Sunday, January 27, 2008

ब्लॉगवाणी में सेटिंग से काम होता है

ब्लॉग एग्रीगेटर्स का गुणा गणित समझना मेरे लिए दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है। ब्लॉग लिखते हुए मुझे करीब दस महीने हो रहे हैं। और, मैंने ऊट-पटांग-गंभीर से लेकर हर तरह के विषय पर काफी कुछ लिख मारा है। लेकिन, मेरी समझ में नहीं आता कि आखिर किसी ब्लॉग एग्रीगेटर के पसंद का पैमाना क्या होता है। क्योंकि, एकाध वाकयों को छोड़ दें तो, मेरा लिखा कभी एग्रीगेटर की पसंद में शामिल नहीं हो पाता।

मैं बात कर रहा हूं ब्लॉगवाणी में आज की पसंद की। जिसमें एक बार लेख आ जाए तो, ज्यादा से ज्यादा पाठकों के पसंद होने की उसकी गारंटी तो ऐसे ही हो जाती है। क्योंकि, कम से कम 24 घंटे तक तो आज की पसंद का लेख सबसे ऊपर दिख ही रहा होता है। इसका क्या क्राइटेरिया होता है ये मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं। ये स्वचालित है या फिर इसमें कुछ चिट्ठे तय हैं कि उन चिट्ठों पर कुछ भी लिखा गया तो, वो आज की पसंद में शामिल हो ही जाएगा।

एक और जो बात मैंने आज की पसंद में देखी है कि ज्यादातर ऐसे चिट्ठे आज की पसंद में जरूर होते हैं जिसमें एक-दूसरे की लड़ाई-झगड़े की प्रवृत्ति को ललकारने की कुछ क्षमता हो। यानी एक चिट्ठे ने किसी दूसरे चिट्ठे को निशाना बनाकर या फिर एक चिट्ठाकार ने किसी दूसरे चिट्ठाकार को निशाना बनाकर कुछ लिखा तो, वो जरूर ब्लॉगवाणी की आज की पसंद में शामिल हो जाएगा। उसके बाद अगर उस भड़काऊ लेखन पर प्रतिउत्तर आता रहा तो, वो टीवी के सीरियल की तरह लगातार ब्लॉगवाणी की आज की पसंद बन जाएगा।

मेरा ये आंकलन कितना सही है, दूसरे चिट्ठाकारों से अनुरोध है कि वो भी इसे जरूर बताएं कि वो क्या सोचते हैं। जहां तक मुझे याद आ रहा है विनोद दुआ की समस्या क्या है के अलावा एक और लेख ही मेरे चिट्ठे बतंगड़ से आज तक ब्लॉगवाणी की आज की पसंद बन सका। एक लेख पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल कितने एक से दिखने लगे हैं बतंगड़ के जरिए तो ब्लॉगवाणी की आज की पसंद नहीं बन सका। लेकिन, जब वही लेख दूसरे ब्लॉग पर छपा तो, आज की पसंद बन गया। हो सकता है ये महज इत्तफाक हो लेकिन, मेरे लेख आज की पसंद में शामिल होने का महज इत्तफाक फिर क्यों नहीं बन पाता।

अगर गुणवत्ता या कोई स्वचालित मशीनी प्रक्रिया है इस ब्लॉगवाणी के आज की पसंद बनने का तो, भी कैसे हो सकता है कि मेरे लेख भूल-भटके भी इसमें शामिल न हो पाएं। अब इसके अलावा तो एक ही क्राइटेरिया बचता है वो है जुगाड़ या सेटिंग। क्योंकि, इसी मामले में मैं कमजोर हूं। तो, भइया ब्लॉगवाणी वालों बता दो कि मेरी सेटिंग कैसे हो सकती है। क्योंकि, ये तो हर लिखने-पढ़ने वाला चाहता है उसका लिखा-पढ़ा ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े-सुनें और इस मोह से मैं भी मुक्त नहीं हूं।

Saturday, January 26, 2008

वैलेंटाइन डे से भी गया गुजरा हो गया है गणतंत्र दिवस

सचमुच ये तुलना करने में मुझे शर्म आ रही है लेकिन, आज सुबह से रात तक मेरे पास कोई भी गणतंत्र के संदेश नहीं आया। वैसे हैपी न्यू ईयर या यहां तक कि वैलेंटाइन डे के संदेश भी मोबाइल के इनबॉक्स में भर जाते हैं। लेकिन, आज किसी ने भी मुझे गणतंत्र दिवस का संदेश नहीं भेजा। देर शाम दो संदेश आए जो, मैं नीचे लिख रहा हूं, इसके बाद मैंने ऑर्कुट की अपनी कम्युनिटी में और मेल पर और संदेश पर ढेर सारे लोगों को गणंतत्र की बधाई भेजी। और, 58 साल के गणतंत्र की मजबूती में शामिल सभी भारतीयों को सलाम और स्वाधीनता दिलाने वाले अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देता हूं।


मेरे पास जो संदेश मोबाइल पर आया
Azaad bharat ke NALAYAK javanon agar aaj Valentine day hota to inbox full hota. Chalo jaldi se mobile uthao aur sabko wish karo. HAPPY REPUBLIC DAY.

ये संदेश ज्यादातर आपस में एक दूसरे को दोस्त भेजकर मजा लेते हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि देश में गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस, शहीद कुछ इसी अंदाज में याद किए जा रहे हैं। भारतीय नववर्ष (हिंदू नववर्ष कहकर खारिज करने वाले कृपया बेवजह कुतर्क न रचें) तो शायद ही किसी को याद रहता होगा।

मैं उन लोगों में से हूं जिन्हें किसी भी खुश होने वाले दिन पर बेवजह का ऐतराज नहीं होता चाहे वो अंग्रेजों का दिया हुआ नया साल हो या फिर अंग्रेजों का दिया हुआ वैलेंटाइन डे, मदर्स डे, फादर्स डे या ऐसे ही एक दिन अपने दिल के करीब के रिश्तों को प्यार देने वाले दिनों की बात हो। लेकिन, मैं आज तक ये समझ नहीं पाया कि एक दिन किसी को किसी से प्यार कैसे हो सकता है। ये एक दिन वाले प्यार के रिश्ते उस समाज में तो समझ में आते हैं जहां 364 दिन शायद सारे रिश्तों को समय ही नहीं दिया जा सकता।

क्या हम ऐसे हो गए हैं कि हमें हमारे रिश्तों, देश की आजादी और गणतंत्र दिवस को भी याद करने का समय नहीं मिल पा रहा। इस विषय पर बहुत लिखने के लिए ही है लेकिन, संदेश इतने से ही पूरा हो रहा है इसलिए बात खत्म कर रहा हूं। एक बार फिर से हमको आजादी की सांस देने के लिए अपनी जान गंवाने वाले सभी शहीदों को श्रद्धांजलि। और, 59 साल का गणतंत्र और मजबूत होगा इस आशा के साथ सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, January 24, 2008

उत्तर प्रदेश में फिर शुरू होने वाला है खूनी खेल


उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े इनामी माफिया को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। भुवनेश्वर के बिग बाजार के बाहर से धरे गए बृजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच लाख रुपए का इनाम रखा था। बृजेश बराबर का ही इनामी ददुआ डाकू था जिसे मायावती की सरकार बनने के बाद पुलिस ने बांदा के जंगलों में मार गिराया। लेकिन, करीब दो दशकों से सारी मशक्कत के बाद भी उत्तर प्रदेश पुलिस को बृजेश सिंह का सुराग तक नहीं मिल सका। अब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बृजेश सिंह को खोज निकाला है। गायब रहकर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में बृजेश सिंह का आतंक इतना बड़ा था कि उस पूरे इलाके में रेलवे और दूसरे सरकारी ठेकों से लेकर कोयले तक की दलाली में बृजेश सिंह का सिक्का चलता था।

वैसे बृजेश सिंह के गायब होने की एक बड़ी वजह ये भी थी कि बृजेश पूर्वी उत्तर प्रदेश में यहां के दूसरे माफिया और विधायक मुख्तार अंसारी के हाथों बुरी तरह पिट गया था। यही वजह थी कि बृजेश ने राजनीतिक शरण के रास्ते तलाशने शुरू कर दिए थे। अपने भाई चुलबुल सिंह को बीजेपी में घुसाया। चुलबुल बनारस जिला पंचायत के अध्यक्ष बन गए। फिर भतीजा बसपा के टिकट पर पहले ब्लॉक प्रमुख और अब विधायक बन चुका है।

बृजेश गिरोह के ज्यादातर बड़े अपराधियों की या तो हत्या हो चुकी है। या फिर वो चुपचाप राजनीतिकी छतरी तानकर किसी तरह अपना जीवन चला रहे हैं। बृजेश सिंह के खासमखास अवधेश राय की हत्या होने के बाद उनके छोटे भाई अजय राय विधायक हो गए और मुख्तार से लड़ाई लड़ने के बजाए सिर्फ अपनी इज्जत बचाने में ही लगे रहे। कृष्णानंद राय जैसे लोग भी थे जो, बीजेपी से विधायक चुने जाते रहे और बृजेश गिरोह की अघोषित रूप से कमान संभाले हुए थे। लेकिन, आरोप है कि मुख्तार अंसारी ने ही कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। मुख्तार के गृह जिले गाजीपुर में ही कृष्णानंद राय का चुनौती बने रहना मुख्तार को कैसे बर्दाश्त हो सकता था। बनारस में हुई अवधेश राय की हत्या में भी मुख्तार पर आरोप है।

आमतौर पर लोगों को बृजेश और मुख्तार की दुश्मनी ही लोगों को याद है। लेकिन, दरअसल बृजेश के अपराधी बनने की शुरुआत आजमगढ़ की बाजार में बृजेश के पिता की हत्या होने से हुई थी। जब दूसरे दबंग ठाकुरों ने बृजेश के पिता को गोली मारकर और चाकुओं से छलनी कर हत्या कर दी थी। उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के दो बदमाशों हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की दुश्मनी खुलेआम चलती थी। हरिशंकर तिवारी ब्राह्मण और वीरेंद्र शाही ठाकुर बदमाशों के सरगना जैसे काम करते थे। उसी में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी का उदय हुआ।

चढ़ी रंगबाजी के समय बृजेश सिंह ने बहुत तेजी से पूरे उत्तर प्रदेश में अपना जाल फैला लिया। बिहार में तब वीरेंद्र सिंह टाटा की अच्छी गुंडागर्दी चलती थी। बृजेश सिंह और वीरेंद्र टाटा ने अच्छा कॉकस बना लिया था। जिससे चंदौसी की कोयला खदानों से लेकर बोकारो और जमशेदपुर तक इन लोगों की तूती बोलने लगी। कोयले की कमाई के अलावा रेलवे, पीडब्ल्यूडी और दूसरे सरकारी विभागों की ठेकेदारी इन लोगों की कमाई का मुख्य जरिया था। बृजेश सिंह का नाम मुंबई के जेजे अस्पताल गोलीकांड में भी आया था। लेकिन, इन सबके बावजूद बृजेश ज्यादातर अंडरग्राउंड ही रहता था। वो, लोगों के सामने नहीं आता था। उसकी यही मजबूती धीरे-धीरे कमजोरी बनती गई।

मुख्तार जेल में होता या फिर बाहर जबकि, बृजेश अंडरग्राउंड रहकर ही गिरोह चला रहा था। इस बीच मुख्तार और बृजेश गिरोह के बीच कई बार आमने-सामने गोलियां चलीं। एक बार तो बृजेश सिंह ने गिरोह के साथ गाजीपुर जेल में बंद मुख्तार अंसारी पर गोलियां चलाईं। लेकिन, धीरे-धीरे मुख्तार अंसारी का पलड़ा भारी होता गया। बनारस में अवधेश राय की हत्या के बाद बृजेश सिंह इस क्षेत्र में काफी कमजोर हो गया। इसी बीच हरिशंकर तिवारी के ही तैयार किए लड़के गोरखपुर में उन्हें चुनौती देना शुरू कर चुके थे। 1995 आते-आते गोरखपुर में शिव प्रकाश शुक्ला, आनंद पांडे और राजन तिवारी का गिरोह हरिशंकर तिवारी को उन्हीं के गढ़ में चुनौती देने लगा।

हरिशंकर तिवारी से सीखने वाले ये लड़के इतने मनबढ़ थे कि वो, अकेले बादशाह बनना चाहते थे। उनके निशाने हर वो बदमाश था जिसकी हत्या करने से उनका कद बढ़ जाता। पहले इन मनबढ़ लड़कों के शिकार गोरखपुर के छोटे-मोटे बदमाश हुए। फिर कई बार की कोशिश के बाद इन लोगों ने वीरेंद्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी। शिव प्रकाश शुक्ला हरिशंकर तिवारी को मारकर उन्हीं की विधानसभा चिल्लूपार से चुनाव लड़ने की तैयारी में था। लेकिन, आनंद पांडे की वजह से शिव प्रकाश की य हसरत परवान नहीं चढ़ की।

लेकिन, इन लड़कों के मुंह खून लग चुका था। हर एक हत्या के बाद इनके पास पैसा और बदमाशों वाली इज्जत बढ़ती जा रही थी। बिहार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हॉस्पिटल में हत्या, इलाहाबाद में जवाहर पंडित की दिनदहाड़े व्यस्त बाजार सिविल लाइंस में हत्या, बनारस से मिर्जापुर के रास्ते में वीरेंद्र टाटा की हत्या, लखनऊ में गोरखपुरे के एक नेता पर होटल में घुसकर चलाई गई गोलिया और दूसरी कई हत्याएं एक के बाद एक हुईं और सबमें शिव प्रकाश शुक्ला, आनंद पांडे और राजन तिवारी गिरोह का ही नाम आया। कहा जाता है कि इन लोगों ने लखनऊ में मुख्तार अंसारी के काफिले का भी पीछा किया था लेकिन, मुख्तार भाग निकलने में सफल रहा। कहा ये भी जाता है कि प्रतापगढ़ के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह से ये वसूली करने में कामयाब भी हो गए थे।

इनका दिमाग खराब हुआ तो प्रदेश के सारे माफिया इन नए लड़कों के गिरोह के दुश्मन बन गए। और, पुलिस को इनके छिपने के ठिकाने के बारे में जानकारी देनी शुरू कर दी। इसी बीच ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या में साक्षी महाराज और विजय सिंह का नाम आया तो, इस गिरोह ने साक्षी महाराज को निशाना बनाने की कोशिश की। लेकिन, इससे पहले कि वो सफल होते, साक्षी महाराज ने अपनी और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जान को शिव प्रकाश शुक्ला से खतरा बताकर पुलिस मशीनरी की इज्जत दांव पर लगा दी। फिर क्या था पहले एक-एक कर इस गिरोह के शूटर लड़के मारे गए। फिर आनंद पांडे और फिर शिव प्रकाश शुक्ला को पुलिस ने मार गिराया।

कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते बड़े पैमाने पर बदमाशों के पुलिस एनकाउंटर के बाद कई सालों तक उत्तर प्रदेश में संगठित अपराधी छिपते-छिपाते ही अपराध कर रहे थे। लेकिन, फिर धीरे-धीरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में दूसरे बदमाशों का गिरोह तैयार हो गया। गाजीपुर में मुख्तार अंसारी, इलाहाबाद में अतीक अहमद और प्रतापगढ़ में रघुराज प्रताप सिंह अपनी जड़ें मजबूत कर चुके थे। मुलायम सिंह यादव के शासन में इन तीनों की ही तूती बोलती थी। फिर भी ये अपने क्षेत्रों से बाहर बहुत दखल नहीं देते थे। इस वजह से उत्तर प्रदेश में आम लोग दहशत में नहीं थे। हां, जो धंधे या रसूख (गुंडई) के रास्ते में आया वो निपट गया।

अब बृजेश सिंह पकड़ा जा चुका है। बृजेश के पहले ही राजनीतिक आत्मसमर्पण की बातें हो रही थीं। और, कहा भी जा रहा है कि बीजेपी और बीएसपी के जरिए वो खुद को बचाए रखने में कामयाब हो पा रहा था। लेकिन, अब बृजेश सबके सामने होगा। कानून की पेचीदगियों के लिहाज से बृजेश को जमानत भी मिल सकती है। या फिर वो लंबे समय लिए जेल में होगा। साफ है जिस बृजेश का किसी ने जब चेहरा नहीं देखा था और उसकी आतंक से कमाई चल रही थी तो, उसके सामने आने के बाद की स्थिति का अंदाजा साफ लगाया जा सकता है। बृजेश बहुत कमजोर हो चुका है और सपा की सरकार न होने से मुख्तार अंसारी को भी प्रशासन से बहुत मदद नहीं मिलने वाली है। लेकिन, दोनों के बीच एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के अंडरग्राउंड साम्राज्य पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो सकती है।

Wednesday, January 23, 2008

नेताजी को याद तक करने से डरती है कांग्रेसी सरकार


नेताजी की आत्मा इस देश की सरकारों पर पता नहीं दुखी हो रही होगी, रो रही होगी या हंस रही होगी। जिस देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने सबकुछ किया। उसी देश में आजादी के बाद उनको याद तक करने से सरकारें डर रही हैं। पता नहीं कौन सी वजह है जो, सरकारों को नेताजी को याद तक करने से डराती रहती है। वैसे तो, कांग्रेस की सरकार गांधी-नेहरू परिवार के अलावा किसी को देश के लोगों को याद नहीं कराना चाहती। लेकिन, नेताजी के मामले में कांग्रेस को ये भी लगता है कि नेताजी को जितने ज्यादा लोग देश में याद करेंगे, कांग्रेस के आजादी के पहले की उनकी भूमिका के गुणगान में उतनी कमी हो जाएगी।

आज नेताजी की 111वीं जयंती है। लेकिन, देश भर में कहीं इस सरकार ने छोटा सा कार्यक्रम भी नेताजी की याद में नहीं किया। RTI यानी सूचना के अधिकार के तहत सरकार को ये जानकारी देनी पड़ी है कि इस सरकार ने नेताजी पर एक छोटा सा भी विज्ञापन नहीं दिया। जबकि, ऐरे-गैरे नत्थू खैरे टाइप के चिरकुट नेताओं की गंदी सी फोटो लगे विज्ञापनों पर सिर्फ साल भर में सरकार ने 209 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

और, ये भी तब जब बंगाली प्रियरंजन दासमुंशी के पास ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय है जो, सरकारी विज्ञापन तय करता है। सरकार अब तक ये भी नहीं बता रही है कि नेताजी की मृत्यु की जांच करने वाले आयोग ने क्या रिपोर्ट सौंपी है। सरकार की बेशर्मी ये है कि आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सरकार देश के पहले कमांडर इन चीफ का खिताब देने को तैयार नहीं है। जबकि, ये नेताजी की आजाद हिंद फौज ही थी जिसने देश की आजादी से तीन दिन पहले भारत का झंडा लहरा दिया था।

खैर, देश नेताजी को पूरे सम्मान के साथ याद कर रहा है। क्योंकि, इन कांग्रेसियों का हाल तो ये है कि ये सोनिया और राहुल-प्रियंका को तो सम्मान दे सकते हैं लेकिन, सुभाष चंद्र बोस को याद करने से भी डरते हैं। ये बेशर्म ये तक भूल जाते हैं कि नेताजी भी आजादी के पहले की कांग्रेस के अध्यक्ष तक रह चुके थे। लेकिन, शायद महात्मा गांधी के विरोध की वजह से कोई कांग्रेसी सुभाष को याद करके महात्मा गांधी का विरोधी नहीं कहलाना चाहता।

Saturday, January 19, 2008

भरोसा हो गया कि बजरंगबली सच थे

साइमंड्स जब आज खेलने आया तो, मेरे ऑफिस में किसी ने कहा कि आज तो, साइमंड्स बहुत ठोंकेगा। मैंने कहा- आज ठोंकेगा नहीं, तुरंत ठुक जाएगा। और, थोड़ी ही देर में डरावनी शक्ल वाला साइमंड्स
फिर से पैवेलियन में बैठा ऑस्ट्रेलियाई टीम को हारते हुए देखने वालों में शामिल हो गया था। साफ है ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी गालियां देकर, विपक्षी टीम का मनोबल गिराकर मैच जीतते आ रहे थे। जब भारत की देसी गालियां पड़ने लगीं तो, वो राइट टाइम हो गए। और, गांगुली ने एक बार कप्तान रहते हुए कहा था कि ऑस्ट्रेलिया को हराने का बस एक तरीका है उनके मनोबल पर चोट करो। अपना भरोसा मत खोओ। और, ये फॉर्मूला काम भी कर रहा है।

खैर, अहंकार कंगारुओं के सबसे मजबूत मैदान पर भारत जीत गया। 20-20 का विश्वविजेता बनने पर ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग ने कहा था- 20-20 और इंटरनेशनल क्रिकेट में फर्क है। अब 20-20 के विश्वविजेता 50-50 छोड़िए, पांच दिन के मैच में कंगारुओं को बुरी तरह हरा चुके हैं। ये जीत इतनी बड़ी हो गई है कि भारत के क्रिकेट प्रशंसक भूल से गए हैं कि ऑस्ट्रेलिया तीन में से दो टेस्ट पहले ही जीतकर सीरीज में आगे चल रहा है। अब या तो, ऑस्ट्रेलिया जीतेगा या भारत बराबीर कर पाएगा। भारत सीरीज नहीं जीत सकता।

लेकिन, इस जीत के ऐतिहासिक हो जाने की कई वजहें हैं। पहली दो टेस्ट मैचों में दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसकों को टीवी पर अंपायरों की जबरदस्त बेईमानी दिखी।

दूसरी एक जैसे ही व्यवहार के लिए हरभजन सिंह पर मैच का प्रतिबंध लगा दिया गया। जबकि, ब्रैड हॉग और एंड्र्यू साइमंड्स मजे ले रहे थे।

तीसरी कप्तान रिकी पोंटिंग से अंपायर के पूछने पर पोंटिंग की आउट बताने वाली उंगली को भद्रजनों के खेल क्रिकेट की शालीन आत्मा में उंगली की तरह देखा गया।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण- ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने पहले भारतीय खिलाड़ियों को लतियाया। फिर मामला इतना बढ़ा कि वो देश की इज्जत पर हमला हो गया। यहां तक कि हर भारतीय खुद को लतियाया सा महसूस करने लगा। बीसीसीआई कसमसा रही थी। पवार को आईसीसी चेयरमैन की कुर्सी खसकती दिख रही थी लेकिन, देश में जब खुद के पटरा हो जाने की नौबत दिखी तो, पवार के साथ उनके मिठाई सचिव राजीव शुक्ला भी कड़वी भाषा में बोले- हरभजन मैच में नहीं खेलेंगे तो, मैच नहीं।

वैसे सचमुच ये भारत की अब तक की सबसे बड़ी टेस्ट जीत में शामिल होगा। भारत ऑस्ट्रेलिया को पर्थ के मैदान पर हराने वाली पहली एशियाई टीम बन गई है। दूसरी टीमें यहां मैच ड्रॉ तक नहीं कर पाईं थीं। हरभजन, साइमंड्स विवाद को सुलझाने के लिए हुई कुंबले और पोंटिंग की मुलाकात के बाद पोंटिंग का बयान था- अब हमारा पूरा ध्यान लगातार 17वीं टेस्ट जीत दर्ज करने पर है। बदमिजाज पोंटिंग और ऑस्ट्रेलिया का वो सपना टूट गया। और, शायद ये अतिशयोक्ति जैसा लगेगा लेकिन, ये जीत 83 के विश्वकप में वेस्टइंडीज को हराने वाली भारतीय टीम की जीत जैसा है। यानी ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत के दिन अब लदते दिख रहे हैं।

हम जीत गए, ऐतिहासिक जीत मिली। लेकिन, इससे एक जो सबसे बड़ी बात साबित हुई है कि हम बिना लतियाए गए जागते नहीं है। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की बद्तमीजी जब हद पार कर गई तो, पहले सरदार हरभजन जागा फिर पूरी टीम जागी। हरभजन पर साइमंड्स को बंदर कहने का आरोप लगा। लेकिन, मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि साइमंड्स कभी बिग मंकी नहीं हो सकता। बिगेस्ट मंकी तो हमारे बजरंगबली थे जिनको जब उनका बल याद दिलाया गया तो, वो समुद्र पार कर गए। पूरा पहाड़ उठा लाए। भारतीय क्रिकेट टीम के बजरंगी के वंशजों को उनका बल याद आया तो, वो कंगारुओं को उलटकर उनके हाथ से मैच जीत लाए।

अब इसमें मुझे किसी रिसर्च की गुंजाइश नहीं दिखती कि बजरंगबली थे या नहीं। ये साबित हो गया है कि बजरंगबली थे। और, मैं बजरंगी से यही मनाउंगा कि हर कोई ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह भारत और भारतीयों की बेइज्जती करे, लतियाए। उसके बाद तो, उन्हें बल याद आते ही सब साफ। वरना तो, बल बचाकर रखते हैं और हनुमान सिर्फ बंदर बनकर रह जाते हैं जो, थोड़ी उछलकूद और किसी के सिर की टोपी भर उठाकर भाग जाते हैं। तो, भइया हनुमान भक्तों एडीलेड में बस साधारण बंदर बनके मत रह जाना।

Friday, January 18, 2008

अच्छा हुआ एनडीटीवी में दिबांग की हैसियत कम हो गई

कुछ महीने पहले जब ये खबर आई थी कि एनडीटीवी में दिबांग की पहले जैसी हैसियत नहीं रह गई। मेरे एक मित्र ने दिल्ली से मुझे फोन करके बताया कि किन्हीं कारणों से दिबांग से मैनेजिंग एडिटर के सारे अधिकार छीन लिए गए। जैसा मुझे पता चला कि एनडीटीवी में एक मेल के जरिए स्टाफ को बताया गया कि दिबांग अब संपादकीय फैसले नहीं लेंगे। ये फैसला लेने का अधिकार मनीष कुमार और संजय अहिरवाल को दे दिया गया है। पता नहीं ये बात कितनी सच है।

इसके बाद इसे एनडीटीवी में दिबांग युग के अंत बताया गया। कुछ लोगों ने तो दिबांग कौन से चैनल में जा रहे हैं या फिर दिबांग खुद नया चैनल लेकर आ रहे हैं जैसी खबरें भी बाजार में उड़ा दीं। दिबांग को लेकर मेरी भी व्यक्तिगत राय बहुत अच्छी नहीं थी। जितना लोगों से सुना था मेरे दिमाग में था कि दिबांग संपादकी कम तानाशाही ज्यादा चलाते थे। मेरी भी दिबांग के बारे में अच्छी राय नहीं थी। और, ये राय मैंने अपने बेहद निजी स्वार्थ में बनाई थी। एक बार काफी पहले नौकरी के लिए मैंने नंबर जुटाकर दिबांग को फोन किया लेकिन, दिबांग के खराब रिस्पांस के बाद मैं भी इस बात का जाने-अनजाने समर्थक हो गया कि दिबांग खड़ूस किस्म के संपादक हैं। इसीलिए मुझे भी लगा कि चलो ठीक ही हुआ।

मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि दिबांग त्रिवेणी के हेड होकर जा रहे हैं तो, दूसरे किसी ने बताया कि जी न्यूज के एडिटर के तौर पर दिबांग का नाम पूरी तरह से फाइनल हो गया है। लेकिन, हर बार जब मैं टीवी खोलता था तो, दिबांग के मुकाबला का प्रोमो एनडीटीवी इंडिया पर दिख ही जाता था। कहा ये गया कि दिबांग को निकाला नहीं गया है। उनसे एनडीटीवी के मैनेजमेंट ने कहा है कि वो अपना शो मुकाबला करें और जो, चाहें वो कर सकते हैं लेकिन, संपादकीय फैसलों में दखल न दें।

किसी संपादक को संपादकीय फैसलों से बाहर निकालकर ये कहा जाना कि आप अपना शो देखिए और जो चाहें वो रिपोर्टिंग कर सकते हैं। इसे संपादक की छुट्टी के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है। पता नहीं हो सकता है कि वो दिबांग की मजबूरी ही रही हो कि वो कहीं और छोड़कर नहीं गए। लेकिन, इसी वजह से वो बात हुई जिससे मैं प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता। दिबांग ने इस मौके का भी पूरा फायदा उठाया और अपने को उस तरह से साबित किया जैसे कोई भी रिपोर्टर नई जगह पर अपने को साबित करता है।

दिबांग के मुकाबला शो की अपनी अलग तरह की पहचान है। जैसे संपादकों के शो होते है, वैसा ही बड़ा शो है। इसलिए इस बारे में कुछ भी कहने का बहुत मतलब नहीं है। लेकिन, दिबांग ने विदर्भ और बुंदेलखंड पर जो, खास खबरों की खबर किया वो, ये बताने के लिए काफी है कि दिबांग अपने संपादक रहते एनडीटीवी के रिपोर्टर्स से जो उम्मीद रखते थे वो, बेवजह नहीं थी। और, अगर कोई संपादक खुद इस स्तर की रिपोर्टिंग कर सकता है तो, उसे पूरा हक है कि वो अपने रिपोर्टर्स से उसी तरह के काम की उम्मीद करे। अच्छा है कि इसी बहाने दिबांग से देश भर से ऐसी रिपोर्ट बना रहे हैं जो, नए-पुराने पत्रकारों के लिए सबक हो सकती है।

दिबांग जिस तरह से रिपोर्टिंग कर रहे हैं उससे मुझे लगता है कि अच्छा हुआ एनडीटीवी में दिबांग की हैसियत कम हो गई। इससे नए पत्रकारों को कम से कम इस बात का अहसास तो होगा कि कोई भी व्यक्ति कितनी काबिलियत के बाद ही संपादक की कुर्सी तक पहुंचता है। वरना तो होता ये है कि कितना भी लायक संपादक हो उसके नीचे या उसके साथ काम करने वालों को कुछ ही दिन में ये लगने लगता है कि इतने लायक तो वो भी हैं। संपादक तो बेवजह कुर्सी पर बैठा ज्ञान पेलता रहता है।

Sunday, January 13, 2008

अब मंगते लोगों को महान बनाएंगे

घर-गांव में अकसर कुछ लोगों के लिए कहा जाता है कि ये तो हद कर देता है। जब देखो तब मांगता रहता है। घर में भी कुछ लोग होते हैं जो, किसी दूसरे को कुछ भी मिला तो, भले ही कुछ देर पहले उनको भी मिला हो, फिर मांगने लगते हैं। दरअसल ये एक पूरी की प्रजाति है जो, मानती है कि मांगे बिना कुछ मिल ही नहीं सकता। चाहे वो मांगना अपने लिए हो या फिर अपने हित में किसी और के लिए।


वैसे ऐसे भीख मांगने वाले समाज में बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते हैं। लेकिन, राजनीति में भिखमगते बड़ा ऊंचा स्थान पा गए हैं। इतना ऊंचा कि भारत रत्न मांगने लगे हैं। कमाल ये है कि भारत रत्न कोई भी अपने लिए नहीं मांग रहा है। अपने लिए क्यों नहीं मांग रहे हैं उसकी वजह अलग है। कुछ जिंदा लोगों के लिए मांग रहे हैं तो, कुछ को मुर्दों को भारत रत्न समर्पित कर उनका सच्चा उत्तराधिकारी होना साबित करना है। सब अपने हित के लि ही जिंदा या मुर्दा को भारत रत्न दिलाना चाहते हैं अभी तक एक बी निष्पक्ष प्रस्ताव भारत रत्न के लिए नहीं आया है।

इसकी शुरुआत की ताजा-ताजा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने लाल कृष्ण आडवाणी ने। अटल बिहारी बाजपेयी ने आडवाणी का रास्ता साफ किया तो, आडवाणी ने इसका धन्यवाद देने का अनोखा तरीका खोजा। अटल बिहारी बाजपेयी के लिए भारत रत्न की मांग कर डाली। अटल बिहारी बाजपेयी निर्विवाद तौर पर देश के ऐसे नेताओं में हैं जिनका स्थान पार्टी से अलग भी बहुत ऊंचा है लेकिन, आडवाणी की ओर से ये प्रस्ताव आते ही कांग्रेस ने इसे राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश के तौर पर देखा और सिरे से खारिज कर दिया।

लेकिन, राजनीतिकों की यही खासियत होती है कि एक बार किसी भी तरह का मुद्दा हाथ लगे तो, उसे थोड़ा कम-थोड़ा ज्यादा के अंदाज में सभी दल आजमा लेना चाहते हैं। वोट बैंक जुटाने से लेकर भारत रत्न बटोरने तक ये फॉर्मूला चालू है। आडवाणी ने बाजपेयी के लिए मांगा तो, मायावती को लगा कि यही सही मौका है कांशीराम का कर्ज उतारने का। मायावती ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग कर डाली। कांशीराम ने देश में दलितों के उत्थान के लिए जितना किया, मेरा मानना है कि उतना डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी चाहकर नहीं कर पाए थे। लेकिन, क्या मायावती कांशीराम के लिए भारत रत्न सिर्फ इसलिए नहीं मांग रही हैं कि किसी तरह से सवर्णों के ज्यादा नजदीक जाने के आरोपों को राजनीतिक तौर पर खारिज किया जा सके।

करुणानिधि की पार्टी डीएमके करुणानिधि के लिए भारत रत्न चाहती है। तो, अजीत सिंह को अपने पिता चरण सिंह अचानक बहुत महान लगने लगे। अजीत सिंह कह रहे हैं कि भारत रत्न तो, चरण सिंह ही होने चाहिए। अभी शायद हर प्रदेश से कई नामों का आना बाकी है। और, हालात जो दिख रहे हैं इसमें भारत रत्न के लिए भी लॉबी तैयार करनी पड़ेगी।

वैसे राजनीति सहित ज्यादातर क्षेत्रों में हाल यही है भिख मंगता समाज ही आगे निकल पाता है। मंगतई का सबसे बेशर्म फॉर्मूला जो, हमारी आपकी बातचीत में भी अकसर आता है, खूब इस्तेमाल हो रहा है। फॉर्मूला ये कि कोई भीख नहीं देगा तो, तुमड़ी थोड़ी न तोड़ देगा। कोई किसी काम के लिए, किसी पद के लिए कितना ही योग्य न हो, अगर वो मांग नहीं रहा है या उसक लिए कोई मांग नहीं रहा है तो, फिर समय से तो, कुछ मिलने से ही रहा। अब भारत रत्न देने का मापदंड तो तैयार हो नहीं सका है। सीधा सा फॉर्मूला एक लाइन का ये कि ऐसा व्यक्ति जिसने देश के लिए कुछ अप्रतिम किया हो। अप्रतिम करने के भी अपने-अपने कायदे हैं।

इतनी मारामारी में ये भी हो सकता है कि मॉल में मिलने वाली छूट की तरह भारत रत्न देने के लिए पहले आओ-पहले पाओ का फॉर्मूला काम में लाया जाए। इसलिए भैया लगे हाथ मैं भी भारत रत्न के लिए खुद को प्रस्तावित करता हूं। मेरे लिए कोई दूसरा अभी भीख मांगने को तैयार नहीं है। इसलिए मेरे नाम का प्रस्ताव मैं खुद कर रहा हूं। अलग-अलग पार्टियों, प्रदेशों, विचारधारा की तरह ब्लॉग समाज से अभी तक भारत रत्न के लिए मैं अकेला उम्मीदवार हूं। मैं खुश हूं कि अब तक की जिंदगी में पहली बार कुछ मांग रहा हूं वो, भी भी भारत रत्न। जय हो भिखमंगता समाज की, मगतई की अवधारणा की।

Friday, January 11, 2008

मैं किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं

मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं ... डॉक्टर बनना चाहता हूं ... मैनेजर बनना चाहता हूं ... आईएएस, पीसीएस अफसर बनना चाहता हूं ... हीरो बनना चाहता हूं ... बड़ा बिजनेसमैन बनना चाहता हूं ... 2007 की आखिरी रात तक देश के ज्यादातर लड़कों की आरजू कुछ ऐसी ही हुआ करती थी। लेकिन, नए साल की पहली सुबह नई आरजू, कुछ नए तरह की तमन्ना लड़कों के अंदर लेकर आई है। लड़कों के सीने में दबे अरमान उबल रहे हैं। वो, कह रहे हैं मैं किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। नहीं फाड़ पाऊंगा तो, कपड़े फटते देखने का सुख तो, जरूर लूंगा।


ये 2008 के लड़के टीवी पर दिखना चाहते हैं। तिलक लगाकर टीवी पर दिख रहे हैं। इनकी मांए-बहनें इन्हें टीका लगाकर शहादत वाले भाव में कैमरों के सामने पेश कर रही हैं। ऐसे, जैसे कह रही हों जाओ, आज इम्तिहान है तुम्हारा कमीनेपन में पुरानी सारी मर्द पीढ़ी को मात देकर लौटना। वैसे पुरानी पीढ़ी के जांबाज मर्द भी उनके साथ खड़े हैं।

भगवान शंकर या फिर छत्रपति शिवाजी किसके नाम पर इन्हें इतना साहस मिलता है, आज तक मैं समझ नहीं पाया। ऐसी नाम से सेना तैयार है। सेना पता नहीं किसे जीतती है लेकिन, ठाकरे नाम जिंदा रहे इसलिए कुछ न कुछ करती रहती है। पता नहीं किसका सामना करने के लिए इनके पास सामना अखबार भी है। संपादकीय से लेकर खबर तक कपड़े फाड़ने वालों के गुणगान हैं। कहा जा रहा है सब मराठा स्वाभिमान और मराठी अस्मिता पर हमला है।

सेना से जुड़ी शहर की साध्वी मेयर का बयान आ जाता है कि मराठी तो, किसी लड़की के कपड़े फाड़ ही नहीं पाता। सब बाहर से आए लोग ही कर रहे हैं। किसी लड़की के कपड़े फाड़ने की आरजू 31 दिसंबर 2007 की रात पूरी कर लेने वालों 14 लड़कों में से 2 लड़के कुछ उत्तर प्रदेश, बिहार जैसी जगहों से आए थे और यहीं बस गए थे। वो, संस्कारी नहीं हैं। मेयर साहिबा और उनकी सेना को शायद मरीन ड्राइव पर बलात्कार करने वाले मराठी कांस्टेबल की याद नहीं रही होगी।

सेना का एक अखबार तो, मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़ने लगा। लेकिन, दूसरे अखबारों, टीवी चैनलों को ये बात समझ में नहीं आई। एक अंग्रेजी अखबार के दो फोटोग्राफरों का ही दुस्साहस था कि इन शूरवीरों की आरजू पूरी होने के बाद बेजवह उस पर हंगामा मच गया। मन मारकर पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। मीडिया ने बेवजह ऐसी घटना को तूल दे दिया जो, मुंबई के पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, मुंबई में कहीं भी कभी भी हो जाने वाली छोटी सी घटना थी।

गृहमंत्री को राजनीति करनी थी इसलिए कमिश्नर को कड़ी कार्रवाई की निर्देश दिया। खैर, न्याय व्यवस्था को ये गंवारा नहीं हुआ और मराठी अस्मिता के सारे प्रतीक लड़के जेल से बाहर आ गए। लेकिन, बात इतने पर ही कहां रुकने वाली थी। एक पुराने सैनिक को याद आया कि उनका तो, जीवन ही सिर्फ महाराष्ट्र के नवनिर्माण को समर्पित है। और, अगर कठिन से कठिन स्थितियों में भी परिस्थितियों में बेशर्मी से खड़े रहने वाले से नौजवान उनके पाले में नहीं रहे तो, नवनिर्माण कैसे होगा। वो, पहुंच गए सबको लेकर गृहमंत्री के दफ्तर कहा- सब मीडिया की गलती है। मीडिया ने इतना बढ़ा-चढ़ाकर मामला पेश किया कि बेगुनाह जेल भेज दिए गए।

ये बेगुनाह लड़के बेचारे तो, सिर्फ ये देख रहे थे कि लड़कियों के कपड़े कौन फाड़ रहा है। कौन है जो, नए साल में नए तरह के संकल्प पूरे करने का साहस कर रहा है। अब मीडिया में फोटो आई तो, ये समझ में ही नहीं आ रहा है कि कौन सिर्फ कपड़े फटते देखने का सुख ले रहा है। कौन ज्यादा साहसी है जो, खुद कपड़े फाड़ रहा है। वैसे ऐसे संकल्पवान नौजवानों ने 31 दिसंबर की रात और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्से में खूब अपने संकल्प पूरे किए।

ये त्यागी नौजवान अपने नए साल के संकल्प को लोगों के सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे। लेकिन, बेड़ा गर्क हो ये फोटोग्राफर, कैमरामैन नाम की गंदी प्रजाति का, जिन्होंने इन लड़कों का संकल्प सबके सामने पेश कर दिया। मुंबई, दिल्ली, केरल, गुड़गांव जैसी जगहों के लड़कों का साहस सबके सामने आ गया। ऐसे उत्साही नौजवानों ने संकल्प तो पूरे देश में पूरा किया होगा लेकिन, दूसरे शहरों के फोटोग्राफर नाकारा निकले कुछ दिखा नहीं सके। और, उन लड़कों को हीरो नहीं बना सके। संकलपवान लड़कों के हाथ से प्रेस कांफ्रेंस का मौका भी निकल गया।

नए साल की शुरुआत में ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के अपने जिले के एक गांव के कुछ नौजवानों ने भी ऐसा ही संकल्प पूरा कर डाला। अब ऐसा संकल्प पूरा करने वाले हीरो तो, हो ही गए हैं। टीवी चैनलों पर, अखबार पर आने लगे हैं। देश के दूसरे लड़के भी ऐसे संकल्प ले रहे हैं। मैं भी संकल्पवान होने की हिम्मत जुटा रहा हूं। मै किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। मैं कमीने से भी कमीना बनना चाहता हूं। मैं अपनी जाति के नाम पर समर्थन चाहता हूं। मैं अपने क्षेत्र के लोगों से समर्थन चाहता हूं। मैं अपने प्रदेश के लोगों का समर्थन चाहता हूं। मैं हर उससे समर्थन चाहता हूं जो, मेरे नए साल के संकल्प को पूरा करने के लिए मेरे साथ खड़ा हो सके और अब तो, गंदे पत्रकारों का भी डर नहीं रहा। मेरे संकल्प को उन्होंने सबके सामने दिखाया तो, मैं हीरो तो हो ही जाऊंगा।

Monday, January 07, 2008

जापानी चाहते हैं भारतीय शिक्षा

जापानी अपने बच्चों को भारतीय स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। दरअसल जापान को लग रहा है कि एशिया में वो चीन और भारत से पिछड़ रहा है और उनके स्कूल आगे की लड़ाई के लिए बच्चों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। अब उनको लगता है कि भारतीय पढ़ाई से वो चीन और भारत के बच्चों को कुछ पकड़ पाएंगे।

जापानी मानते हैं कि भारत एजुकेशन के मामले में दुनिया का उभरता हुआ सुपरपावर है। एक जमाने में इंटरनेशनल टेस्ट में आगे रहने वाल जापानी जब पिछड़ने लगे तो, उन्हें भारतीय स्कूलिंग ही सहारा नजर आ रही है। जापान की किसी भी अच्छी किताब की दुकान में आसानी से "Extreme Indian Arithmetic Drills" और "The Unknown Secrets of the Indians" जैसे शीर्षक वाली किताबें भरी पड़ी मिल जाएंगी।

जापान के अखबारों में भारतीय बच्चों की जबरदस्त याददाश्त के किस्से खूब छप रहे हैं। अखबारों के मुताबिक, भारतीय बच्चे गुणा यानी मल्टीपिलकेशन के मामले में जापान के स्टैंडर्ड से नौ गुना ज्यादा तेज हैं। गणित के अलावा अंग्रेजी में भी उस्ताद बनने के लिए जापानी अपने बच्चों को भारतीय स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। योग और ध्यान भी इन स्कूलों की दिनचर्या की हिस्सा है।

जापान में जो भी इंडियन इंटरनेशल स्कूल हैं। उसमें जापानी परिवारों से बहुत ज्यादा बच्चे पढ़ने के लिए आ रहे हैं। इन इंडियन इंटरनेशनल स्कूल्स में ज्यादातर टेक्स्ट बुक (किताबें) भारतीय स्कूलिंग सिस्टम के मुताबिक ही होती हैं। पढ़ाने के लिए शिक्षक भी भारत या दूसरे दक्षिण एशियाई देशों से ही हैं।

चौंकाने वाली एक बात तो ये भी है कि जापान में एक बड़े भारतीय किंडरगार्टेन स्कूल लिटिल एंजल ने भारत के नक्शे को हरे और केसरिया रंग में रंग रखा है। इस स्कूल में 45 में से एक ही बच्चा भारतीय है। जापान टाइम्स, न्यूयॉर्क टाइम्स में ऐसी खबरें सुर्खियां बनी हुई हैं। ऐसी ही एक खबर के मुताबिक, एक जापानी ईको किकुटाके खुश हैं कि उनका पांच साल का बच्चा भारतीय स्कूल में पढ़कर अपने आसपास के दूसरे जापानी बच्चों से ज्यादा कबिल है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी ऐसी ही खबर पर एक टिप्पणी है- Can American schools learn anything from schools in India? है ना चौंकाने वाली खबर।

Sunday, January 06, 2008

एक पूरे जिले को तरक्की और बचत की आदत

किसी एक घर में सबके पास बैंक अकाउंट होना तो, शायद कोई बहुत चौंकाने वाली खबर नहीं होगी। लेकिन, तमिलनाडु का एक पूरा जिला अगले तीन महीने में ऐसा होगा जहां, हर घर में कम से कम एक बैंक अकाउंट तो होगा ही।

तमिलनाडु के सलेम जिले में सात लाख बीस हजार परिवारों में से चार लाख परिवारों में कम से कम एक बैंक अकाउंट तो अभी भी है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इस जिले को 31 मार्च तक 'total banking district' बना देना चाहता है। यानी इस जिले में कम से कम सात लाख बीस हजार अकाउंट तो होंगे ही।

इस जिले में RBI लोगों को ये भी बता रहा है कि नकली और असली नोट का क्या फर्क होता है। इस जिले में किसी को भी बिना कुछ गिरवी रखे या बिना किसी की सिक्योरिटी के पचास हजार रुपए का कर्झ कभी भी मिल सकता है। यही वजह है कि इस जिले में 13,000 महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप अलग-अलग बैंकों से कर्ज लेकर अपना काम कर रहे हैं।

कमाल ये भी है कि अगर यहां किसी बैंक के खिलाफ कोई शिकायत है तो, ग्राहक सीधे RBI की चेन्नई शाखा में शिकायत कर सकता है। और, RBI भरोसा दिला रहा है कि 45 दिन के भी ऑम्बुड्समैन उनकी शिकायत का निस्तारण कर देगा।

पूरे जिले में हर परिवार के पास कम से कम एक बैंक अकाउंट होने की खबर वैसे तो, सामान्य सी ही खबर लगती है। लेकिन, जब मैं इसके असर पर ध्यान देता हूं तो, ये सीधे-सीधे देश का सबसे बड़ा बचत अभियान नजर आता है।

मैंने इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान (इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने से पहले) अपने एक मित्र की गारंटी पर बैंक अकाउंट खुलवा लिया था। वैसे, खुद मेरे पिताजी बैंक मैनेजर हैं लेकिन, जानबूझकर मैंने उनके बैंक में या उनकी गारंटी पर अकाउंट नहीं खुलवाया कि ये सबसे बचा के पैसे बचाना है। और, आप सोचिए कि मेरे अंदर एक अजीब सी आदत हो गई थी कि महीने में 300 रुपए तो कम से कम मैं चुपचाप उस अकाउंट में डाल ही देता था। अब सोचिए पूरे जिले को बचत की ये आदत लगी तो, देश के लिए और निजी तौर पर उन लोगों के विकास के लिए इससे बेहतर खबर क्या होगी।

बलिया से चंद्रशेखर के बेटे की जीत के मायने


आजीवन बलिया से सांसद रहे चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद बलिया की जनता ने उनके बेटे को सांसद बना दिया। अब उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे आए तो, राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियों इस जीत के राजनीतिक मायने निकालने में जुट गए हैं। लेकिन, अगर ईमानदारी से इस चुनाव के नतीजे को देखें तो, इसके मायने देश की राजनीति के युवा तर्क को बलिया की जनती अंतिम श्रद्धांजलि से ज्यादा ये कुछ नहीं है।

मेरे ऐसा कहने की पीछे खास वजह भी है। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर समाजवादी पार्टी के टिकट से सांसद चुने गए हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि सपा इसका जोर-शोर से हल्ला करेगी और इसे राज्य में आने वाले लोकसभा चुनाव के राजनीतिक रुझान के तौर पर बताएगी। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार आने के बाद से मांद में छिप गए सपा के कार्यकर्ता-नेता बलिया जीतने के बाद चौराहों, बैठकों पर फिर से लोहिया के आधुनिक चेले मुलायम को धरती पुत्र बताने लगे हैं।

लेकिन, क्या बलिया सपा ने जीता है। एकदम नहीं। बलिया की लोकसभा सीट बलिया वालों ने चंद्रशेखर को पैतृक संपत्ति जैसा बनाकर दे दिया था। अब पैतृक संपत्ति थी तो, स्वाभाविक है कि बेटे को इसे विरासत में मिलना ही था। समाजवादी पार्टी ने तो, बस मौके की नजाकत भांपकर नीरज शेखर को साइकिल पर बिठा दिया। बलिया को स्वर्गीय चंद्रशेखर की पैतृक संपत्ति मैं इसलिए कह रहा हूं कि बलिया जाने पर कहीं से भी ये अहसास नहीं होता कि ये भारतीय राजनीति के एक सबसे ताकतवर नेता की आजीवन लोकसभा सीट रही है।

विकास बलिया में रहने वालों को टीवी चैनल या फिर अखबारों की खबरों के जरिए ही पता है। या फिर जो, दिल्ली में चंद्रशेखर के बंगले जाते थे उन्होंने, ही देखा-जाना है। लेकिन, फिर भी चंद्रशेखर जिंदा रहते (और शायद अब भी) बलिया में चंद्रशेखर फोबिया ऐसा था कि बलिया से विधानसभा चुनाव जीतने वाले भाजपा के कई विधायक, मंत्री भी लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर के पक्ष में ही चीखते नजर आते थे।
यहां रहने वालों को चंद्रशेखर ने विकास के नशे से इतना दूर रखा कि लोग उन्हें सिर्फ चंद्रशेखर होने के नाम से ही सारी जिंदगी जिताते रहे। बलिया में विकास न करने के लिए चंद्रशेखर से बड़ा कुतर्क शायद ही कोई दे सके। चार महीने के लिए इस देश के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर कहते थे- मैं देश का नेता हूं। मुझे देश की तरक्की करनी है, देश तरक्की करेगा तो, बलिया भी विकसित हो जाएगा। चंद्रशेखर अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन, चंद्रशेखर की इस बात पर बहस होनी इसलिए जरूरी है कि कोई नेता जिस लोकसभा सीट से चुनकर संसद मे पहुंचता हो, वहां के विकास पर ऐसे अजीब कुतर्क कैसे गढ़ सकता है।

लेकिन, बलिया के लोग शायद ऐसे ही हैं। बस चंद्रशेखर ने उनकी नब्ज पकड़कर उसी हिसाब से उन्हें उन्हीं की अच्छी लगने वाली भाषा में उसी बात को उनके दिमाग में बसा दिया कि वो देश में सबसे अलग और कुछ श्रेष्ठ हैं। बलिया के लोगों को मैं अपनी पढ़ाई के दौरान इलाहाबाद में बड़े ठसके से ये नारा लगाते सुनता था कि ‘अदर जिला इज जिल्ली, बलिया इज नेशन’। बागी बलिया कहकर वो खुश हो लेते हैं। देश से दस दिन पहले बलिया आजाद हुआ था, बस इतने से ही खुश हो लेते हैं। इस आत्ममुग्धता के शिकार बलिया वालों को पता ही नहीं लगा कि कब वो देश की मुख्य धारा से पूरी तरह से अलग हो गए हैं। यहां तक कि बलिया वालों को बगल के मऊ को देखकर भी शर्म नहीं आती लिया जो, कल्पनाथ राय के सांसद रहते हुए तहसील से चमकता हुआ जिला बन गया था।

खैर, चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर बलिया से जीतकर लोकसभा में यानी दिल्ली पहुंच गए हैं। वैसे बलिया के लोगों को पता नहीं कैसे ये भ्रम हो रहा है कि चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को उन्होंने बलिया से दिल्ली पहुंचा दिया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर तो पहले से ही दिल्ली में थे। और, ऐसे दिल्ली में थे कि इस लोकसभा चुनाव से पहले मुश्किल से ही बलिया के लोग चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को पहचानते थे। यही वजह थी कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी बलिया में चंद्रशेखर के ही बेटे को बाहरी बताने का दुस्साहस कर रही थी। लेकिन, ब्राह्मण स्वाभिमान के तथाकथित, स्वयंभू प्रतीक हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी पर दांव लगाना बसपा के काम नहीं आया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को 2,95,000 वोट मिले जबकि, हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर को 1,64,000 यानी लड़ाई में बहुत फासला था। कुल मिलाकर चंद्रशेखर का बेटा चंद्रेशखर से भी ज्यादा वोटों से जीतकर संसद पहुंच गया।

कांग्रेस की तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में कोई गिनती है नहीं तो, फिर बलिया में अचानक होने की कोई वजह भी नहीं थी। लेकिन, यहां बीजेपी की जो दुर्गति हुई वो, देखने लायक है। भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता और एक जमाने में चंद्रशेखर के ही प्रिय शिष्यों में गिने जाने वाले वीरेंद्र सिंह को सिर्फ 22,000 वोट मिले। यानी साफ है कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के समय वाले ही हालात हैं। सीधी लड़ाई बसपा और सपा के बीच ही है।

यही समीकरण 2009 के लोकसभा चुनाव तक भी बना हुआ दिख रहा है। और, अगर यही रहा तो, 2009 में भाजपा की ओर से ‘PM in Waiting’ लाल कृष्ण आडवाणी 2009 लोकसभा चुनाव के बाद ‘Ex PM in Waiting’ हो जाएंगे। बलिया लोकसभा उपचुनाव के नतीजे का संदेश मुझे तो साफ दिख रहा है। आप लोगों की क्या राय है बताइए।

Saturday, January 05, 2008

अब सिर्फ पुराने लोगों की याद में ही इलाहाबादी कॉफी हाउस


50 साल का हो गया इलाहाबाद का कॉफी हाउस
इलाहाबाद का कॉफी हाउस। शहर के सबसे पॉश इलाके सिविल लाइंस में रेलवे के नजदीक बसा ये कॉफी हाउस इलाहाबाद की खास संस्कृति का वाहक, पहचान रहा है। ये खास पहचान थी, इलाहाबाद की कला साहित्य, संस्कृति, आंदोलन और राजनीति में खास भूमिका की। वो, भूमिका जो, याद दिलाती है कला, साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद की अगुवाई की। माना ही ये जाता है कि कोई इस शहर से गुजर भी गया तो, साहित्य, संस्कृति और राजनीति के दांव-पेंच से अछूता, अपरिचित तो रह ही नहीं सकता।

एक जमाने में मशहूर प्रकाशन लोकभारती, नीलाभ, हंस, शारदा, अनादि, परिमल इलाहाबाद शहर में थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से निकली साहित्यकारों से निकली टोली का जमावड़ा यहां होता था। अस्सी के दशक तक इलाहाबाद का कॉफी हाउस देश की राजनीति और साहित्य में सबसे ज्यादा प्रासंगिक था। यहां के सफेद फीते वाली ड्रेस में सजे सिर पर लाल फीत वाली लटकती टोपी को सिर पर सजाए बेयरे पूरी अंग्रेजी नफासत के साथ लोगों को कॉफी सर्व करते थे। और, बेहद पुरानी स्टाइल की चौकोर मेज के चारों तरफ राजनीति और साहित्य के साथ देश की दशा-दिशा पर जोरदार बहस यहां किसी भी समय सुनने को मिल जाती थी।

राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेता और हेमवती नंदन बहुगुणा यहां राजनीतिक गुणा-गणित का हिसाब लगा रहे होते थे तो, इसी कॉफी हाउस में फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे देश के दिग्गज साहित्यकारों का दरबार लगा रहता था। और, इनकी बहसों से निकलने वाली बातें इलाहाबाद के आम लोगों की चर्चा मे अनायास ही शामिल हो जाती थीं। उपेंद्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा जैसे लोगों की चर्चा में लोगों की इनकी अगली कहानी के प्लॉट मिलते थे। कमलेश्वर जब भी इलाहाबाद में होते थे, कॉफी हाउस जरूर जाते थे। दूधनाथ सिंह तो, अब भी इलाहाबाद में कॉफी हाउस में कभी-गोल जमाए मिल सकते हैं।

लेकिन, आज 50 साल बाद शहर की इस खास पहचान के बारे में शहर के लोगों को भी बहुत कुछ खास पता नहीं रह गया है। यहां तक कि हाल ये है कि कला, साहित्य, संस्कृति, आंदोलन और राजनीति की दशा-दिशा तय करने वाला कॉफी हाउस में अब चंद ही ऐसी रुचि के लोग मिलते हैं। अब ज्यादातर समय इस कॉफी हाउस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के कुछ वकील, कुछ पुराने नेता, कुछ ऐसे बुजुर्ग जो, पुराने दिन याद करने चले आते हैं या फिर कुछ ऐसे लोग जो, कॉफी हाउस में बैठने की बस परंपरा निभाने के लिए ही बने हैं यानी एकदम खाली हैं।

कमाल तो है कि इलाहाबाद के इंडियन कॉफी हाउस के सामने सड़क पर अंबर कैफे खुला। ये कैफे खुला तो था सड़क पर अपना धंधा जमाने के लिए। लेकिन, कॉफी हाउस के सामने सड़क पर इसका खुलना ऐसा हो गया है कि नए जमाने के लड़के-लड़कयों को तो शायद ही अब असली कॉफी हाउस का पता होगा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुराने-नए नेताओं का जमावड़ा भी इसी अंबर कैफे पर ही होता है। लेकिन, कॉफी हाउस की पुरानी पहचान आज भी शहर के लोगों को रोमांचित करती है। इलाहाबाद के कॉफी हाउस से जुड़ी बहुत कम बातों की जानकारी के लिए मुझे माफ करिएगा। और, अगर इलाहाबाद में पुराने दौर से जुड़ा आपमें से कोई इस कॉफी हाउस से जुड़े कुछ और रोचक या जानकारी बढ़ाने वाली बात जोड़ सके तो, स्वागत है।

Friday, January 04, 2008

ये कोई पहेली तो है नहीं जो किसी की समझ में नहीं आती

देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसी सांसद के खिलाफ पुलिस ने अपराधियों की तरह स्केच जारीकर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। माननीय (मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है) सांसदों की सुरक्षा के लिए लगी रहने वाली पुलिस एक सांसद की तलाश में पिछले कई महीनों से घूम रही है। सफलता नहीं मिली तो, सांसद के चेहरे के सात संभव तरीके वाले स्केच जारी किए।

ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।

अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।

लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।

25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।

उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।

उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।

सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।

फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...