Wednesday, March 23, 2016

किसान जितना ज्यादा कमाएगा, भारत उतना स्वस्थ होगा

दिल्ली, मुंबई या फिर देश के दूसरे बड़े शहरों के लोगों को ये बात टेलीविजन पर देखने के बाद भी समझ में शायद ही आती हो। पिछले साल सितंबर महीने में पंजाब के जालंधर में किसानों ने आलू सड़कों पर बिखरा दिया था। ये वही समय था जब प्याज की कीमतें साठ रुपये किलो से ज्यादा के भाव पर बिकने लगी थी। और देश में हर साल सब्जियों की महंगाई के समय बढ़ने वाला हल्ला जोर-शोर से मच गया था कि शहरी भारत महंगाई से मरा जा रहा है। इस प्याज की महंगाई की चर्चा के बीच जालंधर के किसानों का आलू ऐसे सड़कों पर फैला देना ज्यादा देर तक टिक नहीं सका। उसकी वजह पर शायद ही ठीक से चर्चा हो सकी। दरअसल जब प्याज साठ रुपये किलो से ज्यादा के भाव पर बिक रहा था। उसी समय जालंधर के किसानों को मजबूरी में आलू दो सौ रुपये क्विंटल पर बेचना पड़ रहा था। यानी एक किलो आलू सिर्फ दो रुपये में मिल जा रहा था। किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा था। इसलिए विरोध स्वरूप आलू की सही कीमत मिलने की मांग के साथ जालंधर के किसान खेत के आलू को सड़क पर बिखेर रहे थे। पिछले साल सितंबर में जालंधर के किसान आलू सड़कों पर बिखेर रहे थे। उससे कुछ ही महीने पहले अप्रैल महीने में उड़ीसा के अलग-अलग इलाकों में किसान जिलाधिकारी के दफ्तर पर आलू से भरे बोरे लेकर पहुंच रहे थे। उनकी भी मुश्किल वही थी जो, जालंधर के किसान की थी। यानी आलू की लागत भी नहीं मिल रही थी। अब सवाल यही है कि हर सब्जी के साथ भारतीयों की थाली में सबसे जरूरी आलू का इतना बुरा हाल क्यों हो रहा था। ये सवाल इसलिए भी ज्यादा बड़ा हो जाता है कि पिछले साल उसी सितंबर महीने में दिल्ली, मुंबई या दूसरे थोड़े बड़े शहरों में आलू की कीमत दस रुपये किलो से ज्यादा की थी। ये एक उदाहरण भर है। लेकिन, सच्चाई यही है कि देश के हर हिस्से में अलग-अलग फसलों को लेकर किसान इस तरह की परेशानी से जूझ रहा है। और इसकी सबसे बड़ी वजह ये कि अगर किसी खास इलाके में खास उपज ज्यादा हो गई, तो उसकी सही कीमत किसानों को नहीं मिल पाती। और सही कीमत तो छोड़िए, दरअसल किसान उपज की लागत भी नहीं निकाल पाता। अब सवाल ये है कि क्या ये संभव नहीं है कि देश के किसानों की इस सबसे बड़ी समस्या का हल निकाला जा सके। मतलब किसान को उसकी उपज की बेहतर लागत मिल सके। ज्यादा मुनाफा कमा सके।

इसका जवाब पक्के तौर पर हां में है। और अच्छी बात ये है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार इस सवाल का जवाब जल्द से जल्द पूरे देश के किसानों को दे देना चाहती है। किसानों को अपनी उपज की सही कीमत मिल सके। उन्हें मजबूरी में उपज सड़कों में न फेंकना पड़े, ये तभी संभव है, जब पूरे देश का बाजार किसान को उसकी अपनी जगह पर बैठे-बैठे मिल सके। इसी को संभव करने के लिए केंद्र सरकार राष्ट्रीय कृषि बाजार को जल्द से जल्द लागू कर देना चाहती है। राष्ट्रीय कृषि बाजार का सीधा सा मतलब एक ऐसी राष्ट्रीय मंडी जिसमें तकनीक के इस्तेमाल से जालंधर में आलू उगाने वाला किसान सीधे मुंबई के किसी आलू कारोबारी को अपनी आलू बेच सके। या फिर बिहार के पूर्णिया का मक्का किसान सीधे किसी बड़े कारोबारी को अपना मक्का बेच सके। राष्ट्रीय कृषि बाजार को लागू किया जा सकता है। इसका भरोसा दिया है कर्नाटक की एकीकृत बाजार प्रणाली ने। कर्नाटक में सभी मंडियों को ऑनलाइन करने का काम राष्ट्रीय ई मार्केट्स सर्विसेज के जिम्मे है। राष्ट्रीय ई मार्केट्स सर्विसेज कर्नाटक सरकार और NCDEX स्पॉट एक्सचेंज की बराबर की साझेदारी से बनी कंपनी है। यही कंपनी एकीकृत बाजार प्रणाली लागू कर रही है। इसी को आधार बनाकर पूरे देश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना को लागू किया जाना है। राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने दो सौ करोड़ रुपये का बजट रखा है। इसे 2018 तक लागू कर दिया जाएगा। मतलब 2017-18 के वित्तीय विर्ष में देश की सभी मंडियां इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के जरिये एक दूसरे से जुड़ जाएंगी। इसको और सरल तरीके से समझें, तो जैसे अभी किसान अपने नजदीक की मंडी में जाकर उस मंडी में आने वाले सभी किसान-कारोबारियों से किसी भी तरह की खरीद-बिक्री कर सकता है। वैसे ही देश के हर हिस्से के किसान आपस में एक दूसरे से और देश भर के कारोबारियों से सीधे जुड़ जाएंगे। मतलब ये ऑनलाइन मंडी तैयार हो जाएगी। अभी देश में कुल 585 मंडियां हैं। केंद्र सरकार की योजना इसे तीन चरणों में पूरा करने की है। इस वित्तीय वर्ष यानी 2015-16 में ही 250 मंडियों को ई प्लेटफॉर्म से जोड़ दिया जाएगा यानी ऑनलाइन मंडी बना दिया जाएगा। 2016-17 में 200 और बची 135 मंडियों को 2017-18 में ऑनलाइन कर दिया जाएगा। राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भारत सरकार की कृषि विभाग SFAC यानी लघु कृषक विकास संघ के जरिये लागू की जाएगी। केंद्र सरकार राज्यों की मंडियों में ऑनलाइन मंडी तैयार करने के लिए सॉफ्टवेयर मुफ्त में लगाएगी। साथ ही सभी 585 मंडियों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार करने के लिए केंद्र सरकार राज्य को अधिकतम तीस लाख रुपये तक की मदद भी देगी। इसमें मंडी में ही जमीन के परीक्षण की सुविधा का होना भी है। राज्य सरकारों द्वारा नियंत्रित 585 मंडियों के अलावा भी बड़ी निजी मंडियों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से आगे जोड़ा जाएगा। लेकिन, इन मंडियों को सरकार से किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। राज्यों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह खुद 23 राज्यों के मंत्रियों और अधिकारियों की टीम लेकर पिछले साल 10 और 11 जुलाई को कर्नाटक के हुबली पहुंचे थे। हुबली की एपीएमसी मंडी देश की आधुनिकतम मंडियों में से एक है। कर्नाटक राज्य की 150 में से 100 से ज्यादा मंडियां एकीकृत बाजार प्रणाली के जरिए पहले ही एक दूसरे से जुड़ चुकी हैं। यानी राष्ट्रीय कृषि बाजार का छोटा स्वरूप कर्नाटक की इन 100 से ज्यादा मंडियों में आसानी से देखा जा सकता है।
अब सवाल ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य क्या पूरा हो सकेगा। इसका जवाब है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार लागू होने के बाद निश्चित तौर पर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। और 2017-18 के वित्तीय वर्ष में ही सरकार देश की सभी 585 मंडियों को एक साथ जोड़ देगी। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2022 का लक्ष्य व्यवहारिक नजर आता है। राष्ट्रीय कृषि बाजार कर्नाटक की जिस एकीकृत बाजार प्रणाली के आधार पर बनाया जा रहा है। एकीकृत बाजार प्रणाली को लागू करने वाली कंपनी आरईएमएस के सीईओ मनोज राजन बताते हैं कि किस तरह से ऑनलाइन मंडी होने से किसानों को फायदा हो रहा है। कर्नाटक की तिप्तुर मंडी में कोपरा का अधिकतम भाव 6000 रुपये क्विंटल तक जाता था। ऑनलाइन होने के बाद उसी मंडी में कोपरा का भाव 13 से 14000 रुपये क्विंटल तक पहुंच गया। ममतलब ऑनलाइन मंडी ने भाव दोगुना से ज्यादा कर दिया। फायदा सीधे तौर पर किसानों को ही मिला। ऑनलाइन होने के बाद गदक मंडी में मूंग दाल के भाव करीब 35% बढ़ गए हैं। बेल्लारी में मूंगफली का भाव 25% बढ़ गया है। और आधुनिक मंडी ज्यादा किसानों को आकर्षित कर रही है। चामराजनगर में कमोडिटी की आवक 322% बढ़ी है। कर्नाटक में ऑनलाइन मंडियों में गजब का कारोबार बढ़ा है। लगे हाथ रोजगार भी। बेहतर रोजगार। और सभी का फायदा दिख रहा है। कर्नाटक की 155 मुख्य मंडियों और 354 छोटी मंडियों में कारोबार 31000 करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया है। 92 कमोडिटीज का कारोबार यहां किया जाता है। 31473 कारोबारी हैं, जो सरकारी मंडियों में सूचीबद्ध हैं और 17149 कमीशन एजेंट हैं। कुल मिलाकर राष्ट्रीय कृषि बाजार खेती से जुड़े हर शेयरधारक के लिए फायदे का बाजार दिख रहा है।


कैसे काम करेगा राष्ट्रीय कृषि बाजार
कर्नाटक में कुल 155 मंडियां और 354 उप मंडियां हैं जिनमें से अब तक करीब 100 मंडियों को ऑनलाइन जोड़कर एक प्लेटफॉर्म पर लाया जा चुका है। आम तौर पर ट्रेडर को हर मंडी में कारोबार के लिए अलग-अलग लाइसेंस लेना होता है, लेकिन कर्नाटक में कोई भी कारोबारी केवल एक लाइसेंस से ऑनलाइन जुड़ चुकी सभी 100 मंडियों में कारोबार कर सकता है। इतना ही नहीं, यहां राज्य सरकार ने गोदामों को भी उपमंडियों का दर्ज़ा दे दिया है, जिससे किसान अपने खेत के करीब के किसी भी गोदाम में अपनी उपज रख कर सीधे वहीं से उसे बेच सकता है। केंद्र सरकार की प्रस्तावित राष्ट्रीय कृषि बाजार एक बार लागू हो गई, तो किसान-कारोबारियों के लिए हर राज्य एक मंडी की तरह हो जाएगा। वैसे तो पूरे देश में किसान, कारोबारी कहीं से कहीं के लिए खरीद बिक्री कर सकता है। क्योंकि, ऑनलाइन होने के बाद सभी राज्य एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। लेकिन, उसे खरीदने-बेचने की प्रक्रिया पूरी करने के लिए लाइसेंस लेना होगा। और वो लाइसेंस राज्यों के आधार पर मिलेगा। मंडियों के आपस में ऑनलाइन जुड़ जाने से सार्थक बदलाव किसानों की जिंदगी में आएगा। अभी देश के किसी भी हिस्से के किसान को अपनी फसल बेचने के लिए अपने इलाके के आसपास की ही मंडीतक पहुंच बन पाती है। अब कर्नाटक के किसी जिले का किसान सीधे दिल्ली या फिर देश के दूसरे किसी राज्ये के किसी जिले में अपनी फसल बेच पाएगा। उदाहरण के लिए दिल्ली में चने का कोई कारोबारी है जो चना खरीदना चाहता है तो कम्प्यूटर पर केवल एक क्लिक से वह देश भर की मंडियों में मौजूद हर गुणवत्ता के चने का पूरा स्टॉक देख सकता है और उसके लिए बोलियां लगा सकता है। ज़ाहिर है इससे जहां एक ओर किसान को अपनी फसल के लिए बेहतर से बेहतर भाव मिलेगा, वहीं सरकार को भी देश के अलग-अलग हिस्सों में मांग और आपूर्ति के लिहाज से संतुलन बिठाने में सहूलियत होगी।

पूरे देश के एक बाजार बनने की पूरी प्रक्रिया हम आपको इस कहानी के जरिये समझाने जा रहे हैं। इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है हुबली की एपीएमसी मंडी के गेट से जहां किसान अपना माल लेकर पहुंचता है। किसान बोरियों और हर बोरी के वजन के लिहाज से अपनी कुल कमोडिटी का एक अंदाजा लगाता है और उसी आधार पर गेट एंट्री की जाती है। लेकिन गेट एंट्री से पहले किसान का पंजीकरण ज़रूरी है। पंजीकरण के लिए तय कई दस्तावेजों में से किसी एक का होना ज़रूरी है। साथ ही बैंक में खाता होना ज़रूरी है। लेकिन, अगर किसी किसान के पास अभी तक बैंक खाता नहीं है, तो उसी समय मंडी के कर्मचारी बैंक के कर्मचारियों से बात करके किसान का बैंक खाता खुलवा देते हैं। एक बार किसान का पंजीकरण हो गया, तो यही उसे हमेशा काम आएगा। वन टाइम रजिस्ट्रेशन के बाद बारी आती है गेट एंट्री की। गेट एंट्री के लिए गेट पर बैठा डाटा ऑपरेटर बोरियों की संख्या, उपज का वजन और कमीशन एजेंट का नाम जैसी जानकारियां कम्प्यूटर में डालता है और फिर वहीं से किसान को अपने माल के लिए एक आईडी और एक लॉट नंबर मिल जाता है। अमूमन एक गुणवत्ता की सारी उपज एक लॉट में आती है और इसलिए एक किसान की उपज को कई लॉट नंबर मिल सकते हैं। इसके बाद इन सारे लॉट का सैंपल असेइंग लैब में जाता है और फिर लैब के परिणाम लॉट नंबर के सामने ऑनलाइन बिडिंग स्क्रीन पर आ जाता है। हालांकि यूएमपी की मंडियों में असेईंग, क्लीनिंग और ग्रेडिंग की सुविधा अभी पर्याप्त नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय ई-मार्केट्स सर्विसेज यानी आरईएमएस तेजी से इस दिशा में काम कर रहा है। अभी मंडियों में ग्रेडिंग और असेइंग की सुविधा मंडी में आने वाले माल की तुलना में नाकाफी है, तो फिलहाल सारे लॉट के लिए ऐसा संभव नहीं होता। ऐसे में फिलहाल कमीशन एजेंट ही ज्यादातर लॉट की असेइंग कर अपने ट्रेडर को लॉट के भाव पर सलाह देते हैं और इस तरह ट्रेडर हर लॉट के हिसाब से अपना भाव कोट करता है और यह भाव किसान को एसएमएस के जरिए उसके मोबाइल पर भेज दिया जाता है। किसान का पंजीकरण हो गया। उसकी उपज की किस्म के लिहाज से उसे भाव पता चल गया। अलग-अलग कारोबारियों के भाव उसके पास आ गए। अब उसे तय करना है कि उसे अपनी उपज कहां बेचनी है। एक बार किसान का पंजीकरण हो गया। तो कर्नाटक के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़ी करीब सौ मंडियों में बैठा कारोबारी उस दिन ट्रेड के लिए मौजूद हर कमोडिटी की पूरी लिस्ट देख सकता है। इसके बाद वह अपनी रुचि की कोई एक कमोडिटी तयकर उस कमोडिटी के पेज को खोल सकता है। इसके लिए उसे ई-टेंडर पेज पर जाना होता है और उस लिंक को खोलना होता है, जहां उसे हर कमोडिटी का नाम, कमीशन एजेंट का नाम, लॉट नंबर और उसकी मात्रा मिल जाते हैं। एक बार ट्रेडर अपनी कमोडिटी चुनकर उस पेज पर जाता है। तो वहां जो लॉट असेइंग किए हुए होते हैं, वे उन्हें हरे रंग में दिखते हैं और उनके आगे असेइंग के सभी नतीजे लिखे होते हैं। सभी लॉट के आगे बोरियां, मात्रा, लॉट आईडी, कमीशन एजेंट इत्यादि का नाम लिखा होता है। स्क्रीन के ऊपर सत्र का समय भी लिखा होता है और सत्र का बचा हुआ समय भी स्क्रीन पर साफ नजर आता रहता है। यहीं कोई कारोबारी किसी भी किसान के किसी भी लॉट के लिए अपनी बोली लगा सकता है। बोली वो बदल भी सकता है लेकिन, घटा नहीं सकता। यहीं ओपन ई-टेंडर पेज पर हर कमोडिटी के लॉट और बोलियों की कुल संख्या भी दिखती है। हर मंडी में अलग-अलग कमोडिटी के लिए बोली लगाने का अंतिम समय अलग-अलग होता है। उसी लिहाज से बोली बंद होने के कुछ समय बाद सबसे ज्यादा बोली लगाने वाला ट्रेडर बोली जीत जाता है। होम पेज पर सभी विजेताओं की पूरी लिस्ट होती है। यहां कमोडिटी आईडी, ट्रेडर और कमीशन एजेंट के लिहाज से पूरी लिस्ट उपलब्ध हो जाती है। यहीं से एक बटन पर उन सभी किसानों के मोबाइल पर एसएमएस से यह जानकारी भी भेज दी जाती है, जिनके लॉट ट्रेड के लिए उस दिन बाजार में होते हैं। बोली के विजेता की घोषणा के बाद हर किसान के पास आधे घंटे का समय होता है अगर वो अपने लॉट के लिए घोषित कीमत पर अपना माल बेचने के लिए तैयार न हो तो। ऐसी स्थिति में ट्रेड रद्द हो जाता है और वह लॉट अगले दिन के ट्रेड में फिर शामिल होता है।

अब इस तरह के आधुनिक बाजार के लिए किसान, कारोबारी कितनी तेजी से तैयार हो पाएगा। ये बड़ा सवाल है। इस सवाल का जवाब तकनीक को यूजर फ्रेंडली बना कर किसानों के बीच प्रशिक्षण और जागरूकता फैला कर दिया जा रहा है। राष्ट्रीय ई मार्केट्स सर्विसेज ने जिस तरह कर्नाटक ने एकीकृत बाजार प्रणाली लागू की है। उससे ये देश भर के लिए ये एक मॉडल बन गया है। दूसरे राज्य भी इसे जल्द से जल्द लागू करना चाह रहे हैं। प्रोजेक्ट के सीईओ मनोज राजन का दावा है कि राज्य चाहे तो सिर्फ 6 महीने में उस राज्य में भी यही बाजार काम करने लगेगा।


Monday, March 21, 2016

सार्क देशों का विवाद सुलझाने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में 
मीडिया की सार्क देशों के बीच विवाद सुलझाने में कोई भूमिका नहीं है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है। कुछ इस तरह की स्थितियां तैयार की जा चुकी हैं जिसमें लगता है कि गलती से भी मीडिया ये करने की स्थिति में नहीं है। मीडिया के पुराने लोग ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि मीडिया की विवाद सुलझाने में कोई भूमिका ही नहीं है। दरअसल हमारी मुश्किल ही यही है कि हम सार्क देशों के सारे विवाद को सुलझाने में मीडिया की भूमिका को हम सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी मीडिया की नजर से देखते हैं। सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश के भी अंग्रेजी मीडिया की ही नजर से। श्रीलंका, भूटान, मालदीव के पत्रकारों की नजर से सार्क देशों के बीच के संबंधों पर कभी बात भी हुई हो। ऐसा मुझे मुश्किल से ही याद आता है। दरअसल जब हम सार्क देश यानी दक्षिण एशिया के सात देशों के बीच के क्षेत्रीय संगठन की बात करते हैं। तो पहले हमारे लिए ये समझना बेहद जरूरी है कि आखिर क्षेत्रीय संगठन बनते क्यों हैं। इनकी जरूरत क्या होती है। इसका सीधा सा जवाब ये है कि एक तरह की सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक विरासत वाले देश आपस में एक दूसरे के बीच बेहतर संबंध के लिए इस तरह के क्षेत्रीय संगठन बनाए जाते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यूरोपीय यूनियन है। उनके बीच में आपसी कारोबार 62 प्रतिशत है। सार्क देशों के बीच में होने वाला कारोबार सिर्फ पांच प्रतिशत है।

हम दरअसल आपस में कारोबार के अलावा सारी बातचीत होती है। इसी से तय होती है कि सार्क देशों में क्या होने वाला है। एक उदाहरण देखिए अगर हम दिल्ली से पाकिस्तान कुछ भेजना चाहते हैं, तो ग्यारह गुना ज्यादा लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। क्योंकि, भारत और पाकिस्तान के बीच रास्ते खुले ही नहीं हैं। बंद हैं। इस कदर बंद हैं कि दिल्ली से इस्लामाबाद कोई सामान जाना है तो पहले मुंबई-दुबई के बाद ही पाकिस्तान की धरती पर पहुंचेगा। दरअसल भारत-पाकिस्तान के इलीट क्लास ने ये जानबूझकर तैयार किया है। जिससे दोनों देशों के बीच लोगों का संबंध न हो सके। फिर वो राजनीतिक इलीट हों या फिर मीडिया इलीट। खासकर अंग्रेजी मीडिया और अंग्रेजी भाषा के आधार पर राजनीति करने वाले राजनीतिक घरानों ने दोनों देशों के संबंधों को कभी बहुत ठीक नहीं रहने दिया। हां, ये जरूर है कि यही इलीट, अंग्रेजी मीडिया है, जो सार्क देशों के बीच संबंध सुधारने के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी दुकान चला पाता है। यही इलीट मीडिया ये बहस चलाता है कि सार्क देश अमेरिका के पिट्ठू हैं क्या। या फिर रूस का प्रभाव सार्क देशों पर कितना है। इस इलीट मीडिया ने कुल मिलाकर पूरे सार्क देशों को खिलौना बना दिया है। इस पर कितनी बहस भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान या सार्क देशों के मीडिया में हुई कि अफगानिस्तान की संसद को यूपीए के समय में तेजी से बनाया गया। एनडीए की सरकार आई, तो भी काम धीमा नहीं हुआ। भारतीय एजेंसियों ने वहां की संसद सलीके से तैयार की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसका उद्घाटन करके आए। दरअसल मीडिया सार्क देशों के बीच विवाद सुलझाने की भूमिका में आना ही नहीं चाहता। वो विवाद बढ़ाने में इस कदर लगा रहता है कि भारत-पाकिस्तान के न्यूज चैनलों पर एक दूसरे देश के अतिवादी विचार के लोग बहस में सिर्फ भावनाएं भड़काने का काम करते हैं। कितनी बार होता है कि जब भारतीय चैनल भारत-पाकिस्तान के बीच या फिर भारत और दूसरे सार्क देशों के बीच के कारोबार पर बहस करते हों। वो भी बहस तब होती है जब दो देशों के बीच रिश्ते किसी भड़काऊ वजह से खराब हो रहे होते हैं। पाकिस्तान की प्याज की बात होती है। जब भारत में प्याज के दाम आसमान पर होते हैं, तो पाकिस्तानी प्याज की बात भी होती है। लेकिन, उसमें ऐसा भाव मीडिया दिखाता है कि जैसे कितने बुरे दिन आए गए कि अब भारतीयों को पाकिस्तानी प्याज खानी पड़ रही है। शर्म का भाव होता है। मीडिया, पत्रकार कब सार्क की इन मुश्किलों की बात करता है। नहीं करता है। इसके पीछे एक बड़ी मुश्किल ये है कि कम से कम हिंदुस्तान के संदर्भ में मीडिया पर वामपंथ का कब्जा सा रहा है। सिर्फ मीडिया में नहीं ज्यादातर शैक्षिक, बौद्धिक संस्थानों में। लेकिन, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच लोगों के बीच बात कितनी हो पाई। करीब 70 साल से तो ये मौका था। लेकिन, वामपंथी पत्रकारों ने इस मौके का इस्तेमाल विवाद को सुलझाने या कम करने में तो कतई नहीं किया। उन्होंने इसका इस्तेमाल दक्षिणपंथ को गलत सिद्ध करने में किया। कमाल देखिए कि भारतीय दक्षिणपंथी पार्टियों को पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के बराबर ले जाकर खड़ा करने की कोशिश भी की। कैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरेंगे। भारतीय वामपंथ देश को मानने को तैयार ही नहीं रहा। जाहिर है देश को मानने वालों के लिए वामपंथ के मन में घृणा की भावना रही। इससे वो पाकिस्तान के अतिवादियों को कहीं न कहीं पल्लवित करता रहा। और इससे विवाद सुलझने की गुंजाइश भी खत्म होती रही। इस चक्कर में अभी हिंदुस्तान की दक्षिणपंथी सरकार की हर कोशिश को धूमिल किया जा रहा है। एक घटना देखिए। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रत्याशित घटनाक्रम में नवाज शरीफ की भतीजी की शादी में लाहौर पहुंच गए। कोई तय दौरा नहीं था। मोदी अफगानिस्तान की संसद का उद्घाटन करके लौट रहे थे। अब इस पर देश की मीडिया को चर्चा ये करनी चाहिए थी कि देश की दक्षिणपंथी पार्टी की प्रधानमंत्री इस तरह से पाकिस्तान से रिश्ते ठीक करना चाहता है कि सारे प्रोटोकॉल तोड़ दे रहा है। दबे मन से मीडिया ने इसकी चर्चा तब तक की। जब तक मीडिया को ये मसाला नहीं मिल गया कि सज्जन जिंदल ने नवाज शरीफ से मुलाकात तय कराई। हालांकि, मैं निजी तौर पर मानता हूं नरेंद्र मोदी जैसे नेता को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिलने के लिए किसी उद्योगपति की जरूरत है। कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा ने ये आरोप लगाया। बस इसी पर समीक्षा होने लगी। मैं इसको दूसरी तरह से देखता हूं। अगर भारत के किसी उद्योगपति की ये स्थिति है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री उसके साथ रिश्ते रखने के लिए भारत के प्रधानमंत्री से मिल रहा है, तो इससे बेहतर क्या होगा। ये तो अच्छी बात होगी कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतने कारोबारी रिश्ते हो जाएं कि उन हितों को बचाने के चक्कर में सेना का काम कम हो। सीमा पर कम गोलीबारी हो। और सबसे महत्वपूर्ण कि दोनों सरकारों के बीच कतई संवाद बंद न हो। लेकिन, जैसे ही कारोबार की बात आएगी देश का तथाकथित सरोकारी मीडिया इस पर मोदी सरकार को पूंजीवादियों के पक्ष में खड़ी सरकार बता देता है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जुमला ही चला दिया है कि ये सूट बूट की सरकार है। मीडिया इस पर बहस करता है।

कारोबार में बुराई क्या है। आखिर इसी कारोबार के लिए ही तो चीन भारत से लाख खराब संबंध के बावजूद संबंध सुधारे रखना चाहता है। दुनिया का बाजार तो कमजोर हो चुका है। अब तो सिर्फ भारतीय बाजार ही चीन की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। पाकिस्तान और नेपाल में भी चीन कारोबार की ही तलाश तो कर रहा है। लेकिन, इस नजरिये से भारतीय मीडिया बात ही नहीं कर रहा। जब चीन पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे को तैयार करे, तो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा दिखने लगता है। फिर ये कैसे गलत हो सकता है कि भारतीय उद्योगपति पाकिस्तान की परियोजनाएं पूरी करें। नेपाल में वामपंथी सरकार आते ही मीडिया ने लगभग ये कर दिया कि भारत की दक्षिणपंथी सरकार और नेपाल की वामपंथी सरकार के बीच संबंध ठीक हो ही नहीं सकते। इसका असर ये रहा कि नेपाल में आई आपदा के समय भारतीय मीडिया के खिलाफ बहुत खराब माहौल नेपाल में बना। दरअसल यूरोपीय यूनियन के देशों ने आपस में कारोबार करना सीखा है। और वहां का मीडिया भी इसी तरह से बात करता है। हमारा मीडिया और हमारी सरकारें भी इसी तरह से व्यवहार कर रही हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को देश मानने वाली सरकारों और उनके नागरिकों के बीच संबंध नहीं सुधरेंगे। तो दोनों देशों के बीच जो देश मानते नहीं, उनकी राय देश के बीच संबंध सुधारने में भला कैसे कारगर हो सकती है।

भारत के मीडिया में सबसे ज्यादा पाकिस्तान की खबर इसीलिए होती है कि सबसे ज्यादा विवाद, झगड़ा इन्हीं दोनों के बीच है। लेकिन, ऐसा सिर्फ भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं है। भारत-नेपाल की भी चर्चा सिर्फ विवादों की ही वजह से मीडिया में होती है। भारत के लोग श्रीलंका के बारे में भी सबसे ज्यादा तब सुनते, जानते रहे। जब विवाद हुआ। जब वहां प्रभाकरन था, लिट्टे था। जब तमिल भावनाओं के नाम पर तमिलनाडु में लिट्टे के लोगों को समर्थन मिलने की बात थी। जब समुद्री सीमा विवाद हो। या फिर किसी समय भगवान राम पर किसी याचिका की सुनवाई होनी हो, तो टीवी चैनल रावण की लंका से लेकर सीता की रसोई तक दिखा देते हैं। मीडिया ने तय कर लिया है कि भारत के दूसरे सार्क देशों के साथ ऐसे ही संबंध हैं। ये मान्यता पक्की कर दी गई है। बांग्लादेश के संदर्भ में भी हम ऐसे ही जानते-समझते हैं। मालदीव के बारे में हम भारतीय मीडिया के जरिए तब जानते हैं। जब वहां एक नेता दूसरे की सत्ता पलट देता है। दरअसल एक और जो बुनियादी गड़बड़ है, जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया है। दरअसल अंग्रेजी मानसिकता से सोचने से मीडिया सार्क देशों का बड़ा नुकसान कर रहा है। जरूरत इस बात की है कि सार्क देशों की भाषा में सार्क देश एक दूसरे से बात करें। अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है और इस तरह से इसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन, सार्क देशों के बीच संपर्क की भाषा अंग्रेजी कैसे हो सकती है। सार्क देशों के बीच की संपर्क की भाषा हिंदी है, उर्दू है, पंजाबी है, नेपाली है, मधेशी है, तमिल है, मालदीव की है, भूटान की है, बंगाली है। इसीलिए अंग्रेजी में बातचीत होती है, तो वो सार्क देशों के इर्द गिर्द कम सार्क देशों पर अमेरिकी और दूसरे पश्चिमी देशों के असर से ज्यादा प्रभावित हो जाती है। इसीलिए जरूरी है कि मीडिया सार्क देशों के संदर्भ में अपनी बातचीत का तरीका और भाषा बदले।

सिर्फ पांच प्रतिशत का कारोबार अगर सार्क देशों के बीच है, तो उसकी साफ वजहें हैं। अभी का उदाहरण है। फिक्की की एक प्रदर्शनी कराची में लगनी थी। लेकिन, ये रद्द हो गई। इसकी चर्चा कितनी हो पाई। दरअसल जरूरत इसी बात की है कि सार्क देशों के लोगों के बीच जो, सांस्कृति, सामाजिक साझा है। उसकी बात की जाए। अगर सार्क देशों के बीच में कारोबार से बहुत सी चीजें एक दूसरे की सुधर सकती हैं, तो उसकी बात होनी चाहिए। ढेर सारी ऐसी जरूरतें हैं, जो सार्क के देश पूरी करने के लिए अमेरिका, चीन, यूरोप के सहारे हैं। जबकि, ये जरूरतें वो आपस में ही पूरी कर सकते हैं। सस्ते में जरूरतें पूरी होंगी। भरोसा बेहतर होगा, तो बेहतरी सार्क देशों की ही होगी। हिंदुस्तान सबसे बड़ा साझेदार होने की वजह से सबसे ज्यादा जिम्मेदार भी है। लेकिन, दूसरे सार्क देशों को भी ये समझना होगा कि आपस में भरोसे का माहौल न होने से नुकसान सबका हो रहा है। मीडिया को ये बताना चाहिए कि सार्क देशों के बीच दुनिया के किसी दूसरे क्षेत्रीय संगठन से ज्यादा सामंजस्य बन सकता है। इसीलिए मेरा ये भरोसा बनता है कि सार्क देशों के बीच के विवाद को सुलझाने में मीडिया की बड़ी भूमिका है। बस मीडिया को जनता और देशों के बीच के कारोबार की बात करनी होगी। जरूरत की बात करनी होगी। विवाद से ज्यादा जगह जरूरत को देनी होगी। सार्क देशों के बीच जरूरत, विवाद से बहुत ज्यादा है। 

Thursday, March 17, 2016

मोदी सरकार की साख तय करेंगे माल्या

विजय माल्या को मोदी सरकार सलाखों के पीछे पहुंचाएगी या नहीं। इससे भी बड़ा सवाल अब ये पूछा जाने लगा है कि मोदी सरकार माल्या को सलाखों के पीछे पहुंचाना भी चाहती है या नहीं। ये सवाल तब खड़ा हो रहा है, जब मोदी सरकार के सिर्फ बाइस महीने में ही माल्या का इतना बुरा हुआ कि उन्हें देश छोड़कर भागना ही बेहतर लगा। माल्या को लगने लगा कि अब किसी भी समय वो सीबीआई दफ्तर के रास्ते जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकता है। धीरे से वो भारत से बाहर चला गया। उस पर तुर्रा ये कि माल्या सोशल मीडिया के जरिये मीडिया से लेकर सबको धमका सा रहे हैं। नसीहत दे रहे हैं। जानबूझकर गलतियां तो ढेर सारे लोग पहले भी करते रहे हैं। लेकिन, गंभीर गलतियां करने के बाद भी छाती चौड़ी करके चुनौती देने वाले अंदाज में बात करने वाले कम ही उदाहरण हैं। इससे पहले कुछ इसी तरह की हरकत सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय ने की थी। हालांकि, दोनों के मामले अलग हैं। लेकिन, जब कोई उद्योगपति इस तरह से सरकार, सत्ता को चुनौती देने लगे, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई सरकार, सत्ता की साख के लिए जरूरी हो जाती है। फिर जब नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री हो, तो उसकी साख के लिए ये और जरूरी हो जाता है कि माल्या जैसे लोगों को उनके अपराध के लिए सलाखों के पीछे भेजा जाए। लेकिन, ये इतना आसान नहीं है। इसका अंदाजा पूर्व प्रधानमंत्री और अभी के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर के बयान से समझ में आ जाता है।

विजय माल्या के अच्छे दिनों में शायद ही कोई राजनीतिक दल या राजनेता रहा हो, जिससे माल्या से अच्छे रिश्ते न रहे हों। लेकिन, जब माल्या के बुरे दिन शुरू हुए, तो सबने दूरी बना ली। हां, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा खुलकर माल्या के समर्थन में आ गए हैं। देवगौड़ा ने विजय माल्या को कर्नाटक धरती पुत्र बताते हुए मीडिया पर आरोप लगा दिया है कि राज्यसभा सदस्य होने की वजह से माल्या के मामले को इतना तूल दिया जा रहा है। देवगौड़ा कह रहे हैं कि दूसरे इसी तरह के साठ से ज्यादा बड़े कर्ज न चुका पाने वाले उद्योगपतियों की बात मीडिया में क्यों नहीं हो रही। दरअसल ये एक बड़ा सवाल है जो देवगौड़ा ने उठाया है। दिसंबर अंत तक देश के बैंकों का बैड लोन या एनपीए साढ़े चार लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। हालांकि, बजट चर्चा पर जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बात को बेबुनियाद बताया कि कोई भी डूबा छोड़ दिया गया है। लेकिन, डूबे कर्ज की ये रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल के बजट में योजनागत खर्च छे लाख करोड़ से कम का ही है। बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन के मुताबिक, 2001 से 2013 के बीच दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज माफ कर चुके हैं। और सबसे बड़ी बात है कि ये सारे कर्ज बड़े उद्योगपतियों के हैं। सरकारी बैंकों में चार सबसे बड़े डिफॉल्टर की ही बात करें, तो ये रकम तेईस हजार करोड़ रुपये की है। इसीलिए जब देवगौड़ा ये कहते हैं कि सिर्फ माल्या निशाना क्यों, तो बात सही लगने लगती है। इसका कतई ये मतलब नहीं कि विजय माल्या के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। दरअसल इसी आधार पर विजय माल्या के खिलाफ और ऐसे सभी कर्ज न चकाने वाले बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कर्ज, ब्याज और जुर्माना मिलाकर सरकारी बैंकों का करीब नौ हजार करोड़ रुपये माल्या पर बकाया है। अभी तो खबरें ये भी आ रही हैं कि विजय माल्या काफी रकम देश बाहर ले जाने में भी कामयाब रहे हैं। अच्छा है कि सेबी भी इस मामले में कड़ाई बरत रहा है। क्योंकि, ये ऐसे कर्ज न चुकाने वाले उद्योगपति हैं, जो ऐशोआराम की किसी भी सोची जा सकने वाली ऊंचाई पर दिखते हैं। लेकिन, माल्या के खिलाफ कार्रवाई करने में कितनी मुश्किलें हैं। इसकी ओर इशारा रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का ताजा बयान करता है। राजन ने एक सवाल के जवाब में कहा कि किसी भी कर्ज के डूब जाने की ढेर सारी वजहें होती हैं। इसीलिए क्या किया जा सकता था इसमें पड़ना ठीक नहीं होगी। ज्यादातर समझदार उद्योगपति डूबते कर्ज रीस्ट्रक्चर कराने के पीछे बहुत आशावादी होते हैं। किंगफिशर मामले में क्या हुआ। इसे नहीं देखना चाहिए। बैंकिंग सिस्टम में अपराध को जगह नहीं दी जा सकती।


राजन कह रहे हैं कि अपराध को बैंकिंग सिस्टम में जगह नहीं दी जा सकती। लेकिन, बैंकिंग में बड़े कार्पोरेट किस तरह से अपराध कर रहे हैं या ये कहें कि बैंकिंग व्यवस्था के साथ दुष्कर्म कर रहे हैं। इसे समझने के लिए एसबीआई चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य को सुनना चाहिए। एसबीआई देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक है। और विजय माल्या को कर्ज देने वाले 17 बैंकों का अगुवा बैंक है, जिनका कर्ज डूब गया है। अरुंधति भट्टाचार्य ने माल्या के मामले बताया कि किसी खाते से संबंधित जानकारी बैंक सार्वजनिक नहीं करता है। लेकिन, इस मामले पर जनता की बहुत ज्यादा नजर है। बैंक माल्या से 2013 से कर्ज वसूली प्राधिकरण में लड़ रहा है। हमारी 81 सुनवाई वहां हो चुकी है। माल्या ने हमारे खिलाफ ढेर सारे केस दर्ज कराए हैं। जिसका जवाब हमने दिया है। कुल 22 मामले हम माल्या के खिलाफ लड़ रहे हैं। 508 सुनवाई हो चुकी है। और 180 बार सुनवाई स्थगित हो गई। भट्टाचार्य ने बताया कि माल्या के गोवा के एक बंगले पर कब्जे के लिए उच्च न्यायालय ने आदेश दे दिया कि तीन महीने के भीतर बंगले का कब्जा बैंक को मिल जाना चाहिए। लेकिन, कलेक्टर ने उसके बाद आठ सुनवाई की और फिर छुट्टी पर चला गया। विजय माल्या का मामला बैंकिंग सिस्टम के साथ पूरे सरकारी तंत्र की गंदगी का जीता जागता उदाहरण है। और इसीलिए जरूरी है कि इस मामले में सरकार सख्ती बरते और माल्या को सलाखों के पीछे भेजा जाए। इसीलिए मैं मानता हूं कि ये सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी की उस साख से जुड़ा हुआ है। जिसकी बुनियाद उनके, न खाउंगा-न खाने दूंगा, बयान से तैयार हुई है। जिस तरह से देश के बड़े उद्योगपति ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत का चार्वाक सिद्धांत को अमल में ला रहे हैं। उसमें जरूरी है कि उनके देश की जनता की खून पसीने की कमाई से घी पीने पर रोक लगे। विजय माल्या के खिलाफ अगर सलीके की कार्रवाई हुई, तो ये ऐसे कर्ज लेकर घी पीने वाले उद्योगपतियों की जमात को तगड़ा झटका होगा। इसका ताजा उदाहरण है। अभी कुछ समय पहले तक कहां कल्पना थी कि चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कोई सरकार कभी कुछ कर पाएगी। सेबी से सुब्रत रॉय की सीधी लड़ाई न हुई होती, तो शायद चिटफंड कंपनियां अभी भी गरीबों की गाढ़ी कमाई लूट रही होतीं। लेकिन, सुब्रत रॉय को सरकार, सत्ता के जेब में होने या फिर उसे खरीद लेने का गुरूर था। झगड़ा बढ़ा और आगे क्या हुआ, ये सब देख रहे हैं। सुब्रत रॉय जेल में हैं। इसी के साथ दूसरे चिटफंडियों पर भी कार्रवाई की सिलसिला तेज हुआ। पर्ल्स, सारदा, साईं प्रसाद और ऐसी जाने कितनी चिटफंड कंपनियों के मालिक फर्जीवाड़े के मामले में जेल में हैं। कमाल ये कि इनमें से ज्यादातर मीडिया हाउस के भी मालिक रहे या हैं। लेकिन, सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी की बुनियाद इतनी मजबूत थी कि एक के बाद एक सारे चिटफंडिये जेल के भीतर पहुंच गए। विजय माल्या का गिरफ्तारी भी ऐसी ही एक बुनियाद है। इससे बैंकिंग सिस्टम में कर्ज डुबाकर बैंकों की हालत खराब करने वाले उद्योगपतियों को उनकी औकात में लाया जा सकेगा। मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा लगाइए। सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज डुबाने वाले उद्योगपतियों की सूची मांगी है। सुप्रीमकोर्ट ये भी पूछ रहा है कि शाही अंदाज में जीने वाले इन उद्योगपतियों के अपनी कंपनी को बीमार घोषित करने के बाद भी बैंक कैसे कर्ज देकर खुश है। बाजार नियामक सेबी ने विलफुल डिफॉल्टरों, यानी ऐसी कंपनियां जिन्होंने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाया है, को कंपनी में किसी भी पद पर रहने से, बाजार में किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल होने से रोक दिया है। देश में नियामक होने न होने पर बहुत बहस चली है। लेकिन, सेबी ने इस बहस को सकारात्मक संदर्भ दे दिए हैं। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की संपत्तियों से ये सारा कर्ज वसूला जाना चाहिए। ठीक है कि ऐसा काम न हो कि लोग उद्योग लगाने, कर्ज लेने से डरने लगें। लेकिन, ऐसे उद्योगपति देश के लिए ज्यादा खतरनाक हैं, जिनसे बैंक, देश डरने लगे। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स की किंगफिशर बीयर दुनिया के 52 देशों में बिकती है। भारत के बीयर बाजार में इसकी आधी से ज्यादा हिस्सेदारी है। इसीलिए देवगौड़ा जी विजय माल्या मीडिया की सुर्खियों में है। और इसीलिए मोदी जी आपको विजय माल्या को सलाखों के पीछे भेजना ही होगा। ये सीधे-सीधे आपकी साख का सवाल है। और साख से ज्यादा देश की आर्थिक दशा का सवाल है। ऐसे कर्ज डुबाने वालों से कर्ज वसूली नहीं हुई, तो पचीस-पचास हजार करोड़ रुपये बैंकों को देकर भी बैंक की दशा सरकार क्या सुधार पाएगी। हां, ऐसे लोगों को कर्ज डुबाने के लिए इतनी रकम और मिल जाएगी। 

Monday, March 14, 2016

समग्रता में पानी, बिजली, सड़क का बजट

वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस बजट को पहली नजर में देखने पर ये लगता है कि बजट भाजपा का वो दृष्टि परिवर्तन है, जो बिहार में भारतीय जनता पार्टी की हार से हुआ है। बजट पहली नजर में पूरी तरह से खेत, किसान और गांव का ही बजट नजर आता है। बजट को देखने की ये पहली नजर का ही असर रहा कि शेयर बाजार ने पूरी तरह से बजट को उद्योग के खिलाफ समझ लिया। और शेयर बाजार में तबाही सी आ गई। हालांकि, पहली नजर के प्रभाव से जब बाजार उबरा, तो स्थिति उलट गई और बाजार में काफी हरियाली देखने को मिली। धीरे-धीरे समझ में आया कि गांवों में भी अगर विकास के काम होंगे, तो उसे करने के लिए बड़ी कंपनियां, उद्योग चाहिए। इस देर से आई समझ से बाजार को लगा कि अच्छे दिन आएंगे। मुझे ध्यान में नहीं आ रहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट भाषण में एक बार भी अच्छे दिन आने वाले हैं या अच्छे दिन का बजट शब्द का इस्तेमाल किया हो। दरअसल अच्छे दिनों को विपक्ष ने इस तरह से जुमला साबित कर दिया है कि अब सरकार अच्छे दिनों की जिक्र करने से बचती है। लेकिन, इस बजट को जरा गहरी नजर से देखें, तो ये अच्छे दिनों का खाका संपूर्णता में पेश करने वाला बजट है। ये देश का पहला बजट है, जिसमें समग्रता में पानी, बिजली और सड़क की बात की गई है। सिर्फ बात नहीं की गई है। पानी, बिजली, सड़क की मुश्किल कैसे दूर होगी। ये साफ-साफ बताया गया है। तारीख दी गई है कि इस समस्या का हल इस तारीख को हो जाएगा। पूरे बजट के बजाय अभी मैं सिर्फ पानी, बिजली, सड़क पर ही इस बजट का विश्लेषण कर रहा हूं।

शुरुआत पानी की मुश्किल से करते हैं, फिर बजट में क्या-क्या हुआ। इस पर बात करेंगे। पानी की मुश्किल इतनी बड़ी हो गई है कि बड़े शहरों में तो डिब्बाबंद पानी सबसे बड़ी जरूरत हो गई है। हर घर में पानी को साफ करके पीने लायक बनाने वाली मशीन लग गई है। गांव में भी मुश्किल से तालाब, कुएं से पीने लायक पानी मिल पा रहा है। पीने लायक तो छोड़िए, अब तो सिंचाई के लिए भी पानी नहीं मिल पा रहा है। जमीन में पानी का स्तर तेजी से नीचे जाने की वजह से खेत बंजर होते जा रहे हैं। खेतों की उर्वर क्षमता खत्म हो रही है। जाहिर है इस हाल में खेतों की उत्पादकता यानी प्रति एकड़ ज्यादा उपज से भी हालात सुधरने वाले नहीं हैं। क्योंकि, उससे ज्यादा तेजी से खेत खत्म हो रहे हैं। इस बजट में इस गंभीर परेशानी को समझकर उससे उबरने की कोशिश करती हुई सरकार दिखती है। जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए साठ हजार करोड़ रुपये इस बजट में प्रस्तावित हैं। ये रकम कितनी बड़ी है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि किसी सरकार ने इस विकराल होती समस्या को खत्म करने की बीड़ा उठाया है। याद नहीं आता कि किसी बजट में सरकार ने जमीन में पानी का स्तर बेहतर करने के लिए इतनी बड़ी रकम दी हो। जमीन में पानी का स्तर बेहतर करने के साथ सरकार को किसानों की सिंचाई की मुश्किल भी अच्छे से पता है। और इसीलिए बजट में अट्ठाइस लाख पचास हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत पक्का करना तय किया गया है। विश्व बैंक के मुताबिक, भारत में जमीन के साठ प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर खेती हो सकती है। अनुमान के मुताबिक, देश में सोलह करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर खेती होती है। करीब चार करोड़ हेक्टेयर खेत की सिंचाई कुओं, तालाबों के जरिये होती है। जबकि, करीब ढाई करोड़ हेक्टेयर खेत की सिंचाई नहर के जरिये होती है। कुल मिलाकर सभी तरह के सिंचाई साधनों का इस्तेमाल करने के बाद भी देश के करीब दो तिहाई खेत सिंचाई का पानी न मिलने की वजह से सिर्फ बारिश के पानी के ही भरोसे होते हैं। और यही वजह होती है कि देश में उपज को लेकर किसान, ग्राहक और सरकार सब आशंकित रहते हैं। इस बजट में पानी का स्तर बढ़ाने और खेतों की सिंचाई पक्का करने का प्रावधानन भरोसा जगाता है कि सरकार पानी की मुश्किल का हल खोज रही है। नाबार्ड बीस हजार करोड़ रुपये का सिंचाई का फंड तैयार करेगा। प्रति एकड़ ज्यादा उपज के लिए सरकार ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है। अगले तीन सालों में पांच लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती की जाएगी।

बिजली कितने घंटे मिलती है। कितने घंटे कटौती होती है। ये बहस शहरों-गांवों में आम है। लेकिन, बिजली देश के कितने गावों में है ही नहीं। ये कितनी दुखद स्थिति है। इस समस्या को इस सरकार ने खत्म करने का बीड़ा उठाया है। इस पर काम पहले से हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी गांवों तक एक हजार दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। इस बजट में एक मई 2018 वो तारीख बताई गई है, जिसके बाद देश का कोई गांव ऐसा नहीं होगा। जहां बिजली नहीं होगी। बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की पीठ थपथपाई। दरअसल पहली बार मंत्री ने पीयूष गोयल ने जिस तरह से हर गांव तक बिजली पहुंचाने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। वो कमाल है। संयोगवश एक दिन इस काम करने वाली नोडल एजेंसी के दफ्तर में जाने पर देखा, तो इस परियोजना से जुड़े हर अधिकारी के टेबल पर रखा कैलेंडर हजार में से हर बीतते दिन का हिसाब तय करता दिखता है। बिजली को लेकर इस तरह से काम किसी सरकार ने किया हो, ये याद नहीं आता। 1999 वाली एनडीए की सरकार में सुरेश प्रभु ने ऊर्जा मंत्री काफी सकारात्मक कोशिश की थी। लेकिन, उस वक्त भी हर गांव तक बिजली पहुंचाने की सोच नहीं बन सकी थी। आधार जरूर उसी समय तैयार हुआ।

पानी और बिजली की ही तरह इस बजट में सड़क पर भी सरकार का खास जोर साफ दिखा। सड़क वैसे तो भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार की सबसे पसंदीदा होती है। फिर चाहे पिछली वाजपेयी सरकार में स्वर्णिम चतुर्भुज की बात हो या फिर इस सरकार के कार्यकाल में तीस किलोमीटर प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का लक्ष्य तय करने वाले सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी हों। इस बजट सरकार ने गांव की सड़कों की समस्या को दूर करने का खाका दिया है। शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अच्छे पता है कि अगर गांव से किसान जिला, राज्य मुख्यालय तक उपज लेकर नहीं आ पाया, तो उनका किसान की आमदनी 2022 तक दोगुना करने का वादा सिर्फ ही रह जाएगा। इसीलिए इस बजट में गांवों की सड़कों के लिए उन्नीस हजार करोड़ रुपये दिया गया है। दो हजार किलोमीटर राज्य की सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में बदलने का प्रस्तावव भी इसी बजट में है। सड़कों के लिए सत्तानबे हजार करोड़ रुपये का प्रावधान इस बजट में है। अगर रेलवे-सड़क दोनों को जोड़ें, तो इस बजट में करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है। बजट में ये सुनकर अच्छा लगा कि पचासी प्रतिशत रुके पड़े सड़क के काम शुरू हो गए हैं। नितिन गडकरी ने बुनियादी परियोजनाओं को तेजी स लागू करने की अपनी छवि को और दुरुस्त किया है। ग्राम पंचायतों को दिया गया करीब तीन लाख करोड़ रुपये साफ बताता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार को ये बात अच्छे से समझ आ गई है। पानी, बिजली और सड़क तीनों की सबसे ज्यादा मुश्किल और उसका समाधान देश के गांवों में ही है। इसीलिए पहली नजर से देखने में भले ये लगे कि सरकार ने चुनावी बजट के तौर पर गांवों की ओर चलना शुरू किया है। लेकिन, मुझे लगता है कि पहली बार किसी सरकार ने समग्रता में पानी, बिजली और सड़की मुश्किलें समझी हैं और उन्हें खत्म करने का रास्ता भी देख लिया है।

Friday, March 11, 2016

जेएनयू की खूबसूरत कहानी और वामपंथ!

किसी विकास के कन्हैया कुमार को थप्पड़ मारने के बाद वैचारिक दिवालिया हो चुका पूरा वाम #JNU की खूबसूरत कहानी इस बहाने भी पेश कर देना चाह रहा है। देखो ये जेएनयू है, जहां छात्रसंघ अध्यक्ष को भी थप्पड़ मारने वाले को कुर्सी दी गई है। पानी पिलाया जा रहा है। देश का दूसरा विश्वविद्यालय होता, तो क्या होता। छात्रसंघ अध्यक्ष को मारने वाले के हाथ-पैर टूट जाते। जाने क्या-क्या। ठीक है जेएनयू की कहानी इतनी खूबसूरत होगी। मान लेता हूं। लेकिन, जब इस बहाने वामपंथ को भी इस खूबसूरत कहानी में घुसेड़ देते हो। तब लगता है कि मक्कारी ज्यादा हो गई। अब इन बुद्धिहीनों से कौन पूछे और पूछ भी ले, तो ये कैसे बता पाएंगे कि केंद्र में एक ऐसी सरकार है, जो इस हरकत पर कन्हैया को फिर टांग सकती है। पूरी तरह से कानून के दायरे में। अंतरिम जमानत पर रिहा आरोपी है कन्हैया कुमार। अदालत की भी पूरी नजर है। इसीलिए वामपंथ इस तरह से निरीह, निर्दोष बना बैठा है। वरना बताओ न जहां सत्ता रहती है। वहां क्या करते हो। दुनिया का सबसे खूनी, हत्यारा विचार है वामपंथ। न समझ आए, तो भारत में हुई राजनीतिक हत्याओं की सिलसिलेवार चर्चा कर लें। खूनी क्रांति, जिसे दुनिया को बरगलाने के लिए लाल सलाम बोलते हो। उसकी कहानी देश को अच्छे से पता है। वैसे तो तुम देश जानते-समझते नहीं थे। इधर डर ने तुम्हें देश भी समझा दिया है। इसलिए इस तरह की कहानियां सुनाने लगे हो। वरना तो तुम बंदूक से क्रांति के ही पक्षधर रहे हो।


खुद से ही खुद को विमर्श-बहस के पक्षधर साबित करने वाले वामपंथी दरअसल अपने आसपास को छोड़कर सब पर बात कर लेंगे। आप देश की किसी समस्या पर बात करिए। वो सोमालिया की समस्या लेकर आ जाएंगे। आप देश में पंचायत चुनाव की बात करिए। वामपंथी दुनिया के किसी भूले बिसरे से कम्युनिस्ट शासन की एकाध ऐसी खूबी टपका देंगे कि आप बहस में भौंचक रह जाएंगे। ये कला वामपंथियों में अनोखी है। ऐसी अनोखी कि कई बार तो दो वामपंथी भी आपस में बहस करते हैं, तो तीसरे वामपंथी को भी बहस में कम ही समझ आ पाता है कि ये वाला सरोकार कहां से खोज लाया। लेकिन, वो गंभीर मुद्रा बनाकर ऐसे सिर हिलाता है कि लगता है सब समझ रहा है। दरअसल इसीलिए ये साबित हो जाता है कि वामपंथियों से बहस नहीं की जा सकती। क्योंकि, बहस का केंद्र हमेशा ये वहां लेकर चले जाएंगे। जहां यही गए हैं। टापू टाइप का कुछ बनाकर रहने की इन्हें आदत रही है। इसी से तो कुछ अलग, बुद्धिजीवी टाइप अहसास हो पाता है। अब सोचिए रह गया। नहीं तो इन विमर्श के पैरोकारों ने कन्हैया के मूतने के अधिकार पर विमर्श चलाया होता। जेएनयू में ओपन डिबेट होती कि आखिर हिंदुस्तान में कभी न कभी तो सभी सड़क किनारे खुले में मूतते ही हैं। उसी पर खुली कक्षा होती और प्रोफेसर पूरा दिन उसी शोध पर निकाल देते। हो सकता है कि मामला थोड़ा और गंभीर होता, तो जेएनयू छात्रसंघ उसी पर एक प्रस्ताव पास कर देता कि परिसर में खुलेआम मूतने की आजादी होनी चाहिए। छात्रसंघ के समर्थन में जेएनयू की शिक्षक संघ भी आ जाता। देश को फिर बताया जाता कि देश के दूसरे विश्वविद्यालयों और जेएनयू में कितना फर्क है। दूसरे विश्वविद्यालय में तो खुलेआम किसी लड़की के सामने मूतने वाले छात्र को शिक्षक बुरी तरह से डांटते। थोड़ा पुराने में तो एकाध शिक्षक पीट भी सकते थे। इससे जेएनयू का अद्भुत चरित्र और उसमें वामपंथ की भूमिका और निखरकर दुनिया के सामने आती। लेकिन, बहस के समर्थक वामपंथी पहले तो सोशल मीडिया की ढेर सारी फर्जी खबरों में से इसे भी एक बताकर बचते रहे। फिर जब साबित हो गया, तो बेहूदे टाइप के वामपंथी आ गए। ये कहते हुए कि कन्हैया पर वही उंगली उठाए जिसने कभी खुले में पेशाब न की हो। इसी तरह का विमर्श करते हैं ये वामपंथी। आतंकवादियों के समर्थन में नारा लगाने वाले जेएनयू के बाहर से आए या जेएनयू के ही हैं। लेकिन, अच्छा ये हो गया कि जेएनयू का सारा विमर्श सबके सामने आ गया। टापू की खूबसूरत कहानियों के साथ वामपंथ भी सबके सामने आ रहा है। ये भी सामने आ रहा है कि इस तरह के व्यवहार में दोषी पाए जाने, जुर्माना भरने वाले को ये विश्वविद्यालय अपना छात्रसंघ अध्यक्ष चुन लेता है। अलग तो है जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय। मैं पक्के तौर पर मानता हूं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में हत्या करने वाले को तो हो सकता है कि छात्रसंघ का अध्यक्ष चुन लिया जाता। लेकिन, किसी लड़की से ऐसी अभद्रता करने वाले की तो जमानत ही जब्त होती। लेकिन, जेएनयू अलग है। इसलिए वहां का अध्यक्ष ऐसा बन गया। जेएनयू की खूबसूरत कहानियां तो अब लोगों को पता चलने लगी हैं। विमर्श बढ़ाइए, कॉमरेड।  

Wednesday, March 09, 2016

फर्जी सरोकारी, हत्यारा वामपन्थ

हिंदुस्तान में वामपन्थ की बात होते ही, लाख बुराइयों के बाद भी इसे सरोकारी घोषित कर देने वालों की लंबी कतार है। दरअसल, ज्यादातर विकास के किसी भी काम का विरोध करके वामपन्थियों ने अपनी छवि ऐसी दुरुस्त की है। लेकिन, अगर थोड़ा ध्यान से देखा जाए, तो शायद की सरोकार और वामपन्थ का कोई सीधा रिश्ता साबित हो सके। हां, उल्टा रिश्ता जरूर साबित होता दिखता है। वामपंथियों का सरोकार मतलब सीधे तौर पर सत्ता हासिल करने के लिए संस्थागत तरीके से राजनीतिक हत्याएं कराना। और, इस तरह की हत्याओं के देश के सामने आने से रोकने के लिए वामपन्थी पत्रकारों का इस्तेमाल करना। सोचिये वामपंथ भारत में सरोकारी स्थापित है। उसके पीछे असली वजह वामपन्थी घुट्टी वाले पत्रकारों का ये लगातार साबित करने की कोशिश रहा है। वामपंथी पत्रकारों ने अपनी भूमिका सलीक़े से नहीं निभाई। वामपन्थ पत्रकार जितना पक्षपाती रहता है। उतना तो कई बार राजनीतिक कार्यकर्ता भी नहीं होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो भारत में जिन दो राज्यों में सबसे ज़्यादा समय सत्ता में रहते वामपन्थ ने संगठित तौर पर राजनीतिक हत्या की वो भी देश के लोग जानते। ‪#FarziSarokar

सबसे कमाल की बात ये है कि सरोकार, शोषित के पक्ष में अपनी छवि बनाने वाले वामपन्थियों का शासन जहां भी आया, वहां बेचारा शोषित रह ही नहीं गया। क्यों नहीं रह गया। बंगाल में उद्योग निपट गए। ये उद्योग विरोधी रहे। अपनी सत्ता चलाते रहे। और सोचिए कि इनकी सबसे बड़ी सरोकारी इमारत बंगाल में क्या हुआ। सरोकार और सरोकारियों के लिए ये जरूरी जानकारी याद कराना बेहद जरूरी है। ज्यादा साल नहीं बीते हैं। दस साल से भी कम समय हुआ है। 2007 की बात है। पश्चिम बंगाल में देश की सबसे सरोकारी सरकार थी। अरे वही वामपन्थी सरकार। ज्योति बसु मुख्यमंत्री और जितने तरह का वामपंथ जानते हों, सबको जोड़ लीजिए। मतलब उन्हीं लोगों का राज था बंगाल में। उसी बंगाल में एक नंदीग्राम है। इसे धार्मिक जगह न समझ लीजिएगा। नहीं तो मामला सांप्रदायिक हो जाएगा। क्योंकि, जगह के नाम में नंदी भी है ग्राम भी। तो, उस नंदीग्राम में 10000 एकड़ जमीन पर सरोकारी सरकार कब्जा कर रही थी। जमीन बचाने के लिए बेचारे गैर सरोकारी किसान भिड़े। अरे होना क्या था। बंगाल में तब उनकी सरकार थी। सीधे पुलिस ने गोली चलाई। दर्जनों किसान मरे और सैकड़ों घायल हुए। और ये जमीन किसी किसान, गरीब, कमजोर की किसी योजना या सरकारी योजना के लिए भी नहीं ली जा रही थी। ये कब्जाई जा रही थी। उद्योगपति रतन टाटा के टाटा ग्रुप की नैनो को बनाने के लिए।


और ये वामपंथी लगातार ये प्रचारित करते रहते हैं कि नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों का प्रधानमंत्री है। अब तो हाल ये है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कॉमरेड देश भर में सरकार के खिलाफ खुद को थप्पड़ मारकर मुंह लाल कर रहे हो। सत्ता हासिल करने के लिए गैर लोकतांत्रिक तरीका अपनाने का इतिहास वामपंथियों का ही रहा है। बंदूक उठाकर सैनिको, जवानों के खून से लाल कर देते हैं। जहां सत्ता में रहे या सरकार में In&Out हुआ, तो राजनीतिक हत्याएं करके खून से जमीन लाल कर देते हैं। दरअसल यही है वामपंथ का लाल सलाम। और ये लाल सलाम मतलब क्रांति को सलाम नहीं होतो। वामपंथियों का कर्म बताता है कि लाल का मतलब खून से ला करना होता है। अच्छी बात ये है कि बहुतायत देश अब समझ चुका है। केरल में संघियों के खून से लाल धरती तो इन्हें महान क्रांतिकारी बना देती है। और ऐसे में वामपंथी पत्रकार क्या करेंगे। किसी लाल धरती की असली कहानी नहीं बताएंगे। नहीं बताएंगे कि लाल सलाम का मतलब संगठि हत्या, संगठित हत्यारों को सलाम है। नहीं बताएंगे। वामपंथ पूरी तरह से हत्यारा और फर्जी सरोकारी विचार है। इसीलिए मनुस्मृति को जलाकर और सेना के जवानों पर बलात्कार का आरोप लगाकर खुद को खबरों में रख रहे हैं। और वामपंथी विचार से प्रेरित पत्रकार अपनी जिम्मेदारियों की हत्या कर दे रहे हैं। मतलब उसका भी लाल सलाम हो जा रहा है। 

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...