Tuesday, March 11, 2008

वीकेंड मां-बाप, वीकेंड पति-पत्नी और वीकेंड बच्चे

मां-बाप के साथ शनिवार-रविवार की छुट्टियों में खिलौनों, कपड़ों से लदे बच्चों को देखकर लगता है कि इस जमाने के बच्चे कितने सुखी हैं। अमीर मां-बाप हैं, तरह-तरह के कपड़े, जूते, फैशन की हर चीज जो, टीवी पर दिखती है, इन बच्चों के पास है। चॉकलेट, आइसक्रीम, पॉपकॉर्न, इंटरनेशनल टॉयज और न जाने क्या-क्या। कितना एटीकेट, कितना सलीका। लेकिन, कितने लोग ये अंदाजा भी लगा पाते हैं कि इन बच्चों को ये सारे सुख सिर्फ शनिवार-रविवार को ही मिलते हैं। क्योंकि, दुनिया भर की सुख सुविधा और ऐशो-आराम जुटाने के चक्कर में महानगरों में रहने वाले कामकाजी जोड़ों में से बड़ा तबका सिर्फ वीकेंड पैरेंट ही बनकर रह गया है।

ऐसा नहीं है कि इस भयावहता का अंदाजा उन मां-बाप को नहीं है। स्टाफिंग फर्म टीम लीज के एक सर्वे में दिल्ली के 100 में से 62 कामकाजी जोड़ों को इस बात का अपराधबोध है कि वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। मुंबई में ज्यादा भागदौड़ वाली जिंदगी दिखती है लेकिन, कमाल ये है कि इस सर्वे में 100 में से 35 कामकाजी जोड़ों को ही ये गम सताता है कि वो अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे मामलों में पुणे या दूसरे मेट्रो से बाहर के शहरों के कामकाजी जोड़े अपने बच्चों को समय ज्यादा दे पा रहे हैं और खुश भी रख पा रहे हैं।

खुद खुश रहने और बच्चों को खुश रखने के चक्कर में जुटे मां-बाप के पास ज्यादा विकल्प भी नहीं बचते। आज ही खबर आई है कि नोएडा के सेक्टर 94 में 95 एकड़ का प्लॉट बीपीटीपी कंपनी ने 5006 करोड़ रुपए में खरीदा है। बीपीटीपी के मालिक खुशी-खुशी टीवी पर बता रहे थे कि वो यहां दुबई के प्रोजेक्ट जैसा, हांगकांग जैसा जहान बसा देंगे। अब इस जहां में एक छोटा से मां-बाप और दो या फिर एक ही बच्चे भर के लिए घर भी हांगकांग और दुबई की ही शर्तों पर मिलेगा।

दुनिया बनावटी भी इसी चक्कर में हो रही है। एक दिन पत्नी को पति समय नहीं देता तो, पत्नी नाराज होती है लेकिन, अब न तो पत्नी नाराज होती है न पति। दोनों ही एक दूसरे को समय न दे पाने के एवज में तोहफे बांटकर काम चला रहे हैं। सैटर्डे-सनडे साथ-साथ छुट्टियां बिता रहे हैं। बच्चों को बड़े खिलौने मिलने लगे हैं। वीकेंड पर मिलने वाले इन तोहफों में ही बच्चा अगले पांच दिन खुशी-खुशी (पता नहीं कितना लेकिन, काफी समय तक दिखता तो ऐसा ही है।) बिना मां-बाप की याद किए समय निकाल देता है।

तोहफे की अहमियत रह गई है। तोहफे देने वाले की तो कद्र ही नहीं रही। कहते हैं समाज में बड़ा बनने के लिए काफी कुछ खोना पड़ता है। काफी कुछ सैक्रिफाइज (हिंदी में सचमुच ये शब्द ईजाद नहीं हुआ था। लेकिन, अब इसके ट्रांसलेशन की निजी-सरकारी-कामकाजी जिंदगी में बहुत जरूरत पड़ने लगी है।) बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान का एक कोट अहा जिंदगी पत्रिका में छपा है। जो, वीकेंड मां-बाप, वीकेंड पति, पत्नी का असली मर्म समझा देता है। शाहरुख कहते हैं अगर मैं बतौर पति या पिता असफल हो जाता हूं तब मेरा काम खिलौने और हीरे कर देते हैं और ये कभी असफल नहीं होते। सबसे सफल अभिनेता शाहरुख पति और पिता के तौर पर सफल नहीं हो पाने की बात कबूल रहे हैं। हीरा और खिलौना पति और पिता की कमी पूरा कर दे रहा है।

कामकाजी पति-पत्नियों पर किए गए सर्वे से ही निकलकर सामने आ रही बात ये है कि मां-बाप समय नहीं दे रहे हैं तो, बच्चे दाइयों के साथ, अब आज के जमाने में ये पुराने जमाने की दाई मां तो हो नहीं सकती। क्योंकि, दाई मां को भी अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए पैसे कमाने हैं। और, कई दूसरे घरों के भी बच्चों के मां-बाप भी इस पैसे देकर लाई गई मां का इंतजार कर रहे होते हैं। इस परवरिश में अपने मां-बाप की बात तो सुनी ही नहीं जाती तो, फिर बच्चे किसकी बात सुनेंगे। दोस्त अच्छे बुरे हो, टीवी सीरियल अच्छे-बुरे हों, ज्यादातर समय बच्चे उन्हीं के साथ गुजारते हैं। शायद यही वजह है कि कई बार टीवी सीरियल में बिना नागा किए दिखने वाले चरित्र बच्चों को अपने परिवार के ही सदस्यों से ज्यादा नजदीक लगने लगते हैं।

कई बार काम और बच्चों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश करते-करते मां-बाप ही अलग हो जाते हैं। दोनों कमा रहे होते हैं, लगभग एक जैसा ही। इसलिए घंटे देखकर बच्चे के देखभाल का भी हक तय कर लेते हैं। एक का हक टूटा तो, दूसरा चढ़ बैठता है। और, कर्तव्य तो, बेचारा अब डिक्शनरी में भी शायद ही होगा। सिर्फ हक की पढ़ाई पढ़ने वाले ये वीकेंड चिल्ड्रेन भी मां-बाप को याद करने के लिए आगे सिर्फ हैपी मदर्स डे या हैपी फादर्स डे का इंतजार करते रहते हैं।

वैसे हैपी फादर्स डे और हैपी मदर्स डे कल्चर देने वाले भी अब परेशान हैं। वहां के बच्चों को तो मां-बाप से ज्यादा दूसरी दुनिया में पहुंचा देने वाली दवाइयां ज्यादा अपनी लगती हैं। अब न्यूयॉर्क की एक ताजा खबर कह रही है कि जानकार मां-बाप को बच्चों के साथ ज्यादा समय रहने की सलाह दे रहे हैं। कह रहे हैं कि मां-बाप के ज्यादा साथ रहने से बच्चे के कम उम्र में नशेड़ी बनने की संभावना कम हो जाती है। वरना वो दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताता है और पार्टी और दोस्तों का साथ उसे हाईस्कूल में ही शराबी बना देता है।

मैरीलैंड युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सब्सटेंस एब्यूज रिसर्च के मुताबिक, कॉलेज में ही छात्रों के शराब की लत पड़ने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। साथ ही मां-बाप का अगर पूरा साथ और सही सलाह न मिले तो, बच्चे इन्हीं दिनों में सेक्सुअल एक्टिविटी में भी लग जाते हैं। हमारे मां-बाप वीकेंड पैरेंट बनकर अपराध बोध में जी रहे हैं और सोच रहे हैं कि पैसा कमा नहीं कमा पाए तो, बच्चा बड़ा होकर उन्हें इस बात के लिए दोषी ठहराएगा कि उसे अगर सुविधाएं मिली होतीं तो, वो तरक्की की दौड़ में और आगे जा पाता। और, अमेरिका में रिसर्चर मां-बाप को समझा रहे हैं कि थोड़ा कम पैसे कमाओ लेकिन, बच्चे को ज्यादा समय दो नहीं तो, बच्चे शराब और सेक्स में ऐसे फंस जाएंगे कि कितना भी पैसा काम नहीं आएगा। अब विकल्प तो सबके लिए खुला है।

Monday, March 10, 2008

मतिभ्रम से उबर नहीं पा रहे हैं राहुल गांधी

ऱाहुल गांधी भ्रमित भर हैं। या वो, ताउम्र ऐसी ही बचकानी राजनीतिक बयानबाजी के सहारे जीवन चलाते रहेंगे। राजीव गांधी का अक्स राहुल में देखने वालों को राहुल लगातार निराश कर रहे हैं। लोकसभा चुनावों की तैयारी में पिछले करीब साल भर से जुटी कांग्रेस ने अब चुनावी तैयारी पर पूरा जोर लगा दिया है। कांग्रेस महासचिव और देश की राजनीति का सबसे ताकतवर युवा चेहरा राहुल गांधी इस समय इंडिया डिस्कवर कर रहा है।

राहुल गांधी डिस्कवर इंडिया कैंपेन के बहाने देश भर में कांग्रेस की राजनीतिक संभावनाओं को मजबूत करने की कोशिश में लगे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने उड़ीसा से की है। लेकिन, राहुल के डिस्कवर इंडिया कैंपेन की शुरुआती डिस्कवरीज ने ही बता दिया है कि क्यों बीमारी के बाद भी सोनिया को कांग्रेस की कमान अपने हाथ में ही रखनी पड़ रही है। और, सोनिया को अपने पुराने कांग्रेसी खिलाड़ियों पर ही क्यों भरोसा करना पड़ रहा है। क्योकि, सोनिया के इन पुराने खिलाड़ियों ने बजट में और बजट के करीब छे महीने पहले से जो चुनावी राजनीति शुरू की है उसका कोई जोड़ नहीं।

डिस्कवर इंडिया की उड़ीसा रैली में राहुल ने जो दो बातें कहीं, मैं उन्हीं का जिक्र करना चाहूंगा। राहुल गांधी कह रहे हैं कि देश की राजनीति में युवाओं को जगह नहीं मिल पा रही है। राहुल ने यहां ईमानदारी बरती है और कह रहे हैं कि कांग्रेस तक में युवाओं को राजनीतिक जमीन मिलनी मुश्किल है। दूसरी बात राहुल ने कहा कि वो समझते थे कि उत्तर प्रदेश ही सबसे पिछड़ा राज्य है। वहां बिजली, पानी, सड़क नहीं है। लेकिन, उड़ीसा आकर उन्हें पता चला कि ये तो उत्तर प्रदेश से भी पिछड़ा राज्य है। और, उन्होंने फिर से वही राग अलापा कि उत्तर प्रदेश की ही तरह बरसों से यहां भी कांग्रेस की सरकार न होने से राज्य की ये दुर्दशा हुई है।

राहुल की डिस्कवर इंडिया कैंपेन की शुरुआती रैली की ये दोनों बातें साफ कर रही हैं कि राहुल अभी राजनीति में सचमुच बच्चे ही हैं। अभी उन्हें परिपक्व राजनेता बनने के लिए बहुत कुछ करना पड़ेगा। अब देश की आधी से ज्यादा आबादी 35 साल से कम की है सिर्फ इसलिए ये बयान दे देना कि राजनीति में किसी भी पार्टी में युवाओं के लिए जगह नहीं है। कोई राजनीति का ककहरा जानने वाला भी बता सकता है कि इससे राहुल को युवा सिर-आंखों पर चढ़ाने से रहे। राहुल कांग्रेस महासचिव हैं। उनके साथ खानदानी राजनीति करने वाले नौजवानों की पूरी टीम सोनिया ने राहुल के कहने पर ही कांग्रेस में डाल दी और राहुल को उनका नेता बना दिया। दूसरी पार्टियों की तो छोड़िए फिर, कांग्रेस में युवाओं को मौका देने के लिए उन्हें किसकी मदद की दरकार थी। बाप-दादा के जमाने से कांग्रेस की राजनीति करने वाले परिवार के अलावा एक भी सामान्य पृष्ठभूमि से आया युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय इकाई में जगह क्यों नहीं बना पाया।

राहुल गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के बाद भी यूपीए में कांग्रेस कोटे से बने मंत्रियों की लिस्ट देख लें तो, समझ में आ जाएगा कि कांग्रेस में अहमियत हासिल करने में कितनी उम्र जाया हो जी है। अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी, जगदीश टाइटलर, कमलनाथ और दूसरे दिग्गज मंत्री राहुल के पिता राजीव गांधी के भी पहले से कांग्रेस का राजनीति में हैं। और, गांधी-नेहरू परिवार के खास दरबारियों में से हैं। उत्तरांचल में कांग्रेस के हारने के पहले तक किसी तरह चल पाने वाले नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे। अब भी वो कांग्रेसी निष्ठा के आरक्षण के कोटे से आंध्र प्रदेश के राज्यपाल हैं। हो सकता है कि कांग्रेस उन्हें निकालकर-झाड़-पोंछकर कहीं से फिर से चुनावी राजनीति में धकेल दे।

राहुल युवा नेताओं को तैयार करने के लिए कितना मुस्तैद हैं, इसका अंदाजा एक और खबर से लगता है। खबर है कि दिल्ली में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के ऑफिस का काम अब डेल कार्नेगी के प्रोफेशनल संभालेंगे। डेल कार्नेगी न्यूयॉर्क की ट्रेनिंग फर्म है जो, दुनिया भर की नामी कंपनियों के लोगों को बिजनेस स्किल (कारोबारी क्षमता बढ़ाने की कला) बेहतर करने की ट्रेनिंग देती है। अब यही फर्म राहुल की यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देगी। अमेरिकी फर्म की देसी इकाई डेल कार्नेगी ट्रेनिंग इंडिया कांग्रेस की युवा इकाई यूथ कांग्रेस और छात्र संगठन NSUI यानी भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन को लोकसभा चुनावों के लिए तैयार करेगी। सवाल ये है कि बिजनेस के सधे-सधाए फॉर्मूलों को सलीके से अमल में लाने की ट्रेनिंग देने वाली कंपनी क्या इस देश के लोकतंत्र के लिए नौजवान नेता तैयार कर पाएगी। बात कुछ अटपटी लग रही है। लेकिन, कांग्रेस की अगली पीढ़ी के चेहरे राहुल ऐसी ढेर सारी अटपटी हरकतें कर रहे हैं।

वैसे राहुल की इस अटपटी हरकत की एक और वजह चिदंबरम के बजट भाषण को ध्यान से सुनने पर पता चलेगी। चिदंबरम ने बजट में युवाओं को तैयार करने के लिए राष्ट्रीय स्तर के नॉन प्रॉफिट स्किल डवलपमेंट कॉरपोरेशन का ऐलान किया है। इस कॉरपोरेशन को चलाने पर 15,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। सरकार कॉरपोरेशन को 1,000 करोड़ रुपए का शुरुआती फंड दे रही है। सूत्रों के मुताबिक, चिदंबरम ने ये ऐलान राहुल गांधी की ही सिफारिश पर किया है। और, इस कॉरपोरेशन के जरिए यूथ डेवलपमेंट का काम डेल कार्नेगी फर्म ही करेगी। यही फर्म राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए 16 दिन की स्किल डेवलपमेंट वर्कशॉप लगा चुकी है। अब तो समझ में आ ही गया होगा कि दुनिया के बिजनेस दिग्गजों को ट्रेनिंग देनी वाली फर्म कांग्रेसी युवा कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग क्यों दे रही है। वजह यही कि राहुल गांधी मानते हैं कि युवाओं को राजनीति में मौका नहीं मिल रहा है।

राहुल गांधी कह रहे हैं उड़ीसा इतना पिछड़ा है कि उन्हें अंदाजा ही नहीं लग पा रहा था। क्या ये मान लिया जाए कि अब तक राहुल गांधी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के अलावा किसी और राज्य से वाकिफ ही नहीं थे। इसीलिए उन्हें उत्तर प्रदेश सबसे पिछड़ा राज्य लगता था। क्या कालाहांडी जैसी जगह का नाम राहुल ने अब तक सुना ही नहीं था। दरअसल राहुल के ये दोनों बयान कुछ उसी तरह के बचकाने बयान हैं जैसा, राहुल ने उत्तर प्रदेश चुनावों के समय दिया था।

राहुल गांधी ने बयान दे दिया था कि अगर गांधी परिवार का कोई सत्ता में होता तो, बाबरी मस्जिद न गिरती। राहुल भूल गए थे कि बाबरी मस्जिद का ताला राजीव गांधी के समय में ही खुला था। लेकिन, उन्होंने एक उस समय के कांग्रेस प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हाराव को, जिसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वो नेहरू-गांधी खानदान का नहीं था, उसे कठघरे में खड़ा कर दिया। राहुल ने मुसलमानों को पटाने के लिए ये बयान दे दिया था। लेकिन, कुछ फायदा नहीं हुआ। वजह ये कि कांग्रेस पार्टी की जो हालत है उसमें अगर अगले पचास सालों तक गांधी परिवार का कोई न भी शामिल रहे तो, भी कांग्रेसी भरत की तरह सिंहासन पर गांधी परिवार की राम पादुका के ही सहारे सत्ता चला पाएंगे।

उत्तर प्रदेश चुनावों के समय राहुल गांधी ने कहा था कि हमें इस विधानसभा चुनाव के लिए नहीं अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी करनी है। तब जो खबरें आईं थीं कि राहुल के पास नौजवानों की एक पूरी टीम है जो, दिल्ली में उनके कार्यालय से लेकर उत्तर प्रदेश के हर जिले में राहुल के निर्देश पर पार्टी को मजबूत करने के लिए काम कर रही है। तब ये माना गया था कि राहुल सचमुच किसी लंबे समय की योजना पर काम कर रहे हैं। लेकिन, अब लोकसभा चुनावों की आहट से पहले राहुल का ये बचकाना बयान बताता है कि अभी राहुल को कांग्रेस का नेता बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। और, उनकी युवाओं की टीम भारतीय राजनीति की असलियत से वाकिफ ही नहीं है।

Thursday, March 06, 2008

का भई चाचा .... बोल भतीजा

अब फिर से बारी बूढ़े शेर बाल ठाकरे की थी। नया नवेला मराठी शेर ‘राज’ करने के लिए बूढ़े शेर की मांद में उसके हिस्से का शिकार निपटाने की तैयारी कर रहा था। शिकार है मराठी वोटबैंक और हथियार है मराठियों की अस्मिता। महाराष्ट्र में राज करने का ये हथियार इतने काम का है कि राज ठाकरे के साथ नाना पाटेकर जैसा अभिनेता भी इस हथियार को धार देने में जुट गया है। जबकि, नाना ऐसे मराठी अभिनेता हैं जिनकी अपील मराठियों से ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार के भैया लोगों में है।

नाना के पीछे सलमान, साजिद और दूसरे बॉलीवुड के सितारे अमिताभ बच्चन पर हमले के समय से हम साथ-साथ हैं का राग अलापते-अलापते अब मराठी अस्मिता का हथियार लेकर खड़े हो गए हैं। अब अमिताभ बच्चन क्या सलमान खान से भी कम मुंबईकर हैं। खैर, मैं बात कर रहा था बाल ठाकरे की। ये वो बाल ठाकरे हैं जो, भले ही भाजपा के साथ राज्य से लेकर केंद्र तक की सत्ता में भागीदार रह चुके हैं लेकिन, सच्चाई यही है कि बाल ठाकरे और कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में एक-दूसरे के हितों को बनाते-बचाते रहे हैं। अब मराठी अस्मिता का हथियार कितने काम का है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चार दशकों से भी ज्यादा समय की ठाकरे परिवार की राजनीति सिर्फ एक बार राज्य की सत्ता का स्वाद दिला पाई है वो, भी भाजपा की मदद से। क्योंकि, भाजपा को देश भर चल रही हिंदुत्व की लहर का फायदा मिला था। लेकिन, ज्यादातर ठाकरे परिवार की मराठी अस्मिता की राजनीति कांग्रेस के लिए राज्य और शिवसेना के लिए बीएमसी की सत्ता का अघोषित सौदा सा बन गया है। वैसे ये सारे लोग मराठियों की उन्नति के लिए ईमानदारी से कितना चिंतित हैं। उसे इस रिपोर्ट से समझा जा सकता है।

अब अगर मराठी-गैर मराठी जहर बोने के ठाकरे परिवार के मंसूबों के राजनीतिक निहितार्थ देखें तो, पार्टियों के लिहाज से कुछ बातें साफ-साफ दिख रही हैं। वोट करने वाले मराठियों में से करीब दस प्रतिशत मराठी ऐसा है जो, मराठी अस्मिता के नाम पर ठाकरे परिवार को आंख मूंदकर समर्थन करता है। उसे ये लगता है कि देश की इस समृद्ध मराठा संस्कृति को उसके हिस्से से बहुत कम मिला है। खासकर राजनीति में इस छोटे से मराठी समुदाय का ये मानना है कि उत्तर प्रदेश, बिहार के नेताओं ने उनके हिस्से से बहुत कुछ छीन लिया है। यही वजह है कि भाजपा का सहयोगी होने के बावजूद जब मराठी प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाने का मौका मिला तो, शिवसेना अपनी भूमिपुत्र की छवि को और पुख्ता करने में कामयाब हो गई।

लेकिन, अब अगर खांटी मराठी वोटबैंक यानी मराठियों के भी सिर्फ दस प्रतिशत लोगों की बात करें तो, वो चाचा-भतीजे की पार्टी में बंटेंगे। और, यही दस प्रतिशत वोटबैंक का बंटवार बूढ़े शेर बाल ठाकरे को पच नहीं रहा है। क्योंकि, वैसे भी भाजपा-शिवसेना की महाराष्ट्र में जो, स्थिति है। इन दोनों के ही पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। भाजपा तो वैसे भी प्रमोद महाजन के जाने के बाद से बिना मुखिया का कमजोर परिवार हो गया है। हाल ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर गोपीनाथ मुंडे को छोड़कर राज्य के किसी नेता काम नाम भी लोग नहीं जानते। और, गोपीनाथ मुंडे भी हर दूसरे बयान में अब भी प्रमोद महाजन की आत्मा के सहारे ही राजनीति करते दिखते हैं।

कुल मिलाकर शिवसेना को तो, फिर भी कुछ वोट मिलेंगे और राज्य में मारपीट-उत्पात के जरिए इनकी उपस्थिति बनी रहेगी। लेकिन, मराठी-गैर मराठी विवाद से सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को ही होगा। भाजपा के लिए ये मुद्दा गरम आलू की तरह हो गया है जो, न निगलते बन रहा है और न ही उगलते। आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने की आखिरी उम्मीद दिख रही है इसलिए, वो दिल्ली में बैठकर थोड़ा बहुत राज के खिलाफ बोल लिए। लेकिन, राज्य का कोई नेता चूं तक करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। और, अब तो बाल ठाकरे के खिलाफ आडवाणी भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे। क्योंकि, इस असलियत का अंदाजा उन्हें भी है कि राज्य में खोखली, बिना कार्यकर्ताओं की भाजपा शिवसेना के बिना लोकसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाएगी। वैसे भाजपा को इस विवाद का नुकसान उत्तर प्रदेश-बिहार में भी हो सकता है। क्योंकि, वहां पर लालू, मुलायम, मायावती जैसे क्षेत्रीय नेता भाजपा को इस बात के लिए दोषी ठहराएंगे कि महाराष्ट्र में भाजपा ने उत्तर भारतीयों का सम्मान ठाकरे परिवार के हाथों गिरवी रख दिया।

मराठी- गैर मराठी विवाद की आड़ में एनसीपी चुपचाप अपना आधार बढ़ाने में लगी है। मेरी एक बार एक उत्तर भारतीय पत्रकार से बात हो रही थी जो, मुंबई में कुछ सालों से रिपोर्टिंग कर रहा है। उसका कहना था कि शिवसेना मराठी के नाम पर हल्ला ज्यादा करती है। लेकिन, शिवसेना बीच-बीच में उत्तर भारतीयों को भी पटाने की कोशिश में लगी रहती है। उत्तर भारतीय संघ की बैठकों में अकसर मुस्कुराते उद्धव ठाकरे को अंगवस्त्रम ओढ़ते देखा जा सकता है। संजय निरुपम भले ही अब कांग्रेस में हैं लेकिन, मुंबई का सबसे जाना पहचाना उत्तर भारतीय नेता शिवसेना की ही पैदाइश है। जबकि, एनसीपी से ज्यादा मराठी क्षेत्रीयता की राजनीति शायद ही कोई पार्टी कर पाती हो।

गृह विभाग संभालने वाले आर आर पाटिल भी खुद को खांटी मराठी नेता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। नए साल की पार्टी के बाद छेड़छाड़ के आरोपियों के साथ आए राज ठाकरे से आर आर पाटिल की मुलाकात तो सबको याद होगी ही। शरद पवार और बाल ठाकरे की सबसे बड़ा मराठी नेता बनने की लड़ाई तो जगजाहिर है ही। विदर्भ में किसान मर रहे थे तो, भी भाजपा-शिवसेना एनसीपी का वोटबैंक नहीं छीन पाई। इसी इलाके की बारामती लोकसभा सीट से शरद पवार लोकसभा में जाते हैं लेकिन, शिवसेना-भाजपा इस इलाके की बदहाली के लिए पवार को जिम्मेदार तक नहीं ठहरा पाई। जबकि, कर्ज माफी का ऐलान होते ही चिदंबरम, सोनिया, मनमोहन को धन्यवाद देने वाले बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए एनसीपी ने इसका सारा क्रेडिट अपने मुखिया शरद पवार को दे दिया। और, साफ तौर पर एनसीपी को इसका बड़ा फायदा होता दिख रहा है।

लेकिन, मराठी-गैर मराठी विवाद का असली ब्लूप्रिंट कांग्रेस मुख्यालय से ही बनकर निकल रहा है। प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देने के बाद सारे अखबारों में छपी बाल ठाकरे के साथ मुख्यमंत्री देशमुख की मुस्कुराती हुई फोटो शायद ही अब लोगों को याद हो। देशमुख ने पहले राज को पूरी आग भड़काने की इजाजत दी और शिवराज पाटिल, श्रीप्रकाश जायसवाल को सोनिया ने उत्तर भारतीयों की सुरक्षा का भरोसा देने के लिए लगा दिया। और, अभी ये विवाद कांग्रेस कम से कम तब तक तो जिंदा रखना ही चाहेगी जब तक महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के ऐलान न हो जाएं। और, फिर अगले साल मई में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। हो सकता है थोड़ा पहले ही हो जाएं।

कुल मिलाकर राज ठाकरे और बाल ठाकरे जितना आग उगलेंगे, उस आग में विलासराव देशमुख की कुर्सी का आधार और मजबूत होगा। ठाकरे परिवार के लिए अच्छी बात ये है कि देशमुख से कमजोर मुख्यमंत्री शायद ही कोई और मिले। लेकिन, अपनी कुर्सी के लिए वोटबैंक की राजनीति में देशमुख की महारत की आने वाले दिनों में मिसाल दी जाए तो, गलत नहीं होगा। मराठी अस्मिता की लड़ाई के बीच जे डी विरकर का नाम डीजीपी के लिए तय होने के बाद एक गैर मराठी ए एन राय को महाराष्ट्र का डीजीपी बना दिया गया। हसन गफूर मुंबई के दूसरे मुस्लिम पुलिस कमिश्नर हैं। इन दोनों अधिकारियों की काबिलियत पर किसी को शक नहीं होना चाहिए। लेकिन, राज्य के दो सबसे जिम्मेदार पदों पर हुई ये नियुक्तियां और इनसे जुड़े समीकरण सिर्फ इत्तफाक तो नहीं हो सकते। अगर ये समीकरण बने रह गए तो, कम से कम एक राज्य में तो, कांग्रेस सत्ता में फिर लौटती दिख रही है। महाराष्ट्र का सारा चुनाव चाचा-भतीजा और देशमुख समीकरण पर होगा।

Wednesday, March 05, 2008

किसानों की चिंता करने वाले पत्रकार का सम्मान


गांव, किसान और कर्ज की समस्या। ये बाते मीडिया में बमुश्किल ही जगह पाती हैं। ऐसे में किसी अखबार के संपादक का खुद इस तरह की रिपोर्टिंग करना और अपने रिपोर्टर्स को इस तरह की खबरें करने के लिए प्रेरित करना पत्रकारीय मानदंडों को बचाने में मदद करता है। बुंदेलखंड के किसानों की समस्या, भुखमरी और किसानों को कर्ज के जाल में फंसाने वाले कारणों पर सार्थक रिपोर्ट्स के लिए अमर उजाला कानपुर के स्थानीय संपादक प्रताप सोमवंशी को के सी कुलिश मेरिट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र समूह ये पुरस्कार दे रहा है।

पहला अवॉर्ड पाकिस्तान के द डॉन और हिंदुस्तान टाइम्स को संयुक्त रूप से दिया गया है। इस अवॉर्ड के लिए दुनिया भर से आई 2286 एंट्रीज में से कुल दस मेरिट अवॉर्ड दिए गए। प्रताप सोमवंशी सातवें नंबर पर रहे। प्रताप सोमवंशी को ये अवॉर्ड 12 मार्च को दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों दिया जाएगा। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी यहां भी अध्यक्षता करेंगे। अवॉर्ड के निर्णायक मंडल में एन राम( संपादक-द हिंदू), पीयूष पांडे( एड-गुरू) और एचके दुआ(प्रधानमंत्री के पूवॆ सलाहकार) शामिल थे।

बुंदेलखंड में किसानों को कर्ज, सूखा की समस्या, डाकुओं का आतंक, डाकुओं को मिलने वाली राजनीतिक गोलबंदी पर अमर उजाला में प्रताप सोमवंशी की करीब 5 दर्जन रिपोर्ट छपी थीं। इसी आधार पर ही इलाहाबद हाईकोर्ट ने किसानों की मौत पर खुद नोटिस लेते हुए सरकार से जवाब मांगा था। सार्थक रिपोर्टिंग पर मिले इस सम्मान के लिए प्रताप सोमवंशी को बधाई।

कर्तव्य पथ से क्या क्या दिखने लगा है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi  आठ सितंबर 2022, भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण तिथि के तौर पर इतिहास में दर्ज हो...