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Showing posts from 2016

चिटफंडियों के मारे लोगों की चिन्ता करो सरकार

देखिए चिटफंडियों के कुतर्क किसको किसको प्रभावित करते हैं। ई हमारा खेत अधिया पर करते हैं। घर में शादी है तो गाँव से आए हैं। अचानक किसी चर्चा पर बोल पड़े अरे ऊ जो बहुत पैसा जमा करवाया। हम लोग नोटबंदी से लेकर सहारा तक अंदाज़ा लगाते रहे। ग़लत जवाब साबित हुआ। अंत में सही जवाब आया पर्ल्स वाला। बताए कि 30000 रु जमा कराए हैं। पूछ रहे हैं भइया अब मिली कि नाहीं। इनको भी जानकारी है ऊ पकड़ा गया है। लेकिन इनका पैसा कैसे मिलेगा न इन्हें पता है , न मैं बता पा रहा हूँ। इन्हें क्या बताऊँ कि कितनी लड़ाई के बाद पर्ल्स समूह के पी७ चैनल से हमने अपनी बक़ाया रक़म वसूली थी। इस तरह के गोरखधंधे पर शुरुआती अंकुश न लगा , तो मोदी सुप्रीमकोर्ट का कर लेंगे। सुब्रत राय और निर्मल सिंह भंगू जेल आ जा रहा है। पर जिन बेचारों का पैसा गया वो कैसे वापस आयेगा। ऐसी वसूली का कोई तानाशाही तरीक़ा होना चाहिए। ई चाहते हैं राजकुमार यादव उर्फ तितिल्ले वाया चंदई का पुरवा, सिया ग्रामसभा, बिहार विकास खंड, तहसील कुण्डा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश।

खेती पर नोटबंदी का कितना असर बता रहे हैं राजकुमार यादव

राजकुमार यादव (तितिल्ले) की बात सुननी जरूरी है। हमारा खेत यही जोतते-बोते हैं। हमने पूछा नोटबंदी होने से खेती क बर्बाद होइ ग होए। तितिल्ले कहेन काहे भइया। हम कहे अरे बीज, खाद सिंचाई क पैसा कहाँ रहा। तितिल्ले कहेन भइया बिया (बीज), खाद पहिले से धरा रहा औ के पैसा दइके तुरंतै ख़रीदथ। खेती प थोड़ बहुत असर परै त परै। वैसे केहूक खेत एकरे ताईं ख़ाली न रहे। एतना गाँव म सब एक दूसरे बरे खड़ा रहथि। राजकुमार यादव वाया चंदई का पुरवा, सिया ग्रामसभा, विकासखंड बिहार, तहसील कुंडा, जिला प्रतापगढ़

1 अप्रैल 2017 से विमुद्रीकरण का सार्थक आर्थिक परिणाम दिखने लगेगा

बैंकों में लंबी कतारें और खाली एटीएम डराने लगे हैं। लेकिन, लालू प्रसाद यादव भी सरकार के बड़ी नोटों को बंद करके नई नोटों को लाने के फैसले के विरोध में नहीं हैं। ये सबसे बड़ी खबर है। और ये खबर इसके बाद बनी जब नीतीश कुमार के बीजेपी से नजदीकी बनाने की खबरों के बीच नीतीश ने लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। इसी से समझ में आ जाता है कि देश के जनमानस को समझने वाला कोई भी नेता या राजनीतिक दल इस फैसले का विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रही है। दरअसल सच भी यही है कि इस फैसले के विरोध की पुख्ता वजह भी नहीं है। विमुद्रीकरण के सरकार के फैसले ने एक नई बहस खड़ी कर दी है। कमाल की बात ये है कि विशुद्ध आर्थिक फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया राजनीतिक नजरिये से आ रही है। और इससे भी कमाल की बात ये कि राजनीतिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया के दबाव में आर्थिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया की चर्चा तक नहीं हो रही है। सबसे बड़ी आलोचना सरकार के इस फैसले की 2 मूल वजहों से हो रही है। पहली, देश कतार में खड़ा है, आम लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। सरकार को पहले से बेहतर इंतजाम करना चाहिए था। दूसरी वजह ये कि काला

सम्पादक, किताब, विमुद्रीकरण और मोदी सरकार

  जब मैं 2008 दिसंबर में सीएनबीसी आवाज़ मुंबई से दिल्ली भेजा गया , तो सबने ढेर सारी नसीहतें , अनुभव , हिदायत दिया। आलोक जी ने ये किताब दी। किताब पर आलोक जी का लिखा मेरे लिए बड़ी ताक़त है। आधार का आधार स्तम्भ नंदन नीलेकनि की लिखी   #ImaginingIndia   आलोक जोशी अब आवाज़ के सम्पादक हैं और उन्होंने सम्पादक बनने के बाद जो पहला काम किया वो था हर हफ़्ते २ किताबें की टीवी पर बात। बेहद जरूरी है टीवी देखने वाले समझें कि किताब क्यों जरूरी है। और ये भी कि टीवी सिर्फ़ तमाशा नहीं है। सम्पादकों को दरअसल अपने साथ रिपोर्टर को, डेस्क पर काम करने वाले को ज्यादा से ज्यादा किताब पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अच्छी पीटीसी भी रिपोर्टर बिना अच्छा और खूब पढ़े नहीं लिख सकता। और यही हाल डेस्क पर बैठे पत्रकार का भी होता है, जब वो अलग से पढ़ता नहीं है। आजकल के भला कितने सम्पादक हैं, जो पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। देश के अतिप्रतिष्ठित पत्रकार रामबहादुर राय ने एक बार मुझे बताया कि रात में सोने से पहले 2 घंटे वो पढ़ते जरूर हैं। मैंने भी उस दिन के बाद कई दिन पढ़ा, फिर छूट जाता है। लेकिन, बीच-बीच में क्रम चला

नोटबंदी की मुश्किल और मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी बड़ी आफत की पड़ताल

दृष्य 1- 8 नवंबर को 8 बजे जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को अब तक के सबसे बड़े फैसले की जानकारी दी, तो देश के हर हिस्से में हाहाकार मच गया। देश में काला धन रखने वालों, रिश्वतखोरों के लिए ये भूकंप आने जैसा था। दृष्य 2- दिल्ली के चांदनी चौक, करोलबाग इलाके में गहनों की दुकान पर रात आठ बजे आए भूकंप का असर अगली सुबह तक दिखता रहा। नोटों को बोरों में और बिस्तर के नीचे दबाकर रखकर सोने वालों की बड़ी-बड़ी कारें जल्दी से जल्दी सोना खरीदकर अपना पुराना काला धन पीले सोने की शक्ल में सफेद कर लेना चाहती थीं। और ये सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के लगभग हर शहर में हुआ। पीला सोना काले धन को सफेद करने का जरिया बन गया। दृष्य 3- उत्तर प्रदेश और पंजाब इन दो राज्यों में स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब हो गई। दोनों ही राज्यों में चुनाव नजदीक होने की वजह से राजनीतिक दलों से लेकर चंदा देने वालों के पास ढेर सारी नकद रकम जमा थी। इस रकम को ठिकाने लगाने की मुश्किल साफ नजर आ रही थी। जाहिर है जिन राजनेताओं के पास बड़ी रकम पुराने नोट के तौर पर आ गई थी, उनके लिए मोदी सरकार का ये फैसला जहर पी लेने के समान दि

बीजेपी संगठन में भला कोई क्यों काम करे?

भारतीय जनता पार्टी ने लम्बे समय से इंतजार कर रही दिल्ली और बिहार इकाई को उनका नया अध्यक्ष दे दिया है। मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया है। साथ ही बिहार इकाई का अध्यक्ष नित्यानंद राय को बना दिया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी गायक हैं, भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। संगठन में कोई खास काम नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। नित्यानंद राय 4 बार विधायक रहे हैं और इस समय उजियारपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। पहली नजर में तिवारी और राय के बीच कोई समानता नहीं नजर आती। लेकिन, इन दोनों के बीच एक ऐसी समानता है जिसने चुनाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। दरअसल दोनों ही लोकसभा सांसद हैं। जनप्रतिनिधि हैं यानी चुनाव में इनको पहले टिकट मिला, फिर पदाधिकारी भी बना दिए गए। यही वो समानता है जिसने यूपी बीजेपी के नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। बीजेपी के टिकट की कतार में लगे नेता नई उलझन में हैं। दरअसल बीजेपी में एक अनकहा सा फरमान है कि किसी भी पार्टी पदाधिकारी को टिकट नहीं दिया जाएगा। इस चक्कर में कई लोगों को

आर्थिक फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया से देश का भरोसा खोता विपक्ष

2 दिसंबर को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर नोटबन्दी के फैसले ने देश की जनता को परेशान किया है। रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में मुश्किल हो रही है। कई जगह पर तो लोगों को बेहद सामान्य जरूरत पूरा करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। ये सब सही है। लेकिन, आम जनता की परेशानी की असली वजह क्या है, इस पर पहले बात करनी चाहिए। दरअसल आम जनता को होने वाली इस सारी परेशानी की वजह नरेंद्र मोदी सरकार का वो फैसला है, जिसके बाद 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की जरूरत आ पड़ी। इस वजह से देश की आम जनता परेशान है। वो कतारों में है। अपने पुराने नोट बदलने के लिए बैंकों की कतार में है। 2000 रुपये निकालने के लिए एटीएम की कतार में है। इस स्थिति को देखकर ये लगता है कि जैसे देश बड़ी मुश्किल में है। लेकिन, जनता के मन में एक भावना आसानी से देखी जा सकती है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले को ज्यादातर जनता हर तरह की परेशानी के बाद भी काला धन रखने वालों, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ देखी जा रही है। और जनता की इस भावना ने दरअसल देश के विपक्ष के लिए कतार में लगी जनता से ज्यादा परेशानी की जमात खड़ी कर दी है। परेशान

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि क

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत : ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रि

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को