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Showing posts from July, 2007

उत्तर प्रदेश में राजनीति के जरिए विकास का गणित

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती राज्य के विकास के लिए केंद्र सरकार से 80 हजार करोड़ रुपए मांग रही हैं। वो भी अखबारों में विज्ञापन देकर। शायद ये पहली बार हो रहा है कि कोई मुख्यमंत्री केंद्र सरकार से राज्य के विकास के लिए विज्ञापन के जरिए पैसे मांग रहा है। इस बार सरकार संभालने के साथ ही मायावती ने इस बात की कोशिश शुरू कर दी थी कि राज्य का विकास कैसे किया जाए (कम से कम बोलकर)। जब मायावती राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं, तभी से लोग इस बात का अंदाजा लगाने लगे थे कि आखिर मायावती केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को समर्थन देकर क्या हासिल करना चाहती हैं। लोगों को लग यही रहा था कि केंद्र सरकार को मायावती का ये समर्थन कहीं सिर्फ राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ तक ही न सीमित रह जाए। लेकिन, इस बार मायावती साफ संदेश दे रही हैं कि वो लंबी पारी खेलने के मूड में है। और, वो उत्तर प्रदेश के जरिए पूरे देश में ये संदेश दे रही हैं कि उन्हें इस बात अच्छी तरह अहसास है कि जिस सर्वजन के फॉर्मूले पर चुनाव जीतकर वो यूपी में सत्ता में आई हैं, आगे के पांच साल का शासन सिर्फ उसी के बूते नहीं हो सकता। मायाव

टीवी न्यूज चैनल को टीआरपी के भूत से बचा लो

जर्नलिज्म में एक्सलेंस का मतलब क्या है। क्या हम एक्सलेंट जर्नलिज्म कर रहे हैं। रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड्स दिए गए और अवॉर्ड्स के बाद हुए पैनल डिस्कशन में सबने एक-दूसरे से यही सवाल पूछा या यूं कहें कि खुद को कसौटी पर कसने की कोशिश की। उस मंच पर एक साथ बड़े-बड़े पत्रकार बैठे हुए थे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को चलाने वाले लोग थे। कुछ ऐसे थे जो, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों में ही अपनी अच्छी छाप छोड़ चुके हैं। एक्सलेंट ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट का अवॉर्ड पाने वाले राजदीप सरदेसाई के साथ बरखा दत्त बहस को चला रही थीं। इंडियन एक्सप्रेस के शेखर गुप्ता, द हिंदू के एन राम, टाइम्स ग्रुप के रवि धारीवाल जैसे दिग्गज मंच पर थे। तो, अखबारों-टीवी चैनलों की सुर्खियां बनने वाले बड़े-बड़े नेता बहस को सुनने वालों में थे। बहस की शुरुआत ही इसी से हुई कि क्या बाजार टीवी चैनलों या पूरे मीडिया को ही इस तरह से चला रहा है कि उसमें इस बात की कोई जगह ही नहीं बची है कि एक्सलेंट जर्नलिज्म किया जा सके। या फिर बदलते जमाने के साथ जर्नलिज्म के पैमाने भी बदल रहे हैं और इसी दौर की वजह से मीडिया भटका हुआ द

पश्चिम बंगाल में लाल सलाम के ३० साल

21 जून 2007 को पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार के तीस साल हो गए। ये दुनिया की अकेली ऐसी कम्युनिस्ट सरकार बन गई। जो, चुनकर इतने सालों तक शासन में रही। ये रिकॉर्ड शासन इतने सालों का रहा कि इस शासन की शुरुआती बागडोर संभालने वाले मुख्यमंत्री कामरेड ज्योति बसु को हटाकर (बूढ़ा हो जाने का हवाला देते हुए ) दूसरे खांटी कामरेड बुद्धदेब भट्टाचार्य को राज्य की बागडोर देनी पड़ी। लेकिन, जब वामपंथी शासन के तीस सालों पर नजर डालें तो, साफ दिख जाएगा कि शासन तो, भले ही पश्चिम बंगाल में कहने को वामपंथियों का ही चल रहा है। लेकिन, दरअसल ये शासन पूरी तरह से पूंजीवादियों के हाथ में है। और, ये बात में नहीं कह रहा हूं। ये बात निकलकर आई है अभी के पश्चिम बंगाल के मुखिया बुद्धदेब भट्टाचार्य के श्रीमुख से। तीस साल पूरे होने पर अलग-अलग टीवी चैनलों-अखबारों ने बुद्धदेब से जानना चाहा कि आखिर दुनिया की सबसे ज्यादा समय तक चुनकर चलने वाली वामपंथी सरकार की दिशा-दशा क्या है। बुद्धदेब ने कहा पुराने वामपंथी लकीर के फकीर रह गए हैं। उन्हें आज के जमाने की समझ नहीं है। आज की जरूरतों की समझ नहीं है। और, समय आ गया है कि जब वामपंथी