाज करेंगे। अकेला गायक होने से कोई मुकाबला भी नहीं है। और, लोगों को कोई जानता ही नहीं। इसलिए वो, परदे पर दिख रहे हैं यही बहुत है।

Friday, August 22, 2008

अल्पायु में लगीं लोकतंत्र को बड़ी बीमारियां

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। दूसरी कड़ी

दक्षिण अफ्रीका का प्रमुख अंगरेजी दैनिक द स्टार सामने रखा है। तारीख है 27 जून 2008। सुबह की चाय के साथ इस दिन के अंक में प्रकाशित चार खबरों पर पर नजर अटक रही है। यह एक संयोग ही था कि एक दिन के अखबार के जरिए हम दक्षिण अफ्रीका के मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक हालात की नब्ज तक पहुंच गए। पहली खबर थी कि दक्षिण अफ्रीका में लोकतंत्र के पितामह नेल्सन मंडेला 90 वें जन्मदिन की खुशी में लंदन में बहुत बड़ा जलसा होगा। दूसरी खबर में वहां के नेशनल पुलिस कमिश्नर जेकाई सेलेबी को भ्रष्टाचार और अपराधियों से सांठ-गांठ के आरोप में अदालत में पेश होना है। मौजूदा राष्ट्रपति थांबो म्बेकी ने पुलिस कमिश्नर पर लगे आरोपों को गलत कहा है, यह तीसरी खबर है। आखिरी खबर दक्षिण अफ्रीका में मौजूदा हाल की मुश्किलों का सबसे खतरनाक चेहरा है। अफ्रीका नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष जेकब जूमा के समर्थन में कांग्रेस की यूथ लीग की ओर से जज को जान से मारने की दी गई धमकी की खबर है। जूमा पर बलात्कार और भ्रष्टाचार के मुकदमें चल रहे हैं। नेशनल यूथ लीग ने कहा है कि अगर अदालत जेकब के खिलाफ फैसला देती है तो यूथ लीग यह मानेगी कि अदालते भी विरोधी तत्वों से मिल गई है। ऐसे में जज के साथ कोई भी लीग समर्थक किसी भी तरह की वारदात को अंजाम दे सकता है। यहां तक की उनकी हत्या हो सकती है। जेकब अगले साल राष्ट्रपति होने वाले हैं।

दक्षिण अफ्रीका में लोकतंत्र की 14 बरस की आयु में जो बीमारियां लगनी शुरू हो गई हैं, वो आने वाले दिनों में बड़ी तबाही के निशान भी बना रही हैं। दक्षिण अफ्रीका के हालात पर शोक जताने पर केपटाउन में दुकान चलाने वाले डी. जेगर चार दिन पहले के इसी अखबार की एक खबर का जिक्र करते हैं। जिसमें नेशनल यूथ लीग ने कहा था कि अफ्रीका नेशनल कांग्रेस के सभी कार्यकर्ता जेकब जूमा के पक्ष में पूरे मन से लग जाएं, विरोध करने वालों को जान से मार दिया जाएगा।

नेल्सन मंडेला ने कैसा दक्षिण अफ्रीका बनाना चाहा और कैसा बन रहा है। मंडेला अपने जीते जी वो सब देख भी रहे हैं। यहीं से सवाल का एक सिरा हमारी पकड़ में आता है कि कैसे हमारे संघर्ष के व्यक्तित्व और उनके विचार लड़ाई खत्म होते ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। सन 1947 में भारत को आजाद कराने के बाद कुछ लोगों को महात्मा गांधी देश के लिए गैरजरूरी से आगे बढक़र बाधक लगते हैं। गांधी का कत्ल के पीछे के गढ़े गए तर्क इसी सच के साक्ष्य हैं। दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के राजनैतिक उत्तराधिकारी उनकी इज्जत खूब करते हैं, बस जो वो कहते हैं वो नहीं करते। केपटाउन के कई बाजारों में एक विज्ञापन की होर्डिंज्स नजर आती है, ज्वैलरी के एक ब्रांड के विज्ञापन में कहा गया है कि अगर आप ये खरीदेंगे तो आपको नेल्सन मंडेला की तस्वीर का सिक्का फ्री मेंं दिया जाएगा। स्टेलिनबाथ की मार्केट हो या केप प्वाइंट के आसपास की सजी दुकानें, नेल्सन मंडेला की तस्वीर वाली टी-शर्ट सबसे अधिक डिमांड में रहती हैं। नेल्सन मंडेला बाहर से जाने वाले पर्यटकों के लिए और भाषण में नाम लेने के लिए काम आ रहे है। जैसे हमारे देश के महापुरूषों के लिए आदर सिर्फ तस्वीरों में शेष रह गया है।


दक्षिण अफ्रीका ने गुजरे 14 बरसों में भव्य बाजार भले बना लिए हों, सामाजिक स्तर पर तरक्की की कोशिश भर नजर आती है। कारोबार और खेतों पर गोरे लोगों का कब्जा है। काले लोग तेजी से शहरों में आ रहे हैं। गोरों की मंहगी जीवन शैली के कारण बाजार बहुत मंहगा हो गया है। छोटे बाजार जहां गोरे नहीं जाते, मगर मंहगाई तो पहुंच ही जाती है। देश के हर बड़े शहर के भीतर दस हजार से भी अधिक आबादी के स्लम आपको मिल जाएंगे। सब नए बसाए गए प्रतीत होते हैं। कई जगह सरकार ने स्कूल और अस्पताल भी साथ में बनवा दिए हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए कालोनियां न के बराबर हैं।

दक्षिण अफ्रीका के किसी भी शहर से आप गुजरें। एक भारतीय के तौर पर सबसे अजीब लगता है कि टीनशेड का घर और बगल में लंबी सी कार नजर आए। कार रखना वहां मजबूरी में शामिल है, क्योंकि पब्लिक ट्रांसपोर्ट न के बराबर है। गोरे लोग अपने बच्चे को कुछ दें न दें कार तो देनी ही है। उनके बच्चे काले लोगों के साथ मैक्सी कैब में जा नहीं सकते। रेल यहां न के बराबर है। एक साल में सात बार बढ़ी पेट्रोल की कीमतें इन दिनों 10.40 रेंड प्रति लीटर हो गई हैं। भारतीय मुद्रा के हिसाब से करीब 62 रूपए 40 पैसे लीटर। आवागमन लोगों के बजट का बड़ा हिस्सा खा जाता है।

आम आदमी की मुश्किलों के बीच वहां लगातार बढ़ रहे शरणार्थी और अफ्रीकी देशों के भीतर बढ़ती आपसी वैमनस्यता जीवन और जटिल कर रही है। हम वेस्र्टन प्राविंश की एक फ्ली मार्केट में घूम रहे थे। तभी वहां नजर आए एक हिन्दुस्तानी साथी से हालचाल पूंछते हैं। वो दो दिन पहले मार्केट के पास की एक बस्ती में केन्याई लोगों के साथ काले लोगंो द्वारा सामूहिक मारपीट की घटना के बारे में बताता है। लगातार कई दिनों से जिम्बाबवे में चल रहे राजनैतिक गतिरोध और उससे दक्षिण अफ्रीका में होने वाली मुश्किलों से अखबार रंगे हुए हैं। टीवी न्यूज चैनल एसएबीसी अफ्रीका में आधे घंटे का एक कार्यक्रम दिखाया जाता है कि जिम्बाबवे की सीमा पर दो लाख लोग दक्षिण अफ्रीका में दाखिल होने के लिए अनुमति की अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। सनसिटी से जोहानेसबर्ग एयरपोर्ट जाते समय रास्ते में सफेद पंडाल नजर आते हैं। उन पंडालों पर यूनाइटेड नेशन्स के लोगो छपे होने के कारण उत्सुकता बढ़ती है। पता चलता है कि ये शरणार्थी शिविर हैं। दूसरे देशों से आए लोगों को उनके देश भेजना और यहां सुरक्षित रखने के लिए ये कैंप बनाए गए हैं।


दक्षिण अफ्रीका में दिक्कत यह है कि गोरों को लगता है कि उनके हिस्से से बहुत कुछ चला गया है। काले अभी जिस तरह कि सरकारे चल रही हैं, उसकी विकास गति से बहुत उत्साहित नहीं दिखते। एक नए सिरे से बनते देश की यह स्वाभाविक बेचैनी है। एक अफ्रीकी नौजवान सिएन जाइना जोहान्सबर्ग में मनी एक्सचेंज के एक काउंटर पर काम करते हैं। यह जताने पर कि हम भारत से आए हैं, वे एक बात कहते हैं। जिस तरह आपका देश कई बार कुछ देशों की पाबंदियों को झेलकर भी खड़ा रहा। हम भी वैसा दक्षिण अफ्रीका में पहुत दिन अमरीका और अमीर मुल्कों के अनुदान पर नहीं पलना चाहते। तमाम दिक्कतों के बीच आगे बढ़ रहे दक्षिण अफ्रीका का स्वाभिमानी चेहरा सिएन जाइना, सुनहरे भविष्य के लिए बहुत सारी उम्मीद जगाता है।

Thursday, August 21, 2008

साझा जीवन शैली के सौ सबूत हैं वहां

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसमें भारतीयों के स्थान का शानदार विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। पहली कड़ी

परिचय और अभिवादन के लिए हम दोनों ने लगभग एक साथ हाथ बढ़ाया। हथेली और उंगलियों के जोशीले स्पर्श के बाद मैने अपना हाथ को पीछे खींचना चाहा, पर उसने पकड़ ढ़ीली नहीं की। मेरे हाथ को पकड़े हुए अंगूठे से अंगूठे को क्रास किया और फिर अंगूठे से हाथ को दबाया। मैने भी उसे वैसे ही अभिवादन लौटाने की कोशिश की। यह सब एक मिनट के भीतर घटित हुआ। मुझे समझ आ गया कि यह दक्षिण अफ्रीका में स्वागत का पारंपरिक तरीका है, जो मेरे हाथ खींच लेने से अधूरा रह जाता। उसने मेरा चेहरा पढ़ लिया था कि मेरे लिए इस अभिवादन से पहला साक्षात है। उसका नाम था एविल, म्युनिशिपल कारपोरेशन में मार्केटिंग मैनेजर। दक्षिण अफ्रीका के सबसे अभिजात्य कहे जाने वाले शहर केपटाउन के एयरपोर्ट पर हमें रिसीव करने आया था।

चेहरे पर तैरती मुस्कुराहट के बीच अभिवादन की व्याख्या से उसने अपनी बात शुरू की। बोला, हाथ मिलाने का मतलब है-आप पूरे परिवार सहित कैसे है? उंगलियों को कसकर पकडऩे और अंगूठे को क्रास करने का आशय है कि पशु-पक्षी, पेड़ और फसलें कैसी हैं? हथेली के पास अंगूठे से स्पर्श से पूछा जाता है कि पड़ोसी और रिश्तेदार कैसे हैं? दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर पांव धरे कुछ मिनट गुजरे थे लेकिन अभिवादन के तरीके और परंपरा ने भीतर से मुझे बांध लिया। मुझे लगा कि मैं अपने देश के किसी गांव में आ पहुंचा हूं, जहां प्रणाम के साथ कोई पूछ रहा है कि पशु-परानी(प्राणी) कैसे हैं। समूह के हित के साथ जीने की सामाजिक व्यवस्था, प्रकृति के साथ पशु तक की चिन्ता करने वाली यह जीवन शैली तो हमारी अपनी है।

उसी क्षण यह महसूस हुआ कि इसी साझेपन के अहसास से महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका के काले लोगों को अपना स्वाभाविक मित्र समझने की दृष्टि दी होगी। गांधी के दर्शन और उदाहरण से उपजी धारा को अपने भीतर समाहित किए नेल्सन मंडेला 27 बरस जेल में गुजारते हैं। सन 1994 में जब अपने देश में लोकतंत्र की बहाली कराने में मंडेला कामयाब होते हैं तो उत्पीडऩ के आरोपी गोरों को माफ कर देते हैं।
दोनों देशों के भीतर विचार और जीवन दृष्टि को पंडित जवाहर लाल नेहरू समझते हैं और एफ्रो-एशियाई फ्रेंडशिप की बुनियाद रखते हैं। हम दोनों देशों ने अंगरेजों की गुलामी साथ-साथ झेली। अपनी आजादी के लिए हजारों-लाखों का बलिदान दिया। अब अपने दम पर खड़े होने की कोशिश कर रहें हैं। हमारे पास आजादी के बाद के 60 सालों का लंबा सफर और अनुभव है तो दक्षिण अफ्रीका के पास 14 बरस का उत्साह। दोनों में इन दिनों संगत भी ठीक बैठ रही है।

दक्षिण अफ्रीका की गलियों में भारतीय के तौर पर घूमना किसी को परदेशी का होना नहीं लगता। ब्लैक, व्हाइट, कलर्ड और इंडियन। यह देश खुद को इन्हीं चार पहचान के साथ देखता है। जोहांसबर्ग हो कि केपटाउन, किसी बाजार में आप घूमें तो हर दस दुकान के भीतर एक या दो भारतीय मिल जाएगा, जिससे आराम से आप हिंदी में बतिया सकते हैं। इनमें वे भी हैं जो चार पीढिय़ों से वहां के हो गए हैं। कुछ वे हैं जो पिछले एक दशक में दक्षिण अफ्रीका रोजगार की तलाश में गए। आपका मजा तब दोगुना हो जाएगा जब आप स्टेलिबाथ मार्केट के इस दृश्य को अक्सर दोहराए जाते पाएंगे। भारतीय नजर आने वाले एक चेहरे को मोबाइल की दुकान पर बैठे देखते ही मैने उससे कुछ जानना चाहा। दो-चार बातों के बाद वो मुस्कुराकर बोला। उूर्द या हिन्दी बोलिए ना। मैं हंस पड़ा। दोनों बरसों के बिछड़े भाई की तरह मिले।

पाकिस्तान के लाहौर शहर का अब्बासी पांच मिनट के भीतर वहां के बाजारों की इतनी जानकारियां दे देता है कि कोई कई दिन बिताए तब भी न पता चले। वह दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ होने वाले हादसों की परिस्थितियां भी बयान करता है। अब्बासी के बयान दूसरे भारतीयों की बातों से मेल खाते हैं। वहां रहने वाले भारतीयों की स्थिति के बारे में तस्वीर थोड़ी साफ होने लगती है।

गुलामी के दिनों में आजादी के लिए लड़ते हुए इंडियन और ब्लैक ज्यादा करीब रहे। कारण था कि गोरे दोनों को बराबर का अस्पृश्य-असभ्य और दास होने लायक मानते थे। जोहांसबर्ग में एक सडक़ पर लिखा गया कि ब्लैक और इंडियन नजर आएंगे तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। आजादी के बाद निश्चित तौर पर ब्लैक लोगों में अधिकार का बोध जागा है। देश नए सिरे से बनना शुरू हुआ है। काले लोग आपको सीना तानकर खड़े मिलेंगे। उनके पास इत्मीनान है कि पुलिस और सरकार उनको ही अपराधी की तरह नहीं देखेगी। वेस्टर्न केपटाउन में एक पेइंग गेस्ट हाउस चलाने वाली श्वेत वर्णी महिला एंड्रीला इसे पुलिस का काले लोगों के पक्ष में खड़े होना बताती हैं। हालांकि दक्षिण अफ्रीका में गोरे वहां की सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए नए दक्षिण अफ्रीका को बनाने की उनकी भी जिम्मेदारी है। लेकिन, गोरे और संभ्रातजनों का समाज भारत से अभी यह नहीं सीख पाया है कि सामाजिक बदलाव के जो राजनैतिक निहितार्थ निकलते है, उसको भी सहज रूप से स्वीकारना होगा।

भारत में आजादी के बाद उच्च वर्णों के बीच बंटी रही सत्ता में जिस तरह मध्य जातियों और दलित राजनीति का जो उभार है, उसे सबने पूरे मन से स्वीकार लिया है। यही वजह है कि यहां एक सामाजिक संतुलन बदले स्वरूप में खड़ा मिलता है, वहां अलगाव की खाई घट नहीं पा रही है। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों ने तो पूरी तरह नई व्यवस्था के साथ चलने की राह पा ली है। लेकिन शासक रहे गोरे काले लोगों के साथ काम तो करते हैं मगर एक कमरे में लंच करने से परहेज करते हैं। दोनों का एक दूसरे के यहां आना-जाना तो बहुत दूर की बात है।

काले लोगों के सत्ता में आने से खुद को एक हद तक असुरक्षित महसूस करने वाले गोरे वहां के भारतीयों से तारतम्य बिठाने की कोशिश में हैं। लेकिन सामाजिक स्तर पर बहुत कुछ बदला हुआ नजर नहीं आता। वजह जो समझ आती है कि वे काले और भारतीयों के बीच किसी तरह परस्परता के बोध से अभी तक नहीं जुड़ पाए हैं। उनकी नस्लीय श्रेष्ठता का भाव पहले से पीढिय़ों को हस्तांरित होता आया है। हमने खुद इसे तब महसूस किया जब माबूला जंगल की सैर के दौरान रेंजर जेक्सन ने जंगल तो घुमाया लेकिन काफी ब्रेक का हिस्सा गोल कर दिया। शाम को हम उसके एक ब्लैक साथी से यूं ही पूछते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया। उसने बताया कि काफी ब्रेक में उसे काफी और स्नैक्स सर्व करने पड़ते। इंडियन या ब्लैक पर्यटक हो तो गोरे रेंजर ऐसा ही करते हैं।

Saturday, August 16, 2008

दलित एक्ट में मायावती अंदर क्यों नहीं हुईं

9 अगस्त को मायावती ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी का एलान कर दिया। वो, भी रैली में। एलान भी कैसा कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है। लेकिन, उसका नाम लोगों को तभी पता चलेगा जब वो, गंभीर रूप से बीमार हों या फिर उनकी अकस्मात मृत्यु हो जाए या फिर कुछ ऐसी ही बड़ी आपदा हो।

मायावती ने इस एलान के वक्त लखनऊ रैली में जोर देकर कहाकि उनका उत्तराधिकारी दूसरी पार्टियों की तरह उनके परिवार से नहीं बल्कि, एक खेत-खलिहान में काम करने वाली मां का बेटा होगा। अपने वोटबैंक को और पक्का करने के लिए मायावती ने भरी रैली में और आगे जाकर कहा- मेरा उत्तराधिकारी दलितों में भी खास चमार जाति का होगा। अब सवाल ये है कि क्या मायावती को सार्वजनिक मंच से ऐसे जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल की इजाजत इसलिए मिल जाती है कि वो भी उसी जाति की हैं।

दलितों को अपमान के बोध तभी होगा जब कोई उनसे ऊंची जाति का ही उन्हें जातिसूचक शब्दों से बुलाए। महेंद्र सिंह टिकैत इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करें तो, दलित एक्ट में फंसें और मायावती इस्तेमाल करें तो, कुछ चर्चा तक नहीं। कानून का यही इस्तेमाल, कानून के गलत इस्तेमाल के रास्ते तैयार कर देता है। यानी हम जिस जाति के हैं राजनीतिक फायदे के लिए अपने हिसाब से जाति का गंदा या अच्छा इस्तेमाल कर सकते हैं।

Thursday, August 14, 2008

वंदेमातरम- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा

आजादी के कुछ रंग




आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए

हिंदुस्तान मुर्दाबाद, मुजफ्फराबाद (पाक अधिकृत कश्मीर) चलो। भारत की सरकार हमारे लोगों पर जुल्म ढा रही है। भारतीय सेना के लोग हमें मार रहे हैं। प्रताड़ित कर रहे हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं। कश्मीर में पिछले कुछ समय से कुछ इसी तरह की भारत विरोधी भावनाएं फिर से उफान पर हैं। क्या सचमुच कश्मीर (जम्मू-लद्दाख छोड़कर) के लोगों के साथ भारत सरकार और भारतीय सेना इसी तरह का व्यवहार कर रही हैं। क्या सचमुच भारत ने जबरदस्ती कश्मीर पर कब्जा कर रखा है। कश्मीर का एक चक्कर लगाकर आइए तो, आपको ये बात और मजबूती से समझ में आएगी।

फिर, दुनिया में गुटनिरपेक्ष, शांति के प्रतीक और मानवता के सबसे बड़े पक्षधर देश भारत को ये क्यों नहीं समझ में आ रहा कि कब्जा, भारत और भारतीयों के मूल स्वभाव में नहीं है। इसलिए वो, ये काम तो मजबूती से कर ही नहीं सकते। हमारे देश में चीन की तरह तानाशाह शासन तो है नहीं कि जो, फैसला हमने लिया उस पर अमल कर सकें। हमारे पास इतनी भी सैन्य ताकत नहीं है कि हम हर दिन भारतीय सीमा का अतिक्रमण करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों और उनकी शह से भारत में आतंक मचाने वालों का बाल भी बांका कर सके। चीन और पाकिस्तान अवैध कब्जा भारत की जमीन पर किए हैं उसे हम छुड़ा नहीं पा रहे हैं फिर, हम क्यों कश्मीर को कब्जे में रखे हुए हैं। बेवजह देश की सेना की वहां आहुति दे रहे हैं, देश के लोगों की मेहनत की कमाई घाटी में झोंक रहे हैं। विदेश में पढ़कर लौटे और भारत के लोकतंत्र की वजह से ही सत्ता की मलाई काट रहे अब्दुल्ला और मुफ्ती के बेटे-बेटी भी कह रहे हैं कि भारत की सरकार कश्मीरियों पर जुल्म ढा रही है।

हुर्रियत और दूसरे अलगाववादी तो पहले से ही ये बात गला फाड़कर कह रहे हैं कि कश्मीर, ऐसी समस्या है जिसका हल निकालने के लिए भारत को कश्मीरियों के साथ पाकिस्तान या किसी तीसरे पक्ष को भी बिठाना होगा। श्रीनगर की रैलियों में पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते हैं। पाकिस्तान जिंदाबाद और हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगते हैं। मैं जब शादी के बाद कश्मीर घूमने गया था तो, घाटी में बहुत बढ़िया माहौल था फिर भी, मैं जिस बोट में रुका था उसके, मालिक ने कहाकि- हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारी, कश्मीर का सेब न बिके इसके लिए सेना और सरकार के साथ मिलकर कश्मीर में आतंकवादी गतिविधि चला रहे हैं। बेहद वाहयात तर्क हैं लेकिन, आप-हम कुछ नहीं कर सकते। उनको भारतीय सेना पर, भारत सरकार पर भरोसा ही नहीं है। सेना के सामने कश्मीर के लोग ठीक वैसे ही नारे लगाते हैं जैसे- शायद आजादी के आंदोलन के समय कश्मीर से लेकर कन्याकुमार तक के भारतीय अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाते थे।

कश्मीर से वो पाकिस्तान जाने की तैयारी करते हैं तो, उनकी करते वक्त जो मरा वो, एक आतंकवादी था। और, द इकोनॉमिक टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर Pushing Kashmir toward Pakistan में स्वामीनाथन अय्यर कह रहे हैं कि जम्मू के आंदोलन की वजह से कश्मीर, पाकिस्तान के नजदीक जा रहा है। स्वामीनाथन साहब खुद ही अपने लेख की शुरुआत में, पुराने वाकये में एक कश्मीरी अधिकारी के हवाले से कहते हैं कि, पाकिस्तान के साथ उनका व्यापार ज्यादा स्वाभाविक है। अब स्वामीनाथन साहब कहीं भी ये नहीं बताते कि जब 60 साल से कश्मीरियों की सारी गलत (अलगाववादी पढ़ें) हरकतों के बाद भी जम्मू में कभी एक भी मुसलमान के सिर की पगड़ी नहीं उछली तो, भी क्या कश्मीर के अलगाववादी कश्मीर को पाकिस्तान के पास नहीं ले जा रहे थे।

कश्मीर के सेब व्यापारी करीब पंद्रह दिनों से सेब से भरा ट्रक लिए खड़े जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर खड़े रहे गए तो, वो पाकिस्तान में सेब बेचने चल पड़े। लेकिन, शायद ही कोई एक वाकया सुनने मिला हो कि देश के किसी भी हिस्से में किसी कश्मीरी मुसलमान ने एक पल भी दहशत में गुजारा हो। लेकिन, जब श्रीनगर, पहलगाम और गुलमर्ग के आसपास अलगाववादियों ने तांडव मचा रखा तो, मेरे परिवार जैसे जाने कितने धरती के स्वर्ग पर डरे सहमे थे कि- अब घर सही-सलामत लौट पाएंगे या नहीं।

दरअसल सच्चाई ये नहीं है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने या उसे वापस लेने से ये सारा हंगामा घाटी में चल रहा है। सच्चाई वो है जो, मशहूर कश्मीरी गायक गुलाम मोहम्मद बताते हैं गुलाम मोहम्मद जम्मू में रहते हैं वो, कहते हैं कि, ये लड़ाई हिंदू-मुसलमान की है ही नहीं। ये लड़ाई है जम्मू के अधिकारों की। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि चाहे अंग्रेजी में J&K कहो चाहे देसी जुबान में जम्मू-कश्मीर, आता जम्मू ही पहले है। लेकिन, विडंबना देखिए कि जम्मू के लोग भारत माता की जय बोलते हैं, 60 सालों में कभी देश के लोगों को डराकर नहीं रखा। कभी कोई धार्मिक आधार पर हिंसी नहीं की। फिर भी भारत सरकार से तवज्जो नहीं पाते।

जबकि, कश्मीर के लोग लगातार भारत पर कब्जे का आरोप लगाते रहते हैं। हिंदुस्तान के खिलाफ नारे लगाते हैं, पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं, हिंदुस्तानी झंडे को आग लगाते हैं। अभी कल के अखबारों में भी श्रीनगर से मुजफ्फराबाद जाने वालों के हाथ में भारत को बंटवाकर पाकिस्तान बनवाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के फोटो थे। आज 14 अगस्त है। आज ही के दिन 1947 में पाकिस्तान आजाद हुआ था यानी भारत से बंटा था। अब मुझे तो आज के हालात देखने के बाद लगता है कि कश्मीर को आजाद कर देना ही भारत के लिए सबसे बेहतर होगा।

कश्मीरियों की भाषा में भारत सरकार कश्मीर पर जबरी कब्जा जमाए हुए है। और, उसका खामियाजा पूरे देश के लोग तो भुगत ही रहे हैं। सबसे ज्यादा जम्मू-लद्दाख के वो, लोग भुगत रहे हैं जो, अलगाव की धमकी भरी भाषा नहीं बोलते। जहां, सचमुच धरती पर स्वर्ग जैसा माहौल रहता है। लेकिन, हमारी सरकार तो, धमकी ही भाषा सुनती है। और, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को भी पाकिस्तान के थोड़ा और नजदीक जाकर ही भारतीय लोकतंत्र की अहमियत समझ में आएगी।

Wednesday, August 13, 2008

मैं पैर छूने के खिलाफ नहीं हूं

मैंने अपनी पिछली दो पोस्टों में बेटियों का पैर छूने की परंपरा के गलत असर का उदाहरण देकर इसकी खिलाफत की थी। जिसके बाद इसके समर्थन में ज्यादातर लोग आए। लेकिन, कुछ लोगों ने इससे ये मतलब भी निकाल लिया कि मैं एकदम से ही पैर छूने के खिलाफ हूं।

मैं एकदम साफ कर दूं कि मुझे नहीं लगता कि अपने से बड़े को सम्मान देने के लिए उसका पैर छूने में कोई बुराई है। चाहे वो फिर मां-बाप हों, दूसरे रिश्तेदार या फिर कोई भी भले ही वो, ऐसे किसी रिश्ते में न आते हों जो, स्वाभाविक-सामाजिक तौर पर पैर छूने की जगह पाते हैं। और, मुझे संजय शर्माजी की एक बात तो एकदम सही लगती है कि आखिर छोटे-बड़े का कोई पैमाना तो होगा ही। और, ऐसे में छोटे, बड़े का पैर छुए, इसमें गलत क्या है। हां, कोई छोटा भी अगर ये समझता है कि किसी बड़े के लिए उसके मन में सम्मान नहीं है तो, फिर उसे अपने बड़े का भी पैर नहीं छूना चाहिए। भले ही उस पर दबाव पड़े।

और, टिप्पणियों में ही ये भी आया था कि अगर, बेटी का पैर छूना गलत है तो, कन्यादान भी। निश्चित तौर पर कन्यादान भी गलत है। पहले के जमाने की परिस्थितियों के लिहाज से बेहतर था कि बेटी जो, पति के घर जाने के बाद दरवाजे से भी बाहर नहीं निकलती थी। और, उसके पिता के घर से कभी-कभी ही उसकी हाल-खबर ली जाती थी। उस समय बेटी को सुरक्षा के लिहाज से शायद उसके पति के परिवार को ज्यादा सम्मान दिए जाने की परंपरा रही होगी। वो, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा दोनों ही रही होगी। लेकिन, आज के संदर्भ में तो ये बिल्कुल ही फिट नहीं बैठती। लेकिन, अब ये भी ठीक नहीं होगा कि इसे आधार बनाकर रिश्तों को सम्मान देना भी बंद कर दिया जाए।

Tuesday, August 12, 2008

बेटियों का पैर छूना बंद कर दें तो, बेटियों का बड़ा भला हो जाए

हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से हूं इसलिए ये परंपरा हमारे ही यहां होगी। लेकिन, जब मैंने ये जानना चाहा कि, कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है तो, इसका काउंटर मेरी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट में शुमार था। और, इस पर अब तक 13 टिप्पणियां भी आईं हैं। अब समीरजी और ज्ञानजी की तरह मेरा वृहद नेटवर्क तो है नहीं इसलिए इतनी टिप्पणियां भी मुझे ये बताती हैं कि इस पोस्ट से कितने लोगों का सरोकार है।

टिप्पणियों से मुझे अंदाजा लगा कि ये कुरीति (अगर ये रीति में है तो, जिसके पास इसके पक्ष में तर्क हों वो बताएं) देश के ज्यादातर हिस्से में फैली हुई है। कोई भी टिप्पणी तो, कम से कम इसके पक्ष में नहीं ही है। अब मुझे ये लगता है कि बेटी-दामाद का आजीवन पैर छूना या सिर्फ शादी के समय ही पैर छूना भयानक विसंगति है और इसके साथ जुड़े-जुड़े उससे भी खतरनाक विकृतियां पैदा हो रही हैं।

अब मुझे तो ये लगता है कि बेटी-दामाद का पैर छूकर पहले ही बेटी को कमतर साबित कर दिया जाता है। अब ये कौन सा पैमाना हो सकता है कि जिस लड़की को मां-बाप ने जन्म दिया हो पाला-पोसा हो उसी लड़की को मां-बाप के पांव छूने का हक न हो। और, हद तो ये कि खुद मां-बाप बेटी का पैर छूते हैं। मेरे यहां तो शादी की रस्म के समय ही नहीं आगे भी परंपरा को निभाया जाता है। शादी के समय तो, उस उत्साह में पांव-पूजने की रस्म मुझे बहुत बुरी नहीं लगी और मेरा थोड़ा ये भी मानना है कि एकदम से कोई क्रांति नहीं होती। समाज, समय परिस्थिति के लिहाज से धीरे-धीरे बदलाव बेहतर होते हैं। और, मैंने अपने सास-ससुर को शादी के बाद बेहद कड़े प्रतिरोध के साथ पैर छूना बंद करवा दिया। क्योंकि, ये बेहद अजीब स्थिति होती है कि मां-बाप के जैसे लोग आपके पैर छू रहे हों।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। ये विसंगति हमारे यहां कितनी आगे तक बढ़ती है- इसका उदाहरण देखिए। मेरे माताजी-पिताजी मेरी ननिहाल के पूज्य हुए। इस वजह से मेरे नाना-नानी का पूरा गांव ही पिताजी-माताजी के साथ मेरे भी पैर छूता है। क्यों, वजह वही शादी के समय लड़की लक्ष्मी तो, लड़की से शादी करने वाला लड़का लक्ष्मीनारायण हो जाता है। और, फिर लक्ष्मीनारायण के लड़के-लड़कियां भी पूज्य हो गए। यानी सिर्फ पति ही नहीं लड़की के परिवार के लोग लड़की के लड़के-लड़कियों के भी पैर छूते हैं। मेरे मामा-मामी मेरा पैर छूते हैं और, मामी को पैर छूने से रोको तो, वो नाराज हो जाती हैं आप हमारे ब्राह्मण हैं, हमें पाप लगेगा।

लड़के अपने से छोटी बहनों का पैर छूते हैं। फिर वो चाहे कुंवारी कन्याएं हों या फिर शादी के बाद पति के साथ घर आएं। पिछले रक्षाबंधन पर मामा की लड़की ने मेरे राखी बांधी तो, उम्र में छोटी होने की वजह से मैंने उसके पैर नहीं छुए। उसके हाथ में तोहफे के तौर पर कुछ रुपए दिए। मेरे पिताजी को राखी बांधने आईं मेरी बुआजी नाराज होकर बोलीं- रमेंद्र बिना गोड़ धरे (पैर छुए) दक्षिणा न देए क चाही। मैंने पैर नहीं छुआ लेकिन, थोड़ी देर के लिए माहौल अटपटा जरूर हो गया।

अब इस चीज को मैं थोड़ा आसानी से समझ पाया हूं कि मेरे यहां क्यों ये कहा जाता है कि लड़की थोड़ा नीचे के ब्राह्मण परिवार से भी होगी तो, ठीक है। लेकिन, लड़की की शादी उच्चकुल के ही ब्राह्मण परिवार में करेंगे। उसके पीछे वजह यही होती है कि लड़की की शादी जिस परिवार में करेंगे। वहां सभी का पैर छूना होता है। अब जैसे हम लोगों प्रतापगढ़ के सोहगौरा त्रिपाठी हैं। तो, अब हमारे परिवार की लड़कियों की शादियां तीन घर के शुक्ला परिवार के अलावा और कहीं नहीं हो सकती। इसका नुकसान ये कि लड़का और उसका परिवार भले ही आर्थिक-सामाजिक हैसियत में कमतर हो लेकिन, अगर वो ब्राह्मण कुल के ऊंचे पायदान पर है तो, उससे शादी करने में कोई हर्ज नहीं।

इसकी वजह से ब्राह्मणों में भी जो, तीन घर के लड़के हुए और अगर थोड़े लायक हो गए तो, उनके लिए थोड़ी बेहतर स्थिति वाले कुलीन परिवारों की लाइन लग जाती है। और, फिर उसी कतार के लिहाज से लड़के को दिया जाने वाला दहेज भी बढ़ जाता है। मेरी पहली पोस्ट पर जो टिप्पणियां आईं वो, ज्यादातर लोग मेरी तरह ये महसूस करते हैं कि ये गलत परंपरा है लेकिन, मेरी ही तरह ज्यादातर लोग सामाजिक रीतियों के खिलाफ एकदम से नहीं जाना चाहते। लेकिन, मैंने तो तय कर लिया है कि अपने से छोटे किसी का भी पैर नहीं छुऊँगा और नही किसी बड़े से पैर छुआऊंगा।

मुझे ये लगता है कि, अगर हम लोग ये तय करें तो, इस बुराई को खत्म किया जा सकता है। और, लड़कियों को देवी मानकर उन्हें सामान्य मनुष्य से भी गई गुजरी हालत में जाने से बचा सकते हैं। जैसे लड़का, वैसे ही लड़की। मैंने अपने आसपास के अनुभव से इसकी विसंगतियां बताईं है अगर आप लोगों को इसकी दूसरी बुराइयां (अच्छाइयां तो हो नहीं सकती फिर भी हो तो, मुझे भी बताएं) भी दिखती हैं तो, उसे आगे जरूर बढ़ाइए।

भारत के आर्थिक सुधारों की यात्रा के नायक हैं नरसिंहाराव, वाजपेयी और मोदी

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भारतीय कृषि क्षेत्र में तीन बड़े सुधारों को लागू क...