Thursday, April 30, 2015

भारत में नेतृत्व का फर्क दुनिया को दिखने लगा है

विदेश सचिव, गृह सचिव और रक्षा सचिव- इन तीनों की एक साथ प्रेस कांफ्रेंस किसी भी खास मौके पर होने का उदाहरण भारत में ध्यान में नहीं आता। लेकिन, ये तीनों महत्वपूर्ण सचिव लगातार मीडिया से एक साथ मुखातिब हो रहे हैं और नेपाल में भारत के राहत कार्यों का पूरा विवरण देते हैं। ये कोई छोटी घटना नहीं है। ये भारत सरकार के नेतृत्व का फर्क है जो, भारत के लोग तो देख ही रहे हैं। दुनिया भी महसूस कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से नेपाल की मदद करने में तेजी दिखाई है वो, अद्भुत है। और ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री सिर्फ नेपाल की ही मदद करने में लग रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूकंप की शुरुआती खबर आते ही काम शुरू कर दिया। उन्होंने सबसे पहले बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से तुरंत बात की और केंद्र की तरफ से मदद भेज दी। नेपाल के प्रधानमंत्री तक पहुंचे। हर मदद का भरोसा दिलाया और उस भरोसे को पूरा कर रहे हैं। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये भी चाहते हैं कि दुनिया और देश के लोगों को ये पता चले कि इस भयानक आपदा में सरकार कैसे काम कर रही है। उसी का नतीजा है कि देश के तीनों महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सचिव एक साथ मीडिया से बात कर रहे हैं। इस प्रेस कांफ्रेंस से एक बात और साफ होती है कि तीनों मंत्रालयों के बीच तालमेल है और तीनों मंत्रालय एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। एक दूसरे पर किसी तरह की गलती की जिम्मेदारी डालने की स्थिति में नहीं हैं। ये भारत सरकार में काम करने का नया तरीका है। वरना एक ही सरकार के अलग-अलग मंत्रालय कैसे दूसरे मंत्रालय पर काम न होने का जिम्मा थोप देते हैं, ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। और ये पूरी तरह से नेतृत्व परिवर्तन का ही फर्क है। खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में स्वीकार किया कि उन्हें इस आपदा की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जरिए ही मिली। इतना प्रो एक्टिव प्रधानमंत्री भारत ने अब तक नहीं देखा है।

मानवता के नाते, पड़ोसी देश होने के नाते नेपाल में भारत सरकार की मदद का बहुत महत्व है। लेकिन, ऑपरेशन मैत्री का महत्व इस नाते से भी बहुत बढ़ जाता है कि चीन पाकिस्तान के साथ नेपाल में भी हर हाल में अपनी पकड़ मजबूत करने की हरसंभव कोशिश में लगा है। और चीन इस आपदा के समय भारत से पिछड़ते हुए नहीं दिखना चाहता। हमारा अपना मीडिया औरर मानस चीन के सामने इस तरह समर्पण की मुद्रा में रहता है कि ये कल्पना से परे है कि भारत चीन के सामने किसी मोर्चे पर बेहतर कर सकता है। लेकिन, अभी जिस तरह से खुद प्रधानमंत्री ने इसकी कमान संभाली है और दुनिया भर के देश भारत के आपदा राहत अभियान की कुशलता पर भरोसा कर रहे हैं वो, कमाल का है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहीं से कोई आपदा प्रबंधन या राहत की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है। लेकिन, समाज जीवन में रहते हुए उन्होंने जिस तरह की प्रशासनिक कुशलता दिखाई है उससे उनकी छवि दुनिया भर में एक बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन वाले नेता की बनती जा रही है। 2001 में भुज में आए भूकंप के बाद जिस तेजी से नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के तौर पर उस पूरे इलाके की तस्वीर बदली थी। वो, मोदी की आपदा प्रबंधन क्षमता के कुशल उपयोग का पहला उदाहरण था। केदारनाथ में आई त्रासदी में भी मोदी ने गुजरात के उन अधिकारियों की टीम के साथ काफी तेजी से काम किया। लेकिन, नरेंद्र मोदी के मार्केटिंग तंत्र की एक कमी से वो पूरा अभियान रैंबो विवाद में फंस गया था। उसके बावजूद सब ये मानते हैं कि प्रशासनिक कार्यकुशलता में मोदी के जोड़ का कोई नेता नहीं है। और इस छवि पर दुनिया का भरोसा भी कैसे बढ़ रहा है। उसका उदाहरण देखिए। नेपाल में अब तक डेढ़ सौ से ज्यादा विदेशी नागरिकों को बचाने का काम भारतीय सेना कर चुकी है। ये नागिरक 15 देशों के हैं। ये विदेशी नागरिक अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे विकसित देशों के हैं। जिनके बारे में ये पक्की धारणा रही है कि ये विदेशी धरती पर अपने नागरिकों की रक्षा में सबसे तेज हैं। अब अगर ये देश भी अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए भारत सरकार से मदद चाह रहे हैं तो, ये नेतृत्व का फर्क ही है। नेपाल को भारत के लोग अपने देश के विस्तार के तौर पर ही देखते हैं। बड़े भाई छोटे भाई जैसी भावना है। और नेपाल, भारत की बोली, व्यवहार में बहुत ज्यादा फर्क भी नहीं है। बहुतायत नेपाली भारत में और बहुतायत भारतीय नेपाल में पूरी तरह से बस गए हैं। इसका भी फायदा राहत कार्य में भारतीय टीम को मिल रहा है। चीन ने भी राहत कार्य में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन, मीडिया रिपोर्ट से पता चल रहा है कि चीन की टीम को भाषा की वजह से राहत कार्य तेजी से करने में दिक्कतें आ रही हैं। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत के तुरंत हरकत में आने का परिणाम ही था कि भारतीय एनडीआरएफ के राहत कार्य शुरू करने के एक दिन बाद बीजिंग की 69 सदस्यों की राहत टीम काठमांडू पहुंची। नेपाली सेना प्रमुख ने भी मीडिया से ये कहा है कि चीन की राहत टीम भी अच्छा काम कर रही है लेकिन, भारतीय टीम के साथ नेपाली ज्यादा जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। इससे भारतीय टीम को राहत कार्य में आसानी हो रही है।
 
और नेपाल का ये अभियान की पहला मौका नहीं है। इससे पहले यमन से भारतीयों को वापस लाने का काम भी भारत सरकार ने शानदार तरीके से किया था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और विदेशी राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह की अगुवाई में अद्भुत तरीके से भारतीय सेना ने भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने का काम पूरा किया था। भारतीय नेतृत्व पर ये दुनिया का बढ़ा भरोसा ही था कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, सिंगापुर से लेकर बहरीन, बांग्लादेश तक 23 से ज्यादा देश भारत के ही भरोसे अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हुए। ये सारी खबरें कोई भारतीय मीडिया में चल रही खबरें नहीं हैं। सीएनएन पर चल रही खबर के स्नैपशॉट ने तो उस समय इंटरनेट पर गजब तेजी से साझा की जा रही थी। सीएनएन की उस खबर में कहा गया था कि अमेरिका अपने नागरिकों को बचाने के लिए भारत की मदद ले रहा है। ये अगर अमेरिकी चैनल पर चल रही खबर न होती तो, शायद इसे भी मोदी विरोधी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी बताने से नहीं चूकते। सबसे बड़ी बात ये कि मोदी विरोधी उन पर जो आरोप लगाते हैं कि वो सारा श्रेय खुद ले लेते हैं। उसमें भी निराशा ही हाथ लगी होगीष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और विदेश राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह के शानदार प्रयासों की सार्वजनिक सराहना की है। उन्होंने ट्वीट किया कि हमारे सहयोगी सुषमा स्वराज और जनरल वी के सिंह ने,  जो पिछले कई दिनों से लगातार मैदान में डटे हैं, ने शानदार तरीके से भारतीयों को वापस लाने का काम किया है। प्रधानमंत्री की ये तारीफ दिखाती है कि अपने सहयोगियों से नेता की तरह काम लेना और उनके काम की सार्वजनिक सराहना करके प्रोत्साहित कैसे किया जाता है। विदेश राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह जिस तरह से भारतीयों को यमन से वापस लाने के काम में लगे हैं। उस तरह से शायद पहले की सरकारों में बड़े स्तर के अधिकारी भी नहीं लगते थे। यही फर्क है जो देश देखना चाहता है। पहले आतंकवाद के बीच से अपने नागरिकों को वापस लाने काम और अब पड़ोसी देश में हुई भीषणा त्रासदी में मदद की सबसे भरोसेमंद पहचान बनना भारत सरकार की बड़ी सफलता है। भारत में नेतृत्व का फर्क दुनिया को साफ दिखने लगा है।

 

Saturday, April 25, 2015

दस प्रतिशत की तरक्की का मजबूत होता आधार

दस प्रतिशत की तरक्की की सपना भारत फिर देख रहा है। सवाल ये है कि क्या भारत दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए जमीन तैयार कर पाया है। सवाल ये है कि क्या भारत के इस सपने को दुनिया सच मान रही है। उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या भारतीय कंपनियां नए उद्योग लगा रही हैं। क्या रोजगार के नए मौके बनते दिख रहे हैं। ये सारे सवाल इसीलिए खड़े हो रहे हैं कि इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यही सपना दिखाया था लेकिन, दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के नजदीक पहुंचते-पहुंचते सरकारी नीतियों में भ्रम से ये सपना बुरी तरह टूट गया। और इस कदर टूटा कि यूपीए दो के शासनकाल के आखिरी दिनों में भारत पांच प्रतिशत के आसपास की तरक्की की रफ्तार पर आकर टिक गया। अब एक बार फिर से नई सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दस प्रतिशत की तरक्की की तरफ्तार हासिल करने की बात की है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमान साफ कर चुके हैं कि इसी वित्तीय वर्ष में भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन जाएगा। ज्यादातर अनुमानों में भारत की तरक्की की रफ्तार इस वित्तीय वर्ष में साढ़े सात प्रतिशत या उससे ज्यादा रहने वाली है। जबकि, चीन पीछे छूटता दिख रहा है। चीन की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत या उससे भी कम रहने का अनुमान है। अनुमानों में चमकती इंडिया ग्रोथ स्टोरी को धरातल पर देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होगी। धरातल पर भी हालात यही है कि सबसे तेजी से तरक्की करने वाले देश में दुनिया के सारे निवेशक रकम लगाने को आतुर हैं। इमर्जिंग मार्केट्स में भारत में ही सबसे ज्यादा विदेशी संस्थागत निवेशक आ रहे हैं। इस साल अब तक एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक भारत में करीब साढ़े छे बिलियन डॉलर का निवेश कर चुके हैं। इसके बाद मेक्सिको, ब्राजील, साउथ कोरिया और ताइवान का नंबर आता है। और ये भरोसा सिर्फ एफआईआई के मामले में ही नहीं है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के आंकड़े इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर ज्यादा भरोसा साबित करते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले दस महीने में कुल 25.25 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। वित्तीय वर्ष 2013-14 में कुल 19 बिलियन डॉलर से कम का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ था।
 
दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए बहुत बड़े विदेशी निवेश की जरूरत है। फिर वो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हो या फिर संस्थागत विदेशी निवेश। इसलिए किसी भी तरह का विदेशी निवेश अगर भारत में इस तेजी से आ रहा है तो इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया के निवेशकों को इंडिया ग्रोथ स्टोरी भरोसे लायक दिख रही है। इसमें बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि भारत में नीतियों में भ्रम की स्थिति अब नहीं रही है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार नीतियों के मामले में यूपीए सरकार बहुत ज्यादा साफ और दृढ़ दिखती है। यही वजह है कि दुनिया की रेटिंग एजेंसियां लगातार भारत की रेटिंग बेहतर कर रही हैं। इसका असर साफ-साफ नजर आ रहा है। फरवरी महीने में औद्योगिक रफ्तार पांच प्रतिशत रही है जो पिछले तीन महीने में सबसे ज्यादा है। फरवरी महीने में कैपिटल गुड्स के उत्पादन की रफ्तार आठ प्रतिशत बढ़ी है। इसका सीधा सा मतलब अगर समझें तो, बड़ी मशीनों का ज्यादा उत्पादन हो रहा है। मतलब निर्माण और दूसरी गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मार्च महीने में कमर्शियल गाड़ियों की बिक्री में भी तेजी आई है। किसी अर्थव्यवस्था में कारोबारी इस्तेमाल के वाहनों की बिक्री बढ़ने का सीधा सा मतलब अर्थव्यवस्था में तेजी के अच्छे लक्षणों की तरह देखा जाता है। सर्विस सेक्टर में भी बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं। सर्विस सेक्टर में इस वित्तीय वर्ष के पहले दस महीने में 2.64 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। कुल मिलाकर निर्माण हो या सेवा क्षेत्र, दोनों ही क्षेत्रों में फिलहाल बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं।
 
यूपीए की सरकार में एक बड़ी समस्या नीतियों को लेकर रही। जिसकी वजह से नए प्रोजेक्ट शुरू करने में कारोबारी डरने लगे थे। उनको डर ये था कि प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद उससे संबंधित नीतियां बदल न जाएं। और इसका असर पुराने प्रोजेक्ट पर भी पड़ रहा था। ढेर सारे प्रोजेक्ट इसी वजह से शुरू हो ही नहीं पाए थे। अच्छी बात है कि मोदी सरकार में पुराने रुके पड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने में तेजी आई है। 2014-15 में करीब दो लाख करोड़ रुपये की रुकी योजनाएं शुरू हुई हैं। जबकि, इससे पहले के साल में सिर्फ सत्ताइस हजार करोड़ रुपये की ही रुकी योजनाएं शुरू की जा सकी थीं। सिर्फ निर्माण क्षेत्र की शुरू हुई योजनाओं की लागत करीब साठ हजार करोड़ है। जो, यूपीए के शासन से साढ़े पांच गुना ज्यादा है। यही बुनियादी परियोजनाओं की बात करें तो करीब छिहत्तर हजार करोड़ रुपये की रुकी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू हुई हैं। जो, 2013-14 से छे गुना ज्यादा है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि रुकी परियोजनाएं तेजी से शुरू हो रही हैं। साथ में नए प्रोजेक्ट भी तेजी से शुरू हो रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि लोगों को रोजगार के नए मौके मिलने वाले हैं। मोदी सरकार के पहले दस महीने में करीब 1900 प्रोजेक्ट शुरू करने का एलान हुआ है। इन योजनाओं में करीब दस लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। पिछले साल के मुकाबले यानी यूपीए दो शासन के आखिरी साल के लिहाज से देखें तो ये अस्सी प्रतिशत ज्यादा है। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि दुनिया को ऐसे ही नहीं भारत के भरोसे अर्थव्यवस्था में तेजी की उम्मीद नजर आ रही है। आईएमएफ चीफ क्रिस्टीन लागार्ड ने ऐसे ही नहीं कहा कि भारत काले घने बादलों के बीच चमकता सितारा है। दरअसल भारत में ये ताकत है कि वो दुनिया की अर्थव्यवस्था के घने बादलों को साफ कर सके। लेकिन, इसके लिए एक जो सबसे जरूरी बात है कि सरकारी नीतियों में भ्रम या बार-बार बदलाव की स्थिति न बने। वो देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों, कारोबारियों के लिए जरूरी शर्त है। अभी तक के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले देखें तो ये भरोसा बनता है। और अगर ये भरोसा बना रहा तो दस प्रतिशत की तरक्की का मनमोहिनी सपना नरेंद्र मोदी की सरकार में पूरा होता दिख सकता है।

Friday, April 24, 2015

लाइव टीवी ने कराई गजेंद्र की आत्महत्या

राजस्थान के एक किसान की आत्महत्या ने भारतीय राजनीति की अब तक की सबसे बड़े गिरावट देश के सामने पेश की है। ये गिरावट सिर्फ चरित्रहीनता, बेईमानी, मौकापरस्ती तक सीमित नहीं है। राजस्थान के किसान गजेंद्र की आत्महत्या भारतीय लोकतंत्र में संवेदना के मर जाने का पुख्ता प्रमाण है। एक और बबात जो एकदम साफ है कि गजेंद्र न तो उस तरह से किसान था और न ही उस तरह से किसी तरह की ऐसी समस्या में था जिसकी वजह से उसे दौसा से दिल्ली आकर इस तरह से आत्महत्या करनी पड़ती। अगर गजेंद्र विपन्न किसान नहीं थे जिसे अपनी फसल बर्बाद होने के गम में आत्महत्या करनी पड़ जाए तो, गजेंद्र सिंह इस तरह से आम आदमी पार्टी की किसान रैली में क्यों आया और क्या सचमुच वो जंतर मंतर पर आत्महत्या करने ही आया था। इसका जवाब पक्के तौर पर ना में है। क्योंकि, न तो वो विपन्न किसान था और न ही वो आत्महत्या करने आया था। दरअसल जबर्दस्त राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाला गजेंद्र लाइव टेलीविजन के जरिए मिलने वाली प्रतिष्ठा और इस लाइव टेलीविजन को अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करने में माहिर अरविंद केजरीवाल के खेल में फंस गया। गजेंद्र सिंह राजनीतिक, सामाजिक तौरर पर सक्रिय, जागरुक व्यक्ति थे। गजेंद्र को सामाजिक प्रतिष्ठा कि इस कदर शौक था कि राजस्थान के दौसा जिले में आने वाला शायद ही कोई बड़ा राजनीतिक व्यक्तित्व रहा होगा जिसने गजेंद्र के हाथ से उनकी पगड़ी न पहनी हो। गजेंद्र सिंह जयपुरिया साफे का कारोबार करते थे। उन्होंने देश-दुनिया के नामचीन लोगों को अपने हाथों से साफा पहनाया था, जिनमें बिल क्लिंटन, नेपाल के राष्ट्रपति परमानंद, मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसी हस्तियां शामिल हैं। गजेंद्र सिंह इस कला में इतनी महारत रखते थे कि वो एक मिनट में 12 लोगों के सिर पर पगड़ी बांध देते थे। इसके अलावा गजेंद्र 33 स्टाइल की पगडियां बांधने में भी निपुण थे। अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए उन्होंने बाकायदा वेबसाइट भी बनाई थी, तो फेसबुक जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी वो सक्रिय थे। गजेंद्र सिंह कल्याणवत मूल रूप से दौसा जिले के बांदीकुई विधानसभा इलाके के रहने वाले थे। गजेंद्र के चाचा प्रधान और सरपंच भी रह चुके थे। गजेंद्र ने बीजेपी के साथ राजनीति की शुरुआत की। वो बीजेपी के स्थानीय कार्यक्रमों में भागीदारी करते रहते थे और चुनाव लड़ने की ख्वाइश भी रखते थे। 2003 में जब बीजेपी की तरफ से गजेंद्र सिंह को टिकट नहीं मिला, तो गजेंद्र सिंह कल्याणवत ने सपा से टिकट हासिल किया और 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ा, जिसमें उनको बीजेपी की अल्का सिंह से हार का मुंह देखना पड़ा। गजेंद्र इसके बाद भी राजनीति में डटे रहे। उन्होंने 2013 तक सपा में रहकर राजनीति की। इस दौरान गजेंद्र ने सपा जिलाध्यक्ष से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य तक का सफर तय किया। हालांकि 2013 में उन्होंने विधानसभा टिकट मिलने की आस में कांग्रेस का दामन थाम लिया। लेकिन जब कांग्रेस में गजेंद्र सिंह की अनदेखी की गई, तो वो आम आदमी पार्टी के करीब आ गए। और उसी आम आदमी पार्टी में बेहतर स्थिति की तलाश में वो जंतर मंतर आए थे। गजेंद्र ने आत्महत्या के पहले जो कागज छोड़ा है उसमें उन्होंने लिखा है कि मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया है। उसमें वो बर्बाद फसल का भी हवाला दे रहे हैं। लेकिन, सलीके से उस नोट को पढ़ें तो उसमें कहीं भी आतमहत्या करने की कोई इच्छा नहीं दिखी है।

सवाल ये है कि फिर गजेंद्र ने आत्महत्या क्यों कर ली। तो, उसका जवाब ये है कि गजेंद्र ने आत्महत्या नहीं की। उसकी हत्या हुई है। और वो हत्या हुई है लाइव टेलीविजन के जरिए मिलने वाली प्रतिष्ठा की चाह ने। और इस चाह को बलवती बनाने का काम किया आम आदमी पार्टी ने। आम आदमी पार्टी देश की अकेली पार्टी होगी जिसने बेहद कम समय में एक राज्य की सत्ता हासिल कर ली। और उसे देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के सबसे मजबूत विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा है। हालांकि, असम गण परिषद में भी नौजवानों ने ऐऐसे ही सत्ता हासिल की थी। लेकिन, वो उदाहरण अलग है, वहां छात्र राजनीति से निकले लोगों ने अपनी तरह का संघर्ष करके सत्ता हासिल कर ली थी। वहां शायद लक्ष्य हासिल करने का इतना व्यवस्थित तरीका भी नहीं था। और सबसे बड़ी बात कि वो लाइव टेलीविजन का युग नहीं था। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुआ अन्ना का आंदोलन लाइव टीवी युग का आंदोलन था। और इस लाइव टीवी युग को शातिराना तरीके से भुनाने की कला अरविंद केजरीवाल को आती थी। लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के हालात समझने की बात हो, बनारस से चुनाव लड़ने की बात हो या अपने क्षीण शरीर का प्रदर्शन करते गंगा स्ना की बात हो या और आगे बनारस में जाकर अजान के लिए रैली में भाषण रोक देने की बात हो, सब अरविंद का लाइव टेलीविजन के लिहाज से तैयार किया गया कार्यक्रम था। अरविंद केजरीवाल ने इसे सलीके से इस्तेमाल कर लिया। टीवी के स्वनामधन्य संपादक लोग कब एक शातिर राजनेता अरविंद केजरीवाल के जाल में फंस गए, पता ही नहीं चला। अरविंद ने पूरी तरह से आम आदमी पार्टी और खुद के कार्यक्रमों को सिर्फ लाइव टेलीविजन के लिहाज से ही तैयार किया। अरविंद तुरंत असर चाहने वाले नेता हैं। इसलिए अरविंद आशंकित रहते थे कि लाइव टेलीविजन के अलावा टीवी के रिपोर्टर, प्रोड्यूसर की बुद्धि से तैयार होने वाले कार्यक्रम उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को साधने में असरदार होंगे। इन्सटेंट फूड, मीडिया के जमाने में अरविंद ने इन्सटेंट पॉलिटिक्स का फॉर्मूला तैयार कर लिया है। ये फॉर्मूला अरविंद की राजनीति के लिए अमृत बन गया है। और यही फॉर्मूला गजेंद्र के लिए जहर बन गया। सारे चैनलों पर बहस ज्यादातर भावुक हो रही थी। आजादी के बाद के पूरे राजनीतिक तंत्र को गाली देकर बात की जा रही थी। लेकिन, सीएनबीसी आवाज के संपादक संजय पुगलिया ने बहस में एक सवाल खड़ा किया कि क्या संपादकों को लाइव टीवी के लिए नए तरीके से गाइडलाइंस बनाने पर सोचना होगा। हालांकि, बहस में आए मेहमानों ने उस सवाल की गहराई को आगे ले जाने की कोशिश नहीं की। ज्यादातर भावुक बहस का ही दौर चल रहा था। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये भावुक होने का नहीं गंभीरता से सोचने का वक्त है कि कैसे एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले साफे के कारोबारी व्यक्ति को किसान का साफा पहनाकर आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने एक आत्महत्या के जरिए टीवी की स्क्रीन पर छाने की कोशिश की। ये आत्महत्या लाइव टीवी की टीआरपी और उसके जरिए अरविंद केजरीवाल की लोगों के दिलों-दिमाग पर छाने की घृणित कोशिश का परिणाम है। लाइव टीवी नहीं होता और लाइव टीवी के ही बूते मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी नहीं होती तो, गजेंद्र भी दौसा से आकर जंतर मंतर पर आत्महत्या नहीं करता।

Sunday, April 19, 2015

किसान विरोधी नरेंद्र मोदी!

#KisaanVirodhiNarendramodi इस समय ट्विटर ट्रेंड पर सबसे ऊपर चल रहे हैं। भावनात्मक तौर पर ऐसे नारे बड़े अच्छे लगते हैं। लेकिन, ये नारे जिसके लिए लगते हैं, उसके साथ कैसा अन्याय करते हैं, ये देश के गरीबों, महिलाओं और किसानों की हालत देखकर जाना जा सकता है। ये ट्विटर ट्रेंड भी उस समय है जब कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी करीब दो महीने की छुट्टी बिताकर किसानों की चिंता करने लौटे हैं। किसान की फसल खराब हुई। एक दिन भी राहुल खेत तक नहीं पहुंच सके। किसान ही राहुल के लौटने पर जैसे उनके घर के बाहर इंतजार में बैठे थे। @narendramodi ने कृषि मंत्री सहित दूसरे कई  मंत्रियों को खेतों तक भेजा, फसल की बर्बादी का सही अनुमान लगाने के लिए। मुआवजा बढ़ा, मुआवजे के लिए फसल आधी की बजाए 33% खराब होने को आधार बना दिया। सवाल ये है कि कौन है जो, किसान, गरीब को नारे से आगे नहीं निकलने देना चाहता। ये बड़ा सवाल इसलिए भी है कि 21वीं सदी में हर नारेबाज को 6-8 लेन की सड़क पर 100 के ऊपर रफ्तार में फर्राटा भरने वाली कार चाहिए। हर किसी को चमकता, वातानुकूलित घर, दफ्तर, स्कूल चाहिए। लेकिन, हर नारा लगाने वाला किसान को बेहतर नहीं होने देना चाहता। किसान की ऐसी चिंता क्यों होती है। कहीं ये चिंता तभी तो नहीं उभरती जब, गलती से किसान का कुछ भला होने जा रहा होता है। अच्छा है कि राहुल गांधी की वापसी के जश्न को कांग्रेसी किसानों की चिंता वाली रैली बता दे रहे हैं। एफएम रेडियो पर कांग्रेस की रैली का विज्ञापन भी साफ करता है कि कांग्रेस को चिंता सिर्फ हरियाणा के किसानों की है। वजह साफ है हरियाणा का किसान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान ही रामलीला मैदान की भीड़ बढ़ाने में मददगार हो सकता है। बस इसी तरह होती है किसानों की चिंता। अपनी ताकत बढ़ाने के लिए ही राजनीतिक पार्टियां किसानों, गरीबों का इस्तेमाल करती हैं। फिर चाहे वो कांग्रेस हो बीजेपी या दूसरी पार्टियां। इसीलिए ट्विटर के इस ट्रेंड को आगे बढ़ाने से पहले अच्छे से सोच समझ लें।

Tuesday, April 14, 2015

आज पूंजीवादी होते बाबा साहब!

महापुरुष होते हैं। बनाए जाते हैं। अद्भुत व्यक्तित्व के बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर दोनों थे। ये अलग बात है कि उनके हाथ में कानून की किताब संविधान विशेषज्ञ टाइप का और दलित हितों के रक्षक का ठप्पा, यही वाला उनके साथ सबसे मजबूती से जुड़ा रहा। लेकिन, डॉक्टर अम्बेडकर को समझना है तो, उन्हें समग्रता, संपूर्णता में समझना होगा। और यही उन्हें सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी। अगर आज भी उनकी 22 प्रतिज्ञाओं को लेकर कोई हिंदू धर्म से उन्हें विरोध में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है तो वो दरअसल बाबा साहब को समझ ही नहीं सका। कोई अगर आज भी उन्हें सिर्फ एक जाति के हितों का रक्षक बनाना-बताना चाह रहा है तो, उसकी नीयत में खोट है। बाबा साहब अद्भुत इस कदर थे कि आज हर कोई अपने तरीके से उनके जीवन के अलग-अलग समय के कर्तव्यों, वक्तव्यों में से अपने लिहाज से फिट बैठने वाली निकालकर उसी खांचे में बाबा साहब को फिट कर देना चाहता है। लेकिन, बाबा साहब आज होते तो आज के संदर्भ में उनकी सोच एकदम ही अलग होती। ये बात मैं इतने भरोसे से इसलिए कह रहा हूं कि उनके बचपन से लेकर जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर उन्होंने ढेर सारे सिद्धांत प्रतिपादित किए। उनमें समयानुकूल बदलाव भी किए। हां, एक बात जो स्थिर रही वो, ये कि शोषित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में कैसे लाया जाए। इसके अलावा सब मिथ्या है। अच्छा रहना, खाना ये उनका मंत्र था। और इसके लिए आर्थिक तरक्की जरूरी। इसलिए बाबा साहब आज होते तो पता नहीं पूंजीवादी का ठप्पा उन पर लगता या कुछ और। इसलिए अर्थशास्त्र के विद्वान डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर को याद कीजिए तो, पहले खुद के दिमाग के खांचे को तोड़िए। फिर बोलिए कि ये बाबा साहब इस संदर्भ में कहते थे।

Friday, April 10, 2015

अच्छा लगता है!

किसान कराहता ही अच्छा लगता है
किसान कर्ज के तले दबा ही अच्छा लगता है
किसान बर्बाद फसल दिखाता अच्छा लगता है
किसान गंदा दिखता ही अच्छा लगता है
किसान वोटबैंक बना अच्छा लगता है
किसान गरीब ही अच्छा लगता है
किसान फसल के भाव के लिए गिड़गिड़ाता ही अच्छा लगता है
किसान मैला कुचैला ही अच्छा लगता है
किसान चिंता करते बड़ा अच्छा लगता है
किसान कर्ज माफी पर खुश होता अच्छा लगता है
किसान भूखा रहे लेकिन, अन्नदाता कहलाना ही अच्छा लगता है
किसान के मरने की खबर टीवी पर देखना अच्छा लगता है
किसान अपनी छवि के नीचे दबा अच्छा लगता है
किसान का खुद की पहचान भूल जाना ही अब अच्छा लगता है
किसान याचक ही अच्छा लगता है
किसान कराहता ही अच्छा लगता है।

Thursday, April 09, 2015

भरोसा लौटने की राह पर भारतीय शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार दुनिया के दूसरे बाजारों के मुकाबले बेहतर ही रहा है। जब भारतीय शेयर बाजार एक ही स्तर पर लगातार करीब तीन सालों तक बने रहे, तब भी सेंसेक्स और निफ्टी दुनिया के दूसरे बाजार सूचकांकों से बेहतर करते रहे। लेकिन, यूपीए दो में भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा बहुत बन नहीं सका। फिर वो विदेशी निवेशक हों या देसी निवेशक या फिर कहें रिटेल इनवेस्टर। विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई को लुभाने के लिए यूपीए की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में हरसंभव कोशिश की लेकिन, मामला बन नहीं सका। मल्टीब्रांड रिटल में एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के फैसले के बाद भी धरातल पर इसका असर नहीं दिखा। यहां तक वॉलमार्ट और दूसरे विदेशी मल्टीब्रांड रिटेलर की कोई बड़ी रिटेल दुकान भारत के किसी कोने में चमकती नहीं दिख सकी। इस सबका असर ये रहा कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी और देसी निवेशक प्रवेश करने से बचते रहे। उस पर दुनिया की रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत और भारतीय शेयर बाजार की साख बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तीन साल से स्थिर शेयर बाजार से विदेशी निवेशक भाग रहे थे। साथ ही 2008 में बुरी तरह से मार खाए देसी निवेशक तो दलाल स्ट्रीट के रास्ते की तरफ से गुजरना भी मुनासिब नहीं समझ रहे थे। लेकिन, अब एक बार फिर से शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा वापस लौटता दिख रहा है। विदेशी और देसी निवेशक दोनों ही फिर से शेयर बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। विदेशी निवेशक तो पूरी तरह से वापस आ गया है। लेकिन, देसी निवेशक अभी तोड़ी हिचक दिखा रहा है। हालांकि, ताजा डीमैक खाता खोलने के आंकड़े इस बात को पुख्ता कर रहे हैं कि भारतीय शेयर बाजार का भरोसा लौटा है। हां, 2008 वाला भरोसा पाने के लिए भारत सरकार और बाजार को अभी बहुत कुछ करना होगा।
 
मई में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई तो जैसे शेयर बाजार को पंख लग गए। शेयर बाजार का अहम सूचकांक तीस हजार के पार चला गया। दुनिया की हर रेटिंग एजेंसी ने भारत की क्रेडिट रेटिंग निगेटिव से पॉजिटिव कर दी। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीना लागार्डे ने साफ कहा है कि दुनिया के निराशा भरे आसमान में भारत एक चमकता सितारा है। दुनिया के जानकार ये मान रहे हैं कि भारत सिर्फ एशिया में ही नहीं सभी उभरते बाजारों में सबसे बेहतर मुनाफा देगा। और यही वजह है कि विदेशी निवेशक धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। अप्रैल 2014 में भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की खरीद की थी। मई में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई तो ये निवेश बढ़कर साढ़े सोलह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया। सिर्फ मई महीने में ही नहीं नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद बीते साल के हर महीने में विदेशी निवेशकों ने जमकर खरीद की। सिर्फ साल का आखिरी महीना दिसंबर अपवाद रहा। दिसंबर महीने में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध बिकवाली की और साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच दिए। लेकिन, फिर नए साल में विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटा और जनवरी में एफआईआई ने साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर खरीदे। फरवरी में करीब नौ हजार करोड़ रुपये और मार्च 2015 यानी बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में विदेशी निवेशकों ने करीब नौ हजार करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश भारतीय शेयर बाजार में किया। ये भारतीय शेयर बाजार में दुनिया का भरोसा दिखाता है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि शेयर बाजार के नजरिये से क्या देसी निवेशकों को भी नरेंद्र मोदी की सरकार पर उतना ही भरोसा है। कम से कम आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में बाजार में पैसा लगाकर मुनाफा कमाने की इच्छा देसी निवेशक में भी बलवती हुई जाती है। शेयर बाजार में निवेश करने के लिए जरूरी है कि डीमैट खाता खोला जाए। 31 मार्च को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में खुले डीमैट खाते पिछले चार सालों में सबसे ज्यादा हैं। एक अप्रैल 2014 से 31 मार्च 2015 के बीच सोलह लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं। वित्तीय वर्ष 2014 में आठ लाख सात हजार, 2013 में दस लाख इकसठ हजार और वित्तीय वर्ष 2012 में दस लाख दो हजार डीमैट खाते खुले थे। बीजेपी की सरकार बनने के लिए हर महीने करीब आठ प्रतिशत ज्यादा डीमैट खाते खुल रहे हैं। और सबसे अच्छी बात ये है कि तुरंत बीते वित्तीय वर्ष में खुले खातों में से पचासी प्रतिशत से ज्यादा डीमैट खाते नए खाताधारकों के हैं। यानी देसी निवेशकों का भरोसा तेजी से लौट रहा है। तेजी से खुलते डीमैट खातों के बूते देश में ढाई करोड़ से ज्यादा निवेशक शेयर बाजार से सीधे जुड़ गए हैं। निवेशकों को इसका फायदा भी मिला है। अप्रैल से मार्च तक शेयर बाजार के दोनों अहम सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी 33 प्रतिशत से ज्यादा बढ़े हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 2008 में बुरी तरह से भरोसा खोने के बाद भारतीय शेयर बाजार में देसी छोटे, मंझोले निवेशकों का भरोसा फिर से लौट रहा है। उसे लग रहा है कि एक बार फिर से देश की तरक्की से देश की कंपनियों को होने वाली तरक्की उनके शेयर भाव में भी दिखेगी। और शेयर बाजार में भारतीय कंपनियों में किया गया उनका निवेश उन्हें मुनाफा देगा। मतलब साफ है कि सरकार ने पहली बाधा मजबूती से पार कर ली है। देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों का खोया हुआ भरोसा लौट आया है। लेकिन, ये पहली बाधा पार करने जैसा ही है। अभी नरेंद्र मोदी की सरकार को मनमोहन सिंह की सरकार के पहले कार्यकाल यानी यूपीए वन के आखिरी साल से पहले तक का भरोसा बनाना बाकी है। 2008 में दुनिया में आई मंदी और इसके बुरे परिणाम से ध्वस्त हुए शेयर बाजार में देसी निवेशकों का उसके पहले जैसा भरोसा अब तक नहीं बन सका है। यानी कम से कम शेयर बाजार और तरक्की के मोर्चे पर 2008 जैसा माहौल बनना बाकी है। जनवरी 2008 के पहले आठ दिनों में देसी निवेशकों ने करीब एक लाख साठ हजार डीमैट खाते खोले थे। ये वो दौरर था जब रिलायंस पावर का बहुप्रतीक्षित आईपीओ आना था। और हर कोई शेयर बाजार में निवेश करके तगड़ा मुनाफा कमा लेना चाहता था। लेकिन, वही आईपीओ शेयर बाजार में आईपीओ में निवेश करने वाले लोगों के लिए बुरे सपने की तरह साबित हुआ। और 2008 की मंदी में भारतीय शेयर बाजार और रिलायंस पावर के आईपीओ में मार खाए देसी निवेशक ने तेजी से डीमैट खाता बंद कराकर बाजार से दूरी बना ली। उसके बाद 2010 में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने ही निवेशकों को फिर से बाजार की तरफ खींचा। लेकिन, 2008 के बाद से अब तक कोल इंडिया को छोड़कर कोई ऐसा आईपीओ नहीं आया जो, निवेशकों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहा हो। मतलब साफ है कि भारतीय शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की संभावनाओं की कहानी फिर से अभी शुरू ही हुई है। और अच्छा हो कि शेयर बाजार इस बार प्राइमरी मार्केट में आए निवेशकों को साध सके। देसी कंपनियों की निवेश योजनाएं पहले से काफी बेहतर हुई हैं। विदेशी कंपनियों को भी मोदी सरकार का मेक इन इंडिया लुभा रहा है। मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रस्ट्रक्चर के मोर्चे पर काफी कुछ हो रहा है। चार महीने में सबसे बेहतर काम मैन्युफैक्चरिंग में होता दिखा है। सड़क बनाने के काम में नितिन गडकरी का मंत्रालय बेहतर कर रहा है। हालांकि, तीस किलोमीटर प्रतिदिन के महात्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में अभी बहुत लंबी दूरी तय करनी है। फिर भी बारह किलोमीटर प्रतिदिन का लक्ष्य हासिल करना भी बड़ी कामयाबी मानी जानी चाहिए। कुल मिलाकर सरकार की दिशा सही है। बस इसकी रफ्तार बेहतर करने की जरूरत है। फिर 2008 के पहले वाला भरोसा और दस प्रतिशत की तरक्की वाला सपना पूरा होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

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