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Saturday, February 27, 2016

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे हैं पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम

खतरनाक है ये। कितना खतरनाक इसका अंदाजा तो अभी लगाना मुश्किल है। आगे चलकर पता चलेगा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखने, देश की बर्बादी के नारे लगाने और देश की संसद पर हमला करने की साजिश रखने वाले आतंकवादी अफजल गुरू को शहीद बताने वाले छात्रों के समर्थन की राजनीति और आगे चली गई है। हालांकि, इसे राजनीति क्यों कहा जाना चाहिए। क्योंकि, राजनीति तो सत्ता पाने के लिए, सत्ता चलाने के लिए की जाने वाली नीति है। लेकिन, शायद कांग्रेस सत्ता पाने के लिए कहीं तक भी जाने को राजनीति का हिस्सा ही मानने लगी है। इसी तरह की राजनीति में यूपीए के शासनकाल में भ्रष्टाचार की सारी हदें पार हो गईं। और कांग्रेस, सत्ता बनी है, इसी से खुश रही। लेकिन, इसी राजनीति की ही वजह से मई 2014 में कांग्रेस के साथ वो हुआ, जो किसी ने कल्पना नहीं की थी। कांग्रेस के उस खराब दशा में पहुंचने के बाद कांग्रेस के महासचिव और कांग्रेस के पर्दे के पीछे के बड़े नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि कांग्रेस से हिंदुस्तान को समझने में भूल हो गई है। जाहिर है कोई भूल हो, तो उसे सुधारने का काम होना चाहिए। लेकिन, हुआ उल्टा। इस स्वीकारोक्ति के बाद कांग्रेस में जनार्दन द्विवेदी की अहमियत और घट गई। अब पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम हिंदुस्तान को समझने में हुई गलती को और बड़ा कर रहे हैं। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक साक्षात्कार में कह दिया कि अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो शायद अफजल मामले पर सही फैसला नहीं हुआ। चिदंबरम ने और आगे जाते हुए साक्षात्कार में कहा है कि इस बात पर काफी संदेह है कि अफजल संसद पर हमले के मामले में कितना शामिल था।

किसी भी मसले पर अपनी राय निजी तौर पर रखने के लिए कोई भी स्वतंत्र है। लेकिन, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा तो तय करनी होगी। अभी के माहौल में, जब मैं राष्ट्रद्रोही हूं, कहकर ढेर सारे पत्रकार, बुद्धिजीवी जेएनयू में आतंकवादियों के समर्थन में छात्रों के उतरने को सिर्फ असहमति साबित करने की कोशिश कर रहे हों। ऐसे माहौल में जब देश का पूर्व गृहमंत्री अफजल गुरू को फांसी देने की न्यायिक प्रक्रिया पर ही संदेह जता दे, तो मामला सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं रह जाता है। वो भी एक ऐसा कांग्रेसी गृहमंत्री जो कांग्रेस की सरकार में गृहमंत्री और वित्तमंत्री जैसे अहम ओहदों पर रह चुका हो। पी चिदंबरम का गृहमंत्री के तौर पर नक्सलियों से कड़ाई से निपटने के मामले में अपनी ही पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह से मतभेद खुले तौर पर सामने दिखा था। वो चिदंबरम अगर अब नक्सली से भी आगे आतंकवादी के समर्थन में आए छात्रों के खड़े होने को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, तो खतरनाक मिसाल बनती दिख रही है। अफजल गुरू पर संसद पर हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप है और सबसे बड़ी बात ये कि अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के यहां से दया याचिका खारिज होने के बाद ही फांसी दी गई। अफजल गुरू के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया 2002 में शुरू हुई थी। लेकिन, 2004 से लेकर 2013 यानी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने तक कांग्रेस की ही सरकार थी। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि कानूनी प्रक्रिया में अफजल गुरू के खिलाफ आरोप साबित करने, जुटाने का काम कांग्रेस की सरकार के दौरान ही हुआ। निश्चित तौर पर ये कतई नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस ने बिना वजह अफजल गुरू को संसद पर हमले की साजिश में फंसाने का काम किया होगा। दिसंबर 2001 में हुए संसद हमले के लिए आतंकवादियों को छिपने की जगह देने के साथ ही दूसरी तरह की मदद का आरोप अफजल गुरू पर साबित हुआ है। संसद पर हुए हमले के ठीक पहले की कॉल डिटेल से ये साबित हुआ है कि अफजल गुरू इस मामले में पूरी तरह से शामिल रहा। 2002 में पोटा कोर्ट ने अफजल गुरू को हमले की साजिश का दोषी पाया। उसके बाद 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके बाद 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी अफजल को दोषी ही पाया। यहां यह तथ्य भी बेहद जरूरी है कि अफजल को फांसी से बचाने के लिए हिंदुस्तान से लेकर दुनिया भर के सारे मानवाधिकारवादी लगे रहे। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय से भी फांसी की सजा बरकरार रहने के बाद अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ अफजल की पत्नी ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी डाली। उस समय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी थे। प्रणब मुखर्जी ने अफजल गुरू की दया याचिका को खारिज कर दिया। यानी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी संसद हमले में अफजल की भूमिका लगी होगी। इसके बाद 9 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को कांग्रेस की सरकार ने तिहाड़ जेल के भीतर ही फांसी दे दी। और सबसे गलत काम किया कि अफजल के परिवार को सूचना देना तक जरूरी नहीं समझा। हालांकि, तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं कि सूचना भिजवाई गई थी। सुशील कुमार शिंदे ने पी चिदंबरम के वित्तमंत्री बनने के बाद गृहमंत्री की कुर्सी संभाली थी। इस लिहाज से 2008 से 2012 तक यानी चार साल तक हर तरह से अफजल गुरू को न्याया दिलाने के लिए हरसंभव कोशिश करने का मौका पी चिदंबरम के पास था। अगर कहीं कोई गलती हो रही थी, तो उसको सुधारने का अवसर था। लेकिन, गृहमंत्री रहते चिदंबरम को भी अफजल गुरू की फांसी न्यायोचित लगी होगी।


फिर आज ऐसा क्या हो गया है कि अचानक पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को ये लगने लगा कि अफजल गुरू के साथ शायद न्याय नहीं हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस मत परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ी वजह आज का माहौल है। देश में माहौल कुछ इस तरह का है कि देशभक्त होने को भी तथाकथित बुद्धिजीवी गाली बना देने पर तुले हुए हैं। वहीं खुद को देशद्रोही कहकर ढेर सारे बुद्धिजीवी, पत्रकार सरकार को चुनौती दे रहे हैं। क्या इसी माहौल का फायदा उठाकर पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम सरकार को असहज करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन, ये बेहद खतरनाक मिसाल होगी। जहां कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता और लंबे समय तक देश के गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम देश विरोध की भावना का जानबूझकर समर्थन करते दिख रहे हैं। ये वही पी चिदंबरम हैं, जिन्होंने गृहमंत्री रहते 2010 में कहा था कि वामपंथी अतिवाद आतंकवाद से भी खतरनाक है। साक्षात्कार में नक्सली समस्या पर बात करते हुए पी चिदंबरम ने कहा – नक्सली राज्य और सेना को दुश्मन कह रहे हैं। सच तो ये है कि वो सेना को दुश्मन की सेना कह रहे हैं और इसे युद्ध बता रहे हैं। मैं ऐसे शब्दों को नापसंद करता हूं। गृहमंत्री रहते नक्सलियों के देश विरोधी, सेना विरोधी शब्दों को नापसंद करने वाले पी चिदंबरम आज विपक्ष के नेता के तौर पर उन्हीं को बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले साल नवंबर महीने में पी चिदंबरम ने लिट्रेचर फेस्टिवल में, क्या भारत एक उदार गणराज्य है, विषय पर बोलते हुए कहा था कि राजीव गांधी सरकार का सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेस को प्रतिबंधित करना गलत था। यहां ये भी जान लेना जरूरी है कि 1988 में जब ये पुस्तक भारत में प्रतिबंधित हुई, तो पी चिदंबरम गृह राज्यमंत्री थे। गलत किए हुए की स्वीकारोक्ति गलत नहीं है। लेकिन, सरकार में रहते हुए खुद के किए हुए को विपक्ष में रहते सिर्फ इसलिए गलत बताना कि इससे अभी की सरकार को असहज किया जा सकता है। खतरनाक मिसाल बन रहा है। नुकसान देश का हो रहा है।

Tuesday, June 18, 2013

चिदंबरम साहब इतनी भी नहीं सुधरी है अर्थव्यवस्था

12 जून को अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग बढ़ाने का एलान किया। हालांकि, इसे अगर ध्यान से समझें तो ये रेटिंग बढ़ने से ज्यादा बद से बदतर हुई साख के थोड़ा सुधरने का मसला था। लेकिन, लंबे समय से ऐसी किसी खबर के इंतजार में बैठी सरकार और उसके वित्त मंत्री के लिए इससे बेहतर खबर भला क्या हो सकती थी। फिच के मुताबिक अब भारत में निवेश करने वालों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। ढेर सारे आर्थिक सुधारों की जरूरत है लेकिन, सरकार सही रास्ते पर जा रही है। और, इसीलिए रेटिंग एजेंसी ने भारत का आउटलुक निगेटिव से बढ़ाकर स्थिर कर दिया। और, सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम को भी फिर से वित्त मंत्रालय में आए 9 महीने भी बीत चुके हैं। ठीक 9 महीने बाद आई इस शुभ खबर के बहाने वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश को ये बताने की कोशिश की कि उनके आने के बाद अर्थव्यवस्था के हालात कितने बेहतर हुए हैं। इसलिए रेटिंग सुधरने के अगले दिन चिदंबरम साहब मीडिया के जरिए देश के सामने थे। रेटिंग सुधारने के फिच के फैसले के जरिए उन्होंने समझाने की कोशिश कि ज्यादातर मोर्चों पर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर लौट आई है। और जहां कमी रह गई है उसे 2 महीने यानी जून और जुलाई के महीने तक सुधार लिया जाएगा। 

वित्त मंत्री की उम्मीदों को और परवान मिला लगे हाथ आए महंगाई दर के आंकड़ों से। होलसेल प्राइस इंडेक्स के आंकड़े बता रहे हैं कि मई में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही जबकि, अप्रैल में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही थी। इस लिहाज से महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 3 साल में सबसे कम रही है। यही महंगाई का वो आंकड़ा है जिसके आधार पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी मौद्रिक नीति तय करता है। इसका मतलब ये कि इसी के आधार पर ब्याज दरें घटेंगी या बढ़ेंगी ये तय होता है। हालांकि, घटती महंगाई दर में आम जनता के लिहाज से एक आंकड़ा जो और छिपा हुआ है जिसकी चर्चा सरकार कम ही करना चाहेगी वो है फूड इनफ्लेशन यानी खाने पीने के सामानों की महंगाई दर। दरअसल फूड इनफ्लेशन अभी भी 8.25% प्रतिशत है। जबकि, पिछले साल मई में ये 6.08%  था। शायद फूड इनफ्लेशन के इस स्तर पर होने की ये वजह ही है कि वित्त मंत्रालय के साफ इशारों के बाद भी रिजर्व बैंक उस रफ्तार से ब्याज दरें नहीं घटा रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही है। और, एक दूसरा पहलू ये भी है कि रिजर्व बैंक चाहता है कि पहले बैंक रेपो रेट में की गई कटौती को लोगों तक पहुंचाएं। क्योंकि, इस साल पौना प्रतिशत और पिछले साल अप्रैल से अब तक रिजर्व बैंक सवा प्रतिशत रेपो रेट घटा चुका है लेकिन, आशंकित बैंक अभी भी ग्राहकों को इस कटौती का फायदा नहीं दे रहे हैं। हाल ये है कि अभी भी अगर घर के लिए किसी को कर्ज लेना है तो, साढ़े दस प्रतिशत के नीचे के ब्याज पर कर्ज मिलना लगभग असंभव है। सरकारी बैंक एसबीआई दस प्रतिशत के आसपास ब्याज पर कर्ज दे रहा है लेकिन, उससे कर्ज मिलना देश के ज्यादातर प्रोजेक्ट के लिए लगभग असंभव है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि अगर कोई अभी घर के लिए कर्ज लेगा तो, उसे बैंक को इस ब्याज दर पर कर्ज ली गई रकम का दोगुना 20 सालों में चुकाना होगा।

फिच की रेटिंग सुधरने के बहाने वित्त मंत्री ने स्थापित करने की कोशिश की कि महंगाई घटी है, विदेशी कर्ज भी कम हुआ है और रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है जो, बेहतर होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है। ये काफी हद तक सही भी है कि पिछले 9 महीने में देश की अर्थव्यवस्था सुधरी है या यूं कहें कि अर्थव्यवस्था सुधरने के संकेत सुधरे हैं। लेकिन, इस बात की चर्चा भले कम हो और रिजर्व बैंक फैसले महंगाई के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर लेता हुआ न दिखे। सच्चाई यही है कि इन 9 महीनों की छोड़िए 2009 में यूपीए दो आने के बाद से इस देश के लोगों को जिस महंगाई का सामना करना पड़ा है वो दस प्रतिशत के ऊपर है। आंकड़ों में भी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) से तय होने वाला रिटेल इनफ्लेशन 2009 में 10.83 प्रतिशत रहा। 2010 में ये 12.11 प्रतिशत पर पहुंच गया। 2011 में इसमें काफी कमी आई लेकिन, फिर भी ये 8.87 प्रतिशत रहा। 2012 में फिर 9.30 प्रतिशत हो गया और इस साल की बात करें तो, औसत महंगाई करीब साढ़े ग्यारह प्रतिशत है। 
ये महंगाई दर के आंकड़े अगर कम भयावह दिखते हैं तो, इन्हें कुछ और आंकड़ों के साथ रखकर देखिए अर्थव्यवस्था की स्थिति और साफ हो जाएगी। महंगाई की मार झेलने वाले देश के लोगों की जेब में रकम कितनी बढ़ रही है इस पर नजर डालिए। 2012-13 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय बढ़कर 39,168 रुपए हुई ये 2011-12 से सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ी है। जबकि, 2011-12 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 4.7 प्रतिशत बढ़ी थी। महंगे कर्ज के बोझ से परेशान कंपनियों के तिमाही नतीजे और बीते वित्तीय वर्ष में दस साल में सबसे कम तरक्की की रफ्तार अर्थव्यवस्था की चुनौती के हालात साफ साफ बयान कर देती है। बीते वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार पांच प्रतिशत रही है। हालांकि, ये साल सुधार का साल है। और आगे अर्थव्यवस्था सुधरती दिख रही है। लेकिन, अगर सबकुछ अच्छा रहा तो, भी 2015 में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत के नीचे ही रहती दिख रही है। ये अनुमान विश्व बैंक का है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2014 में खत्म होने वाले यानी इस वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान 5.7 प्रतिशत का है। जो पूरी तरह से निर्यात के बेहतर आंकड़ों और निवेश पर टिका हुआ है। वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर दिखाई। कोयला, गैल, फर्टिलाइजर क्षेत्र में निवेश की बेहतर तस्वीर भी दिखी। साथ ही वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया कि विदेशी निवेश की शर्तें बेहतर करने के लिए चंद्रशेखर समिति की सिफारिशों पर 25 जून को होने वाला सेबी की बैठक में कुछ अच्छे फैसले लिए जाएंगे। हफ्ते के आखिरी दिन अच्छी तेजी देखने को मिली। लेकिन, शुक्रवार को 350 अंक से ज्यादा चढ़ने के बाद भी सेंसेक्स अभी बमुश्किल उन्नीस हजार से कुछ आगे ही जा पाया है। जो, कितने दिनों तक टिकेगा पता नहीं। जनवरी 2008 में 21000 पार करने वाला सेंसेक्स आज तक 21000 छोड़िए 19000 के आसपास ही लहराता रह जा रहा है। वित्त मंत्री भरोसा दिला रहे हैं कि रुपए की औकात डॉलर के मुकाबले अब और नहीं गिरेगी। वैसे 2008 में 1 डॉलर के लिए 46 रुपए के भाव वाला रुपया गिरकर अब 59 के भाव तक पहुंच गया है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम बार-बार लोगों से अपील कर रहे हैं कि सोना मत खरीदो और उनकी इस चाह में मैं भी पूरी तरह से साथ हूं लेकिन, सोने के अतिमोह वाले भारतीयों के मन का क्या करेंगे कि जिस दिन उन्होंने भरे गले से ये अपील की उस दिन भी सोने का भाव 360 रुपए प्रति दस ग्राम चढ़ गया। फिर अभी तो शादियों का सीजन शुरू हो रहा है। उसके बाद त्यौहारों की झड़ी लग जाएगी। फिर भारतीय कहां से चिदंबरम साहब की अपील सुनने लगे। सोने पर आयात ड्यूटी जनवरी से दोगुनी हो चुकी है। चार प्रतिशत लगती थी अब आठ प्रतिशत लगती है फिर भी भारतीयों का सोना प्रेम बहुत कम नहीं हो पा रहा है। भारतीयों के बीच सोने की हैसियत जितनी बढ़ेगी और भारतीय रुपए की हैसियत दुनिया में जितनी गिरेगी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत उतनी ही तेजी से सिर के बल चलने लगेंगे। पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर सब्सिडी घटाकर सरकार ने सब्सिडी बिल काफी कम कर लिया है। लेकिन, डीजल की कीमत अठन्नी बढ़ती हुई और पेट्रोल की कीमत रुपए दो रुपए बढ़कर सरकार के महंगाई घटने के सपने को फिर से आधी नींद में हो तोड़ देगी। और, चुनाव नजदीक हैं तो, सरकार खर्चे घटाने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। खुद वित्त मंत्री अब कह रहे हैं कि सभी मंत्रालय खर्च तेजी में करें। तो वित्तीय घाटा तो सुरसा के बढ़ते मुंह की तरह और खुलने के लिए तैयार ही बैठा है। यही वजह रही वित्त मंत्री जी कि आपके लाख इशारे के बाद भी 17 जून को रिजर्व बैंक ने चवन्नी रेट भी नहीं गिराया अब कम से कम 30 जुलाई तक के लिए कर्ज सस्ता होने की उम्मीद धूमिल हो गई है। वित्त मंत्री जी रिजर्व बैंक पर दबाव बनाने से पहले आपको बैंकों पर दबाव बनाना होगा कि वो कर्ज सस्ता करें।

प्रधानमंत्री जी एनर्जी पॉलिसी बेहतर कीजिए जिससे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खोज का काम तेज हो और पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली से पूछिए और इस बात का इंतजाम कीजिए कि देश की पेट्रोलियम पॉलिसी में बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके। क्योंकि, सारा खेल भरोसे का है अगर देश के लोगों को ये लगेगा कि कोई और ताकत देश को चला रही है तो, भला वो भरोसा कहां से आएगा। और, अगर भरोसा नहीं आया तो फिर ये यूपीए दो के आखिर में अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर का सपना दिखाकर यूपीए तीन बनाने का सपना भी सपना ही रह जाएगा।

Tuesday, January 15, 2013

20000 का बाजार और यूपीए की सरकार!

क्या बाजार का मूल स्वभाव ही चोरी, सट्टेबाजी है। कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के समय के एक कानून को 2016 तक के लिए टालने का एलान किया। ये कानून इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों को ज्यादा अधिकार देता है कि वो..., विदेशियों की भारत में टैक्स चोरी के मामले की अच्छे से जांच कर सकें। तब से हंगामा मचा था। चिदंबरम ने आते ही इसे 2013-14 तक टाला था। लेकिन, इत्ते से बात नहीं बनी। अब विदेशी निवेशकों को राहत है कि ये कानून GAAR 2016 तक लागू नहीं होगा। इससे बाजार कल खूब भागा। आज भी। बाजार के काम करने की क्या यही मूल शर्त है कि चोरी करने वालों पर शिकंजा न कसे। वो, उसी रकम को घुमाते रहें और बाजार बढ़ाते रहें।
 
 
वैसे, अपने पी चिदंबरम साहब बाजार भगाने के पुराने उस्ताद हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हैं और ये 2013 की शुरुआत है यानी करीब डेढ़ साल का समय है। 2007 अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा पता नहीं कितने लोगों को याद है। यही पी चिदंबरम साहब वित्त मंत्री थे। शेयर बाजार अचानक धड़ाधड़ कर गिरने लगा था। सट्टेबाजों ने तेजी से निवेश निकालना शुरू कर दिया। और, उस समय भी पी नोट्स और FII का ही झंझट था। लेकिन, वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उस गिरते बाजार में एंट्री क्या ली। सब मामला पलट गया था किसी फिल्म की कहानी जैसा। तब भी ये समझना मुश्किल नहीं था कि आखिर ये बौराया बाजार किसका भला कर रहा है। हाल ये है कि अगर आप घूम टबलकर इस देश के निवेशकों से चर्चा कर लें तो, झूठ बोलकर बुद्धिमान बनने के चक्कर में भले ही सीना चौड़ा किए बाजार से कमाई करने की कहानी सुनने को मिल जाएं। लेकिन, थोड़ा डिटेल में बात कीजिएगा तो, समझ में आएगा कि हमें तो, बड़ी समझ थी लेकिन, कभी ब्रोकरेज के चक्कर में पिट गए तो, कभी बस चूक गए टाइप के बहानों से खुद के बाजार विशेषज्ञ होने की बात बताने वाले लोग मिल जाएंगे। और, इसी विशेषज्ञ होने की कमजोरी को सरकार समझ चुकी है। इसीलिए उसे पता है कि सेंसेक्स सरपट दौड़ता रहे तो, देश की जनता को तरक्की का आभास होता रहेगा। भले उसकी जेब में हुआ छेद बड़ा होता जा रहा है।
 
गजब के फॉर्मूले पर चल रही है यूपीए सरकार। यूपीए 1 पता नहीं किस चमत्कार से आ गई। लेकिन, यूपीए 1 ऐसे ही चमत्कारों से आई थी। 2007 अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में आई इस गिरावट और उसके चमत्कारिक उभार के ठीक पहले यानी अक्टूबर 2007 के पहले पखवाड़े में ही सरकार ने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं। और, उन तैयारियों का आगाज भी हो गया था।  उसका असर ये रहा है कि 2009 में यूपीए 2 सत्ता में। और, 2009 में सरकार बनने के साथ ही सरकार के होने पर ही सवाल खड़े होते रहे। देश के सभी राज्यों में कांग्रेस पिटती रही। सिवाय दिल्ली के। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी, बिहार में कांग्रेस गायब सी ही रही। लेकिन, अब जब फिर 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल ही बचे हैं तो, चिदंबरम साहब का चमत्कार दिखने लगा है। नीति विकलांगता से ग्रस्त यूपीए 2 अचानक सारी नीतियों को कड़ाई से लागू करने लगी है या लागू करने की बात करने लगी है। शेयर बाजार का एक अहम वाला सूचकांक सेंसेक्स फिर से 20000 की तरफ जा पहुंचा है। आज तो, छूकर वापस लौटा है। विदेशी निवेशकों को टैक्स चोरी पर भी सरकारी इनकम टैक्स अधिकारी ज्यादा कड़ाई नहीं कर सकेंगे ये खबर सुनते ही विदेशी निवेशक हर तरह की कमाई लेकर भारतीय शेयर बाजार की चमक फिर बढ़ाने में लग गए। मकर संक्रांति के दिन जब प्रयाग (इलाहाबाद) के महाकुंभ में श्रद्धालु आस्था, पुण्य की गठरी संजोने में लगे थे तो, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से मुनाफे की गठरी तैयार करने में लगे हुए थे। 14 जनवरी को FII यानी विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में $ 185.41 मिलियन की रक लगा दी। अब कहां टिक पाएंगे इस रकम के सामने हमारे विदेशी निवेशक। ठीक वैसे ही जैसे कहां वॉलमार्ट की लॉबी के आगे टिक पाएंगे हमारे देसी किराना वाले।
 
लेकिन, इसे सरकार क्यों माने। क्यों समझे। बिना माने-समझे और विदेशियों, विदेशी पैसे की चिंता से ही तो, यूपीए 2 आया। यूपीए 3 का भी जुगाड़ लगा लिए हैं। कम लोगों को कम पैसे देने वाली डायरेक्ट कैश सब्सिडी ट्रांसफर योजना को सरकार के मंत्री मैच विनर कह रहे हैं। समझ रहे हैं न सेंसेक्स के 20000 वाले बाजार और सरकार के बनने में बड़ा तालमेल है।

Saturday, July 25, 2009

तुम लोग बेवकूफी की बात कब बंद करोगे

तुम लोगों के पास थोड़ी भी अकल है या नहीं। या पुराना फंसा हुआ रिकॉर्ड हो गए हो तुम मीडिया वाले। जहां अंटक गए उसके आगे बढ़ ही नहीं पाते। दरअसल तुम लोगों का दोष भी नहीं है। तुम लोग क्या जानो कानून के बारे में। लेकिन, मैं तो जानता हूं इसलिए मेरी बात सुनो।



और, अब तो मैं गृहमंत्री भी हूं। बड़ा वकील हूं बड़ा मंत्री हूं। अब दुबारा मत पूछना कि अफजल को फांसी देने में हमारी सरकार देर क्यों कर रही है। चलो तुम बेवकूफों को मैं समझा देता हूं। अफजल गुरु को जब फांसी की सजा सुनाई गई है। और, अभी तक कुल फांसी के 28 मामले हैं। उन 28 मामलों में अफजल का नंबर 22वां है। तो, जाहिर है हमारी सरकार कानून तोड़कर तो अफजल को फांसी देगी नहीं। पहले 21 लोगों को फांसी चढ़ने दीजिए फिर अफजल की बात करिएगा।



अब कसाब का भी ट्रायल चल ही रहा है। कसाब के कबूलनामे के बाद भी विशेष अदालत के न्यायाधीश महोदय पता नहीं क्यों कह रहे हैं कि फैसला अभी नहीं सुनाया जाएगा। फैसले के लिए कसाब का कबूलनामा रिकॉर्ड के तौर पर रखा जरूर जाएगा। बड़ा एहसान मुंबई हमले में कसाब और दूसरे उसके साथी आतंकवादियों की गोली से मारे गए लोगों के परिजनों पर। मारे गए लोगों की आत्मा को भी इतनी शांति तो मिल ही रही होगी तो, आज नहीं तो कल आंतकवादी अंजाम तक पहुंचेंगे।



अरे लेकिन, इसमें मुश्किल है। क्योंकि, कसाब का नंबर तो अगर तुरंत फांसी सुनाई जाए तो, 29वां हो जाएगा। तो, पहले 21 फिर, 22वां अफजल, फिर 29वां कसाब फांसी चढ़ेगा। और, अपने गृहमंत्रीजी तो बहुत दुखी हैं। कह रहे हैं कि तुम मीडिया के बेवकूफों को तो पता नहीं होता। फांसी चढ़ने से ज्यादा कष्ट वो झेल रहे होते हैं जो, फांसी दिए जाने का इंतजार कर रहे होते हैं। वाह रे समझदार सरकार और उसके समझदार गृहमंत्री ... लेकिन, हम तो भइया बेवकूफ ही भले

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...