Sunday, September 30, 2007

बेशर्मी की हदें टूट गईं मुलायम राज में

उत्तर प्रदेश में जिस्म बेचकर सिपाही की नौकरी मिली। ये सब उस समय हुआ जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। पुलिस भर्ती घोटाले की जांच में अब तक का ये सबसे चौंकाने वाला और शर्मनाक तथ्य सामने आया है। मामले के जांच अधिकारी शैलजाकांत मिश्रा पत्रकारों को ये बात बताते हुए खुद शर्म महसूस कर रहे थे। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान सिपाही की भर्ती में शामिल हुई कई लड़कियों ने उनसे बताया कि उन्हें सिपाही बनाने के एवज में बिस्तर गर्म करने को कहा गया। जब ऐसा चल रहा हो तो, जाहिर है जिसने भी मना किया वो, सिपाही की सूची से बाहर हो गया।

उत्तर प्रदेश में गलत तरीके से नौकरी पाने वाले 18,000 सिपाहियों की भर्ती अब तक मायावती रद्द कर चुकी हैं। पहले 6504 सिपाहियों की भर्ती रद्द हुई, अब 7,400। 25 IPS अफसर भी निलंबित किए जा चुके हैं। बड़े पुलिस अधिकारियों की भी गर्दन जब मायावती ने नापनी शुरू की तो, मुलायम इसे अपने ऊपर राजनीतिक हमला बता रहे थे। वैसे मुलायम अभी भी बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि सब कुछ राजनीतिक साजिश है। वो, मायावती को चेतावनी भी दे रहे हैं कि मायावती की भी सरकार जाएगी। अच्छा है मुलायम बार-बार मायावती को ये चेतावनी दे रहे हैं। इससे कम से कम मायावती के राज में तो ऐसा नंगा नाच नहीं होगा। जिससे अगली सरकार मायावती की खाल उधेड़ने की कोशिश करे।

खैर, बात मुलायम राज में हुई गंदगी की चल रही थी। सिपाही भर्ती घोटाले की जांच कर रहे शैलजाकांत ने बताया है कि इसमें पुलिस के बड़े अफसरों के अलावा एक बड़े नेता का नाम भी सामने आया है। अभी वो इसे बताने को तैयार नहीं हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश को जानने वाले ज्यादातर लोग उन नेताजी का नाम जानते ही होंगे। वैसे किसी नेता के शामिल हुए बिना कोई भी पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर इतना बड़ा घोटाला कर सकता है, ये तो संभव ही नहीं था। नेता भी कोई ऐसा ही होगा जो, सत्ता के दरबार में सबसे ज्यादा हनक रखता हो। लखनऊ में इन्हीं नेताजी के घर पर तय हुआ कि किस-किस को सिपाही की वर्दी देनी है। एक निजी एजेंसी के हाथ में रिजल्ट बनाने का जिम्मा था। हद ये हुई कि किसी अधिकारी के बिना हस्ताक्षर के ही सूची जारी की गई। वैसे जारी करने से पहले मुलायम राज में सत्ता के सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे नेताजी ने कई बार सूची में फेरबदल कराया। वैसे जिस तरह से मुलायम के राज में जनता त्रस्त थी। उससे तो, यही लगता है कि ये ट्रेलर भर है। फिल्म अभी बाकी है। यानी उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के छलावे के पीछे के कई कुकर्म सामने आने बाकी हैं।

प्रियदर्शन की ही ढोल बज गई

आज मैं प्रियदर्शन की एक और फिल्म ढोल देखकर आया। सुबह अखबारों में रिव्यू और रेटिंग देखकर गया था। तो, लगा था कि फिल्म अच्छी ही होगी। खैर, मैं इस फिल्म को कॉमेडी समझने की गलती करके देखने गया था। कुछ जगहों पर राजपाल यादव की चिरपरिचित कॉमेडी को छोड़ दें तो, कहानी ने कहीं नहीं हंसाया। लेकिन, राजपाल यादव भी अब एक जैसा ही मुंह बनाकर लोगों को हंसाने की कोशिश करते दिखे।

कुल मिलाकर पूरी फिल्म में प्रियदर्शन की ही ढोल बजती नजर आई। एक भी चरित्र ऐसा नहीं था जो, भूमिका पर खरा उतर सका हो। ओमपुरी जैसा शक्तिशाली अभिनेता भी फिल्म में किसी काम का नहीं दिखा। प्रियदर्शन की पुरानी फिल्मों की ही तरह इस फिल्म में भी लोगों को हंसाने के लिए चरित्रों को हर दस मिनट पर बुरी तरह पिटवाया। एक-दो रहस्य भी थे। जो, दर्शकों को पहले से ही पता था कि कुछ खास नहीं निकलने वाला।
प्रियदर्शन ने अपने पुराने फॉर्मूले के तहत चरित्रों को खूब भगाया। इतना कि ढोल भी कहीं-कहीं पर भागमभाग होने का भ्रम देने लगती है। फिल्म में मासूम हीरोइनें कॉमेडी का हिस्सा नहीं थी। प्रियदर्शन की फिल्मों से दर्शक हमेशा यही उम्मीद लेकर जाते हैं कि वो कुछ हल्की-फुल्की ऐसी स्क्रिप्ट पर चरित्रों को नचाएंगे कि दर्शकों को हंसी आएगी, मन थोड़ा हल्का होगा। लेकिन, ढोल देखने के बाद दर्शक के दिमाग का भी ढोल बज गया। और, प्रियदर्शन की कॉमेडी फिल्मों की एक जो सबसे खराब बात सामने आ रही है कि हर फिल्म में बेकार-लफंगे चरित्रों को हीरो बनाया जाता है। जो, अंत में हराम की कमाई को बड़ी ईमानदारी से पाकर मस्त हो जाते हैं।
अब उम्मीद यही की जा रही है कि प्रियदर्शन अपनी अगली फिल्म भूलभुलैया में दर्शकों को कुछ नया देंगे। चरित्रों को एक दूसरे के पीछे भगाने, काली कमाई को फिल्म के हीरो के हाथ लगने से अलग हटकर कुछ कहानी लेकर आएंगे। जिससे सचमुच दर्शक प्रियदर्शन का नाम एक अच्छे फिल्म बनाने वाले के तौर पर याद रखेंगे।

Saturday, September 29, 2007

मुंबई रहने के लिहाज से सबसे अच्छा शहर नहीं है

रहने के लिहाज से दिल्ली देश का सबसे अच्छा शहर है। इसका मतलब ये है कि आधुनिक सुविधा, जीने-रहने की आसानी दिल्ली में सबसे ज्यादा है। सड़कें अच्छी हैं। सड़कों पर जाम कम है और जरूरी सुविधाओं के मामले में बहुत खराब मुंबई से अभी भी सस्ता है। ये बात कह रही है शहरी विकास मंत्रालय की हाल ही में मुंबई में जारी रिपोर्ट।

दिल्ली रहने के लिए देश का सबसे अच्छा शहर है। इसके लिए तो, ढेर सारे तर्क हैं। दिल्ली- देश की राजधानी है। दिल्ली- देश के सारे नेता-बड़े अधिकारी यहीं रहते हैं। विदेशों से आने वाले प्रतिनिधिमंडल-नेताओं को यहीं रुकाया जाता है। इन सब छोटी-बड़ी वजहों से दिल्ली को बुनियादी सुविधाओं यानी सड़क, बिजली, पानी के लिहाज से बेहतर होना ही पड़ता और, वो है। दिल्ली सरकार के साथ ही केंद्र की सरकार भी इस शहर/राज्य को सजाने-संवारने की हर संभव कोशिश करती रहती है।

दिल्ली रहने के लिहाज से सबसे अच्छा है, इसके पक्ष में ऐसे सैकड़ो तर्क हैं। लेकिन, ऐसे ही सैकड़ो तर्क होने के बाद भी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को रहने लायक देश के सबसे अच्छे शहर का खिताब नहीं मिल सका। आपको लगेगा कि इसमें क्या बात हुई ये तो, चलता रहता है। दरअसल मुंबई के इसी, चलता है वाले, अंदाज से ही सारी काबिलियत होने के बाद भी मुंबई रहने के लिहाज से देश का सबसे अच्छा शहर नहीं बन पा रहा है।

मुंबई रहते हुए मुझे भी तीन साल हो गए हैं। सच बात ये है कि अभी भी मुझे दिल्ली के मुकाबले मुंबई कम ही अच्छी लगती है। इसके पीछे कोई ऐसी वजह नहीं है जो, अभी के सर्वे में निकली है। लेकिन, तीन साल पहले और अब जब मुझे हाल में दिल्ली जाने का मौका मिला था तो, दिल्ली में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। लेकिन, इन तीन सालों में मुंबई एयरपोर्ट की बदली सूरत को छोड़ दें तो, कुछ भी नहीं बदला। यहां तक कि नवंबर 2004 में सुबह-सुबह मुंबई एयरपोर्ट पर उतरने के बाद से बांद्रा के एक होटल में पहुंचने तक जिस तरह झुग्गियों की लाइन, सड़क पर सुबह चारपाई डालकर सोते लोग, जाम, भीड़ भाड़ दिखा था, वो आज भी वैसे का वैसा है।

सड़क के दोनों तरफ करीब 6-6 फीट रास्ता रोके झुग्गियों में अभी भी लाखों लोग रह रहे हैं। 2004 में बनकर पूरा होने वाला बांद्रा वर्ली सी लिंक अगले साल अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। बांद्रा वर्ली सी लिंक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का पहला हिस्सा है जो, 5.6 किमी का है। दूसरा हिस्सा वर्ली से कोलाबा का 12 किमी से ज्यादा का है जो, अभी शुरू भी नहीं हुआ है। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के अलावा कोई ऐसी सड़क नहीं दिखती जो, देश के सबसे अमीर लोगों के शहर होने का भरोसा दिला सके।

मुंबई में लोकल रेलवे इतनी भरी होती हैं कि सांस लेना भी मुश्किल होता है। अब ऐसा तो है नहीं कि ऐसी दमघोंटू रेल में कोई खुशी से सफर करना चाहता है। लोकल मुंबई की जान इसलिए है कि दम घुटते हुए भी सफर जरा जल्दी पूरा हो जाता है और, दम निकलने से बच जाता है। रेल के बराबर की ही दूरी सड़क के रास्ते तय करने में मुंबई में दोगुना समय लग जाता है। और, सड़कों का ये हाल तब है जब, मुंबई का सिर्फ म्युनिसिपल कॉरपोरेशन इतना बजट पाता है। जितने में कई राज्य अपना बजट बना लेते हैं। आपको शायद भरोसा नहीं होगा- BMC यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का बजट 7000 करोड़ रुपए का है।

मुंबई में टाटा-अंबानी-गोदरेज-बजाज जैसे जाने कितने तुर्रमखां उद्योगपति रहते हैं। जो, इस समय दिल्ली दरबार में अलग से पूरा शहर (SEZ) बनाने के लिए अर्जी पे अर्जी दे रहे हैं। ये उद्योगपति कह रहे हैं कि ये शहर ऐसे होंगे जहां, बाहर से कुछ जरूरत नहीं होगी। बिजली, पानी, सड़क, एयरपोर्ट सबकुछ शहर में होगा। हेडक्वार्टर होने की वजह से इन्हें अक्सर ही मुंबई रहना, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना पड़ता है। लेकिन, दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति बनने की कतार में लगे उद्योगपति अपने शहर में कुछ खास करने की इच्छा भी नहीं जताते। हां, अपने प्रोजेक्ट में जरा सी ऊंच-नीच होने पर किसी भी सरकार से भिड़ने को तैयार रहते हैं।

दिल्ली में रिंग रोड तो पूरी तरह से रेड सिग्नल फ्री है। इसके साथ ही दूसरी कई ऐसी सड़कें भी बन गई हैं जिसमें, 10-15 किलोमीटर तक ब्रेक लगाने की जरूरत नहीं होती। मेट्रो की सहूलियत तो दुनिया को पता है। मुंबई भी मेट्रो दौड़ाना चाहता है लेकिन, सी लिंक की ही तरह मेट्रो के काम में भी देरी शुरुआत से होनी शुरू हो गई है। लेकिन, रेड सिग्नल फ्री सड़कों की बात तो अभी मुंबई चलाने वाले सोच भी नहीं रहे हैं। जबकि, मुंबई में जिस तरह से छोटी (कम चौड़ी) सड़कों पर चलने वाली गाड़ियां बढ़ रही हैं, पूरी मुंबई में दो मंजिला सड़क की जरूरत दिखती है।

मैं मुंबई को लेकर निराश नहीं हूं। लेकिन, इतना जरूर सोचता हूं कि देश में सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर लोग मुंबई में रहते हैं। उन्हें विश्व स्तरीय सुविधा न मिलने की कोई वजह नहीं है। मोनो रेल, मेट्रो रेल, ढेर सारे फ्लाईओवर, सी लिंक, नई खूबसूरत-ज्यादा सुविधाओं-रफ्तार वाली लोकल और ऐसी ही दूसरी योजनाएं हैं जो, भरोसा दिलाती हैं कि मुंबई देश का सबसे ज्यादा सुविधाओं वाला शहर आसानी से बन सकता है। मुंबई एयरपोर्ट पर नए टर्मिनस पर उतरने पर ये अहसास होता भी है। मैंने बचपन में मुंबई के बारे में सुन रखा था कि वहां तो, कई-कई लेन वाली सड़कें हैं। तेज रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए अलग-अलग लेन है। लंबी दूरी, चंद मिनटों में तय हो जाती है।

तीन साल पहले दिल्ली से हवाई सफर तय करने के बाद जमीन पर उतरा तो, खराब सुविधाओं को देखकर मेरे नीचे की जमीन ही खिसक गई। लेकिन, उम्मीद करता हूं कि मेरे बाद कोई और जब मायानगरी में सपने पूरे करने आएगा तो, उसे मुंबई देश में ही नहीं दुनिया में रहने के लिए सबसे अच्छे शहरों में शामिल मिले। उसे सिर्फ ये कहकर न बहलाया जाए कि मुंबई की खूबी यही है कि मुंबई कभी रुकती नहीं। बल्कि, यहां नया आने वाला मुंबई की तेज रफ्तार देखकर कहे कि हम दुनिया से आगे निकल गए हैं।

फिर एक दिल्ली वाले ने आग लगा दी!

इंडियन आइडल प्रतियोगिता से कौन बाहर हुआ। कौन अंदर आया। इस पर हर बार की तरह इस बार भी खूब विवाद हुआ। लेकिन, इस बार जब फाइनल मुकाबला प्रशांत तमांग और अमित पॉल के बीच हुआ तो, एक जो सबसे अच्छी बात दिखी वो ये कि इंडियन आइडल के बहाने पूरा पूर्वोत्तर भारत, भारत में खुशी-खुशी शामिल हो गया था। पूर्वोत्तर भारत के कई शहर प्रशांत तमांग और अमित पॉल के पोस्टरों से लदे पड़े थे। सबको लग रहा था पूर्वोत्तर भारत का भाई, बेटा, पूरे भारत का हीरो बनने जा रहा है। ये पहली बार हो रहा था।

वैसे इससे पहले भी असम के देबोजीत उर्फ देबू इंडियन आइडल बन चुके हैं। और, देबोजीत की प्रतिभा पर भी किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन, पिछली बार मीडिया में बार-बार ये बात आती रही कि असम के उग्रवादी संगठन उल्फा ने कहा है कि अगर देबोजीत नहीं जीता तो, वो हिंसा फैला देंगे। उल्फा की ओर से देबोजीत के समर्थन में एक फरमान जारी करने की भी खबर थी। इस बार के इंडियन आइडल की दौड़ में लगे सुर के सरताजों के लिए न तो किसी ने फरमान जारी किया और न ही इस बार कहीं से किसी क्षेत्रवाद या भाषावाद की बदबू आई।

पिछले जाने कितने सालों से भारत से कटे होने का दर्द झेल रहे पूर्वोत्तर भारत के लोग इंडियन आइडल के बहाने भारत से जुड़कर खुश थे। लेकिन, रेडियो पर बकबक के लिए पैसे लेने वाले एक RJ को पूर्वोत्तर भारत के लोगों की ये खुशी बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपने शो में हंसी-मजाक में कह दिया कि अगर चौकीदार इंडियन आइडल बनने लगेंगे तो, चौकीदारी कौन करेगा। बस फिर क्या था। हफ्ते भर पहले इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के पोस्टरों के साथ रैली वाली सड़क पर आग जल रही थी। खुशी मनाने वाले चेहरों पर गुस्सा था। मिठाइयां बांटने वाले लोग तोड़फोड़ कर रहे थे।

लेकिन, अगर आपको ये लग रहा है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के दिलों में जो आग लगी है वो, सिर्फ दिल्ली के एक RJ के बर्ताव की वजह से है तो, आप गलत हैं। दरअसल ये गुस्सा दिल्ली में बैठी सरकार की उस मानसिकता के खिलाफ है जो, पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ एक सा बर्ताव नहीं करते। ये उस बर्ताव के खिलाफ है जो, पिछले कई दशकों से दिल्ली की सरकार पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ कर रही है। दिल्ली में सत्ता में रहने वाले नेताओं के भाषणों में ही भारत का हिस्सा बनकर रह गए हैं, पूर्वोत्तर भारत के लोग। कश्मीर में जेहाद के लिए पाकिस्तान से मदद मिलती है, इसका हल्ला बार-बार होता है। और, घाटी का आतंकवाद सुर्खियों में भी बना रहता है। लेकिन, क्या असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में सामान्य जिंदगी के लिए सेना और उग्रवादियों के बीच पिस रहे लोगों की बात पूरे भारत तक पहुंच पाती है। अगर पहुंच पाती तो, वहां की महिलाओं को निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन न करना पड़ता।

पूर्वोत्तर भारत बारे में भारत के दूसरे हिस्से में रहने वालों की राय का अंदाजा इस एक बात से ही लगाया जा सकता है। देश की सबसे प्रतिष्ठित (रुतबेदार) परीक्षा IAS पास होने के बाद भी लोग पूर्वोत्तर का कैडर नहीं लेना चाहते। वो, दिल्ली, अपने राज्य या फिर किसी दूसरे नजदीक के राज्य में SDM, DSP बन जाना पसंद करते हैं। लेकिन, असम या पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के किसी जिले में DM, SP नहीं बनना चाहते। दरअसल देश में सरकार चलाने वालों ने जिस संवेदनहीन तरीके से पूर्वोत्तर के मामले को खराब किया है। उससे पूर्वोत्तर के लोग मुश्किल से ही भारत के साथ जुड़ पाते हैं। यही वजह है कि चुनावों में भारत विरोध वहां वोट बटोरने का जरिया बन जाता है।

आजादी के इतने सालों के बाद भी अगर कोई सर्वे कराया जाए कि देश के लोगों का सामान्य ज्ञान पूर्वोत्तर भारत के बारे में कितना है तो, चौंकाने वाले आंकड़े सुनने को मिल सकते हैं। इंडियन आइडल प्रशांत तमांग के बारे में (गोरखाओं को चुभने वाली टिप्पणी) शर्मनाक टिप्पणी करने वाले RJ के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी इसलिए भी जरूरी है कि देश में जुड़ने की पूर्वोत्तर भारत के लोगों की कोशिश फिर एक दिल्ली वाली मानसिकता की वजह से बेकार न हो जाए।

Friday, September 28, 2007

स्वीडन की जांच एजेंसी सोनिया माइनो गांधी से सवाल पूछना चाहती है?

बीस साल पुराना बोफोर्स मामला फिर सुर्खियों में है। इस बार सुर्खियों की वजह देश के किसी नेता के आरोप से नहीं बल्कि स्वीडन से आ रही है। बोफोर्स मामले की जांच कर रहे स्वीडन के अधिकारी सोनिया गांधी से जवाब मांग रहे हैं। स्वीडन के जांच अधिकारी स्वेन लिंडस्टॉर्म सोनिया और क्वात्रोची के रिश्ते की पूरी हकीकत जानने के लिए सोनिया से सवाल पूछना चाहते हैं। जो आरोप अब तक कांग्रेस की विरोधी पार्टियों के नेता लगाते थे, उसकी पुष्टि स्वीडन के जांच अधिकारी लिंडस्टॉर्म कर रहे हैं। शुक्र है कि लिंडस्टॉर्म के विदेशी होने से कांग्रेस इसे त्याग की देवी सोनिया गांधी पर राजनीतिक हमला बताकर देश को धोखा नहीं दे सकती। एक निजी टीवी चैनल पर लिंडस्टॉर्म ने साफ कहा कि बोफोर्स की खरीद के मामले में कमीशन के तौर पर अलग-अलग खाते में करोड़ो रुपए जमा किए गए। ये खाते बोफोर्स मामले के मुख्य आरोपी ओटावियो क्वात्रोची के नियंत्रण वाले थे। इन्हीं में से एक खाते में जमा तीस करोड़ रुपए सीबीआई की लापरवाही से करीब दस महीने पहले क्वोत्रोची लंदन से निकालने में सफल हो गया। कांग्रेस की अगुवाई वाली भारत सरकार ने खाता फ्रीज करने तक की अर्जी समय पर नहीं दी।

लिंडस्टॉर्म ने भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई पर भी सवाल खड़ा किया है। लिंडस्टॉर्म का कहना है कि जब वो खुद इस मामले से जुड़ी सारी जानकारी सीबीआई को देने को तैयार हैं तब, हाल ये है कि सीबीआई ने अब तक उनसे सिर्फ बीस मिनट की मुलाकात की है। वो, भी आज से 19 साल पहले, 1988 में। लिंडस्टॉर्म को कोई हैरानी नहीं है कि एक इटैलियन को भारतीय रक्षा सौदे में कमीशन क्यों मिला। भारत में क्वात्रोची का इटैलियन कनेक्शन किसी से छिपा नहीं है। लिंडस्टॉर्म कहते हैं कि क्वात्रोची के इटैलियन सोनिया माइनो गांधी से अच्छे रिश्ते ही क्वात्रोची को पैसे मिलने की वजह बनी।लिंडस्टॉर्म कहते हैं कि सीबीआई उनसे जानकारी इकट्ठी नहीं करना चाहती। लेकिन, एक ऐसे बोफोर्स अधिकारी से पूछताछ की इजाजत मांग रही है जो, बहुत पहले मर चुका है।

वैसे बोफोर्स मामले में लिंडस्टॉर्म सीबीआई को सवालों के घेरे में भले खड़ा कर रहे हों। लेकिन, इससे कुछ निकलने वाला नहीं है। क्योंकि, देश के लोगों को अच्छी तरह पता है कि एक सीमा के बाद सीबीआई भी सरकार में बैठे लोगों के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती। और, वो भी तब जब, आजाद भारत के सबसे बड़े गांधी-नेहरू परिवार से जुड़ा मामला हो। सीबीआई की खुद की जांच में ये निकलकर आया है कि क्वात्रोची को करोड़ो रुपए मिले हैं। लेकिन, सरकार से बंधे होने की वजह से सीबीआई तो ये नहीं कह सकती कि सोनिया के रिश्ते की वजह से क्वात्रोची को ये पैसे मिले हैं।

सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री नहीं बनने का फैसला लिया था तो, उस वक्त हुई नौटंकी शायद ही किसी को भुलाए भूलेगी। वो, नौटंकी मुझे इसलिए भी अच्छे से याद है कि मैं सोनिया को प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए गोविंदाचार्य के अभियान की शुरुआत के समय वहीं पर था। दक्षिण भारत के जाने-माने पत्रकार चो रामास्वामी के घर पर हुई गोविंदाचार्य की प्रेस कांफ्रेंस में देश के वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय जी के साथ मैं भी गया था। उस समय मैं खुद पूरी तरह से नहीं समझ पा रहा था कि ये सचमुच देश हित के लिए किया जा रहा आंदोलन है या दूसरे आंदोलनों की तरह सिर्फ राजनीतिक लाभ पाने की कोशिश है। अब इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है कि गोविंदाचार्य का वो आंदोलन भले ही बहुत प्रभावी न हो पाया हो। लेकिन, वो राजनीतिक लाभ पाने की कोशिश तो बिल्कुल ही नहीं थी।

गोविंदाचार्य के आंदोलन को देश के एक बहुत बड़े वर्ग का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन भी मिला था जो, ये बिल्कुल नहीं चाहता कि देश की सबसे ताकतवर कुर्सी पर कोई ऐसा विदेशी बैठे जिसके ऊपर देश के ही रक्षा सौदे में दलाली के आरोपियों से रिश्ते रखने के आरोप हों। वैसे ये शायद ऐसे ही लोगों के विरोध का नतीजा था कि सोनिया ने खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने से इनकार कर दिया। हां, खुद देश की सत्ता परदे के पीछे से चलाती रहीं। अब राहुल गांधी को 2009 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का महासचिव बनाकर सोनिया ने साफ संकेत दे दिए हैं कि कांग्रेस की सरकार बनी तो, देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा।
वैसे कांग्रेस के नेता बनाने के इस फासीवादी तरीके का ये पहला उदाहरण नहीं है। गांधी-नेहरू परिवार के बाहर भी अगर किसी को सत्ता मिली तो, वो इस परिवार के दरबारियों को ही मिली। फिल्म अभिनेता देवानंद इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल के दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि संजय गांधी ने उस समय खुद को देश का प्रधानमंत्री पेश करने की हर कोशिश की थी। फिल्म अभिनेता देवानंद ने ऑटोबायोग्राफी में लिखा है कि इसके लिए फिल्म अभिनेताओं पर दबाव डाला गया। जो नहीं माना उसे परेशान भी किया गया।

देश के लिए चिंता की वजह ये तो है ही कि जिन लोगों के ऊपर रक्षा सौदे में दलाली के आरोपियों के साथ मिले होने के आरोप लगे हैं वही, देश की सत्ता चला रहे हैं। लेकिन, उससे भी ज्यादा चिंता की बात ये है कि जो पिछले बीस साल से बोफोर्स मामले पर ही कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे। वो, खुद वो भी सत्ता में आकर इस मामले में कुछ नहीं कर सके। स्वर्गीय राजीव गांधी पर बोफोर्स की दलाली का आरोप लगाकर कांग्रेस छोड़ने वाले और फिर इसी बूते देश का प्रधानमंत्री बनने वाले वी पी सिंह भी अपने कार्यकाल में इस दिशा में कुछ नहीं कर सके। अकेली विपक्षी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी भी जब सत्ता में आयी तो, कुछ नही हुआ। एनडीए के नेता अटल बिहारी बाजपेयी को इतने समय तो, प्रधानमंत्री रहने का मौका मिला ही था कि वो, इस सौदे की सच्चाई पता कर पाते। और, यही सबसे बड़ी चिंता की बता है कि ये नेता एक दूसरे के खिलाफ घिनौने से घिनौने आरोप तो लगाते रहते हैं। लेकिन, सत्ता में आने के बाद अपने ही लगाए घिनौने आरोपों को भूल जाते हैं। डर यही कि दूसरा सत्ता में लौटा तो, उनकी बजेगी। इससे तो यही लगता है कि एक दूसरे के भ्रष्टाचार को छिपाना भारतीय नेताओं के खून में शामिल हो गया है।

वैसे देश के बीमारू कहे जाने वाले दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से इस मामले में कुछ अच्छे संकेत मिल रहे हैं। नीतीश सरकार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और अब के रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाले में फिर से मामला दायर करने की अर्जी डाली थी। जो, मंजूर हो गई। उधर, उत्तर प्रदेश में मुलायम राज में हुई पुलिस भर्ती घोटाले के बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव के खिलाफ भी मायावती सरकार कार्रवाई कर रही है। मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में लखनऊ में प्लॉटों के आवंटन में घपले का आरोप है। मुलायम-लालू दोनों इसे राजनीतिक साजिश बता रहे हैं। अब ये चाहे जो भी अच्छा है। कम से कम एक दूसरे के भ्रष्टाचार को उजागर करेंगे तो, खुद भी तो, भ्रष्टाचार करने से डरेंगे। क्योंकि, लोकतंत्र की तमाम खामियों के बाद भी ये अच्छाई तो है ही कि जनता जब चाहे जिसको उल्टा करे दे। तो, जनता जागो। अब तुम्हारा समय आ रहा है। 2009 में फिर से लोकसभा चुनाव होने हैं। कमर कस लो कि भ्रष्टाचार करने वाले और भ्रष्टाचार छिपाने वाले को तो, संसद तक नहीं पहुंचने देंगे। और, नहीं तो फिर मस्त रहिए। सोनिया को सत्ता दे दीजिए। और बोफोर्स को सिर्फ अखबार-टीवी के लिए एक-दो दिन के हल्ले भर की खबर भर बनकर रह जाने दीजिए।

Wednesday, September 26, 2007

नेताओं को शर्म क्यों नहीं आती


भारतीय क्रिकेट की दुनिया की सबसे बड़ी जीत हासिल कर नई टीम इंडिया भारत लौटी तो, मुंबई के लोगों ने टीम का ऐतिहासिक सम्मान किया। जीत जितना ही ऐतिहासिक। विश्व विजेता टीम के हर खिलाड़ी को सम्मान के साथ ही इनाम से भी लाद दिया गया। आखिर ऐसा मौका 24 साल बाद जो देश को मिला था। लेकिन, ऐसे ऐतिहासिक मौके पर भी नेताओं ने देश को शर्मसार कर दिया।
मुंबई एयरपोर्ट से वानखेड़े स्टेडियम पहुंचने तक बीसीसीआई अध्यक्ष शरद पवार सहित कांग्रेस-एनसीपी के नेता विश्व विजयी टीम को इस तरह से घेरे रहे जैसे, धोनी ब्रिगेड महाराष्ट्र सरकार या फिर कांग्रेस-एनसीपी की टीम हो। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के साथ ही पवार के भरोसेमंद महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री ने टीम इंडिया को बंधक सा बना लिया था। अच्छा हुआ दो मंजिल की खुली बस में भारतीय सूरमाओं को आना था नहीं तो, पवार-पाटिल जैसे नेता तो शायद ही असली हीरोज की हमें शक्ल भी देखने देते। टीम के साथ लोगों के उमड़े सैलाब का कांग्रेस-एनसीपी राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश में ऐसे लगे थे कि पार्टी के कार्यकर्ता इस ऐतिहासिक जीत पर भी भारत झंडा लहराने के बजाए अपनी पार्टी का झंडा लहरा रहे थे।

इतने से भी इन बेशर्म नेताओं का पेट नहीं भरा। वानखेड़े स्टेडियम में धोनी के धुरंधर जब सम्मान के लिए मंच पर पहुंचे तो, उन्हें पीछे की सीट पर टरका दिया। सिर्फ कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को ही पहली लाइन में शरद पवार, निरंजन शाह, ललित मोदी, राजीव शुक्ला, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री आर आर पाटिल और राज्य के ही एक दूसरे मंत्री वसंत पुरके के साथ जगह मिल पाई। अब आप ही बताइए वसंत पुरके को आप जानते हैं क्या। शुरू में पहली लाइन में बैठे युवराज सिंह को तो एक बेशर्म नेता के लिए दूसरी लाइन में जाकर बैठना पड़ा। मंच पर पहुंचने के बाद ही खिलाड़ियों को पता चला कि जीत भले ही उनके दमखम से आई हो लेकिन, इसका श्रेय लेने के लिए बेशर्म नेता और बोर्ड के अधिकारी पहले से ही पूरी तैयारी करके बैठे हैं। आखिर, सबको दिखाना जो था कि टीम इंडिया उनकी ही बदौलत ही जीती है।

अब इन बेशर्म बोर्ड अधिकारियों और नेताओं से कोई ये पूछे कि वो उस समय कहां थे जब, भारतीय टीम विश्व कप से बुरी तरह हारकर बाहर हो गई थी। तब बीसीसीआई के इन्हीं अध्यक्ष शरद पवार ने टीम की हार की जांच की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी। और, सारा दोष खिलाड़ियों पर ही डाल दिया था। अब कोई इनसे पूछे कि भाई जब टीम के खराब प्रदर्शन में तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। तो, फिर विश्व कप जीतने वाली टीम के मैदान में अच्छे खेल के तुम साझीदार कैसे हो गए।

इनकी बेशर्मी का आलम ये था कि बड़ी मुश्किल से ही किसी को भी पूरी टीम को एक साथ देखने को मिला होगा। ज्यादातर मौकों पर पवार के साथ धोनी, पाटिल के साथ धोनी, बोर्ड अधिकारियों के साथ धोनी या फिर टीम के अलग-अलग खिलाड़ी अलग-अलग नेताओं-अधिकारियों के साथ दिख रहे थे। कल अखबारों को छापने के लिए भी विश्व विजेता पूरी टीम के दर्शन शायद ही हो पाएं। अब ये बेशर्म नेता-बोर्ड अधिकारी तो समझने से रहे। जरूरत आपके जागने की है। ये सिर्फ बात क्रिकेट की ही नहीं है। हर जगह बेशर्म नेता और ब्यूरोक्रैट आपका हमारा हिस्सा छीनकर अपनी छवि चमकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यहां तक कि अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए हमारा आपका गलत इस्तेमाल भी कर लेते हैं।

धोनी ने प्रेस से बात करते हुए कई बहुत महत्व की बातें कहीं। पहली ये कि देश के छोटे शहरों में असली प्रतिभा है। उनमें ज्यादा विश्वास है, कुछ कर गुजरने का। टीम इंडिया टीम की तरह खेली। इस देश के नेता तो, शायद ही इससे कुछ सीखें। क्योंकि, वो तो सब जानते हैं, इसीलिए कुछ नहीं करते। हमें-आपको देश के छोटे शहरों के लोगों को, देश के जवान लोगों को इससे सबक लेना होगा।
आखिर विश्व कप जीतने वाली टीम के स्वागत में नेताओं के पीछे तिरंगे की जगह अपने नेता के लिए झंडा लेकर चलने वाले लोग भी हमारे-आपके बीच के ही थे। यानी इन नेताओं को ऐसी बेशर्मी करने का मौका भी हमारी-आपकी वजह से ही मिल रहा है। धोनी की यूथ ब्रिगेड ने वो कमाल किया है जो, बड़े-बड़े निजी रिकॉर्ड वाले खिलाड़ियों से सजी टीम इंडिया भी 24 साल से नहीं कर सकी।
आज देश की आधी से ज्यादा आबादी जवान है। इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि शायद आजादी के साठ साल बाद नौजवान देश से इन बेशर्म नेताओं को धक्का मारकर देश के लिए सच में सोचने-करने वाले नेताओं को मजबूत करेगा। अगर नहीं चेते तो, शायद फिर इस इतिहास को दोहराने के लिए या इससे बेहतर करने के लिए अगले पता नहीं कितने सालों का इंतजार करना होगा। और, तब टीम के कप्तान को भी नेताओं-अधिकारियों की वजह से अगली पांत में शायद ही बैठने का मौका मिल सके।

Tuesday, September 25, 2007

डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ कार्रवाई करने से डरती सरकारें

डेरा सच्चा सौदा के आश्रम से एक और साध्वी गायब हो गई। एक और साध्वी इसलिए कि इसके पहले भी बाबा राम रहीम सिंह पर साध्वियों को गायब कराने और उनके साथ बलात्कार तक के आरोप लग चुके हैं। कमाल ये है कि इस मामले में सीबीआई की चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी अब तक राम रहीम के खिलाफ न तो, पंजाब या हरियाणा की राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार कुछ कर पाई है।

आश्रम से गायब हुई साध्वी सुखजीत कौर का गायब होना इसलिए भी ज्यादा महत्व का हो जाता है। क्योंकि, सुखजीत कौर, खट्टा सिंह की भतीजी है। वही खट्टा सिंह जिसने सीबीआई के सामने राम रहीम के खिलाफ ये बयान दिया है राम रहीम सिंह ने उसे और दूसरे 6 लोगों को रंजीत सिंह की हत्या करने का आदेश दिया था। सिरसा में बाबा के आश्रम के बारे में पहले से ही ये खबरें आती रही हैं कि आश्रम के हर तरह के कुकर्म होते हैं। और, बाबा के चोले की वजह राम रहीम का पाप लोगों के सामने नहीं आ पाता।

रंजीत सिंह की हत्या 2002 में हुई थी। कहा जाता है कि राम रहीम सिंह के खिलाफ रंजीत सिंह ने अखबारों में सूचनाएं दी थीं। और, उस समय खट्टा सिंह राम रहीम का निजी वाहन चलाता था। कुछ दिन पहले ही एक टीवी चैनल पर एक वरिष्ठ संवाददाता ने कहा था कि उन्होंने एक महीने तक राम रहीम के सिरसा आश्रम की जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश की। लेकिन, सिरसा के आश्रम में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से सिर्फ वही बाबा का आशीर्वाद पा सकता है जिसे बाबा खुद आशीर्वाद देना चाहें। वैसे इस संवाददाता ने एक साध्वी से बाबा के बलात्कार करने के मामले में काफी पुख्ता जानकारी इकट्ठा की थी। जिसका जवाब चैनल पर आए डेरा सच्चा सौदा के प्रवक्ता आदित्य इंसान ठीक से नहीं दे पाए।

ये आश्चर्य ही है कि इस मामले की जांच करीब दो साल से सीबीआई के पास है। फिर भी अब तक राम रहीम के काले कारनामों की पोल जनता के सामने नहीं खुल पा रही है। बाबा राम रहीम कहने को तो, सिख धर्म की विसंगतियों से ऊबे लोगों को इकट्टा करने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि राम रहीम को लंबी लग्जरी कारों में घूमने, रंगीन-चमकीले कपड़े पहनने और भोग विलास का शौक है। इन्हीं बाबा राम रहीम की वजह से महीने भर से ज्यादा दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) के लोग बंधक बने हुए थे। पूरे देश में आतंक फैल गया था।

राम रहीम गुरु गोविंद सिंह बनना चाहते हैं। उनके जैसे कपड़े पहनकर तस्वीरें छपवाने पर विवाद खड़ा हो गया। लेकिन, खुद को संत बताने वाले राम रहीम को दो राज्यों की जनता के भले के लिए गुरु गोविंद सिंह से भी माफी मांगने में इतना समय लग गया कि राज्य में फिर से अलगाववादी ताकतें सिर उठाने लगीं।
राम रहीम सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो पाने के पीछे सरकारें ढोंगी बाबा के भक्तों की आस्था को न छेड़ने की मजबूरी बताती हैं। लेकिन, मुझे समझ में ये नहीं आता कि जब राम रहीम के खिलाफ बलात्कार और हत्या के मामले सीबीआई के सामने सिद्ध हो चुके हैं। तो, फिर सीबीआई को सरकार सीधे कार्रवाई की इजाजत क्यों नहीं दे रही है। जिन भक्तों की आस्था पर चोट करने से सरकारें डर रही हैं। राम रहीम उन्हीं की इज्जत लूट रहे हैं। जो, भी उनकी खिलाफ गया उसकी हत्या करवा रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये कि, आस्था पर चोट का डर उस सरकार को है। जो, दुनिया भर में पूजे जाने वाले भगवान राम के भी होने का प्रमाण इतिहास में खोजने की कोशिश कर रही है।

हम अब भी गुलाम हैं क्या

आजाद भारत में अंग्रेज इंग्लैंड से आकर विजय दिवस मना रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों के विद्रोह को दबाने में मारे गए अंग्रेज सैनिकों-अफसरों को उनके परिवार के लोग भारत में हर उस जगह जाकर महान बता रहे हैं। जहां उनके बाप-दादाओं ने हमारे स्वाधीनता सेनानियों का खून बहाया था। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत का वो मजाक उड़ा रहे हैं। 1857 के भारतीय सैनिकों को विद्रोह को बेरहमी से कुचलने वाले मेजर जनरल हैवलॉक के पड़पोते को विजय दिवस मनाने की इजाजत हमारी सरकार ने ही दी है।

कमीने हैवलॉक का पड़पोता मार्क एलेन हैवलॉक के साथ हम भारतीयों का मजाक उड़ाने के लिए पूरा अंग्रेज दस्ता साथ आया है। हमें तो पता भी नहीं चलता। वो आकर हम पर 200 साल हुकूमत करने का जश्न मनाकर चले भी जाते। लेकिन, मेरठ में विद्रोह दबाने वाले अंग्रेज अफसरों के बचे निशानों पर विजय दिवस मनाने की खबर मीडिया में आने के बाद इसका विरोध शुरू हुआ तो, लोगों के गुस्से को दबाने के लिए लखनऊ में गोरी चमड़ी वालों को भारतीयों की बगावत को कुचलने वाले अफसरों के रिश्तेदारों को विजय दिवस मनाने की इजाजत वापस ले ली गई।

लेकिन, सवाल यही है कि आखिर केंद्र की यूपीए सरकार क्या इजाजत देने से पहले ये नहीं जानती थी कि वो कैसा अनर्थ कर रही है। पश्चिमी सभ्यता हममें कुछ ऐसी रच बस रही है कि अपने स्वाधीनता सेनानियों की स्मृतियां बहुत कम ही हमारे मन-मस्तिष्क में बची हुई हैं। अब हमारी खुद की चुनी लोकतांत्रिक सरकार ही हमें गुलाम बनाने वालों को देश में बुलाकर विजय दिवस मनाने की इजाजत दे रही है। ये खबर पढ़ने के बाद मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा है कि हम अभी भी गुलाम हैं क्या।

Monday, September 24, 2007

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, बीजेपी में नेता कौन?

कांग्रेस अभी से 2009 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में लग गई है। सारे मीडिया सर्वेक्षण बता रहे हैं कि अगर अभी लोकसभा चुनाव होते हैं तो, इसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को और सबसे ज्यादा नुकसान लेफ्ट को होगा। इसमें बीजेपी की तस्वीर कुछ साफ नहीं दिखती। अंटकी हुई सी है। जैसे बीजेपी में नेता कौन का सवाल अंटका हुआ है। बीजेपी की भोपाल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अटल बिहारी बाजपेयी नहीं गए तो, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर दूसरी पांत के नेता भी अपनी दावेदारी का अपनी तरह से हल्ला करने लगे। तब तक बुढ़ऊ अटल बिहारी ने फिर बोल दिया- हम लौटेंगे।

वैसे आज बीजेपी की तरफ से ये बात रही है कि नेता तो अटल बिहारी ही हैं। लेकिन, आज जो दिन की सबसे बड़ी खबर रही वो थी, राहुल गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाने की। वैसे इस खबर का ऐलान भर होना था। लेकिन, आज ऐलान के बाद ये तय हो गया कि अब इसमें कुछ दबा छिपा नहीं है कि कांग्रेस की चौथी पीढ़ी से कौन देश की अगुवाई करने वाला है। अब राहुल न तो विदेशी मूल के हैं और न ही अभी तक कोई ऐसा कृत्य किया है, जिससे किसी को उंगली उठाने का मौका मिले। वैसे सोनिया ने राहुल को कांग्रेस की सबसे बड़ी समितियों में जगह दिया तो, उससे पहले पूरी तैयारी की।

राहुल के साथ ही पूरी कांग्रेस बदल दी गई है। इस बदलाव में ज्यादातर नाम ऐसे ही हैं जो, एक जगह से दूसरी जगह रखे गए हैं। रखे गए इसलिए कह रहा हूं कि ये सब दस जनपथ के दरबारी लोग हैं। लेकिन, सोनिया ने कई बदलाव बहुत ही समझदारी वाले किए हैं। कम से कम अभी तो यही दिख रहा है।
राहुल के साथ ही प्रिया दत्त और जतिन प्रसाद को कांग्रेस का सचिव बना दिया गया है। कई समितियों में भी राहुल के साथ युवा सांसदों को शामिल किया गया है। वैसे ज्यादातर युवा नेता अपने बाप-दादाओं की विरासत ही संभालते हुए कांग्रेस में आगे बढ़ रहे हैं लेकिन, जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम की हो। वहां ये संदेश भी जाए कि युवाओं को कोई पार्टी तवज्जो दे रही है तो, राजनीतिक फायदा ही देती है। वोटबैंक कितना बढ़ेगा ये तो, चुनाव ही बताएगा।

कांग्रेस में ये बदलाव ऐसे समय में और भी मायने रखता है जब, कांग्रेस के बराबर की अकेली पार्टी अपने बुढ़ाते नेताओं की ही महत्वाकांक्षा की लड़ाई देख रही हो। और, उनके पीछे के नेता सिर्फ ये मौका ताड़ रहे हों कि कैसे आगे वाले को लंगड़ी लगे और हमें मौका मिल जाए। वैसे तो, कई बदलाव कांग्रेस में आज हुआ। लेकिन, राहुल के साथ ही कांग्रेस का एक और समझदारी वाला बदलाव उत्तर प्रदेश में दिखता है। रीता बहुगुणा जोशी को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया है। अध्यक्ष सलमान खुर्शीद, विधानमंडल दल के नेता प्रमोद तिवारी या फिर प्रदेश प्रभारी अशोक गहलोत ऐसे नेता हैं जो, अब चुक से गए हैं। प्रमोद तिवारी का जनाधार उनकी अपनी विधानसभा सीट जीतने से आगे नहीं दिखता।

ऐसे में ब्राह्मण रीता जोशी को प्रदेश अध्यक्ष और सोनिया कैंप के भरोसे के आदमी ठाकुर दिग्विजय सिंह को प्रदेश प्रभारी बनाने से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की रणनीति आसानी से समझी जा सकती है। रीता बहुगुणा जोशी को अब तक कांग्रेस में भले ही कितनी भी तवज्जो मिलती रही हो। उनके अपने शहर इलाहाबाद में कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक बाजपेयी के चलते कोई तवज्जो नहीं मिल पाती थी। विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने से अशोक बाजपेयी बेटे के लिए बसपा से टिकट लेकर आए और खुद भी वहीं चले गए।कांग्रेस को पता है कि बसपा के चुनाव जीतने के बाद सबसे ज्यादा मेहनत उसे उत्तर प्रदेश में ही करनी है। इसीलिए सोनिया ने राहुल को युवा कांग्रेस और छात्र संगठन की भी जिम्मेदारी दे डाली है।
अब कांग्रेस ने तो ये साफ कर दिया कि राहुल गांधी की अगुवाई में वो लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है। सबसे बड़ा लक्ष्य उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा सीटें जीतने की है। अब बीजेपी बताए कि वो किसके सहारे चुनावी नैया पार करेगी। या फिर वो राम भरोसे ही रहेगी।

ये वाला नुस्खा याद रहेगा ना

मैं चक दे इंडिया फिल्म देखने के बाद से ही लगातार ये सोच रहा था कि ये कबीर खान कहां मिलेगा। जो, हमारी क्रिकेट, हॉकी या दूसरी टीमों को टीम की तरह खेलना सिखा सके। बहुत दिमाग लगाने पर भी समझ में नहीं आ रहा था। लेकिन, अब समझ में आया कि हमें कबीर खान की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि, जिस बात के लिए कबीर खान की जरूरत थी वो तो, टीम इंडिया ने सीख लिया है। आज के जमाने की फटाफट क्रिकेट यानी 20-20 में भारत विश्वविजेता हो गया है। फाइनल मैच से पहले तक धोनी की धाकड़ धुरंधरों की टीम कमाल दिखाती रही। लेकिन, हम यही समझते रहे कि शायद तुक्का लग रहा है। इंग्लैंड के मैच में युवराज के छक्कों को छोड़ इस बात की चर्चा कम ही हुई कि टीम इंडिया खेली। सहवाग-गंभीर की सलामी जोड़ी की तेज-ताकतवर पारी लोगों के जेहन से गायब हो गई। दरअसल हम भारतीयों की आदत ही कुछ ऐसी है। हमारे लिए हर जगह एक नेता चाहिए और नेता भी ऐसा जो, अपने पूरे साथियों के बराबर काम खुद करे। यानी हर जीत का सेहरा नेता के ही सिर बंधे। वो, नेता चाहे कभी कपिल बने, गावस्कर बने, सौरभ गांगुली बने, सचिन तेंदुलकर बने या फिर युवराज, सहवाग या टीम इंडिया का कोई और खिलाड़ी। और, चूक यहीं से होनी शुरू होती है।

फिर टीम इंडिया रह ही नहीं जाती है। किसी एक सचिन या सौरभ के आउट होने पर टीवी बंद कर दी जाती है। सहवाग, युवराज के बोल्ड होते ही गालियां मिलने लगती हैं। क्योंकि, टीम इंडिया के लोगों को टीम पर नहीं सिर्फ 1, 2, 3, 4 नंबर के नेताओं पर ही भरोसा होता है। और, यही वजह रही कि वर्ल्ड कप में दुनिया के सबसे मजबूत खिलाड़ियों को ले जाकर भी हम कुछ खास नहीं कर सके। खैर, वो बीती बात है। ये धोनी वाली नई टीम में ना सब नेता हैं। पहला मैच खेलने वाले रोहित शर्मा भी और सिर्फ फाइनल खेलने वाले इरफान पठान के भाई यूसुफ पठान भी। अब हम विश्वचैंपियन हैं। हमने पाकिस्तान को हराया है। उससे पहले हम दुनिया की सबसे प्रोफेशनल टीम ऑस्ट्रेलिया को भी धूल चटा चुके हैं। इंग्लैंड हमारे सामने टिक नहीं पाया। अब जरा याद करके बताइए, इन मैंचों में कौन सा एक खिलाड़ी था जो, हर मैच में चला हो। शायद कोई नहीं। लेकिन, हर मैच में कोई न कोई चला। हर मैच में एक नया नेता था। सब अपने जवान नेता धोनी के साथ थे। फाइनल में जब सहवाग की जगह यूसुफ पठान आए तो, कई लोग इससे भी मायूस थे। लेकिन, अब टीम इंडिया खेल रही थी, इसलिए सहवाग स्टैंड में बैठे भी टीम की ताकत बन रहे थे। देश में हर न्यूज चैनल पूरे भरोसे के साथ कप हमारा है, चक दे कप जैसे नारों के साथ सुबह से ही डटा हुआ था। टीम इंडिया खेल रही थी। कोई हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र के लिए नहीं खेल रहा था। सब टीम इंडिया के लिए खेल रहे थे। किसी का अपना रिकॉर्ड बने न बने। टीम जीत रही थी। सब रिकॉर्ड के साझीदार बन रहे थे। फटाफट क्रिकेट में भी सिर्फ 158 रनों के स्कोर पर भी पूरे देश को जीत का भरोसा था। ऐसा नहीं है कि सिर्फ क्रिकेट में ही देश का भरोसा बढ़ा हो। भारतीय हॉकी टीम ने एशिया कप जीता। सब कबीर खान के नुस्खे का कमाल है। पहले देश के लिए खेलो। फिर टीम के लिए खेलो। फिर जान बचे तो, अपने लिए खेलो और लगाओ छक्के पे छक्के कौन रोकता है। वैसे मैच खत्म होते ही एक और फ्लैश आया कि टीम इंडिया को बीसीसीआई 8 करोड़ रुपए देगा। सिर्फ युवराज को ही एक करोड़ मिलेंगे। भई अब तो पैसे के लिए भी सिर्फ अपने लिए खेलने की जरूरत नहीं। तो, याद रहेगा ना ये टीम इंडिया वाला नुस्खा।

Tuesday, September 11, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! तीसरी कड़ी

भ्रष्टाचार जगह-जगह कितना संगठित तंत्र बन गया है। इसका अंदाजा आज मायावती सरकार के एक फैसले से हुआ। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने 6504 सिपाहियों की भर्ती रद्द कर दी गई है। ये सभी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में हुई थीं। इस भर्ती के दौरान रहे 12 IPS अफसरों को निलंबित कर दिया गया है। इन पर भर्ती में गड़बड़ी का आरोप है। इन अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी। निलंबित 12 आईपीएस अधिकारियों में 1 आईजी, 9 डीआईजी हैं। 2 एसपी रैंक के अधिकारी भी निलंबित हुए हैं। इसके अलावा 18 एएसपी और 40 डीएसपी रैंक के अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

55 केंद्रों में से 14 पर हुई भर्ती की जांच के बाद मायावती सरकार ने ये फैसला लिया है। जांच में पाया गया है कि इन सिपाहियों की भर्ती में कॉपी सेंटर से बाहर लिखी गई। कई कॉपियों में नंबर काटकर फिर से बढ़ाए गए। जांच में ये भी सामने आया है कि इन सिपाहियों ने भर्ती के लिए दो से चार लाख रुपए दिए हैं। यानी उत्तर प्रदेश के लोगों की सुरक्षा के लिए भर्ती होने वाले इन सिपाहियों की शुरुआत ही रिश्वत के जरिए हुई। अब अगर ये दो से चार लाख देकर सिपाही बने हैं तो, जाहिर है इनका सबसे पहला काम यही रहा होगा कि कैसे रिश्वत के तौर पर दिए गए दो से चार लाख रुपए कैसे वापस लिया जाए। अब ये पैसा इमानदारी से तो आने से रहा। साफ है कि इसके लिए उस सिपाही ने अपराधियों को छोड़ा होगा। सही आदमी को पैसा लेकर फंसाया होगा।

इस फैसले से मायावती सरकार पर राजनीति का भी आरोप लग रहा है। क्योंकि, ये सारी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के सत्ता में रहते हुई थीं। लेकिन, ये कोई छिपा तथ्य नहीं है कि सिपाहियों की भर्ती का पूरा जिम्मा मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने खुद संभाल रखा था। अनुमान के मुताबिक, कुल मिलाकर सिपाहियों की भर्ती में कम से कम 500 करोड़ की रिश्वत ली गई है। अब अगर मायावती ने राजनीति के तहत भी एक सही काम किया है तो, इसके लिए मायावती को बधाई दी जानी चाहिए। लेकिन, अब मायावती को ये भी ध्यान रखना होगा कि पांच साल में अगर उन्होंने कोई भ्रष्ट फैसले लिए तो, उसका क्या अंजाम होगा।

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का जो तंत्र इतने सालों तक फला-फूला है। उस पर मायावती अगर लगाम लगा पाती हैं तो, सचमुच मुलायम के शासन में बने नारे उत्तम प्रदेश को सही साबित कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश से ही एक और खबर है कि 15 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ के मामले में 15 पुलिसवालों को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। फर्जी मुठभेड़ एक ऐसा भ्रष्टाचार है जो, भ्रष्टाचार को और बढ़ाने में मदद करता है। और, भ्रष्टाचार करने वाला बहादुरी की तमगा भी पा जाता है।

अलग-अलग जगहों पर भ्रष्टाचार के तरीके भी अलग-अलग हैं। मुंबई में लोगों को जरूरी सुविधाएं देने का जिम्मा रखने वाली संस्था BMC अपनी ही तरह का भ्रष्टाचार कर रही है। मुंबई के वर्ली नाके में 5000 छात्रों की पढ़ाई की जगह पर मॉल बनाने की इजाजत BMC ने दे दी है। यानी शिक्षा के मंदिर की जगह, खरीदने बेचने का काम होगा।

वैसे मुंबई में इससे पहले स्लम रिहैबिलिएशन यानी झुग्गी झोपड़ी वालों को अच्छी जगह बसाने के नाम पर सरकार से मिलकर बिल्डर हजारों करोड़ रुपए का घोटाला कर चुके हैं। सरकार भी ये मानती है, जांच के लिए कमेटी भी बनी है। लेकिन, आज तक कुछ नहीं हुआ। हां, स्लम रिहैबिलिएशन के नाम पर मुंबई की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के दाम पाने वाले बिल्डर करोड़पति बन चुके हैं। और, शहर में इतने सम्मानित हो चुके हैं कि टीवी चैनलों में रियल एस्टेट सेक्टर की हर खुशी-चिंता की बहस में अपने विचार देते दिखते हैं। इन बिल्डरों को आंख मूंदकर बेईमानी की इजाजत देने वाले अलग-अलग सरकारों के मंत्री, विधायक, सांसद भी लग्जरी कारों में घूमते हैं। और, हर बार मीडिया में झुग्गी-झोपड़ी घोटाले का मामला खुलने पर बेशर्मी से कार्रवाई की मांग करते हैं या आश्वासन देते रहते हैं।

टीवी चैनलों का स्टिंग ऑपरेशन भी भ्रष्टाचार का जरिया बन गया है। दिल्ली की स्कूल टीचर के खिलाफ एक नए-नए चैनल के फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की खबर अभी पुरानी भी नहीं पड़ी है। आज एक और फर्जी स्टिंग का मामला सामने आया है। सांसदों को स्टिंग ऑपरेशन में फंसाने की धमकी दे रहे 3 लोगों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

भ्रष्टाचार हममें ऐसा रच बस गया है कि हमें पता ही नहीं चल पाता कि हम क्या-क्या कर गुजर रहे हैं । अलग-अलग किस्म भ्रष्टाचार के आरोपी लालू प्रसाद यादव के साले साधु और सुभाष यादव ने अनोखा भ्रष्टाचार किया है। संसद में और चुनाव आयोग में दर्ज जानकारी के मुताबिक, इन दोनों भाइयों की उम्र में सिर्फ महीने का अंतर है। जय हो। हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

Monday, September 10, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! दूसरी कड़ी

आज ही सुबह मैंने महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा और पंजाब के पूर्व डीजीपी एस एस विर्के के भ्रष्टाचार के किस्से लिखे। शाम को मैं टीवी चैनल देख रहा था तो, एक और राज्य बिहार के डीजीपी के भ्रष्ट आचरण का नमूना सामने आ गया। बिहार के डीजीपी जनता दरबार में फरियादियों से चरण स्पर्श कराकर उन्हें कार्रवाई का आशीर्वाद दे रहे थे। ये भ्रष्टाचार तो ऐसा फैल गया है कि इनके नमूना तो, कहीं से भी कोई भी उठा ले।
हैदराबाद से एक खबर आई कि फ्लाईओवर गिरने से कई लोगों की मौत हो गई। ये फ्लाईओवर अभी बना भी नहीं था। बन रहा था, बन चुका होता तो, न जाने कितने और लोगों को मौत के गाल में ले जाता। फ्लाईओवर कोई छोटा-मोटा ठेकेदार नहीं बना रहा था। ऐसे कामों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली बड़ी कंपनी गैमन इंडिया के पास इसका काम था।

हैदराबाद से ताजा खबर थी, इसलिए पूरे देश को दिख गया। लेकिन, मैं मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूने रोज ही देख लेता हूं। मुबंई से उसके पड़ोसी शहर ठाणे जाने के रास्ते में तो, मुझे भ्रष्टाचार के नमूने ऐसे मिल जाते हैं, जैसे मधुमक्खी के किसी छत्ते से शहद टपक रही हो। मुंबई की सड़कों को दुरुस्त करने को लेकर मुंबई हाईकोर्ट BMC, MMRDA को बुरी तरह से लताड़ चुका है। बावजूद इसके अब तक इन बेशर्म संस्थाओं का भ्रष्टाचार से मोह नहीं छूट पा रहा है।

ठाणे की घोड़बंदर रोड पिछले एक साल से लगातार बन रही है। हाईकोर्ट की कई बार डांट खाने के बाद इसके एक बड़े हिस्से का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। लेकिन, मुंबई से ठाणे जाते समय घोड़बंदर के लिए मुड़ते ही किसी भी गाड़ी में बैठे व्यक्ति की सारी हडि्डयां एक दूसरे के साथ मिलकर राग भैरवी गाने लगती हैं। मुंबई में सिर्फ गड्ढों में ही हर साल लाखों-करोड़ो रुपए चले जाते हैं लेकिन, BMC, MMRDA एक ऐसी सड़क नहीं बना पा रहे हैं जिसमें बनने के कुछ ही दिन बाद गड्ढे न हो जाएं। BMC का सालाना बजट 7000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है, पता नहीं इसमें से कितना गड्ढों में चला जाता है। मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूनों की ऐसी लंबी लिस्ट है।

भ्रष्टाचार है, देश के लोगों को इसमें मजा आ रहा है। हर राज्य में सड़कें बनाने की जिम्मा होता है, लोक निर्माण विभाग यानी PWD के पास। इस विभाग में काम करने वाले छोटे कर्मचारी से इंजीनियर, ठेकेदार सब अपने को खुशकिस्मत मानते हैं। यहां तक कि राज्यों में लोक निर्माण विभाग के मंत्री का पद भी राज्य के सबसे रुतबेदार विधायक को ही मिल पाता है। आपको लग रहा होगा कि जब पूरे राज्य को जोड़ने, सड़क-पुल बनाने का काम इसी विभाग के पास है तो, सबसे जिम्मेदार विधायक को ही ये काम मिलना ही चाहिए।
लेकिन, दरअसल किस्सा कुछ और ही होता है। कहने को तो ये विभाग लोक निर्माण के लिए है। लेकिन, ये विभाग मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार से राज्य के मुख्यमंत्री तक के निजी निर्माण में मददगार होता है।

मैं 2001 के महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में रिपोर्टिंग कर रहा था। इस दौरान मुझे जो जानकारी मिली वो ये कि इस कुंभ मेले में अपनी ड्यूटी लगवाने के लिए इंजीनियरों ने लाखों रुपए मंत्रीजी को चढ़ावे में दिए थे। महाकुंभ में करोड़ो रुपए का काम बिना हुए ही भुगतान कर दिया गया। इसका तरीका भी आसान था, ठेकेदार दो लाख के भुगतान के लिए एडवांस में नकद एक लाख पचीस हजार रुपए चढ़ावे में देता था। वो, मंत्री से लेकर बाबू तक बंट जाता था। बची पचहत्तर हजार की रकम ठेकेदार को बिना कुछ किए फायदे के तौर पर मिल जाती थी।

लोक निर्माण विभाग का मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। हर विभाग में ऐसा ही होता है। कहा न भ्रष्टाचार मजा देने लगा है। हर विभाग में भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी को तेज-तर्रार लोगों में गिना जाता है। जो, भ्रष्टाचार में मददगार न हो उसे, कोई अपने साथ नहीं रखना-देखना चाहता। ऐसे लोग बेकार माने जाते हैं। पैसे लेकर काम करने वाला -मंत्री, सांसद, विधायक, सभासद, अधिकारी, दरोगा, सिपाही- सबको पसंद आता है। पैसे लेकर काम कराने वाला दलाल भी इज्जत की नजर से देखा जाता है। हम तो अब रिश्ते भी यही देखकर करते हैं कि भ्रष्टाचार में हमारा रिश्तेदार कितना आगे है। ये बात पूरी हनक के साथ दूसरों को बताते भी हैं। तो, भ्रष्ट समाज के सम्मान में जोर से बोलो- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में NSUI के चारों प्रत्याशी जीत गए हैं। इन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का भरोसा मिल गया है। अगले साल भर तक ये चारों दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के नेता रहेंगे। सीधे-सीधे देखने में इनका नेता बनना एक सामान्य प्रक्रिया लगती है। लेकिन, ये इतनी सामान्य प्रक्रिया है नहीं, जितनी दिख रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष बन गए हैं NSUI के देवराज तेहलान। देवराज तेहलान ने चुनाव के एक दिन पहले एक निजी चैनल के खुफिया कैमरे पर बोला था कि लाखों रुपए खर्च कर उन्हें टिकट मिला है और वो चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लाखों रुपए खर्च कर सकते हैं। छात्रों को शराब बांट सकते हैं और जो, भी जरूरी होगा वो करेंगे।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने और कांग्रेस के आलाकमान ने तेहलान का ये इकबालिया बयान सुना होगा। लेकिन, न तो कांग्रेस ने तेहलान के खिलाफ कुछ किया और न ही छात्रों ने तेहलान को उपाध्यक्ष बनने से रोका। इसके बाद तो यही लगता है कि अब भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं रह गया है, हमें भ्रष्ट होने में और भ्रष्टाचार करने में मजा आने लगा है।

जिस दिन टीवी चैनल पर तेहलान लाखों रुपए छात्रसंघ चुनाव पर खर्च करने का ऐलान कर रहे थे। उसी दिन एक और खबर थी। हरियाणा में कांग्रेस के एक सांसद सरकारी गेस्ट हाउस में दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़े गए। पकड़े जाने के बाद भी न तो कांग्रेस ने और न ही पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की। और, कांग्रेसी सांसद महोदय की बेशर्मी ये कि वो अपने साथ पकड़ी गई महिलाओं में से एक को अपनी पुत्रवधू बता रहे थे। लेकिन, चैनलों पर जिस अवस्था में थे, उसे देखकर कोई भी साफ समझ सकता है कि इस तरह से कोई गेस्ट हाउस में अपनी बहू के साथ तो नहीं रह सकता है। भ्रष्टाचार सिर्फ नेता ही नहीं कर रहे हैं।

दूसरों के भ्रष्टाचार को उजागर करने का दावा करने वाले एक टीवी चैनल ने भी हद कर दी। नए-नए खुले चैनल लाइव इंडिया के एक टीवी जर्नलिस्ट प्रकाश सिंह ने अपनी एक जानने वाली नई नवेली पत्रकार रश्मि सिंह के साथ मिलकर दिल्ली की एक स्कूल टीचर के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन कर डाला। इस स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया था कि दिल्ली के स्कूल की एक टीचर उमा खुराना लड़कियों को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करती थी। और, बड़े लोगों को लड़कियों की सप्लाई करती थी। इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद दिल्ली में जमकर हंगामा हुआ था। लेकिन, बाद में पुलिस जांच में ये बात सामने आई कि सब रश्मि और प्रकाश की मिलीभगत थी। स्टिंग ऑपरेशन झूठा था। अब लाइव इंडिया बेशर्मी से कह रहा है कि हमारे पास कई लड़कियों ने उमा के खिलाफ शिकायत की थी। लेकिन, कोई भी लड़की कैमरे पर नहीं आना चाहती थी। इसलिए हमें इस तरह का ऑपरेशन करना पड़ा। लेकिन, कोई इन लाइव इंडिया से पूछे कि अगर लोगों को सच बताने के लिए सच खोजने का साहस और धैर्य नहीं था तो, क्यों आ गए पत्रकार बनने। बस जल्दी से टीआरपी बढ़ाने के लिए। हालांकि, अभी तक ये साफ नहीं हो पाया है कि उमा गलत धंधे में लगी थी या नहीं। लेकिन, महीने भर के बच्चा टीवी चैनल की ये हरकत आजकल के पागलपन वाले टीवी जर्नलिज्म की इंतहा दिखाती
भ्रष्टाचार में हमें कुछ ऐसे मजा आने लगा है कि हर रोज ऐसी खबर देखने को मिल जाती है। पंजाब के एक पूर्व डीजीपी एस एस विर्के को भ्रष्टाचार के एक मामले में गिरफ्तार किया गया है। विर्के पर आरोप है कि उन्होंने 100 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति जुटाई है। अब ये बिना भ्रष्ट हुए तो, जुटाई नहीं जा सकती।
वैसे ये तो, पूर्व डीजीपी थे। अभी कुछ महीने पहले ऐसा ही आरोप महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा के ऊपर भी लगा था। एक टीवी चैनल की इस खोजबीन के बाद महाराष्ट्र विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। गृहमंत्री आर आर पाटिल ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन भी दिया। लेकिन, पसरीचा अभी भी महाराष्ट्र के डीजीपी हैं। सरकार ने एक कमेटी भी बना दी है।

कई मामलों में भ्रष्टाचार करने वालों को सजा भी हो रही है। लेकिन, ज्यादातर मामलों में ऐसी सजा कोर्ट के दखल के बाद ही मिल पाती है। लेकिन, हमें तो, भ्रष्टाचार में मजा आने लगा है। हम भ्रष्टाचार में मददगार बन रहे हैं। पहला मौका मिलते ही भ्रष्टाचार कर रहे हैं। भ्रष्टाचार का ये चक्र कुछ ऐसा घूम चुका है कि अब इन सबके बाद मैं तो इतना ही कहूंगा कि हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

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