Thursday, July 14, 2011

एक बार थम क्यों नहीं जाता देश



मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।


11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।

26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।

गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।

इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।

लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।

Tuesday, July 12, 2011

सुस्त बाजार, गायब पब्लिक ऑफर


इस साल शेयर बाजार की डांवाडोल रफ्तार बाजार के जरिए पैसा जुटाने की इच्छा रखने वाली नई कंपनियों पर भारी पड़ती दिख रही है। साल 2011 आधा बीत रहा है और अभी तक शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए ज्यादा विकल्प नहीं दिख रहे हैं। पिछले साल की तेजी के भरोसे इस साल कई कंपनियों ने अपना आईपीओ लाने का इरादा कर रखा था। लेकिन, प्राइमरी मार्केट में कंपनियां उतरने का साहस ही नहीं जुटा पा रही हैं। जनवरी से जून महीने की ही बात करें तो, 15 आईपीओ बाजार में उतरने थे लेकिन, समयसीमा खत्म होने के बाद भी वो, बाजार में नहीं आए। ये वो 15 आईपीओ यानी इनीशियल पब्लिक ऑफर थे जिन्हें, बाजार रेगुलेटर सेबी से मंजूरी मिल चुकी थी। एक बार समय सीमा खत्म होने का सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब इनके पब्लिक ऑफर फिलहाल तो नहीं आ सकेंगे।

जिन कंपनियों के आईपीओ सेबी से मंजूरी के बाद भी बाजार में नहीं आ सके। वो, कंपनियां हैं जिंदल पावर, रिलायंस इंफ्राटेल, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम, स्टरलाइट एनर्जी, लोढ़ा डेवलपर्स, बीपीटीपी, एंबियंस, ग्लेनमार्क जेनेरिक्स, नेपच्यून डेवलपर्स, कुमार अर्बन डेवलपर्स और एएमआर कंसट्रक्शंस। इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो रियल एस्टेट सेक्टर की हैं या फिर पावर सेक्टर की। वैसे, इन कंपनियों के आईपीओ न आ पाने की बड़ी वजह ये है कि रियल एस्टेट सेक्टर के हालात अंदर से खराब हैं। ज्यादातर कंपनियों के प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं और पिछले छे महीने में कीमतें भी स्थिर रही हैं। इसके अलावा पावर सेक्टर की कंपनियों के आईपीओ के लटकने की जो वजह बताई जा रही है वो, ये कि पावर सेक्टर की कंपनियों को निवेश पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

अब ये 15 आईपीओ बाजार से बाहर हो चुके हैं। अगर ये आईपीओ बाजार में आते तो, करीब 25 हजार करोड़ रुपए बाजार से जुटाते। लेकिन, फिलहाल आईपीओ बाजार में दिख रही सुस्ती से निवेशकों को सिर्फ सेकेंडरी बाजार के सहारे ही रहना पड़ रहा है। सेकेंडरी बाजार यानी वो, शेयर जो पहले से ही शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। आईपीओ बाजार में कमजोरी की सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है कि साल 2011 की पहली छमाही में एफआईआई निवेश की रफ्तार बहुत घटी है। इसकी वजह से सेंसेक्स जो, दिवाली पर 21000 का स्तर पार कर गया था। उसके बाद 18000-19000 के बीच में ही लटक रहा है।


दरअसल पिछले साल के आखिर में जिस तरह से बाजार में तेजी आई थी। और, देश की तरक्की दस अंकों के नजदीक जाती दिख रही थी। उसने निवेशकों का सेंटिमेंट बेहद मजबूत कर दिया था। बाजार के कई तो, सेंसेक्स के इस साल जुलाई के महीने तक 25000 के नजदीक पहुंचने की भविष्यवाणियां भी करने लगे थे। लेकिन, एक के बाद एक घपले-घोटालों की सरकार के कारनामे जैसे-जैसे सामने आने लगे, धीरे-धीरे सारे सेंटिमेंट उल्टी दिशा में चल पड़े। महंगाई को 5-6 प्रतिशत के बीच में लाने का भरोसा बार-बार दिलाने वाली ये सरकार अब बात करने लगी है कि 7-8 प्रतिशत की महंगाई दर ही अभी की सही महंगाई दर है।

इस सबने भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेंसेक्स के दिग्गज रिलायंस के लिए एक के बाद एक उत्पादन से लेकर नीतियों में फेरबदल कराने तक की ऐसी खबरें आईं कि ये उबर ही नहीं पा रहा । यही वजह है कि कंपनियों नए आईपीओ बाजार में उतारने का साहस नहीं कर पा रही हैं। साल 2010 के आखिर में बाजार में आई शानदार तेजी के भरोसे आईपीओ में पैसा लगाकर निवेशकों ने जमकर मुनाफा कमाया। पिछले साल के आखिर में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। और, कोल इंडिया ही क्यों, साल 2010 शेयर बाजार में आईपीओ मार्केट के लिए कितना खास रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ सरकारी कंपनियों के पब्लिक इश्यू में ही दस लाख से ज्यादा निवेशक शामिल हुए। हां, सबसे बड़ा धमाका रहा कोल इंडिया के काले सोने का।


साल 2010 में शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की सबसे बड़ी खबर बनी करीब पंद्रह हजार करोड़ रुपए का कोल इंडिया का आईपीओ। कोल इंडिया ने देश का सबसे बड़ा IPO बाजार में उतारा और निवेशकों ने इसे हाथों हाथ लिया। दिवाली के पहले आए इस IPO ने निवेशकों को मालामाल भी किया। कोल इंडिया के पब्लिक इश्यू में पैसा लगाने वाले निवेशकों को 60 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने को मिला। कोल इंडिया का IPO निवेशकों के लिए काला सोना साबित हुआ। ये शेयर ऐसा चढ़ा कि इसने मार्केट कैपिटलाइजेशन में ओएनजीसी तक को पीट दिया। इसके बाद तो जो भी IPO आए निवेशकों ने उसे हाथों हाथ लिया। सिर्फ सरकारी कंपनियों के ही पब्लिक इश्यू के लिए दस लाख से ज्यादा निवेशक लाइन में लगे। कोल इंडिया (CIL) के अलावा पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन (PGCIL), और मैंगनीज ओर (MOIL) के IPO को अच्छा रिस्पॉन्स मिला।

इसके अलावा साल 2010 में जितने IPO आए हैं वो, तेजी 3 साल के बाद दिखी है। 2007 में तेजी के दौर में 96 IPO आए थे लेकिन, जनवरी 2008 में शुरू हुई मंदी के असर से 2008 में 36 और 2009 में सिर्फ 21 कंपनियां ही बाजार में अपना IPO लाने की हिम्मत जुटा सकीं। 2010 में 72 IPO आए। यानी साल 2010 प्राइमरी मार्केट के लिए शानदार साबित हुआ है। लोगों को उम्मीद थी कि साल 2011 भी आईपीओ मार्केट के लिए धमाकेदार साबित होगा। लेकिन, आधा साल बीत जाने के बाद भी इस साल अब तक सिर्फ 24 आईपीओ ही बाजार में आए हैं। अब उम्मीद साल की अगली छमाही पर ही टिकी है। लेकिन, वो तेजी तभी आएगी जब महंगाई से राहत मिले और देश की तरक्की की रफ्तार फिर से तेज हो सके। साथ ही सबसे जरूरी ये कि देसी उद्योगपतियों को ये न लगे कि भारत से बेहतर मुनाफा भारत से बाहर पैसा लगाकर बनाया जा सकता है। ये सब हुआ तभी विदेशी निवेशक फिर से लौटेंगे और उनके भरोसे देसी निवेशक भी। इसलिए अभी प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए सलाह यही है कि वो, सोच-समझकर ही किसी नई कंपनी में रकम लगाएं।


कुल 25000 करोड़ रुपए के आईपीओ बाजार में नहीं आए


2007 में 96 आईपीओ आए


2008 में 36 आईपीओ आए


2009 में सिर्फ 21 आईपीओ आए


2010 में 72 आईपीओ आए


2011 में अब तक सिर्फ 24 आईपीओ आए


(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Tuesday, July 05, 2011

तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Prannoy Roy और Radhika Roy NDTV चलाने वाली कंपनी के बोर्ड से बाहर हुए

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi NDTV पर Adani समूह के अधिग्रहण को लेकर सारे कयास खत्म हो गए। पहले से ही यह तय हो गया था कि, NDTV...