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Tuesday, September 03, 2013

मनमोहन सरकार ये तूने क्या किया !

हम भारतीयों को सपना देखने में बड़ा मजा आता है। ऐसा कि कोई भी हमें सपना दिखा दे तो हम मजे से उसके साथ हो लेते हैं। ये बात हमारे नेताओं को गजब समझ में आई। जवाहर लाल नेहरु ने नया भारत बनाने का सपना दिखाया। भारत एक खोज हो गई, हम भारतीय नेहरु के साथ हो लिए। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का सपना दिखाया। फिर हम भारतीय इंदिरा के साथ हो लिए। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया। हम भारतीय अब राजीव के साथ हो लिए। लेकिन, हम भारतीयों को सबसे तगड़ा सपना दिखाया  गैरराजनीतिक मनमोहन सरकार ने। मनमोहन सरकार कभी नेता नहीं रहे। लेकिन, हमेशा जीवन की सर्वोच्च सुख सुविधा का भोग करते रहे। उन्होंने भी एक सपना इस देश को दिखाया। और, वो अब तक का सबसे तगड़ा सपना था। हम भारतीय बिस्तर पर पड़े इस सपने की आहट भर से गुदगुदाने लगे। वो सपना था हम भारतीयों को अमेरिकी बनाने का। वो सपना था दुनिया की सारी सुख सुविधा भारत में जुटाने का। वो सपना था हम भारतीयों को जेब में जमकर रुपया भर जाने का। वो सपना था हम भारतीयों की देह पर दुनिया के सारे ब्रांडेड कपड़ों के सज जाने का। वो सपना था हम भारतीयों के पास दुनिया की सबसे शानदार कारों के होने का। वो सपना था हम भारतीयों के हंसते-खेलते बिना संयुक्त परिवार के तनाव के मियां-बीवी और बच्चे के साथ मॉल में घूमने का। वो सपना था हर गांव के शहर बन जाने का। वो सपना था हर भारतीय शहर में अमेरिकी शहरों जैसी चमक का। वो सपना था 10% की तरक्की का। हम मनमोहन सरकार के साथ हो लिए। 2004 में, फिर 2009 में। सपना टूट गया है। आधा रह गया है हमारी तरक्की की रफ्तार की तरह। अब देखिए सपने में जीने वाले भारतीय बिस्तर से बूथ तक पहुंचते हैं या इस सपने के लिए 2014 में मनमोहन सरकार का साथ देते हैं। क्योंकि, सपना तो बहुत बड़ा है। और, पूरे तो पहले के भी सपने नहीं हुए थे।

Thursday, July 09, 2009

जरदारी की सरदारी में ही भला है

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है – ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।


भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।


जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।



जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-


पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।

अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।

और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।



साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।


कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।


कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।


बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।


अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।

Wednesday, August 27, 2008

हम कैसा देश बनें

बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बादशाह बीजिंग से बोलेगा।

खैर, मैं देश की बात कर रहा था तो, सोवियत संघ उधर टूट और इधर हमारे देश के नेताओं का आदर्श भी नहीं रह गया। अब हम अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं। कमाल ये कि इस पर संघी-भाजपाई से लेकर कांग्रेसी तक सब सहमत हैं। नए समाजवादियों को भी अमेरिका का ही साथ अच्छा लग रहा है। सिर्फ कम्युनिस्ट भाई चीन जैसा बनाना चाहते हैं देश को। ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट भाइयों की जिन दो राज्यों में बपौती है उसे, चीन तो क्या चीन के पिद्दी बराबर भी नहीं बना पा रहे हैं।

अमेरिका, रूस बनने के समय तो मैं इतना जाग्रत ही नहीं था कि कुछ बनाने में अपनी बहुमूल्य राय दे पाता। लेकिन, अब देश कैसा बने इसमें मेरी बहुमूल्य राय काम आ सकती है। चीन जैसा देश बनने में मुझे जाग्रत होने के साथ ही चिढ़ होनी शुरू हो गई थी। उतनी ही जितनी कोई अगर पाकिस्तान जैसा बनने की वकालत कर दे।

इसकी सीधी-सीधी कई वजहें थीं
चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा जमा रखा है।
चीन ने तिब्बत पर जबरी कब्जा जमाया हुआ है। घिघियाए दलाई लामा भारत में हैं, उनसे अनायास सहानुभूति है।
कम्युनिस्ट चीन में तानाशाही है।
हमारे देश में जो, कम्युनिस्ट बने घूम रहे हैं वो, सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करके काम चला रहे हैं।
कम्युनिस्ट राज्यों के पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो, बता सके कि चीन जैसा ही बनना चाहिए। एक पश्चिम बंगाल थोड़ा बहुत था वो, भ्रम भी शीशे की तरह टूटकर चुभ रहा है।


इतनी वजहें दिमाग में ऐसे घर किए हुए हैं कि जब मैं देहरादून, अमर उजाला में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA) में पासिंग आउट परेड कवर करने गया तो, जॉर्ज फर्नांडिस से लगभग भिड़ सा गया था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, पासिंग आउट परेड के मुख्य अतिथि थे। POP भाषण के दौरान उन्होंने चीन का जिक्र किया और उसकी जमकर तारीफ की। मंच से उतरते ही दूसरे पत्रकारों के साथ मैंने उन्हें घेर लिया। और, कड़े लहजे में सवाल दागा- क्या आप भारत में चीन मॉडल की वकालत कर रहे हैं। फर्नांडिस ने कहा- मैं सिर्फ चीन के विकास की बात कर रहा था। लेकिन, मैं तो भरा हुआ था। फिर से मैंने वही सवाल किया। फर्नांडिस इतने झल्ला गए कि उन्होंने प्रेस से बात करने मना कर दिया। कहा- आप मेरे मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश कर रहे हैं।

खैर, मैंने देहरादून छोड़ दिया। और, मुंबई आ गया-मन में कहीं न कहीं बचपन से था कि मुंबई जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। लेकिन, मायानगरी में आते ही इसकी फिल्मी छवि टूट सी गई। मरीन ड्राइव के क्वीन्स नेकलेस से मैं मुंबई को पहचानता था। जहां पुरानी-नई मॉडल की शानदार गाड़ियों में बड़े लोग घूमते हैं। यहां एयरपोर्ट (अब तो, कम से कम एयरपोर्ट शानदार हो ही गया है) से उतरते ही झुग्गियों से गुजरकर होटल तक पहुंचा। समझ में आ गया मैं अपने पैतृक प्रतापगढ़ के गांव से निकलकर देश के सबसे बड़े गांव में आ गया।

गांव में सड़कें कच्ची-पक्की हो सकती हैं लेकिन, कोई भी दूरी तय करने में साइकिल से जितना समय लगता है उससे ज्यादा समय मुंबई में ट्रैफिक के बीच फंसी कारों से लग जाता है। गांव में खेत में लोग दिशा-मैदान जाते हैं तो, यहां भी रेलवे ट्रैक के किनारे लोग लैट्रिन करते मिल जाएंगे। झुग्गियों में तो लोग गांव से भी बदतर हालात में रह रहे हैं। हां, झुग्गी में भी एयरकंडीशनर जरूर लगा है। अपने गांव देश की लंबी-चौड़ी जगह और शानदार हवा-पानी को छोड़कर लोग तरक्की तलाशते नाले के ऊपर-सड़क के किनारे-रेलवे ट्रैक के किनारे बदबूदार जगह में एक चारपाई की जगह में झुग्गी बनाकर तरक्की वाले देश में रह रहे हैं।

फिर, कभी-कभी लगता है कि दिल्ली जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। और, दिल्ली इधर जिस तेजी से बदल रही है—कि हर महीने भर पे भी दिल्ली जाओ तो, नई सी लगती है, ढेर सारे फ्लाईओवर, चमचमाती सड़कें- उससे और लगता है कि देश, दिल्ली जैसा ही हो जाए। फिर, लगा कि नहीं यार इतनी सड़कों-फ्लाई ओवरों पर दिल्ली वाले तो, मजे से चल ही नहीं पा रहे हैं। ऑफिस के टाइम में तो, मुंबई से थोड़ा ही भले रह पाते हैं। फिर भी दिल्ली देश की अकेली वर्ल्ड क्लास सिटी लगती है।

और, लीजिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में होने वाला है। उसकी तैयारी की वजह से ये दिल्ली का साज-सजावट ज्यादा तेजी से हो रही है। बड़ी मुसीबत है भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे देश के बगल में होना। पाकिस्तान रोज हम पर बिना वजह गोली बरसाता रहता है-धमाके करता रहता है। निर्दोष मारे जाते हैं। तो, चीन की तरक्की से हम ऐसे ही मरे जा रहे हैं। चीन 5 SEZ बनाता है तो, हम 500 SEZ के प्रस्ताव पास कर देते हैं। जबकि, हमें ये अच्छे से पता है कि हमारे लिए SEZ मॉडल काम का नहीं है। और, देखिए हमें भी 108 साल में ओलंपिक में रिकॉर्ड बनाने के लिए चीन की राजधानी बीजिंग ही एक जगह मिली थी।

रिकॉर्ड भारत ने भी बनाया और चीन ने भी। भारत देश की अब तक की जिंदगी का पहला और अकेला निजी स्वर्ण पदक मिला। चीन के खिलाड़ी 51 स्वर्ण पदक लटकाए घूम रहे हैं। हम कुल जमा तीन गिनती में पहुंचे तो, चीन ने पदकों की सेंचुरी मार दी। लीजिए, साहब अब चीन से कुछ तुलना बची क्या। स्वर्ण पदक के लिहाज से चीन हमसे 51 गुना आगे, अपना कांसा भी मिला लें तो, भी चीन तीस गुना आगे। अब मैं सोच रहा जॉर्ज फर्नांडिस गलती से ही सही कह रहे थे हमें चीन जैसा बनना चाहिए। वो, भी उन जवानों की पासिंग आउट परेड में जो, हो सकता है चीन की उसी सीमा पर तैनात कर दिए जाएं। जहां चीन ने लंबे भारतीय क्षेत्र पर चीनी झंडे लगाकर नई सीमा बना दी है।

अब मुझे भी लगता है कि हम चीन जैसा ही देश बनें। कांग्रेसी-कम्युनिस्ट तो, खुश होंगे ही। संघी भी खुश होंगे बस उन्हें ये नहीं बताना है कि हम कम्युनिस्ट चीन जैसा बन रहे हैं। वैसे, संघियों को भी गुजरात एक देश बनाने का मॉडल मिल गया है। लेकिन, फिर वही बात कि हम चीन तो हैं नहीं थ्येन आन मेन चौक पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले छात्रों का नरसंहार करने वाली रेड आर्मी किसी को याद तक नहीं है। चीन की तरक्की सबको याद है। अब एक चुनाव विकास के मुद्दे पर जीतने वाले नरेंद्र मोदी भी शायद तरक्की से सब ढंक दें। लेकिन, गुजरात में है तो, लोकतंत्र ही ना। तानाशाही तो है नहीं कि बस एक ही पार्टी, एक ही राज। फिर, तो हम चीन भी नहीं बन पाएंगे। वैसे, मेरे स्वर्गीय बाबा श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री मुझकों अक्सर समझाते हुए एक श्लोक सुनाते थे जो, मुझे अब याद नहीं है। लेकिन, उसका मतलब मुझे याद है कि हाथी के पैर में सबका पैर समा जाता है। यानी इतने बड़े बनो कि सारी गलतियां उसमें छिप जाएं। अब भारत की पहचान भले दुनिया में हाथी के तौर पर होती है लेकिन, हम हाथी नहीं बन पा रहे हैं।

लीजिए, मैं चीन, गुजरात जैसा बनते-बनते फिर से हाथी यानी भारत बनने लगा। दिमाग में बाप-दादाओं का दिया भरा हुआ है ना। अरे, अब तो मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा। क्या हम बिना चरित्र के ही देश रह जाएंगे। ए भाई, किसी को समझ में आ रहा हो तो, बताओ ना- हम कैसा देश बनें। और, देश के वीरों ये सलाह मत देना कि हमें किसी की नकल की जरूरत नहीं हम भारत हैं और भारत ही बनेंगे। क्योंकि, आजादी के करीब बासठ सालों बाद भी हम भारत जैसा बनते-बनते बिना किसी चरित्र के रह गए हैं। प्लीज, बताइएगा जरूर, हम ही नहीं देश मानसिक उलझन में है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...