Tuesday, April 24, 2007

चीनी विकास का SEZ मॉडल भारत में काम का नहीं

चीन में कुल पांच SEZ हैं । Shenzhen, Zhuhai, Shantou और Xiamen जो, 1980 में बने और Hainan बना 1988 में। इन पांच SEZ से चीन दुनिया का एक्सपोर्ट हब बन गया। और, तरक्की में भारत से बहुत आगे निकल गया। 79 से95 के बीच शेनझेन SEZ हर साल पचास परसेंट बढ़ा। और, सरकार के लिए स्पेशल कमाई जोन बन गया। 80 से 95 के 15 सालों में शेनझेन से सरकार को पचास अरब युआन से भी ज्यादा की कमाई हुई।


चीन के ये मॉडल अपनाने के 25 साल बाद अब भारत के नेता जागे हैं। और, देश की तरक्की के लिए उनको यही रास्ता समझ में आ रहा है। शायद यही सोचकर चीन को पीछे पछाड़ने के लिए भारत में सैद्धांतिक तौर पर 234 SEZ को मंजूरी मिल चुकी है। औऱ, इसके भरोसे भारत सरकार अगलेपांच साल में तीन लाख करोड़ रुपए का निवेश और चालीस लाख नौकरियों का भरोसा दिला रही है।यही वो लुभाने वाले आंकड़े जिनके बूते सरकार SEZ पर कोई भी पंगा लेने को तैयार है।

सरकार कह रही है कि SEZ से देश में नौकरी और निवेश दोनों आएगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अभी तक के जो आठ SEZ शुरू हुए हैं उसमें करीब उन्नीस सौ करोड़ रुपए लगे और करीब एक लाख लोगों को नौकरी मिली। ये आंकड़े अच्छे लगते हैं। लेकिन, ये 8 SEZ तीन लाख वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन में बने हैं। और, भारत की जो आबादी है उस लिहाज से इतनी जमीन पर सिर्फ एक लाख लोगों को रोजगार से तरक्की नहीं हो सकती।

सबसे बड़ासवाल ये है कि क्या तानाशाह कम्युनिस्ट चीन का ये मॉडल भारत के लोकतांत्रिक राज्य में काम कर सकेगा। शायद नहीं कर सकेगा क्योंकि, यहां हर मॉडल को लोकतंत्र के पैमाने पर खरा उतरना होता है और SEZ के मामले में ये साफ है कि ये मॉडल लोकतंत्र के हित में नहीं है। इस मॉडल के फेल होने के सारे लक्षण दिख रहे हैं। इसकी शुरुआत देश के सबसे बडे प्रस्तावित SEZ में शामिल रिलायंस के महामुंबई, गुड़गांव, सलीम ग्रुप के नंदीग्राम जैसे SEZ के जबरदस्त विरोध से हो गई है।

पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार में जब चौदह जानें SEZ को जमीन न देने में चली गईं तो, फिर चुने न जाने से डरी केंद्र और राज्य सरकार पीछे लौट गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो, तुरंत ऐलान कर दिया कि बिना नई पुनर्वासनीति के आए नया SEZ पास नहीं किया जाएगा। ये दूसरा लक्षण था चीन के विकास मॉडल के भारत में फेल होने का।

इतना ही नहीं सरकार ने ऐलान कर दिया कि मल्टीपल प्रोडक्ट SEZ भी पांच हजार हेक्टेयर से ज्यादा में नहीं बनेगा। इससे रिलायंस के दस हजार हेक्टेयर से ज्यादा में बनने वाले दो और दूसरे करीब चार अलग-अलग SEZ पर ग्रहण लग गया।लेकिन, जब रिलायंस ने आपना SEZ छोटा करने से इनकार किया तोखुद वाणिज्य मंत्री कमलनाथ दबाव में कहने लगे कि केस टू केस बेसिस पर लैंड लिमिट बढ़ाई जा सकतीहै।इसी बीच सरकार ने 63 और नए SEZ को मंजूरी दे दी। यानी SEZ को लेकर सरकार की कोई पॉलिसी अब तक नहीं है जब-तब इसमें बदलाव होते रहेंगे। ये एक मजबूत लक्षण है चीन के मॉडल के भारत में फेल होने का।


चीन के सबसे बड़े SEZ शेनझेन जो, 32700 हेक्टेयर में बना है, में शुरुआत में पूरा पैसा केंद्रीय और राज्य सरकार ने लगाया। बाद में इसमें विदेशी निवेश आया। सिर्फ इसी SEZ से देश का 14% एक्सपोर्ट होने लगा।


यही कहानी दोहराने के लिए सरकार देश के हर कोने में SEZ बनाकर एक्सपोर्ट के मामले में पीछे छोड़ना चाहती है। और, इसके लिए उद्योगपतियों को कोई भी छूट देने को तैयार हैं।
SEZ के डेवलपमेंट, मेनटेनेंस और ऑपरेशन के लिए इंपोर्ट किए सामान पर कोई ड्यूटी नहीं लगेगी।
पांच सालों तक SEZ सेहोने वाले एक्सपोर्ट पर पूरी तरह से इनकम टैक्स, सेंट्रल सेल्स और सर्विस टैक्स की छूट। उसके बाद के पांच साल भी कोई भी टैक्स सिर्फ पचास परसेंट ही देना होगा। राज्य सरकार के सभी टैक्स और ड्यूटी से भी छूट।
तीन वजहें जो मैंने लिखी हैं वो SEZ को टैक्स हैवेन बना देती है। इसके अलावा भी ऐसी ढेर सारी वजहें हें हैं जसका फायदा उठाने के लिए देश का हर बड़ा उद्योगपति किसी भी तरह किसानों की जमीन लेकर स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाना चाहते हैं।
और, यही वो सबसे बड़ी वजहें हैं जो, इस मॉडल के भारत में फेल होने की गारंटी देता है। उद्योगपति पैसा लगाएंगे तो, वो शहर जो उनकी तैयार की सुविधाओं पर ही चलेगा। उस पर सरकार का कोई नियंत्रणभीनहीं होगा। उससे आम आदमी के जीवन में कोई खास सुधार नहीं होगा। विदेशी कंपनियां जो इन SEZ में यूनिट लगाएंगी क्या गारंटी है कि वो मिलने वाला मुनाफा भारत में ही लगाएंगी। ज्यादातर SEZ आईटी सेक्टर के ही हैं क्योंकि, इनको 2009 के बाद टैक्स से छूट खत्म हो रही है। यानी SEZ सिर्फ टैक्स छूट के बहाने के लिए बन रहे हैं।
फिर विकास का मॉडल क्या हो। असल बात SEZ को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन, SEZ की पॉलिसी में इतनी विसंगतियां हैं और भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप में ये मॉडल काम करता नहीं दिखता। अगर विकास के लिए सरकार को ज्यादा शहर ही तैयार करने हैं जहां की सारी सुविधाएं खुद शहर ही तैयार करे तो, जमशेदपुर का मॉडल अपनाया जा सकता है।
भारत जैसे देश में जहां के ज्यादातर शहर भी दुनिया के बड़े शहरों से विकास में बहुत पीछे हैं । जरूरत इस बात की शहरों के बगल ही छोटे इंडस्ट्रियल एस्टेट बनाए जाएं। लेकिन, सरकार उस पुराने मॉडल को SEZ के चक्कर में इस तरह भूल गई है कि कई शहरों के पास बनाए इंडस्ट्रियल एस्टेट अब बड़े इंडस्ट्री कबाड़खाने जैसे बन गए हैं। इसलिए इतने SEZ को बिना सोचे समझे मंजूर देने से देश में कुछ ऐसे ही नए इंडस्ट्री के कबाड़खाने तैयार करने से बेहतर है कि उन इंडस्ट्रियल एस्टेट्स को ही बेहतर किया जाए।
मैं इलाहाबाद से हूं, उत्तर प्रदेश को अच्छे से जानता हूं। इसलिए वहां का ही उदाहरण बेहतर तरीके से दे सकता हूं। गंगा, यमुना से घिरे इलाहाबाद के एक ओर यमुना के पार नैनी इंडस्ट्रियल इस्टेट में पचास के दशक में कई सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों को लगाकर ये कोशिश की गई कि इलाहाबाद के और इसके आसपास के लोगों को यहीं पर रोजगार मिल सके। आईटीआई, बीपीसीएल, रेमंड, जीई, त्रिवेणी ग्लास जैसी प्रतिष्ठित कंपनियां नैनी में लगीं। कोशिश काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, हालात खराब होने लगे यहां नौकरी करने वाले ज्यादातर लोग स्थानीय थे, इस वजह से यूनियन में राजमीति हावी होने लगी और वो राजनीति भी ऐसी कि किसी भी सही परिवर्तन को लागू होने से रोकना ही राजनीति मानी जाती थी। मुझे याद है कि मैंने बचपन से एक कांग्रेसी नेता को देखा जो, सिर्फ इसीलिए जाने जाते थे कि वो फैक्ट्री में नेता थे और राजनीति कांग्रेस के लिए करते थे।

नैनी इंडस्ट्रियल इस्टेट के उजड़ने की बड़ी वजह ये भी थी कि नब्बे के दशक तक देश तो उदारीकरण के रास्ते पर तेजी से दौड़ पड़ा था लेकिन, नैनी इंडस्ट्रियल इस्टेट जहां की तहां थी। सबसे टिकाऊ और अच्छे फोन उपकरण बनाने वाली आईटीआई को विदेशों से तो छोड़िए देश में भी ऑर्डर मिलने बंद हे गए थे। क्योंकि, बदलते जमाने के साथ आईटीआई के फोन नहीं बदले तो, लोगों ने अपने घरों से उन्हें ही बदल डाला। बाद में तो, हाल ये हो गया कि सरकारी दफ्तरों में भी दूसरी निजी कंपनियों के फोन उपकरण नजर आने लगे।
और, यही हाल उत्तर प्रदेश के सभी शहरों से लगे इंडस्ट्रियल इस्टेट्स का होने लगा। चाहे वो इलाहाबाद-जौनपुर की सीमा पर बसी सतहरिया इंडस्ट्रियल इस्टेट हो या फिर गोरखपुर के बगल में बसे इंडस्ट्रियल इस्टेट का। कानपुर में बसी लेदर इंडस्ट्री बरबाद हो गई। लेकिन, इसे सुधारने की सुध किसी को नहीं आई। शायद सुध आ जाती तो, हालात न बिगड़ते और SEZ मॉडल का हौव्वा खड़ाकर वाहवाही लूटने का मजा और मौका भी न मिल पाता।

लेकिन, अभी भी सरकार अगर सचमुच देश का विकास चाहती है तो, शहरों के बगल में छोटे-छोटे इंडस्ट्रियल इस्टेट बसाए जिससे उस शहर और आसपास के शहर-गांव की रोजगार और दूसरी जरूरतें पूरी हो सकें। हां, चीन से इतनी प्रेरणा ली जा सकती है कुछ चार-पांच बड़े SEZ बनाएं जो, इन शहरों के आसपास बसे इंडस्ट्रियल इस्टेट और विदेशों के बीच पुल का काम करें। और, इन बड़े SEZ में सरकार -निजी क्षेत्र के साथ मिलकर पैसा लगाए और एक्सपोर्ट हब ही बनाए आईटी कंपनियों के लिए टैक्स हैवेन नहीं। भारत जैसे एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले लोकतांत्रिक देश में विकास का इससे बेहतर मॉडल नहीं हो सकता। और, SEZ के भरोसे कुछ उद्योगपतियों का भला तो, हो सकता है लेकिन, देश के भले के लिए देश की जरूरतों के लिहाज से औद्योगिक विकास की नीति तैयार करनी होगी।

Sunday, April 22, 2007

बालाजी भगवान के यहां पहुंचे बिगबी भगवान

बालाजी भगवान से मिलने खुद भगवान बिगबी आज तिरुपति गए। बालाजी भगवान का परिवार वहीं रहता है इसलिए बिगबी भगवान भी सपरिवार गए थे। बिगबी भगवान के घर एक नया सदस्य आया था। उन्हीं से मुलाकात कराने गए थे। ये भी वैसे देवी हैं बॉलीवुड की। इनको भी लोग पूजते हैं। और, बड़े भगवान के बेटे के साथ विवाह होने से बड़ी देवी भी बन गई हैं। लाल साड़ी में देवी बालाजी के दरबार से छोटे भगवान के साथ निकलीं तो, बाहर खड़े भक्त धन्य हो गए। ये उन भक्तों से खुशनसीब निकले जो पिछले एक हफ्ते से बड़े और छोटे भगवान के दोनों मंदिरों (प्रतीक्षा-जलसा) के सामने रात-रात, दिन-दिन भर लाइन लगाए खड़े थे। जब बड़े भगवान के मंदिर के सामने खड़े रहने पर भी भक्तों के लिए कपाट नहीं खुले( खुले भी तो, भगवान-भगवती काले शीशे की गाड़ी में थे) तो, ये भक्त देवी के मंदिर के सामने लग लिए। बांद्रा के उस मंदिर के सामने पहले भी भक्तों की भीड़ लगा करती थी। लेकिन, जब पता चला कि भगवती- बड़े भगवान की बहू बन गई हैं तो, ये कतार और लंबी हो गई । और, इसी के साथ बांद्रा में भगवती के मंदिर के अगल-बगल बने घरों के पहुंचने वाली गली और संकरी हो गई।

खैर हम ये कह रहे थे कि बिग बी भगवान , छोटी भगवती के आने के बाद भगवान बालाजी के दर्शन के लिए गए। बिगबी भगवान भगवती के आने के पहले न्यौता देने भी तिरुपति आए थे। तब 51 लाख रुपए का दक्षिणा भी बालाजी भगवान को दिया था। लेकिन, इस बार दक्षिणा नहीं दिया।बिगबी भगवान के साथ भगवती के आने के पहले बिगबी भगवान के मंदिर के सबसे बड़े पुजारी अमर सिंह के साथ छोटे पुजारी अनिल अंबानी भी थे। इस बार सिर्फ छोटे पुजारी अनिल अंबानी साथ थे।

खैर, बात हम कर रहे थे कि बिगबी भगवान के मंदिर (प्रतीक्षा) के बाहर भक्तों को दर्शन नहीं मिला। कुछ भक्त ऐसे भी थे जो, ये चाह रहे थे कि भगवान के कपाट खुलने के साथ पहली जो तस्वीर हो वो उन्हीं के द्वारा पूरे भक्त समाज को देखने को मिले। इसी चक्कर में जब छोटे भगवान , भगवती के साथ लौट रहे थे। तो, इन भक्तों ने अपने कैमरे में हिलोरें लेती आस्था के साथ भगवान और भगवती के दृश्य लेने की कोशिश की। और, जब ड्राइविंग सीट पर बड़े भगवान के साथ छोटे पुजारी को बैठे देखा तब तो , कपाट खुलने का इंतजार भी नहीं कर पाए। लेकिन, भगवान का घर था तो, पुजारियों के साथ कुछ मंदिर के रक्षक भी थे। और, बड़े भगवान तो रक्षक भी बलशाली। बस इन बलशाली रक्षकों ने उन अधमों को थोड़ा बहुत समझाने-बुझाने की कोशिश की। नहीं माने तो भगवान की मूक सहमति पर थोड़ा दंड दे दिया। ये वो अधम थे जो, कपाट खुलने के पहले ही भगवान की तस्वीरें भक्तों को बिना किसी प्रयास के पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे। आखिर देवी-देवता के दर्शन के लिए भी तो पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता है। लंबी-लंबी लाइन लगानी पड़ती है। फिर यहां बिना लाइन के टीवी पर तस्वीरें दिख जाएं ये शायद भगवान को भी मंजूर नहीं था।

खैर, भक्तों को भी भगवान से थोड़ा नाराज होने का हक तो होता ही है। टीवी वाले भक्त नाराज हुए और भगवान के मंदिर (प्रतीक्षा-जलसा) के बाहर की तस्वीरों के अलावा रक्षकों (ब्लैक कैट कमांडो) के द्वारा अधम (पत्रकार) खबरचियों के समझाने-बुझाने के दृश्य भी थोड़ी देर टीवी पर दिखाए। बिगबी भगवान के खिलाफ नारेबाजीऔर रक्षकों को किसी और मंदिर भेजने का दंड देने की मांग भी इसमें शामिल थी।
खैर, फिर से लौटते हैं वहीं जहां से शुरू हुए थे। बिगबी भगवान , भगवान बालाजी से मिलकर बाहर निकले और पूरे परिवार(बड़ी भगवती, छोटी भगवती, छोटे भगवान, छोटे पुजारी) के साथ भक्तों को आशीर्वाद दिया। और, उड़न खटोले में उड़कर मंदिर (प्रतीक्षा ) आ गए। शुक्र, इस बात का है कि थके भगवान को इस बार किसी नराधम भक्त ने परेशान करने की कोशिश नहीं की। और, बालाजी मंदिर के बाहर बिगबी भगवान के उदारमना व्यवहार से प्रसन्न (टीवी के नाराज पत्रकार) लोगों ने फिर से बिगबी भगवान के पुराने नए विजुअल मिलाकर देश भर के भक्तों को दर्शन के लिए लाइन में लगा दिया। ये पुराने-नए विजुअल बिगबी भगवान के परिवार के थे, बालाजी भगवान के परिवार के नहीं।

Friday, April 20, 2007

मैं भी इलाहाबाद का हूं मुझे भी टीवी पर दिखाओ

परिदृश्य नंबर 1-
इलाहाबाद के मुट्टीगंज मुहल्ले में एक श्रीवास्तव जी के मकान की सफेदी टीवी पर चल रही है। सफेदी इसलिए नहीं हो रही थी कि श्रीवास्तव जी के घर की दीवार ज्यादा गंदी हो गई थी। मसला ये है कि श्रीवास्तव जी की रिश्तेदारी में शादी है और उसी शादी की वजह से श्रीवास्तव जी की सफेदी वाली दीवार टीवी पर दिख रही थी। चैनल पर श्रीवास्तव जी बता रहे हैं कि बिटिया की शादी में बच्चन साहब ने न्यौता भेजा था। लेकिन, इस बार लगता है अभिषेक की शादी में शायद ख्याल नहीं रहा। श्रीवास्तव जी फिर मुस्कुराकर कहते हैं लेकिन, घर की शादी में इस बात पर नाराज थोड़े न हुआ जाता है। अब पता नहीं ये श्रीवास्तव जी अपने किसी सगे रिश्तेदार की शादी में बुलाने पर भी जाते हैं या नहीं। श्रीवास्तव जी के यहां उनके दूसरे शहरों के रिश्तेदार भी जमा हो गए थे। ढोल की थाप पर घर के बच्चे और महिलाएं नाच भी रहे हैं। नाचें भी क्यों न अभिषेक बेटे की बहू ऐश्वर्या जो घर आ रही है।

परिदृश्य नंबर 2- कानपुर के ठग्गू के लड्डू मुंबई जाने के लिए तैयार हैं। और, ठग्गू के लड्डू बेचने वाले पांडे जी मुस्कुराते हुए टीवी पर कह रहे है कि भांजे की शादी के लिए लड्डू बनवाए हैं। लेकर मुंबई जा रहा हैं। भांजा यानवही अमिताभ बच्चन साहब का बेटा अभिषेक बच्चन। पांडेजी को अभिषेक बच्चन मामा कहता है ऐसा पांडेजी ने टीवी वालों को हंस-हंसकर बताया।
लेकिन, पांडे जी को लड्डू लेकर प्रतीक्षा के बाहर ही प्रतीक्षा करना पड़ा। पर कोई बातनहीं पांडेजी अब भी मुस्कुरा रहे थे।अभी भी पांडेजी टीवी पर ही थे बता रहे थे कि जो भी अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी होने से खुश है उसके लिए मिठाई लेकर आए हैं। आखिर बंटी और बबली की शूटिंग के दौरान कानपुर में अभिषेक पांडेजी की दुकान पर एक घंटे था न।

परिदृश्य नंबर 3- बरेली से खास हार लेकर सरदारजीखड़े थे ये भी टीवी पर । बता रहे हैं कि अभिषेक के लिए खास ये माला है एस माला की खासियत ये कि इसमें कई नोट786 नंबर वाले हैं। बड़े गर्व से बता रहे हैं कि कालिया फिल्म में जेल में अमिताभकीजान 786 नंबर का बिल्ला ही बचाता है।


परिदृश्य नंबर 3- लखनऊ का कोई पानवाला टीवी पर हैगुजारिश कर रहा है और अकड़ दिखा रहा है कि लखनऊ की मशहूर गिलौरियों के बिना तो ऐश्वर्या अभिषेक की शादी का मजा ही नहीं। उन्हें बुलाना चाहिए। रिपोर्टर ने मुंबई जाने के बारे में पूछा तो खुश होकर बोले बच्च्न साहब बुलाएंगे तो, जरूर जाएंगे।

परिदृश्य नंबर 4- बनारस की साड़ी की दुकान। दुकान वाले साहब बता रहे हैं कि अगर ऐश्वर्या के लिए साड़ी का ऑर्डर आया तो, वो कौन सी साड़ी किस मौके के लिए देना चाहेंगे। न ऑर्डर आया न साड़ी बिकी। लेकिन, साड़ी वाले भाई साहब टीवी पर आ गए। बस काम हो गया।
ऐसे सैकड़ो लोग हैं जो किसी न किसी तरह से पिछले दो हफ्ते से बच्चन साहब से जुड़कर टीवी पर दिख रहे हैं। लेकिन, ये सारी बात पुरानी हो गई है। नई बात ये है कि सारे टीवी चैनलों-अखबारों के जोर लगाने के बाद भी ढंग की तस्वीरें(टीवी के लिए विजुअल) नहीं मिल पा रहे। अब ऐसे में टीवी वाले क्या करें। सभी चैनलों पर प्रतीक्षा, मुंबई लोकेशन के साथ रिपोर्टर सारी-सारी रात जागरण कर रहे हैं। बच्चन साहब एक बार सफेद सूट में बाहर तक आकर मेहमानों को लेकर अंदर क्या गए पूरा मीडिया धन्य हो गया। ये वही बच्चन साहब हैं जो पब्लिसिटी के लिए एक दिन में पांच-पांच मीडिया हाउसेज के चक्कर काटकर अपना इंटरव्यू मैनेज करा लेते हैं। खैर, लौटते हैं छोटे सरकार की शादी नंबर वन पर। टीवी वालों को कुछ चमकती सी लाइव तस्वीरें/विजुअल मिल गए। संगीत की रस्म बीतने के चौबीस घंटे बाद तक वही विजुअल अलग-अलग चैनलों पर अलग-अलग व्याख्यान के साथ चल रहा था।

यहां तक भी बात बिगड़ी नहीं थी। आगे का हाल दिवालियापन की ओर जाता नजर आता है। एक चैनल पर रिपोर्टर लाइव थी कहा- मेरे पीछे आप देख रहे हैं प्रतीक्षा में संगीत की रस्में चल रही हैं। उस समय उसके ठीक पीछे बेस्ट की बस आकर रुक गई थी। रिपोर्टर ने किसी तरह हालात संभाला। दूसरे चैनल पर तब तक ब्रेकिंग न्यूज आ चुकी थी। सलमान प्रतीक्षा में पहुंच चुके हैं। लेकिन, थोड़ी ही देर में तीसरे चैनल ने उस न्यूज को ब्रेककर दूसरी ब्रेकिंग न्यूज चला दी कि वो सलमान नहीं था। और बस चार दिन पहले मीडिया पर हुए हमले के खिलाफ एकजुट मीडिया टीआरपी के लिए एक दूसरे की खाल उतारने में लग गया। जिन चैनलों पर खबरें चल रहीं थीं उनके न्यूजरूम में भी इस बात पर बहस थी कि आखिर किसी एक ऐसे व्यक्तिगत कार्यक्रम को इतना चमकाकर इतने लंबे समय तक दिखाने की क्या जरूरत है। लेकिन, किसी भी चैनल में ये साहस नहीं दिखा कि वो अपने चैनल से खबर उतारकर कुछ काम की खबरें दिखाता। सवाल यही है कि आखिर कब तक मीडिया ऐसे बड़े लोगों के किसी व्यक्तिगत कार्यक्रम को देश की जनता की फरमाइश मानकर उनके सिर पर थोपता रहेगा। अब तो हर न्यूजरूम में पहले के अखबारों के दिवसों की तरह सेलिब्रिटीज के जन्मदिन की तारीखें लटकी रहती हैं जिस पर कुछ बड़ा आयोजन करना होता है। मैं बिजनेस चैनल में हूं इसलिए हाल कुछ ठीक रहता है। लेकिन, यहां की लिस्ट भी अब बड़ी हो रही है। अंबानी से लेकर बियानी तक के जन्मदिन पर रेडीमेड पैकेज तैयार हैं। ये तो कहिए कि पचास साल के हुए मुकेश अंबानी ने जामनगर में बर्थडे मनाया और मीडिया के लिए पूरी नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया। बच गए दर्शक नहीं तो धीरूभाई अंबानी, मुकेश की सफलता की कहानी दर्शकों को फिर से पूरे सलीके से दिखा दी जाती। लेकिन, इससे टीवी चैनल हताश नहीं हैं। वो उत्साहित हैं कि इसलिए दर्शकों तैयार रहिए अब आपको भले ही काम की खबर न मिले ऐश्वर्या-अभिषेक जैसी शादी के हर इंतजाम के बारे में पता जरूर चलेगा और सेलिब्रिटीज के रिश्तेदारों का भी। जो, टीवी पर दिखने की प्रतीक्षा में लगे हैं। वैसे मुझे भी टीवी पर दिखाया जा सकता है कि मैं इलाहाबाद से हूं और जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से चुनाव लड़ने आए थे तो, मैंने भी उन्हें करीब से देखा है।

Sunday, April 15, 2007

कब सिखाया जाए बच्चों के सेक्स के बारे में

1- सेक्स एजुकेशन से समाज में लोकतंत्र स्थापित होगा।
2- सेक्स एजुकेशन से एड्स जैसी यौन संबंधों से होने वाली बीमारियां कम होंगी।
3- सेक्स एजुकेशनछोटे बच्चों को मिलने से वो चाइल्ड अब्यूज से बच सकेंगे।

ऐसे ही कई और अच्छे लगने वाले तर्क हैं जो, सेक्स एजुकेशन की वकालत करने वाले आजकल थैली में लिए घूम रहे हैं कि कहीं कोई विरोधी मिले तो, उसके ऊपर उड़ेल दें। लेकिन, महाराष्ट्र की सरकार और विपक्ष के नेताओं के ऊपर इन तर्कों की कोई असर ही नहीं हुआ। और, वहां सेक्स एजुकेशन पर रोक लग गई। महाराष्ट्र के पीछे-पीछे कई और राज्य लग लिए और ‘एजुकेशन में सेक्स का डोज मिलाना’ इन राज्यों में बंद हो गया। इस पर रोक की शुरुआत मध्य प्रदेश सरकार ने की थी लेकिन, उस समय ये बड़ी बहस का मुद्दा नहीं बन पाया। बहसबाजों ने ये कहकर इसे एक झटके में खारिज कर दिया कि ये तो पुरातनपंथी सोच वाली बीजेपी सरकार की कारस्तानी है। लेकिन, जब देश के अकेले कॉस्मोपॉलिटन शहर मुंबई वाले राज्य महाराष्ट्र में इस पर रोक लगी तो, फिर कान खड़े होना स्वाभाविक था। सेक्स एजुकेशन के पक्ष में जो तर्क हैं वो मैंने शुरू में ही लिख दिया।

अब बात ये कि क्या ऊपर लिखी तीनों बातें सेक्स एजुकेशन से ठीक की जा सकती हैं। मुझे लगता है शायद थोड़ा बहुत। लेकिन, इसका बुरा असर (इस शब्द पर भी लोगों को ऐतराज हो सकता है) ज्यादा होता दिखता है।
सेक्स एजुकेशन से किस तरह लोकतंत्र स्थापित होगा ये बात तो किसी भी तरह से दिमाग की छन्नी के पार नहीं जाती। दूसरे तर्क में कुछ दम लगता है कि अगर बच्चों को सेक्स का पूरा ज्ञाम समय से मिल गया तो, वो यौन संबंध स्थापित करते समय अपनी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम पहले से रखेंगे जिससे उन्हें एड्स या कोई यौन रोग न हो। लेकिन, ये बात कुछ अजीब नहीं लगती है कि यौन संबंधों के बारे में बच्चों को बताने की उम्र हमारे इन समझदार लोगों को पहली क्लास से ही लगने लगती है।

दलील ये भी दी जा रही है कि टीवी-मीडिया के दूसरे माध्यमों से बच्चों को इतना कुछ देखने को मिल रहा है कि सेक्स एजुकेशन से बच्चों को दूर रखना गलत होगा। तर्क य़े भी है कि पोर्न फिल्में - बाजार में-- खुलेआम इंटरनेट पर उपलब्ध हैं फिर बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने में हर्ज क्या है। इसी तर्क के बाद मेरा कड़ा एतराज शुरू होता है - क्या सेक्स एजुकेशन के नाम पर बच्चों को सेक्स परोसने- सेक्स करने की कला सिखाने की तैयारी हो रही है। क्या तैयारी इस बात की हो रही है कि पांच-छे साल के बच्चों को सेक्स एजुकेशन इस तरह दिया जाएगा कि दस-बारह साल का होते-होते उन्हें सेक्स कला की जरूरत पड़ जाए। और, वो यौन रोगों से सुरक्षित रहने के जरिए के बारे में बेहतर जान पाएं।

सेक्स एजुकेशन की वकालत करने वाले तर्क ये भी देते हैं कि समाज में जितना खुलापन होगा वो बेहतर है। क्या खुलापन सेक्स एजुकेशन से ही हो सकता है। लड़का-लड़की शारीरिक संरचना में अलग होते हैं इसलिए जरूरी है कि उन्हें एक दूसरे से व्यवहार के तरीके बताए जाएं। क्या अब तक बच्चों को इस बात का अहसास नहीं होता था। क्या वो परिवार के बीच बड़े होते-होते ये सब नहीं जान जाते थे। फिरउन्हें बचपन में ही बड़ा कर देने की क्या जरूरत है।

तथाकथित प्रगतिशील लोगों के पास एक और बड़ा तर्क ये आ गया है कि बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने से उन्हें अच्छे और बुरे स्पर्श की पहचान हो सकेगी जिससे चाइल्ड अब्यूज के मामले रोके जा सकेंगे। अब इन नामसझ लोगों को कौन समझाए कि जिस उम्र के बच्चों के साथ कोई बड़ा गंदा व्यवहार करता है उस समय वो ऐसे स्पर्श को समझकर भी क्या कर पाएगा। और, मुझे लगता है कि यहां तो, सीखने की जरूरत बड़ों को है।

कुल मिलाकर सेक्स एजुकेशन पर हो रहे हो हल्ले की असली वजह में अगर जाएं तो, वो है सेक्स एजुकेशन को सेक्स आर्ट बनाने की कोशिश। मुझे नहीं लगता कि किसी को इस बात पर एतराज होगा कि बच्चों को ये सिखाया जाए कि सलीके से कैसे कपड़े पहनें कि शरीर को कोई अंग भद्दा न दिखे । शरीर विज्ञान की पूरी जानकारी तो हर किसी के लिए जरूरी है। बस उम्र के साथ जरूरी सेक्स ज्ञान हो तो ठीक। और, बच्चों को अभी भी बॉयोलॉजी विषय के जरिए नौवीं-दसवीं क्लास में सब कुछ समझाने की कोशिश बहुत पहले से ही है।

इसलिए, पहली क्लास से ही बच्चों को सेक्स की कला सिखाने की कोशिश करने वालों से मेरी गुजारिश है कि बच्चों को बचपन का पूरा मजा लेने के बाद ही बड़ा होने दीजिए। उन्हें सेक्स का विज्ञान सही उम्र के साथ ही सीखने दीजिए। इसके कुछ कुछ बेहतर तरीके हों तो वो सुझाएं। लेकिन, कृपा करके प्रगतिशील होने के चक्कर में बच्चों का बचपन बरबाद न करें। जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि बच्चों को सेक्स सिखाने के इस अभियान का विरोध सिर्फ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकारें ही नहीं कर रहीं। केरल की वामपंथी सरकार को भी सेक्स एजुकेशान का ये तरीका समझ नहीं आ रहा।

Tuesday, April 10, 2007

मुसलमान हिंदुओं के बराबर हैं अल्पसंख्यक नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने हंगामा बरपाया हुआ है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसला सुना दिया कि मुसलमान कम से कम यूपी में तो अल्पसंख्यक नहीं है। फिर उसी हाईकोर्ट के दूसरे जजों ने सरकारी याचिका (याचना कहें तो बेहतर होगा ) पर स्टे दे दिया।

हाईकोर्ट की तरह ये तो मैं भी मानता हूं कि मुसलमान होने का मतलब अल्पसंख्यक तो कम से कम नहीं ही है। हां, सबसे बड़ा वोट बैंक जरूर है। जिस पर खेल कभी इस खेमे से तो कभी उस खेमे से होता रहता है लेकिन, इसमें मददगार ऐसे लोग हो रहे हैंजो ये मानते है कि अल्पसंख्यक शब्द हटा तो मुसलमानों का बड़ा नुकसान हो जाएगा।

मेरा ये भी साफ मानना है कि अल्पसंख्यक होना मुसलमानों के लिए न तो कोई तमगा है न ही कोई ओहदा फिर उस खास स्टेटपर मुसलमान क्यों बने रहना चाहते हैं। जो, स्टेटस उन्हें कुछ देता तो, नहीं हां इसके चक्कर में वो देश में बराबर केभागीदार होने पर भी किनारे ख़ड़े रहते हैं। और, अल्पसंख्यक बनकर किसी न किसी पार्टी के वोटबैंक भर बनकर रह जाते हैं। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से मुसलमानों का अल्पसंख्यक होने का खास स्टेटस खत्म होने का फरमान निकला तो, मुसलमानों की हमदर्द बनने का दावा करने वाली सियासी पार्टियां हों या फिर मुसलमानों से ये खास स्टेटस छीनने को आतुर विहिप दोनों ही जल्दी से मीडिया के सामने आ गए।

मुसलमानों की हमदर्द सियासी पार्टियोंमें टीवी पर दिखने की जल्दी ये थी कि कहीं कोई और उनका ये दावा छीन न ले। और, विहिप की जुगत ये कि कहीं इस बारे में कुछ न बोलने से हिंदु हितों की रक्षा का उनका दावा बेकार सा होता दिखने लगे। इसीलिए फैसले पर बीजेपी ने खुशी जताई तो, यूपी चुनाव के ठीक पहले आए फैसले से कहींअल्पसंख्यक वोटबैंक खिसक न जाए इस डर से मौलाना मुलायम (इस विशेषण से वो शायद सबसे ज्यादा खुश होते होंगे।) इलाहाबाद हाईकोर्ट से अल्पसंख्यक होने का पुराना स्टेटस जल्दी से बहाल करवा लाए। ये स्टेटस न बहाल होता तो, शायद मायावती कुछ और कर गुजरतीं। लेकिन, इस सबमें नुकसान उस वोटबैंक का ही रहा है जिसे अल्पसंख्यक नाम से बुलाया जाता है और चुनाव के समय इसकी चिंता सियासी दलों को सबसे ज्यादा सताने लगती है।

दरअसल अल्पसंख्यक होना ही अपने आपमें वो शब्द है जिसे राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए वोटबैंक में तब्दील कर लेते हैं। ये फायदा आरएसएस-बीजेपी अल्पसंख्यकों (मुसलमान पढ़ें) के खिलाफ बोलकर और कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी पार्टियां उसी खिलाफ बोले की खिलाफत में थोड़ी और आग डालकर। लेकिन, भला दोनों में से कोई भी नहीं कर रहा होता है। तो, फिर हम इस अल्पसंख्यक शब्द को क्यों पाल पोल रहे हैं। लेकिन, क्या सिर्फ अल्पसंख्यक शब्द हटाने से मुसलमानों का भला हो पाएगा। नहीं, जरूरत इस बात की है कि मुसलमानों को भी किसी तरह का खास स्टेटस देने के लिए मुसलमान होने के बजाएउनकी आर्थिक सामाजिक स्थिति को ही आधार बनाया जाए।
इसके लिए आधार भी बढ़िया मिल गया है। हिंदू और मुसलमान देश में बराबर हो गए हैं। ये किसी नेता का भाषण नहीं है। ये हैं नेशनल काउंसिल अॉफ अप्लाइड अकोनॉमिक रिसर्च यानी NCEAR की ताजा रिपोर्ट। ये रिपोर्ट साफ कहती है कि खर्च, आमदनी के मामले में हिंदू मुसलमान करीब-करीब बराबर खड़े हैं।हिंदू परिवार की औसत कमाई एक सौ अड़सठ रुपए रोज की है तो, एक मुसलमान परिवार की औसत कमाई भी एक सौ साठ रुपए हर रोज की है। यानी इस एक रिपोर्ट ने वो साफ किया है जो, आजादी के बाद से लगातार इस देश के सियासतदां गंदा करते जा रहे थे इस चक्कर में कि ये साफ हो गया कि हिंदु-मुसलमान एक जैसे हैं तो, हमारा क्या होगा। खैर मैं फिर से लौट रहाहूं इलाहाबाद हाईकोर्ट के उसी फैसले पर जिसमें एक बार मुसलमानों को अल्पसंख्यक न मानकर फिर से उसे लागू करने पर रोक लगा दी गई है। मेरी गुजारिश सिर्फ इतनी ही है कि अगर हिंदू-मुसलमान एक बराबर हैं तो फिर मुसलमानों को फिर से अल्पसंख्यक बनाकर क्या हासिल करने की कोशिश हो रही है। सियासत करने वाले तो ये समझेंगे नहीं - या यूं कहें कि समझते हैं इसीलिए मुसलमानों को अल्पसंख्यक ही रहने देना चाहते हैं। इसलिए जरूरत खुद मुसलमानों के समझने की है जिन्हें अल्पसंख्यक नाम का वोटबैंक बनाकर साठ सालों से सिर्फ कैश कराया जा रहा है।सियासत करने वालों की तरह हाईकोर्ट के फैसले के भी एक दिन में ही पलट जाने से तो, सब साफ समझ में आ ही जाता है। वक्त आ गया है कि मुसलमान ये चिल्लाकर बोले कि हमसिर्फ यूपी में नहीं पूरे देश में हिंदुओं के बराबर हैं अल्पसंख्यक नहीं । और, मेरी उन लोगों से गुजारिश से जो मुसलमानों के अल्पसंख्यक न होनेके फैसले को किसी और भावना से प्रेरित बताकर फिर से अल्पसंख्यक नाम के वोटबैंककी इमारत को मजबूत बनाना चाहते हैं।

किसका चुनाव करेंगे बुलेट या बैलेट

उत्तर प्रदेश में 30 सांसद और 150 विधायक अपराधिक रिकॉर्ड वाले हैं। यानी ये वे लोग हैं जिनके डर के बाद भी लोगों ने इनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करा दिये हैं। पता नहीं खबर बिग बी --- शहंशाह अमिताभ बच्चन ने पढ़ी-सुनी या नहीं। खबर बच्च्न साहब के लिए ज्यादा महत्व की इसलिए भी है क्योंकि,सिर्फ बच्चन साहब ही दम ठोंककर ये कह रहे हैं यूपी में बहुत दम हैं क्योंकि जुर्म यहां कम है। और, बच्चन साहब और उनके दोस्त अमर सिंह का जानकारी के लिए ये आंकड़े किसी मीडिया हाउस के या विपक्षी पार्टी के आरोप नहीं हैं ये आकंड़े हैं उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के-- यानी गृह विभाग जानते हुए भी इन अपराधियों की सुरक्षा के लिए पुलिसबल का इंतजाम करताहै, वजह सिर्फ इतनी कि ये आपके वोट की ताकत से चुने हुए जनप्रतिनिधि है। ------

ये वो जनप्रतिनिधि हैं जिनको आपने पिछले विधानसबा और लोकसभा चुनाव में वोट दिया कि वो आपके बुनियादी हक के लिए लड़ाई लड़ेंगे जिससे आपकी जिंदगी कुछ औऱ बेहतर हो सकेगी। कम से कम वोट मांगते वक्त तो इनका यही दावा था। लेकिन, ऐसे जनप्रितिनिधि क्या खास आपके हकों की लड़ाई लड़ पाएंगे। जिनका आधा से ज्यादा समयअदालतों में सिर्फ इसलिए बीत जाता है कि कहीं अदालत इन्हें अपराधी घोषित न कर दे और अगली बार ये आपसे ये वादा करने न आ पाएं कि हम आपकी जिंदगी के हालात सुधारने आ रहे हैं । तो, इस बार वोट डालने जाइए तो, जरा संभलकर क्योंकि, बैलेट बुलेट पर पांच साल में सिर्फ एक ही दिन भारी पड़ता है और तो, सत्ता और अपराधियों का गठजोड़ बैलेट को बुलेट दिखाकर डराता ही रहता है।

यूपी के अपराधी सांसदों -विधायकों की गृह विभाग ने आज सूची पेश की है औरआज ही एक और खबरआई है। फैजाबाद के मिल्कीपुर विधायक रामचंद्र यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। अब आप कहेंगे कि जब 150 विधायकों के खिलाफ अपराधिक मामले हैं तो फिर किसी विधायक की गिरफ्तारी की खबर मेंखासक्याहै। लेकिन, ये खास इसलिए है क्योंकि, समाजवादी पार्टी के इन विधायक जी के खिलाफ कोर्ट ने गैरजमानती वारंट जारी कर रखा था। और, अब ये पकड़ में इसलिए आ गए हैं कि इन्हें चुनाव लड़ना है। वरना तो, ये मजे से घूम रहे थे लेकिन, पुलिस को ढूंढ़े नहीं मिल रहे थे।

और, इन साहब के चुनाव प्रचार में जो जी-जान से जुटे हैं वो हैं मित्रसेन यादव-- ये भी कोई कम नहीं हैं-- असल बात इन दोनों खबरों जैसी ढेर सारी खबरें हमें रोज सुनने देखने को मिलती हैं लेकिन, हम हमारे ऊपर क्या असर होगा सोचकर इनके बगल से आंख मूंदकर निकल जाते है। आपको लग रहा होगा फिर मैं अभी हल्ला क्यों मचा रहाहूं।

हल्ला मचाने की वजह है यूपी विधानसभा के सात चरणों में होने वाले चुनाव। चुनाव आयोग ने सात चरणों में यहां वोटिंग का ऐलान किया है। दरअसल ऊपर की दोनों खबरें और चुनाव आयोग का सात चरणों में चुनाव का ऐलान , एक दूसरे से जुड़ी हुई खबरें हैं। असल बात ये है कि 150 विधायक- 30 सांसद(इतने लिस्टेड हैं) अपराधियों के अलावा दूसरे ऐसे ही रिकॉर्ड वाले अपराधियों (ये सब चुनाव भी लड़ेंगे।)से निपटने की तैयारी में ही आयोग सात चरणों में चुनाव करा रहा है।

यूपी की सीमा से लगे सभी राज्यों के डीजीपी भी अलर्ट हैं कि इस राज्यपर कहीं उनका कब्जा न हो जाए जो, गृह विभागके अपराधियों की सूची में होने के बाद भी गृह विभाग के ही मातहत आने वाले पुलिस की संगीनों के साये में अपराध करते घूमते रहें। लेकिन, ये चुनाव आयोग के बस की बात है ये मुझे नहीं लगता। क्योंकि, ये ताकत सिर्फ आपके हाथ में है।और मेरे कहने का आशय बिल्कुल भी ये नहीं है कि सिर्फ समाजवादी पार्टी में ही अपराधी रिकॉर्ड वाले लोग हैं।

सभी पार्टियों में थोड़ कम-थोड़ा ज्यादा वाले अंदाज मे अपराधी सम्मानित हो रहे हैं। प्रदेश की 403 में से कम से कम 250 विधानसभा ऐसी हैं जिसमें डेमोक्रेसी का लिटमस टेस्ट होना है। क्योंकि, इन विधानसभा से पहले से चुने हुए विधायक या फिर विधायकजी बनने की इच्छा रखने वाले कोई सज्जन (साबित न होने तक यही कहा जाता है) नामांकन भर चुके हैं या फिर भरने की पूरी तैयारी कर चुके हैं।देश को राह दिखाने का दम भरने वाला उत्तम प्रदेश (अब सिर्फ विज्ञापनों में) उत्तरोत्तर गर्त में ही जाता दिख रहा है। तो, एक दिन अपनेऔर अपने प्रदेश के लिए मनबना लीजिए। सभी पार्टियों में थोड़े कम ज्यादा अपराधी और बचे खुचे शरीफ मिल ही जाएंगे।इसलिए कोशिश करके इस बार बचे खुचे शरीफों को अपराधी बनने रोकिए। नहीं तो, अगले विधासनभा चुनाव तक गृह विभाग की सूची शायद और लंबी होगी।

कश्मीर में बंदूक को मात दे रहा है बाजार

कश्मीर में अमन है। पहली नजर में देखने में ये अमन बंदूक के खिलाफ बंदूक की ताकत का अमन दिखता है। जम्मू स्टेशन पर उतरने के बाद श्रीनगर यानी धरती पर जन्नत मेंहर तरफ बंदूक के साथ चौकस सुरक्षाबल के जवान इस बात का भरोसा तो दिलाते हैंकि कश्मीर में अमन है लेकिन, साथ ही दहशतका अहसास भी दिलाते रहते है असल में दहशतगर्दी को यहां बंदूक ने नहीं बाजार ने मात दे दी है।

जम्मू से कटरा के लिए टेढ़ीमेढ़ी पहाड़ियों पर चढ़ते हुए कटरा से मां वैष्णो देवी के दरबार के लिए साढ़े बारह सौ रुपए में जाने वाले हेलीकॉप्टर के विज्ञापन के साथ ही कुटॉन्स शर्ट के भी बड़े-बड़े विज्ञापन नजर आ जाते हैं। साफ है बिना मुनाफे के विज्ञापन नहीं हो सकता। यानी बड़ी-बड़ी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए मांवैष्णो देवी के दरबार में आने वाले भक्तों पर भरोसा है।ये बाजारका वो पक्ष है जो, अक्सर इसका विरोध करने वालों को कभी नजर नहीं आता। पिछले दो दशकों से आतंकवाद की वजह से जमाने पुरानी जिंदगी जी रहे लोगों को बाजार ने नई रंगत दे दी है।

जम्मू से श्रीनगर के लिए फ्लाइटका सफर शुरू होते ही एक बार फिर सुरक्षा की कड़ी जांच इस बात का अहसास दिलाती है कि हवा में कुछ दहशत है। लेकिन, श्रीनगर हवाईअड्डे पर उतरने के बाद टैक्सी में इस दहशत को दूर करता है फिर वही बाजार। लेकिन, बाजार यहां प्रोडक्ट बेचने के बजाए सुरीले रस घोलता है।बिग 92.7 एफएम पर सबकी आंखों का तारारेडियोजॉकी सारा आपकोनए पुराने सुनाकर कश्मीर की फिजां को और खूबसूरत बनाती है।

जनवरी -फरवरी का समय कश्मीर के लिए पीक सीजन नहीं होता यानी धरती की जन्नत जाने के लिए लोग ये समय कम चुनते हैं। लेकिन, असल कश्मीतो, सर्दियों में कश्मीर की डल लेकके किनारे की सड़क पर शाम को हल्की बर्फबारी में घूमकर ही देखाजा सकता है। डल गेट से लेकर शंकराचार्य मंदिर और मशहूर मुगल गार्डन जाने वाली सड़क पर बंदूक की आंखों से लोगों की पहचान करते सुरक्षाकर्मी सिर्फ इतनी दूरी पर होते हैं कि एक की तेज पुकार दूसरे तक पहुंच जाए।

यहां डल गेट पर बाजार फिर हाजिर है। डल लेक में पांच से छे सौ हाउसबोट में ज्यादातर हाउसबोट के नाम बड़े शहरों में दुकानों के साइनबोर्ड की ही तरह किसी न किसी विज्ञापन के साथ चमक रहेहोते हैडल लेक का मजाशिकारे की सैर के बिना बेकार है और इस शिकारे के चलते ही बाजार साथ चलने लगता है। शिकारे को आगे बढाने के लिए चलने वाले हर दसवें चप्पू पर कोई न कोई नई कश्ती शिकारे के बगल में आकर कुछ बेचने की कोशिश करती है।

कश्मीर के खास केसर और शिलाजीत से कश्मीरी हैंडीक्राफ्ट तक। चलती फिरती फोटो शॉप भी है और कश्मीरी कहवा से आगे कोल्डड्रिंक का विज्ञापन भी साथ लजे और कुरकुरे तो होंगे ही। वैसे तो, कश्मीर में अॉटो से पुरानी बाजार तक जाने के पचास रुपए से कम नहीं लगते। लेकिन, हो सकता है कि कोई अॉटो वाला सिर्फ दस रुपए में आपको बाजार की सैर कराकर वापस पहुंचाने को तैयार हो जाए। इसकी वजह भी बाजार ही है।ये अॉटो शॉप की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का हिस्सा है। आप पर ये भी दबाव नहीं होगा कि आप कुछ खरीदें हीं। पसंद आए खरीदिए नहीं तो, कोई बात नहीं दस रुपए में ही अॉटो वाला वापस डल गेट छोड़ देगा। बाद में वहां से कुछ खरीदने का जी करे तो, फोन कीजिए दस रुपए वाला अॉटो हाजिर है।

मैंने सुन रखा था कश्मीर में शाकाहारी खाना मिलना मुश्किल है। लेकिन, डल लेक के किनारे ढाबे से लेकर दिल्ली के नाथू स्वीट्स के रेस्टोरेंट तक सब मिलेगा। बाजारके साथ प्रोफेशनलिज्म अपने आप आ जाता है। गुलमर्ग की बर्फ के बीच में भी बाजारचुपचाप अपना काम कर रहा है। स्लेज गा़ड़ी खींचने वाले को रोजगार मिला है तो, नए जोड़ों को उनके हनीमून ट्रिप की यादगार वीडियो हाथ के हाथ देनेवाले भी अपनी दुकान चला रहे हैं। कश्मीर में अमन है इसलिए गुलमर्ग से पहले तंगमर्ग कस्बे के रियाज को गाइड का काम भी आसानी से मिल रहा है। दो बहनों की पढ़ाई और घर का खर्च इसी अमन की वजह से ही चल रहा है।

कश्मीर में अब लोगों को जेहाद के नारे से ज्यादा बिग एफएम की सारा की बकबक ज्यादा अच्छी लगती है। लेकिन, कश्मीर के अमन कादुश्मन है कि सरकार पर यहां के लोगों का भरोसा नहीं बन पाया है। दो दशकों से इतने खुशहाल और समृद्ध राज्य को आतंक से बरबाद कर देने वालों से अभी भी यहां के कुछ लोगों को सहानुभूति है। वैसे बाजार के विरोध ये दहशतगर्द भी हैं क्योंकि रेडियो के गाने गोलियों की आवाज की दहशत कम करते हैं। डल लेक के किनारे देर शाम तक टहलते नए जोड़े भी दहशतगर्दी को चिढ़ाते हैं। यहां बाजार ही काम कर रहा है अमन लाने में। बाजार का सीधा फायदा यहां दिख रहा है। यहां सरकार और बाजार को साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। सरकार ने बाजार के चलने का पुख्ता इंतजाम कर लिया तो, अमन अपने आप जन्नत में लोगों को न्यौता दे रहा होगा। अब आप भी बाजार का शुक्रिया अदाकर जन्नत घूमने जा सकते हैं।

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...