Thursday, October 29, 2020

विकल्पहीनता में विकल्प खोजने की कोशिश हैं बिहार विधानसभा के चुनाव

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

 

लोकतंत्र में जनता ही माई बाप होती है, यह जुमला अकसर सुनने को मिल जाता है, लेकिन कमाल की बात है कि लोकतंत्र में नेता हरसंभव कोशिश करके धीरे-धीरे जनता से उसका चुनने वाला अधिकार ही छीनने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है और इसे अलग-अलग विचारों के स्वतंत्र तौर पर बढ़ते हुए लोकतंत्र को ज्यादा मजबूत करने के तौर पर देखा जाता है और काफी हद तक यह सही भी है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अलग-अलग सोच रखने वाले अलग-अलग तरीके से राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाने की बात करने वाले एक दूसरे के साथ आकर जनता के सामने सरकार का विकल्प देने की बात करने लगें तो क्या यह लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण है। इस जवाब आ सकता है कि राजनीतिक तौर पर इसमें बुराई क्या है। और, अलग-अलग विचार की पार्टियों के साथ आकर सत्ता के लिए विकल्प देने की इस प्रक्रिया को हमेशा साझा कार्यक्रम की सरकार के तौर पर पेश करने की कोशिश होती है। एक बड़ा राजनीतिक विद्वानों का समूह है, जिसे गठजोड़ की सरकारों में ज्यादा जीवंत लोकतंत्र नजर आता है। इसे ऐसे भी कहा जाता है कि जब लोकतंत्र में एक दल बहुमत के साथ सत्ता में होता है तो धीरे-धीरे उसमें तानाशाही की भावना आने लगती है और इसीलिए गठजोड़ की सरकार लोकतंत्र में ज्यादा लोकतांत्रिक और जीवंत होती है, लेकिन कमाल की बात यह है कि ऐसे गठजोड़ की सरकारें जनता के विकल्प चुनने की स्वतंत्रता पर किस कदर चोट पहुंचाती हैं, इसका अनुमान ही नहीं लगता।

अभी बिहार में चुनाव हो रहा है और बिहार में किसी से भी बात कर लीजिए। तुरन्त यह जवाब आ जाएगा कि बिहार में हम बदलाव तो चाहते हैं, लेकिन विकल्प कहां है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां- भाजपा और कांग्रेस- बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों- जदयू और राजद- की पिछलग्गू पार्टियां हैं। ऐसे में बिहार में सिर्फ गठजोड़ ही विकल्प है। और, इस गठजोड़ वाले विकल्प ने बिहार के लोगों से विकल्प चुनने का विकल्प ही छीन लिया। लोकतंत्र में विकल्प चुनना यह सबसे महत्वपूर्ण होता है और 5 वर्ष तक जनता प्रतीक्षा इसी बात की करती है कि बेहतरी की उम्मीद कितनी पूरी हुई, इस आधार पर किस विकल्प पर निशान लगाए। बिहार के मामले में कमाल की बात यह भी रही कि ढेरों राजनीतिक दल होने से भले ही विकल्पों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन जनता का विकल्प सीमीत होता गया। बिहार में कांग्रेस का नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है और भाजपा नेता सुशील मोदी की पूरी पहचान ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उप मुख्यमंत्री (सहायक) के तौर पर होती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति के दिनों में एक बार किसी नेता ने इस बात का गूढ़ जवाब दिया था कि उपाध्यक्ष की भूमिका छात्रसंघ में क्या होती है। जवाब इतना सटीक है कि अभी तक मन मस्तिष्क में बैठा हुआ है और वह जवाब था, उप मतलब चुप। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष पद के लिए उप मतलब चुप की यह व्याख्या शायद उतनी सटीक उस समय नहीं लगी होगी, लेकिन अब जब बिहार में भाजपा के उप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देखता हूं तो विश्वविद्यालय के जमाने की वह बात सटीक लगती है।

बिहार में भाजपा का सबसे बड़ा नेता उप बनकर चुप हुआ तो पूरी भाजपा चुप हो गई। 2015 में चुप्पी तोड़ने का साहस किया तो नीतीश कुमार ने पलटी मारकर लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया और बहुविकल्पीय लोकतांत्रिक प्रश्न के उत्तर में भी बिहार की जनता को विकल्पहीनता के तौर पर नीतीश कुमार ही मिले। बिहार के डेढ़ दशक में यह भी साबित हुआ कि लोकतंत्र में भले ही जनता के माई बाप होने की अवधारणा स्थापित है, लेकिन गठजोड़ की सरकारों में जनता का महत्व कमतर होता जाता है। और, कई बार तो शून्य से भी नीचे चला जाता है। बिहार में एक समय सुशासन बाबू की छवि के साथ चमकने वाले नीतीश कुमार के निरंतर राज में अब जनता के माई बाप होने की अवधारणा शून्य से भी नीचे चली गई है, लेकिन हर गड़बड़ी के बावजूद लोकतंत्र जनता को अधिकार देने के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ अवधारणा है और इसी सर्वश्रेष्ठ अवधारणा में विकल्पहीनता में भी विकल्प की तलाश जनता कर लेती है।

बिहार विधानसभा के चुनाव में इस बार हर कोई यह कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और लोकजनशक्ति पार्टी के बीच अंदरुनी गठजोड़ है और चिराग पासवान इसे चिल्लाकर कह भी रहें हैं क्योंकि इसकी उन्हें जरूरत भी बहुत ज्यादा है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी उतने ही जोर से यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि भाजपा और लोकजनशक्ति का कोई ऐसा अंदरूनी समझैता नहीं है। दरभंगा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार को भावी मुख्यमंत्री बताकर राजनीतिक धंध छांटने की कोशिश की है, लेकिन यह धुंध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन भाजपा कार्यकर्ताओं के सामने से छांटना चाहते हैं, उनको जब कोई धुंध दिख ही नहीं रही है या कोई भ्रम है ही नहीं तो उनके लिए स्थिति में कोई बदलाव होने से रहा। दरअसल, लगातार नीतीश-भाजपा गठजोड़ में भाजपा कार्यकर्ता नीतीश कुमार को अपना नेता मान बैठा और उसके पीछे बड़ी वजह यही कि नीतीश कुमार भाजपा के सुशासन वाले एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन 2015 में भाजपा के उस कार्यकर्ता को बड़ा झटका लगा, जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी से हाथ मिला लिया और यह झटका सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं को नहीं, उन सभी बिहारियों को लगा था जो बिहार की बेहतरी की राह पर नीतीश कुमार की अगुआई में आगे बढ़ रहे थे। बाद में जुलाई 2017 में नीतीश कुमार फिर से भाजपा के साथ आए गए, लेकिन करीब 20 महीने में विकल्पहीनता की अवस्था में नीतीश को विकल्प मान बैठे बिहार के लोगों ने विकल्प खोजने का मन बना लिया और इस बार तरीका अलग था।

बिहार में भाजपा कार्यकर्ता और नरेंद्र मोदी के आभामंडल की वजह से जुड़ा नया भाजपाई नीतीश कुमार को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। मोदी और शाह इसे अच्छी तरह से समझ रहे थे, लेकिन 2015 का असफल प्रयोग उन्हें दुस्साहसी होने से रोक रहा था और इसीलिए नीतीश कुमार को लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव के पाले में जाने से रोकना भी जरूरी थी। विकल्पहीनता में विकल्प खोज रही बिहार की जनता के लिए 2020 विधानसभा चुनाव एक ऐसा प्रयोग है, जिसकी सफलता की प्रतीक्षा देश के दूसरे राज्यों के विकल्पहीन मतदाता भी कर रहे हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव नतीजे यह भी तय करेंगे कि लोकतंत्र में असली माई बाप तो जनता ही होती है।

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Sunday, October 25, 2020

टीवी की टीआरपी नहीं, टीवी पत्रकारिता की साख के साथ छेड़खानी हुई है

 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

फर्जी तरीके से टीआरपी बढ़ाने के मामले में मुम्बई पुलिस ने कुल 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। फर्जी तरीके से टीआरपी बढ़ाने की जांच में 3 टीवी चैनलों के नाम सामने आए। मुम्बई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने रिपब्लिक टीवी पर सीधा हमला बोल दिया, हालांकि, रिपब्लिक के साथ फक्त मराठी और बॉक्स सिनेमा पर भी टीआरपी के फर्जीवाड़े का आरोप मुम्बई पुलिस ने लगाया था, लेकिन रिपब्लिक टीवी ने मुम्बई पुलिस की प्रेस कांफ्रेंस के कुछ घंटे बाद ही मुम्बई पुलिस की FIR में इंडिया टुडे का नाम होने और रिपब्लिक का नाम न होने का दावा करके फर्जी तरीके से टीआरपी हासिल करने की पूरी बहस का ही शीर्षासन करा दिया। स्पष्ट तौर पर यह बात दिख रही थी कि किस तरह से मुम्बई पुलिस रिपब्लिक टीवी के साथ निजी दुश्मनी जैसा व्यवहार करती दिख रही थी और यह व्यवहार इससे पहले तब दिखा था, जब सोनिया गांधी पर टिप्पणी करने के बाद मुम्बई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी से 12 घंटे से ज्यादा पूछताछ की थी। इसमें कतई संदेह नहीं है कि मुम्बई पुलिस रिपब्लिक के खिलाफ विद्वेष की भावना से काम कर रही है। अब मुम्बई उच्च न्यायालय में अर्नब का पक्ष रख रहे मशहूर अधिवक्ता हरीश साल्वे मुम्बई पुलिस की जांच में रिपब्लिक का नाम आने को इन्हीं आधारों पर खारिज कर रहे हैं। हरीश साल्वे ने कहाकि उनके मुवक्किल अर्नब की आवाज दबाने की कोशिश इसलिए हो रही है क्योंकि उन्होंने पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ बहुत मजबूत तरीके से आवाज उठाई थी। सुशांत सिंह राजपूत मामले में भी रिपब्लिक ने महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और मामला सिर्फ एक टीवी चैनल और एक सरकार के बीच का होता तो ऐसा होना स्वाभाविक है, लेकिन यहां तो टीवी की फर्जी टीआरपी का मामला अब सीधे तौर पर टीवी चैनलों की निजी दुश्मनी और उससे भी आगे बढ़कर अलग-अलग सरकारों के साथ खड़े दिखने की कोशिश में किसी भी हद तक जाने का मामला हो गया है।

टीवी चैनलों की गिरती साख का सवाल इतना बड़ा हो गया है कि नेटवर्क 18 के प्रधान संपादक राहुल जोशी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ यह सवाल पूछा कि मीडिया में घंटों एक ही विषय पर हो रही रिपोर्टिंग को आप किस तरह से देखते हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने इस सवाल के जवाब में कहाकि, राहल, इसका जवाब तो मुझसे अच्छा आप दे सकते हो। गृह मंत्री अमित शाह ने कहाकि मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। जहां गलत हो रहा हो, वहां मीडिया को सवाल खड़ा करना चाहिए, लेकिन कार से निकले, अभी दायां पैर बाहर निकाला ... इस तरह की रिपोर्टिंग ठीक नहीं है और इससे न्याय के काम में भी बाधा आती है। दरअसल, आदर्श स्थिति यही होनी चाहिए कि किसी भी हाल में लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर स्थापित पत्रकारिता को अपने आचरण के लिए राजनेताओं या सरकार की तरफ न ताकना पड़ता, लेकिन विज्ञापन के लिए टीआरपी और सरकार पर आश्रित टीवी चैनलों ने खुद ही सरकारों को पक्ष बना दिया और इसी का नतीजा है कि बिना ड्राइवर की कार, स्वर्ग की सीढ़ी, भूत-प्रेत-नाग-नागिन और घटिया कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते टीवी चैनल कब टीआरपी खरीदने में लग गए होंगे, पता ही नहीं चला। कमाल की बात है कि आज टीवी की शुचिता और शुद्धता की बात करने वाले ज्यादातर वही संपादक हैं जो ज्यादातर मौजूदा दौर में संपादक की कुर्सी पर काबिज नहीं रह पाए हैं और टीवी की साख गिराने का बुनियादी काम करके गए हैं। और, शायद टीआरपी के फर्जीवाड़ा में भी टीआरपी की शुरुआत से ही शामिल रहे थे। अभी भी देश भर सिर्फ 44 हजार घरों में टीवी की टीआरपी आंकने वाले मीटर या बक्से लगे हुए हैं। BARC भले ही दावा करता है कि टीवी की टीआरपी नापने का तरीका पहले से बहुत अच्छा हुआ है, लेकिन टीआरपी के फर्जीवाड़े की खबर सामने आने के बाद 12 सप्ताह के लिए टीआरपी न आंकने का फैसला स्पष्ट करता है कि टीआरपी का फर्जीवाड़ा बहुत जबरदस्त तरीके से हो रहा था। रिपब्लिक ने BARC और टीवी चैनल के पत्राचार को सार्वजनिक करके बताया कि दरअसल किसी भी जांच में रिपब्लिक का नाम टीवी की टीआरपी में छेड़छाड़ के लिए नहीं आया है। अब इस पर भी विवाद हो गया। BARC के साथ ही NBA के चेयरमैन रजत शर्मा भी खुलकर रिपब्लिक के खिलाफ खड़े हो गए।

इस सबके बीच हरीश साल्वे ने अर्नब गोस्वामी की तरफ से पक्ष रखते हुए न्यायालय से फर्जी टीआरपी मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी CBI से कराने की मांग की और कहाकि टीवी की विश्वसनीयता के लिए यह बहुत जरूरी है क्योंकि मुम्बई पुलिस उनके मुवक्किल के प्रति पक्षपाती है। भारतीय टीवी मीडिया पर इस तरह का संकट इससे पहले कभी नहीं आया था और टीवी चैनलों में बैठे लोग कुछ भी स्थापित करने की कोशिश में लगे हों, टीवी चैनलों को देखकर, असली टीआरपी बढ़ाने वाली जनता के मन में धारणा गहरे बैठ गई है कि लंबे समय से टीवी की टीआरपी के शीर्ष पर बैठे टीवी चैनलों के पिछड़ने के बाद शीर्ष पर पहुंचने की वजह से रिपब्लिक के खिलाफ यह घेरेबंदी की जा रही है। और, यह घेरेबंदी जनता के मन में और गहरे बैठ गई, जब महाराष्ट्र विधानसभा ने रिपब्लिक के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को समन कर दिया। रिपब्लिक रिपब्लिक संवाददाता प्रदीप भंडारी को बिना किसी आधार के मुम्बई पुलिस ने घंटों बैठाए रखा और मोबाइल छीन लिया। प्रदीप भंडारी के पास न्यायालय से राहत होने के बावजूद यह सब हुआ।

रिपब्लिक की याचिका में कहा गया है कि इसकी जांच होनी जरूरी है जिससे बड़े स्तर पर देश भर में हो रही साजिश सामने आ सके। हरीश साल्वे ने केबल टीवी ऑपरेटर, ब्रॉडकास्टर, मीडिया एजेंसियों, विज्ञापनदाताओं और दूसरे पक्षकारों पर इसका प्रभाव पड़ने की बात कहकर इसकी जांच पूरे देश में सीबीआई से कराने की मांग की थी और इसी बीच मामले में एक नया मोड़ आ गया, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने टीवी की टीआरपी फर्जी तरीके से बढ़ाने के मामले में एक मामला दर्ज कर लिया। इस एफआईआर में किसी टीवी चैनल का नाम नहीं है, लेकिन किसी भी टीवी चैनल की जांच की जा सकती है। 17 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने मामला दर्ज किया और इसे सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर दी गई। एफआईआर में किसी का नाम नहीं है। सीबीआई ने लखनऊ के हजरतगंज थाने में दर्ज एफआईआर की बुनियाद पर जांच शुरू कर दी है। गोल्डेन रैबिट कम्युनिकेशंस मीडिया के कमल शर्मा ने यह मामला दर्ज कराया है और इसमें कहा गया है कि मेरे पास पक्की जानकारी है कि टीआरपी को फर्जी तरीके से बढ़ाने के लिए अपराधिक तरीके का भी इस्तेमाल किया गया है।

मुम्बई और दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश टीआरपी के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण है और अब मुम्बई पुलिस की जांच के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की एफआईआर पर सीबीआई जांच से पूरे देश में टीवी टीआरपी के फर्जीवाड़े की जांच होगी। हो सकता है कि इस जांच में टीवी की टीआरपी के बेढंगे तंत्र को थोड़ा दुरुस्त किया जा सके और टीवी की टीआरपी में फर्जीवाड़ा करने वाले कुछ लोगों को पकड़ा भी जा सके, टीवी की टीआरपी के साथ छेड़खानी करने वालों की भी पहचान हो जाए, लेकिन टीवी की साख के साथ हुई छेड़खानी ने दर्शकों के मन में टीवी की साख पर जो सन्देह गहरा दिया है, अब शायद ही उसे भरा जा सके। नेटवर्क 18 के प्रधान संपादक राहुल जोशी को सवाल के जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने कहाकि मीडिया की रिपोर्टिंग के बारे में तो आप ही ज्यादा अच्छे से बता सकते हैं और टीवी के संपादकों को यह बात अच्छे से समझने की जरूरत है। यही बात टीवी के संपादक अगर समझ सकें तो शायद टीवी पत्रकारिता की साख को वापस लाया जा सके।  

Thursday, October 22, 2020

इमरान खान की जगह बिलावल भुट्टो को सत्ता सौंपने की पाकिस्तानी फौज की तैयारी

 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी


सिंध पुलिस मुख्यालय में पुलिस को समर्थन देने पहुंचे बिलावल भुट्टो जरदारी

पाकिस्तान में पिछले एक सप्ताह से जो कुछ हो रहा है, उससे पाकिस्तान में अवाम की बेचैनी बहुत स्पष्ट तौर पर नजर आ रही है। आतंकवाद और आर्थिक संकट से बुरी तरह से जूझ पाकिस्तान का सबसे बड़ा संकट यही है कि इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में कहने के लिए लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार है, लेकिन सच यही है कि पाकिस्तानी फौज और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई ही देश को नियंत्रित करती है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने गुजरांवाला की रैली में वीडियो संदेश के जरिये पाकिस्तान की अवाम से बात करते हुए पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी की हर कारगुजारी को खोलकर रख दिया। पाकिस्तान में आतंकवादियों पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है तो इसकी बड़ी वजह यही है कि लोकतांत्रिक तौर पर चुने गए प्रधानमंत्री के पास कोई अधिकार ही नहीं है और इमरान खान अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुए हैं। हालंकि, इमरान खान की कमजोरी इस तरह से सामने आने की बड़ी वजह यह भी है कि पाकिस्तानी फौज के दबाव के अलावा पाकिस्तान के बुरे आर्थिक हालात में चीन का दबाव भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है और चीन की कंपनियों के साथ पाकिस्तानी फौज के अधिकारियों के कारोबारी रिश्ते की वजह से भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बावजूद इमरान खान बयानबाजी से आगे बढ़ नहीं सके। पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी के अधिकारियों को यह भरोसा था कि इमरान खान की क्रिकेट सितारे के तौर पर प्रसिद्धि उनके काम आएगी और भारत के सामने इमरान खान का चेहरा रखकर पाकिस्तानी अवाम को यह समझाने में कामयाब रहेंगे कि भारत की तरफ से ही सारी गड़बड़ हो रही है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्पष्ट पाकिस्तान नीति की वजह से पाकिस्तानी फौज और आईएसआई की हर शातिराना चाल धरी की धरी रह गई। उस पर दुनिया के हर मंच पर पाकिस्तान लगातार अपमानित होता रहा। इन वजहों से लंदन में रह रहे निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पाकिस्तान की अवाम का भरोसा जीतने का अवसर दिखने लगा।

पाकिस्तान की अवाम में बढ़ रहे इसी गुस्से का उपयोग कर लेने की मंशा से नवाज शरीफ ने बेटी मरयम नवाज शरीफ के जरिये पूरे पाकिस्तान में जमीन पर आन्दोलन खड़ा किया और जब पाकिस्तान की जनता आतंकवादियों पर कोई कार्रवाई न कर पाने में असहाय दिख रहे प्रधानमंत्री इमरान खान को दुनिया के सामने गिड़गिड़ाते देखा तो उसी समय का इस्तेमाल नवाज शरीफ ने फिर से अपनी जमीन तलाशने के लिए करना शुरू किया। नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों के बावजूद पाकिस्तान की जनता मरयम नवाज शरीफ के प्रति सहानुभूति रखती है और पाकिस्तान की अमनपसंद और लोकतंत्र बहाली की इच्छा रखने वाली जनता के मन में कहीं न कहीं यह बात है कि अगर नवाज शरीफ की चलती तो शायद भारत से रिश्ते इतने खराब नहीं होते। बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के साथ पाकिस्तान की अवाम को भी बता दिया कि पाकिस्तान ने कश्मीर के जिस हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है, उस जमीन का इस्तेमाल सिर्फ आतंकवादियों को तैयार करने में कर रहा है। इस्लामोफोबिया की बात करके विश्वमंचों पर इमरान खान के पिटने और अमेरिका में जाकर खुद ही चालीस से पचास हजार आतंकवादियों के पाकिस्तानी जमीन पर होने और पाकिस्तान से भारत की भूमि पर आतंकवादियों के भेजने की स्वीकारोक्ति के बाद पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के लिए भी इमरान खान बोझ बन चुके हैं। पाकिस्तानी फौज और आईएसआई पिछले 6 महीने से इमरान खान का विकल्प गंभीरता से खोजने में जुट गई थी, लेकिन लोकतंत्र का आवरण ओढ़ाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पुतला बैठाने के लिए कोई उचित नेता नहीं मिल पा रहा था। FATF की ग्रे लिस्ट में होने से पाकिस्तान को आर्थिक मदद नहीं मिल पा रही थी, इससे पाकिस्तान फौज और आईएसआई के आर्थिक हितों पर भी असर पड़ रहा था। आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर अमेरिका से मिलने वाली रकम भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बंद कर दी है। इस बीच पाकिस्तानी अवाम नवाज शरीफ की पार्टी के साथ जुड़ती दिख रही थी।

कराची और गुजरांवाला में 11 राजनीतिक दलों के साझा लोकतांत्रिक अभियान की रैली में जबरदस्त भीड़ उमड़ी, लेकिन 11 पार्टियों के नेताओं में सबसे ज्यादा प्रभाव खांटी नेता नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरयम नवाज शरीफ का ही दिख रहा था और नवाज शरीफ ने खुलेआम पाकिस्तानी फौज और आईएसआई पर उनका तख्तापलट का आरोप लगाया। पाकिस्तानी अवाम सड़कों पर उतर रही थी, यह पाकिस्तान के लिए कोई नई बात नहीं थी, लेकिन फौज के खिलाफ इस तरह से पाकिस्तानी अवाम का गुस्सा शायद ही कभी इस तरह से दिखा हो। कराची की सड़कों पर जनता उतर गई थी और गो नियाजी, गो बाजवा के नारे लग रहे थे। सिंध की पुलिस ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया था। कराची की सड़कों पर पाकिस्तान की सेना और सिंध पुलिस आमने सामने थी। और, इन सबकी बुनियाद में मरयम नवाज शरीफ के पति कैप्टन सफदर की गिरफ्तारी के लिए सिंध के पुलिस प्रमुख का अपहरण करके उनसे जबरदस्ती कैप्टन सफदर की गिरफ्तारी का आदेश पारित करवाना था। सिंध पुलिस के 10 AIGs, 16 DIGs और 40 SSP ने इस्तीफा दे दिया था। पाकिस्तानी सेना और सिंध पुलिस के बीच इस संघर्ष में अवाम के पुलिस के साथ खड़े होने के बीच पाकिस्तानी सेना के लिए संकट बढ़ रहा था। उसी बीच बिलावल भुट्टो जरदारी सिंध पुलिस प्रमुख के समर्थन में खड़े हो गए और सिंध पुलिस के अधिकारियों के साथ तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि, अभी-अभी मैं सिंध पुलिस के मुख्यालय, कराची पहुंचा हूं और पुलिस जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए सिंध पुलिस के प्रमुख आईजी और दूसरे अधिकारियों के साथ मुलाकात की है। 20 अक्टूबर को 9 बजकर 47 मिनट पर बिलावल भुट्टो जरदारी सिंध पुलिस मुख्यालय से ट्वीट करते हैं कि I stand in solidarity with Sindh Police, do you? #WeStandWithSindhPolice

 

 

 

उससे पहले उनकी पार्टी के मीडिया सेल के ट्विटर खाते से 8 बजकर 31 मिनट पर ट्वीट किया गया कि चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी से फोन पर कराची में हुई घटना पर बात की। और, अगले ट्वीट में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की मीडिया सेल ने लिखा कि पीपीपी चेयरमैन ने कराची की घटना पर चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ की तुरंत कार्रवाई के लिए उनकी तारीफ की और उन्होंने भरोसा दिलाया है कि जांच में पूरी तरह पारदर्शिता बरती जाएगी। इस ट्वीट को बिलावल भुट्टो जरदारी ने रीट्वीट किया और इसके बाद सिंध पुलिस के मुख्यालय गए, वहां से सिंध पुलिस के अधिकारियों के साथ तस्वीर जारी की और 20 अक्टूबर को रात 11 बजकर 42 मिनट पर सिंध पुलिस के ट्विटर खाते से 6 ट्वीट के साथ आईजी सिंध और सिंध पुलिस के सभी अधिकारियों ने छुट्टी पर जाने का फैसला रद्द कर दिया।

पाकिस्तानी फौज और आईएसआई को लंबे समय से पाकिस्तान में एक कमजोर नेता की तलाश थी और बेनजरी भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी पाकिस्तानी फौज और आईएसआई के लिए मुंहमांगी मुराद जैसे साबित होते दिख रहे हैं। अभी पाकिस्तान के हालात बेहद खराब हैं। जनता सरकार के साथ फौज और आईएसआई के खिलाफ खुलेआम बोल रही है। ऐसे में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी में पाकिस्तानी फौज और आईएसआई संभावना देख रही है।

यह लेख मनीकंट्रोल डॉट कॉम के मेरे साप्ताहिक स्तंभ में छपा है।

Wednesday, October 14, 2020

चीन के साथ भारत की विदेश नीति बदलने का यही सही वक्त है

 चीन के साथ भारत की समारिक नीति किस तरह से बदली है और प्रभावी है, इसका अहसास भारतीयों के साथ पूरे विश्व को हो रहा है, लेकिन सातवें दौर की कोर कमांडर स्तर की वार्ता के बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान ने एक बार फिर से इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है कि कब तक भारत का विदेश मंत्रालय चीन के मामले में कड़ा रुख अपनाने से बचता रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन के सामने भारत का इतना कड़ा रुख कभी देखने को नहीं मिला, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे 20 सैनिक भारत की सीमाओं की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। हमारे सैनिकों ने इस बार धोखेबाज चीन की हरकत का इंतजार किए बिना कम से कम 6 रणनीतिक चोटियों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिससे सर्दियों में बर्फ बढ़ने पर भी चीन की सेना की अवैध घुसपैठ-कब्जे की कोशिश को नाकाम किया जा सके। पहली बार हुआ है कि रक्षा मंत्री सीधे तौर पर कह रहे हैं कि चीन और पाकिस्तान सैन्य रणनीति के तहत एक साथ भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने भी चीन से युद्ध की स्थिति में भारत की मजबूत स्थिति के बारे में स्पष्ट तरीके से बात की है। इतने स्पष्ट तरीके से युद्ध की स्थिति में चीन से निपट लेने की ताकत भारत के पास है, यह बात पहले कभी नहीं कही गई। कुल मिलाकर भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने तानाशाह चीन के खिलाफ सैन्य और आर्थिक रणनीति के तौर पर सीधे मोर्चा खोल दिया है और भारतीयों को इसका अहसास भी है। आर्थिक मोर्चे पर चीन के एप पर प्रतिबंध और चीन की कंपनियों के ठेके रद्द करने से लेकर चीनी उत्पादों के आयात पर अप्रत्याक्ष तरीके से प्रतिबंध लगाकर भारत सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर भी चीन से सीधा मोर्चा खोलने की कड़ी नीति अपना ली है, लेकिन सामारिक और आर्थिक मोर्चे के साथ अतिमहत्वपूर्ण विदेश नीति के मोर्चे पर अभी भारत बच बचाकर चल रहा है और यह रणनीति भारत के लिए अच्छी नहीं है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह संसद में बता चुके हैं कि चीन ने भारत की करीब 45 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है। अप्रैल के बाद से चीन ने भारतीय सीमा में कई स्थानों पर घुसपैठ की कोशिश की। गलवान घाटी में हमारे 20 सैनिक वीरगति प्राप्त हुए और चीन की पीएलए के कम से कम 60 सैनिकों की गर्दनें तोड़ दीं। इससे अपनी ताकत से भारत को पीछे धकेल देने के चीन के अहंकार को झटका जरूर लगा, लेकिन बौखलाया चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और उसने गलवान का मोर्चा बुरी तरह से हारने के बाद पैंगोंग सो झील के क्षेत्र में अवैध कब्जा कर लिया। भारतीय सैनिकों ने भी अस्थाई चौकी को स्थाई चौकी में बदलकर चीनी सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया है और भारतीय और तिब्बती सैनिकों ने काली पहाड़ी पर कब्जा करके चीन को उसकी सैन्य कमजोरी का भी अहसास करा दिया। ब्लैक टॉप पर चीनी सेना के साथ हुए संघर्ष में कई चीनी सैनिक मारे गए और एक भारतीय सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हुआ। भारतीय सेना के स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के तिब्बती जवान नीमा तेनजिन को पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ विदाई दी गई और भारत माता की जय, तिब्बत देश की जय के नारे एक साथ लगे, लेकिन चिढ़े हुए तानाशाह चीन की सेनाओं ने अभी भी लद्दाख के कुछ क्षेत्रों में घुसपैठ कर रखी है। इसी पर भारत और चीन के बीच कमांडर स्तर की सातवें दौर की वार्ता 12 अक्टूबर को हुई। इस वार्ता में विशेष प्रगति की खबरें नहीं हैं और इसी बीच चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को चीन भारत का हिस्सा नहीं मानता है। भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर कड़ी प्रतिक्रिया आनी चाहिए थी, लेकिन अभी तक विदेश मंत्रालय की तरफ से इस पर कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। सामरिक और आर्थिक नीति में चीन के प्रति भारत ने बड़ा बदलाव किया है और कड़ाई से चीन की विस्तारवादी नीति पर चोट पहुंचाने में सफलता भी प्राप्त की है, लेकिन तीसरे महत्वपूर्ण मोर्चे विदेश नीति में बच बचाकर चलने की नीति पहले दोनों मोर्चे पर कड़े रुख का प्रभाव कम कर सकती है। ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर को इस बात का अहसास नहीं है। विदेश नीति के मोर्चे पर चीन की तगड़ी घेरेबंदी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर कामयाब भी रहे हैं। विदेश मंत्रालय के बदले रुख का प्रमाण ताइवान के मसले पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान भी दे रहा है, लेकिन इसे बिना किसी देरी के ज्यादा धार देने की जरूरत है।   

भारत और चीन की सेनाओं के बीच कमांडर स्तर की सातवें दौर की वार्ता से ठीक दो दिन पहले ताइवान का राष्ट्रीय दिवस था। भारतीय अखबारों में ताइवान के राष्ट्रीय दिवस का विज्ञापन छपने पर दिल्ली में चीनी दूतावास ने भारतीय मीडिया को सलाह के अंदाज में धमकी दी कि आपको भारत सरकार की अधिकारिक वन चाइना नीति पर ही चलना चाहिए और ताइवान को एक देश और वहां की राष्ट्रपति साई इंग वेन को राष्ट्रपति नहीं लिखना चाहिए, लेकिन यह धमकी चीन पर उल्टी पड़ गई। दरअसल, तानाशाही चीन को चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के बंधक मीडिया की आदत थी और भारतीय मीडिया ने तानाशाह चीन को लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता और ताकत का अहसास करा दिया। साथ ही भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय मीडिया पर सरकार नियंत्रण नहीं है और भारतीय मीडिया उन सभी मुद्दों पर बात करता है जो उसे महत्व के लगते हैं। यह पहला कदम है। अब इससे कई कदम और आगे बढ़ने की जरूरत है और शुरुआत ताइवान के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल करने से हो सकती है। 3 दशकों में तानाशाह चीन के चंगुल से निकलकर एक बेहत लोकतंत्र बनने की ताइवान की कोशिश को समर्थन देकर भारत की सरकार चीन के लद्दाख और अरुणाचल पर अनर्गल बयानों पर आइना दिखा सकती है। साथ ही आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर कड़ी नीति से मिली बढ़त को बरकरार भी रख सकती है। दशकों बाद अमेरिका ने ताइवान के साथ अधिकारिक तौर पर संबंध बहाल कर दिए। चीन की धमकी और सबमरीन की तैनाती के बावजूद अंडर सेक्रेटरी कीथ क्रेच सितम्बर में ताइवान के दौर पर पहुंचे थे। चीन की तानाशाही कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ भारतीय जनमानस है और ताइवान की लोकतांत्रिक सरकार के साथ भारतीय खुद को जोड़कर देख रहा है। भारतीयों ने ताइवान का राष्ट्रीय दिवस जमकर मनाया और ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने ताजमहल भ्रमण की तस्वीरें डालकर लिखा कि भारत से उन्हें बहुत प्यार है। लद्दाख में चीनी सेनाओं की घुसपैठ को खत्म करने के लिए हो रही वार्ता के बीच चीन ने लद्दाख और अरुणाचल पर दावा करके स्पष्ट कर दिया है कि चीन संबंधों में बेहतरी की कोई कोशिश नहीं कर रहा, बस मौके का इंतजार कर रहा है। भारत ने चीन के साथ इस समय बढ़त हासिल की है तो उसकी बड़ी वजह यही रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर चीन की सीधी चुनौती स्वीकार करने में देरी नहीं की। अब यही सही वक्त है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के खिलाफ विदेश नीति के मोर्चे पर भी सीधे और कड़े मुकाबले का ऐलान कर दें। तिब्बत और हांगकांग में लोकतंत्र का दमन कर रहे चीन के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में कभी-कभी धीमी आवाज उठती रही है, उसे भारत का साथ मिला तो पूरी दुनिया को यह आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। 

(यह लेख मनी कंट्रोल डॉट कॉम पर छपा है)

Friday, October 09, 2020

सामाजिक मुद्दों को संभाल क्यों नहीं पाती भाजपा

 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी


हाथरस विधानसभा सीट पर पिछले चार विधानसभा चुनावों से बहुजन समाज पार्टी का कब्जा था। 13वीं, 14वीं और 15वीं विधानसभा में एक समय में मायावती के बेहद खास रहे ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय चुनकर पहुंचे थे और 2012 में सीट सुरक्षित होने के बाद 16वीं विधानसभा में भी बसपा प्रत्याशी के तौर पर गेंदा लाल चौधरी को ही हाथरस की जनता ने चुना था, लेकिन 17वीं विधानसभा के लिए वर्ष 2017 में हुए चुनाव में स्थिति बदल गई और यह स्थिति सिर्फ हाथरस नहीं पूरे प्रदेश की बदली थी, जब उत्तर प्रदेश में जातीय आधार पर लड़ने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को जनता ने बुरी तरह नकार दिया था। अभी भी यह दोनों पार्टियां यादवों और और दलितों के मतों की ठेकेदारी की बात भले करें, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट हो गया कि अब जातीय मतों की उस ठेकेदारी से एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल चुका है। हाथरस विधानसभा 2017 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हरिशंकर महार ने बसपा के गेंदालाल चौधरी को हरा दिया। और, सिर्फ हाथरस विधानसभा ही नहीं, हाथरस लोकसभा की पांचों विधानसभा पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक ही चुने गए हैं। हाथरस की लोकसभा सीट से लगातार भारतीय जनता पार्टी का सांसद चुना जाता रहा है। अभी हाथरस सुरक्षित लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के राजवीर सिंह दिलेर सांसद हैं और 2009 में राष्ट्रीय लोकदल की सारिका बघेल एक बार भले सांसद चुनी गईं, लेकिन 1991 से 2019 तक 8 में से 7 चुनावों में भाजपा का ही सांसद बनता रहा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 में से 306 भाजपा विधायक हैं और सहयोगियों के साथ यह संख्या 318 पहुंच जाती है। अभी 8 विधानसभा सीटें खाली हैं, जिनमें से 7 पर उपचुनाव होने जा रहा है। राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 62 सीटों से भाजपा और 2 पर उसके सहयोगी, कुल मिलाकर 80 में से 64 सीटों पर भाजपा का ही परचम लहरा रहा है।

मार्च 2017 में आए विधानसभा चुनाव परिणामों और मई 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी को खूब जनसमर्थन प्राप्त है। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनने की वजह भी जनता से मिल रहा अपार जनसमर्थन है। अब हाथरस की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार की किरकिरी को देखें तो इसके मूल में एक बात नजर आती है। इस मूल बात को अगर भारतीय जनता पार्टी समझ सके तो शायद इस तरह के संवेदनशील, सामाजिक मुद्दों पर जनता के आक्रोश से भविष्य में बच सकती है। हाथरस मामले की अब सीबीआई जांच घोषित हो चुकी है। हाथरस की बेटी इस दुनिया में नहीं रही और उसकी हत्या सहित बाद में जोड़ी गई दुष्कर्म की धाराओं में चार आरोपी जेल में भी हैं। अब गांव के दूसरे लोगों की बातें सामने आने से इस पूरे घटनाक्रम का शीर्षासन होता दिख रहा है, लेकिन यह विषयांतर हो जाएगा। असली बात यही है कि घटना में आरोपियों और घोषित अपराधियों के खिलाफ समय से कार्रवाई के बावजूद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ऐसे सामाजिक, संवेदनशील मुद्दों पर गलत तरीके से काम करती क्यों दिखी। विपक्ष की तरफ से इस घटना पर राजनीति हो रही है, इसे कहकर भारतीय जनता पार्टी पल्ला झाड़ लेना चाह रही है तो लंबे समय में यह भाजपा के खिलाफ जनमत बनने का आधार बन सकता है।

विपक्ष के पास प्रशासन या पुलिस नहीं होता तो जाहिर है कि विपक्ष की तरफ से उनके नेता ही ऐसे मुद्दों पर आगे होते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक दल के सत्ता में आने के बाद पुलिस-प्रशासन के जरिये ही जनता से जुड़े मुद्दों के समाधान की कोशिश लोकतंत्र में खतरनाक परिणाम तक पहुंचा सकती है जो हाथरस के मामले में भी स्पष्ट तौर पर दिख रहा है। राज्य में जनमत से आए प्रचंड बहुमत और हाथरस की लोकसभा और सभी विधानसभा सीटों से भाजपा के ही प्रतिनिधि चुने जाने के बावजूद क्या पूरी घटना में भाजपा के किसी नेता, जनप्रतिनिधि की भूमिका आपने देखी या सुनी। जनप्रतिनिधि के तौर पर एम्स ऋषिकेश से उमा भारती का दर्द ट्विटर के जरिये लोगों ने सुना या फिर बलिया से एक भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह का लड़कियों को संस्कारी बनाने से ऐसी घटनाएं रुक सकती हैं, बताने वाला बेहूदा बयान सुना। इसे ऐसे देखें कि जिस जनता ने नरेंद्र मोदी के नाम पर मार्च 2017 और मई 2019 में भाजपा के सांसद, विधायक चुनकर भेजे, उन जनप्रतिनिधियों ने उन्हें मत देकर भेजने वाली जनता के बीच जाने की कोशिश ही नहीं की। इसको एक तरह से और देखा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की छवि इतनी बड़ी हो गई है कि किसी भी जनप्रतिनिधि या भाजपा नेता की छवि शून्य सी हो गई है। इसका फायदा भाजपा को इस तरह मिलता है कि विपक्ष के सभी नेताओं की छवि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने बहुत छोटी नजर आती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि योगीराज में विधायक, सांसद का कोई महत्व ही नहीं रह गया है। भाजपा वैचारिक तौर पर प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की पार्टी है और इस तरह से जनप्रतिनिधियों का महत्वहीन होना उनके बीच चर्चा का विषय बनता है। विकास कार्यों और अपराध के मामलों की समीक्षा वाली लगभग हर बैठक से मीडिया में यह खबर जरूर आती है कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को बिना डरे, सीधे उन्हें रिपोर्ट करने को कहा है और किसी भी मामले में किसी भी नेता का दबाव बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे वह नेता भारतीय जनता पार्टी का ही क्यों न हो। मीडिया में तो यह खबर योगी आदित्यनाथ की अपराध, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस वाली छवि के तौर पर पेश की जाती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह होता है कि स्थानीय मीडिया से लेकर राज्य के मीडिया तक योगी आदित्यनाथ के अलावा किसी भी मंत्री, सांसद, विधायक का महत्व खत्म होता दिखता है। स्थानीय सांसद, विधायक अधिकारियों की कृपा पर आश्रित होने लगते हैं और धीरे-धीरे जनता के बीच निष्क्रिय होने लगते हैं।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के इर्द गिर्द रहने वाले अधिकारी किसी भी मंत्री से बहुत बड़े नजर आने लगे हैं। यहां तक कि पुलिस थाने में भाजपा के जनप्रतिनिधियों के साथ भी आए दिन बदसलूकी की खबर आती रहती है। जिस हाथरस से इतनी बड़ी गड़बड़ी की खबरें अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंच गईं, वहीं बगल में ही अलीगढ़ के एक थाने में भाजपा के एक विधायक के साथ पुलिसवालों की बदसलूकी की खबरें अभी हाल में ही चर्चा में रहीं थीं। मुख्यमंत्री के सामने अधिकारी अकसर वही चित्र पेश करता है जो मुख्यमंत्री को अच्छा लगे। और, मुख्यमंत्री किसी मठ का मठाधीश हो तो यह शर्त अनिवार्य सी हो जाती है। इसमें थोड़ी बहुत सकारात्मक आलोचना की गुंजाइश जनप्रतिनिधियों के जरिये ही हो सकती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार में यह स्थान खत्म होता दिख रहा है। यही वजह है कि हाथरस मामले में एसडीएम, एडीएम, एसपी, डीएम से लेकर पीड़ित के परिवार से मिलकर आए डीजीपी हितेश अवस्थी और अतिरिक्त प्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी के मिलने खबरें सबके सामने आईं और मुख्यमंत्री कार्यालय से वीडियो कांफ्रेंसिंग करते मुख्यमंत्री की तस्वीरें भी, लेकिन हाथरस के स्थानीय विधायक, सांसद किसी चित्र में सहायक भूमिका में भी नहीं दिखे। ऐसे संवेदनशील, सामाजिक मामलों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों का एकदम गायब रहना लोकतंत्र में एक खालीपन पैदा करता है और उसी खालीपन को भरने की कोशिश विपक्ष कर रहा है। हर घटना में साजिश और फंडिंग की बात करके उत्तर प्रदेश सरकार जनप्रतिनिधियों की भूमिका के साथ ही मार्च 2017 और मई 2019 में भारतीय जनता पार्टी को मिले प्रचंड जनसमर्थन को भी कमतर साबित करने की कोशिश करती दिख रही है। जनमत से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं और उसके बहुमत से सत्ता मिलती है। मिली हुई सत्ता से जनता के हित के काम हों और जनप्रतिनिधि का महत्व बना रहे तो जनमत लंबे समय तक बनाए रखने में आसानी होती है। लोकतंत्र का यह सबसे आसान सूत्र है, लेकिन अकसर लोकतंत्र में छवि गढ़ने में इस सबसे आसान सूत्र को नेताओं की नजदीकी सलाहकार मंडली गायब कर देती है। उत्तर प्रदेश में भी यही हो रहा है।

(यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Thursday, October 08, 2020

उत्तर प्रदेश में बत्ती गुल होने के मायने समझना जरूरी है

 

उत्तर प्रदेश में जिस दिन योगी आदित्यनाथ की सरकार ने न्यायालय में हाथरस मामले पर शपथपत्र पेश किया, उसी दिन राज्य के बड़े हिस्से में बत्ती गुल हो गई। इन दोनों घटनाओं का आपस में सीधा संबंध नहीं है, लेकिन राज्य सरकार की प्रशासनिक अक्षमता और योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रदेश में भाजपा के मंत्रियों, चुने हुए जनप्रतिनिधियों का कोई महत्व न होने की बात दोनों में ही स्पष्ट नजर आती है। 5 अक्टूबर 2020 को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के बीच समझौता हुआ कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड या किसी भी विद्युत वितरण निगम लिमिटेड का निजीकरण या हस्तांतरण का प्रस्ताव वापस लिया जाता है। इस समझौते पर उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की सहमति से विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के पदाधिकारी तैयार हुए और उन्होंने समझौते पर दस्तखत करके आन्दोलन वापस लेने का निर्णय कर लिया, लेकिन इसके बाद जो हुआ, उससे उत्तर प्रदेश में आए दिन होने वाली गड़बड़ियों की असली वजह सामने आ जाती है। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की सहमति के बावजूद उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार ने समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया। यही मूल वजह है जो पूरे उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की विफलता में तब्दील होता जा रहा है। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करके जनप्रतिनिधि चुनती है, लेकिन अगर जनप्रतिनिधियों का ही अपमान होने लगे तो कल्पना की जा सकती है कि राज्य में सामान्य जनता की भला कितनी सुनी जाती होगी। फिर वो भाजपा कार्यकर्ता हो या उत्तर प्रदेश का सामान्य नागरिक और मंगलवार 6 अक्टूबर को तो उत्तर प्रदेश में सामान्य नागरिकों, भाजपा कार्यकर्ताओं की छोड़िए, विधायकों, सांसदों और मंत्रियों की भी कोई सुनने वाला नहीं था क्योंकि उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन आईएएस अरविंद कुमार के समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार करने के बाद विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने हड़ताल कर दी थी। काम रोको पहले से ही चल रहा था, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में लोगों के घर की बिजली गायब हो चुकी थी। हड़ताल के बाद बिजली कर्मचारियों ने गुस्से में कई जगह बिजली काट दी। सबसे पहले वीआईपी क्षेत्र की ही बिजली आपूर्ति ठप कर दी। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या और ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के घर की भी बिजली गायब हो गई। इसके अलावा दो दर्जन मंत्रियों, विधायकों, न्यायाधीशों, कांग्रेस मुख्यालय, वीआईपी गेस्ट हाउस, मुख्यमंत्री कंट्रोल रूम की बिजली भी गुल हो गई।

जब पूरे प्रदेश में हाहाकार मचा तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आनन फानन में बैठक बुलाई।  उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के चेयरमैन आईएएस अरविंद कुमार की बेअदबी से नाराज ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने पहले बैठक में जाने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा उस बैठक में शामिल हुए। इसके अलावा इस बैठक में वित्त मंत्री सुरेश खन्ना, मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी, अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी, प्रमुख सचिव ऊर्जा अरविंद कुमार और वित्त विभाग के अधिकारी शामिल हुए। इस बैठक में फिलहाल तीन महीने के लिए निजीकरण का निर्णय टालने पर सहमति बनी। सहमति बनने के बाद विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने कार्य बहिष्कार वापस लेने का निर्णय लिया। हालांकि यह सहमति बनते 6 अक्टूर की शाम हो चुकी थी और पूरे प्रदेश में 24-48 घंटे से ज्यादा कई क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह से बाधित थी। बिजली आपूर्ति इतने लंबे समय तक बाधित होन का सीधा सा मतलब था कि जलापूर्ति का भी संकट खड़ा होना और पूरे प्रदेश में बड़े क्षेत्र में जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। अब सवाल यह उठता है कि कौन सी ताकत थी कि ऊर्जा सचिव ने अपने ही मंत्री का कहा मानने से इनकार कर दिया और इसी सवाल के जवाब मे उत्तर प्रदेश की हर मुश्किल की मूल वजह छिपी है और मूल वजह यही है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा आईएएस अधिकारी किसी की सुनने को तैयार नहीं हैं और यह संदेश नीचे तक इस तरह से है कि आए दिन पुलिस थानों तक से भाजपा के विधायकों, सांसदों और नेताओं के अपमानित होने की खबरें आती रहती हैं।

किसी भी जिले के विकास कार्यों और अपराध के मामलों की समीक्षा वाली लगभग हर बैठक से मीडिया में यह खबर जरूर आती है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिले के अधिकारियों, पुलिस वालों को बिना डरे, सीधे उन्हें रिपोर्ट करने को कहा है और किसी भी मामले में किसी भी नेता का दबाव बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे वह नेता भारतीय जनता पार्टी का ही क्यों न हो। मीडिया में तो यह खबर योगी आदित्यनाथ की अपराध, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस वाली छवि के तौर पर पेश की जाती है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह होता है कि स्थानीय मीडिया से लेकर राज्य के मीडिया तक योगी आदित्यनाथ के अलावा किसी भी मंत्री, सांसद, विधायक का महत्व खत्म होता दिखता है। स्थानीय सांसद, विधायक अधिकारियों की कृपा पर आश्रित होने लगते हैं और धीरे-धीरे जनता के बीच निष्क्रिय होने लगते हैं। इस निष्क्रियता का अनुमान अभी भारतीय जनता पार्टी को इसलिए समझ में नहीं आ रहा है कि अदालत के निर्णय के बाद तेजी से हो रहे राममंदिर निर्माण, अपराधियों के एनकाउंटर के बीच दबे स्वरों में ही भाजपा कार्यकर्ता इस निराशा की बात कर रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इस तरह से बत्ती गुल होने और हाथरस मामले में प्रशासनिक अक्षमता ने इस समस्या को उभारकर सामने ला दिया है। योगी आदित्यनाथ के समर्थक उन्हें हर हाल में नरेंद्र मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना देना चाहते हैं। इसमें कोई सन्देह भी नहीं है कि योगी आदित्यनाथ की छवि मोदी के बाद योगी वाली हो चली है, लेकिन इस तरह से भाजपा नेताओं, जनप्रतिनिधियों का अधिकारियों के सामने अपमान भाजपा कार्यकर्ता का मनोबल बुरी तरह से तोड़ रहा है और भारतीय जनता पार्टी को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बिजली कर्मचारियों को निजीकरण न करने का आश्वासन देकर काम पर बुला लिया गया है और अगले 24 घंटे में बिजली आपूर्ति फिर से बहाल हो जाएगी, लेकिन जनता के बीच एक बार विश्वास टूटा तो उसकी बहाली बहुत मुश्किल से हो पाती है। उम्मीद है कि हाथरस और बत्ती गुल होने के मामलों से उत्तर प्रदेश की सरकार सबक लेगी।

(यह लेख मनीकंट्रोल डॉट कॉम पर छपा है।)

Prannoy Roy और Radhika Roy NDTV चलाने वाली कंपनी के बोर्ड से बाहर हुए

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi NDTV पर Adani समूह के अधिग्रहण को लेकर सारे कयास खत्म हो गए। पहले से ही यह तय हो गया था कि, NDTV...