Monday, March 29, 2010

अर्थ आवर पर मैंने बत्ती नहीं बुझाई

दुनिया को बचाने की तथाकथित अर्थ आवर मुहिम में भारत भला कैसे पीछे रहता। और, दिल्ली-मुंबई हमेशा की तरह ऐसी प्रतीकात्मक मुहिम में इस बार भी देश में सबसे आगे रहे। कम से कम इलेक्ट्रॉनिक-प्रिंट मीडिया के जरिए तो ऐसा ही दिखा। हमेशा ही ऐसा दिखता है। लेकिन, मैं मीडिया में होने, जागरूक होने और दिल्ली से सटे दिल्ली जैसे ही नोएडा शहर में रहने के बावजूद इस अभियान से खुद को जोड़ नहीं सका।

मैंने 27 तारीख को साढ़े आठ बजे से साढ़े नौ बजे के दौरान एक भी बत्ती नहीं बुझाई। बल्कि, IPL भी देख रहा था। वैसे आमतौर पर हमारे घर में जिस कमरे में हम होते हैं या जहां जरूरत होती है वहीं की बिजली जल रही होती है। ये बचपन से आदत मिली है। इलाहाबाद से मुंबई, दिल्ली पहुंच जाने के बाद भी ये आदत बची हुई है। शायद इसीलिए मुझे ज्यादा चिढ़ हो रही थी इस भेड़ियाधसान आयोजन से। कुछ चैनलों ने तो अपने न्यूजरूम में अंधेरा करके गजब का तिलिस्म तैयार किया था।

लेकिन, ये अर्थ आवर कितना बड़ा ढकोसला था। इसका अंदाजा मुझे तब लगा जब मैंने ये अंदाजा लगाने की कोशिश की कि आखिर दुनिया भर में पिछले तीन सालों से चल रही इस मुहिम में आखिर कितनी बिजली बची और इससे कितनी धरती बची। आपको आश्चर्य होगा ये जानकर कि अर्थ आवर की अधिकृत वेबसाइट पर भी सबसे प्रमुखता से यही जानकारी फ्लैश हो रही थी कि 4000 से ज्यादा शहर और 120 देशों ने अर्थ आवर अभियान में हिस्सा लिया। कहीं ये जानकारी नहीं दिख रही है कि आखिर इस अभियान से कितनी बिजली बची, कितनी धरती बची।

वेबसाइट पर दुनिया के मशहूर स्थलों शहरों की, रोशनी में और रोशनी बुझाने के एक घंटे दौरान की तस्वीरें गजब चमक रही हैं। खुद इंडिया गेट पर एक घंटे की बत्ती बुझाने के प्रायोजित कार्यक्रम से पहले शानदार रंगारंग समारोह हुआ। अब ये कौन बताएगा कि दुनिया को बचाने की इस मुहिम को प्रचारित करने में धरती को कितने जख्म मिले हैं। और, ज्यादा आंकड़े लिखने का कोई मतलब नहीं है बस इतना बता दे रहा हूं कि पिछली बार इस दिखावटी बिजली बचाओ अभियान में दिल्ली में करीब 700 मेगावॉट बिजली बची थी। इस बार ये घटकर 250 मेगावॉट रह गई।

साफ है धरती को बचाना है तो, रोज की आदतें सुधारनी होंगी। एक घंटे की बिजली बुझाना भारत जैसे देश में तो वैसे भी किस काम का जहां, वैसे ही बिजली करीब 25 प्रतिशत तक कम है। अभी भी हजारों गांवों को बिजली की रोशनी देखने को नहीं मिली है। ऐसे में घंटों बिजली कटौती की मार झेलने वाले लोग एक घंटे के दिखावटी बिजली बचाओ अभियान में शामिल भला क्यों होने लगें। ये विकसित दुनिया का चोंचला है जिसमें सारी दुनिया फंसी है। अर्थ आवर धरती के साथ घटिया मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है लेकिन, भेड़ियाधसान के युग में कुछ हटके कहे-सोचे कौन।


Friday, March 26, 2010

एनसीपी में जा रहे हैं अमर सिंह?

ये सवाल फिर से खड़ा हो रहा है। हालांकि, इसकी कहीं भी चर्चा नहीं हो रही है। मीडिया में चर्चा सिर्फ इस बात की हो रही है कि अमिताभ बच्चन का अपमान कांग्रेस क्यों कर रही है। लेकिन, इस बात की तरफ शायद जानबूझकर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि अचानक अमिताभ बच्चन को कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में एक ऐसे सीलिंक के उद्घाटन में बुलाने की वजह क्या हो सकती है जिसका शुरुआती उद्घाटन खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया हो।

अब भले ही सी लिंक का उद्घाटन सोनिया ने कर दिया था और अब बची चार लेनों का लोकार्पण होना था। लेकिन, सच्चाई तो यही हुई कि सी लिंक की 8 लेनों में से 4 का लोकार्पण सोनिया ने किया और कांग्रेस सरकार, संगठन के न चाहते हुए भी मीडिया में जिस तरह से अमिताभ छाए हैं। बची 4 लेनों का लोकार्पण अमिताभ के हाथों ही याद किया जाएगा। अब अचानक एनसीपी को अमिताभ को सोनिया गांधी के बराबर खड़ा करने की तो नहीं सूझी होगी।

और, अगर आप ध्यान से देखें तो, अमिताभ के सीलिंक उद्घाटन समारोह में आने से सबसे ज्यादा तिलमिलाए दिख रहे हैं मुंबई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह। कृपाशंकर सिंह उत्तर भारतीय हैं, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से आते हैं। कांग्रेस में उत्तर प्रदेश के एकमात्र मजबूत नेता हैं, ठाकुर हैं। अमर सिंह भी ठाकुर हैं, उत्तर प्रदेश से आते हैं। समाजवादी पार्टी से ठिकाना छूटने के बाद कहीं ठिकाना तलाश रहे हैं। क्षत्रिय सम्मेलन और कुछ सितारों के ग्लैमर के जरिए खुद को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं।

वैसे, जब अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दिया था तभी इस बात की चर्चा जोर-शोर से उठी थी। लेकिन, अमर सिंह और एनसीपी शायद आपसी तालमेल के लिए तैयार नहीं हो पाए थे। इस बीच कांग्रेस ने महंगाई के लिए सीधे तौर पर पवार को जिम्मेदार ठहराया है। पवार को कांग्रेस एकदम से निपटाने की हर कोशिश में लगी है। पवार कभी बाल ठाकरे से मिलकर तो, कभी पूरी सरकार को महंगाई के लिए दोषी ठहराकर कांग्रेस को लगातार परेशान करते ही रहते हैं। लेकिन, उनको एक चेहरा चाहिए जो, महाराष्ट्र से बाहर भी कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर सके। और, इस बात से किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए कि अमर सिंह एक ऐसा चेहरा है जिसे एनसीपी अपने लिहाज से और अमर सिंह एनसीपी को अपने लिहाज से इस्तेमाल करने के लिए बेहद मुफीद दिखते हैं।

ये अमर सिंह का ही प्रताप था कि समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र में 4 विधायक जिता ले गई। भले ही उसकी अगुवाई अबू आजमी जैसे आरोपी के हाथ में हो। लेकिन, उत्तर भारतीय और मुसलमान वोटबैंक को अपील करने की एक शानदार कला अमर सिंह के पास है जो, एनसीपी के लिए फायदे की हो सकती है। इसमें भी कोई बहस नहीं है कि अमिताभ अब राजनीति में खुद आएं तो, ये दैवीय चमत्कार से कम नहीं होगा। वो, पत्नी जया बच्चन और छोटे भाई अमर सिंह के जरिए ही राजनीति से जुड़े रहेंगे। और, अमिताभ भले राजनीति से दूर रहें इतनी राजनीति तो, उन्हें पहले से आती है और अमर सिंह की संगत ने इस तरह की सोच को इतनी धार तो दे ही दी थी कि उन्हें अच्छे से अंदाजा होगा कि कांग्रेस सरकार के राज में इतने बड़े आयोजन में विशेष अतिथि बनने के बाद क्या होगा। अमिताभ की ही भाषा में रंक, राजा का बराबरी की कोशिश कर रहा है।

इस कोशिश के पीछे राजनीतिक वनवास झेल रहे छोटे भाई अमर सिंह को फिर से राजनीति में अहम रोल दिलाने की कोशिश हो सकती है। बेवजह नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अछूत होने का राग अलापा जा रहा है। असली निशाना कहीं और है। क्योंकि, अमर सिंह जैसे तिकड़मी व्यक्ति की बीजेपी जैसी किसी राष्ट्रीय पार्टी में शायद ही कभी अहमियत बन सके। ऐसे में महाराष्ट्र की एनसीपी को देश के महा प्रदेश उत्तर प्रदेश में थोड़ी बहुत राजनीतिक उर्वर जमीन और महाराष्ट्र में सितारों की बड़ी लाइन को शायद बेहतर राजनीतिक सौदा लगे। अमर सिंह के लिए इससे भला क्या होगा कि फिर से वो टीवी पर दिखने लगेंगे। सस्ती शेरो शायरी का दौर फिर शुरू होगा। अपने कॉरपोरेट क्लाइंट्स को फिर से ताकत का अहसास दिला सकेंगे और अमर सिंह मार्का राजनीति को बीते दिनों की बात मान चुके लोगों को फिर से इसे झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। और, तो ये राजनीतिक रंग हैं गिरगिट भी इन्हें देखकर अब रंग बदलने में शर्माते हैं।

Thursday, March 25, 2010

रामनवमी के बहाने

रामनवमी के दिन हमारे पूरे सेक्टर में इसी तरह से छोटी बच्चियों का हुजूम घूमता दिख रहा था। ये हमारे सेक्टर की लड़कियां नहीं थीं। ये नोएडा के अतसंपन्न सेक्टरों के अगल-अगल बसे गांवों के परिवारों की बच्चियां थीं। जिन्हें अभाव की आदत होती है। ये बच्चियां हर घर की घंटी बजाकर पूछ रही थीं कि क्या कन्या खिलाना है।

दरअसल वैसे तो, देश के ज्यादातर हिस्सों में पुण्य की तलाश में 9 दिन व्रत रहने वाले कन्याओं को खिलाते हैं। इलाहाबाद में तो, मोहल्ले के लोग एक दूसरे के घर में कन्याओं को भोजन के लिए भेज देते थे। लेकिन, नोएडा के इन सेक्टरों में रहने वालों की मुश्किल ये है कि ये अपने घर की बच्चियों को किसी के यहां खाना खाने नहीं भेजना चाहते। बस बुरा लगता है और क्या। लेकिन, कन्या भोजन कराकर पुण्य भी कमाना है तो, इनकी इस दुविधा को खत्म करती हैं ये कम कमाई वाले परिवारों की बच्चियां।

अच्छा है कि इसी बहाने इन बच्चियों को रामनवमी के दिन बढ़िया पकवान के साथ कुछ दक्षिणा भी मिल जाती है। अब ये पता करने की बात है कि क्या कन्याओं को देवी समझकर ये संभ्रांत परिवार के लोग इन गरीब बस्ती की कन्याओं का पैर भी छूते हैं या नहीं।


Wednesday, March 24, 2010

मुलायम ने हराया डिंपल यादव को!

 अब तो ये सबको पता चल चुका है कि मुलायम सिंह यादव नहीं चाहते थे कि उनके घर की बहू डिंपल यादव संसद में चुनकर पहुंचे। दरअसल मुलायम को डर ये था कि संसद में डिंपल के पहुंचने पर लड़के डिंपल को देखकर सीटी बजाएंगे और भला ये नेता जी को कैसे बर्दाश्त होता। बेवजहै बेचारे अमर सिंह इस इल्जाम के ही भार से दबकर बरसों की समाजवादी निष्ठा छोड़कर अब क्षत्रिय सम्मान जगाने में जुट गए हैं।

आज मुलायम सिंह ने महिला आरक्षण के विरोध में वो सारी हदें लांघ दीं जो, उनके और लालू यादव के सांसद राज्यसभा और ये दोनों यादव नेता संसद के बाहर अब तक नहीं लांघ पाए थे। मुलायम सिंह यादव ने भरी सभा में कहाकि --- वर्तमान विधेयक में कैसी महिलाएं आएंगी। मैं आप सबके सामने कहना नहीं चाहता। इसमें बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बड़े-बड़े अफसरों के घरों की लड़कियां आएंगी। और, उन्हें देखकर (महिला सांसदों को) लड़के सीटी बजाएंगे। उन्होंने इस बयान पर फिर से मुहर लगाते हुए कहाकि हां ऐसी ही लड़कियां चुनकर आएंगी। उसके बाद उन्होंने गांव-गांव में बड़े आक्रमण की तैयारी भी करने को अपने समाजवादी कार्यकर्ताओं को कह दिया।

अब इस पर अगर कहीं से कोई डिंपल यादव की भा राय ले आता तो, सचमुच पता चल जाता कि नेताजी की राय की उनके घर में ही क्या हैसियत है। खैर, नेताजी तो इस पर बयान देने के लिए टीवी चैनल वालों को तुरंत मिले नहीं। मिल गए मुलायम सिंह के नए ठाकुर सिपहसालार मोहन सिंह। लेकिन, ये क्या कुतर्क में तो मोहन सिंह, अमर सिंह को भी पीछे छोड़ने की कसम खाकर बैठे दिख रहे हैं। पहले तो मोहन सिंह ने कहाकि नेताजी ने ऐसा नहीं कहाकि महिला सांसदों को देखकर लड़के सीटी बजाएंगे। एंकर के ये कहने पर कि उन्होंने कहाकि बड़े अफसरों, बड़े उद्योगपतियों के घरों की लड़कियां महिला आरक्षण से आएंगी और उन्हें देखकर लड़के सीटी बजाएंगे।

मोहन सिंह ने भी कहाकि जब संभ्रांत घरों की महिलाएं, लड़कियां आएंगी तो, यही होगा। मुझे तो लगाकि मोहन सिंह को ये क्या हो गया है। लेकिन, फिर समझ में आया कि भइया यही मुलायम का समाजवाद है जिसमें महिलाओं को सीटी बजाने से ज्यादा के लायक समझा ही नहीं गया है। इसीलिए उन्होंने शायद बड़े नेताजी की बहू डिंपल यादव को चुनाव हरवा दिया होगा। वैसे एक महिला ने मुलायम सिंह यादव की पूरी राजनीति की सीटी बजा रखी है। और, ये महिला किसी बड़े अफसर या बड़े उद्योगपति यहां तक कि बड़े नेता के घर की भी नहीं है। नेताजी इसी सीटी बजने से डर रहे हैं।

Wednesday, March 17, 2010

मैं महिला आरक्षण का विरोधी क्यों हूं?


आखिरकार जैसी आशंका सबको थी वही हुआ और एक बार फिर मुश्किल बाधा दौड़ पार करने के बाद आम सहमति के नाम पर कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल की आसान बाधा दौड़ पूरी करने से इनकार कर दिया। ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि ये तो होना ही था। लेकिन, क्यों। इसका जवाब ज्यादातर लोग यही देंगे कि कांग्रेस यही चाहती थी। लेकिन, क्या कांग्रेस और देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी भी यही चाहती थीं। जवाब कड़े तौर पर ना में हैं। वैसे तो, ज्यादातर टीवी चैनलों और अखबारों ने बिल के राज्यसभा में पास होने को सोनिया गांधी का निजी संकल्प बताया ही लेकिन, मुझे एक सांसद ने जब ये बताया कि प्रणव बाबू तो, बिल के खिलाफ थे। उन्होंने कहाकि सरकार चली जाएगी, बावजूद इसके सोनिया ने कहा- सरकार जाती है तो, जाए- बिल पास कराइए। फिर कौन क्या कहता और बिल राज्यसभा में पास हो गया। फिर बिल में अड़ंगा क्यों लग रहा है। सरकार को इस मसले पर बीजेपी, लेफ्ट का पूरा समर्थन है। लेकिन, दरअसल इसी में महिला आरक्षण के अंटकने की असली वजह छिपी है।

कांग्रेस और बीजेपी भले ही व्हिप जारी करके अपने सांसदों को महिला आरक्षण पर वोट डालने के लिए राजी कर लें, सच्चाई ये है कि कांग्रेस-बीजेपी दोनों के बहुतायत सांसद महिला आरक्षण के विरोधी हैं। इसीलिए लालू प्रसाद यादव के ये कहने पर कि 90 प्रतिशत कांग्रेसी सांसद कह रहे हैं कि महिला आरक्षण डेथ वारंट है, इससे बचा लीजिए तो, भी कांग्रेस की ओर से इसका कोई कड़ा प्रतिकार नहीं आय़ा। ये तो हुई महिला आरक्षण के अंटकने की बात लेकिन, क्या महिला आरक्षण मिल जाए तो, लोकतंत्र सुधर जाएगा। संसद की 33 प्रतिशत सीटों के जरिए उनको उनका हक मिल जाएगा। जवाब ईमानदारी से खोजेंगे तो, साफ पता चलेगा कि जवाब ना में है।

महिला आरक्षण कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए उबले आलू की तरह है जो, न तो उगलते बन रहा है न निगलते। लेकिन, ये राष्ट्रीय पार्टियां हैं और इनके बड़े नेताओं को भरोसा है कि किसी न किसी सीट से वो तो, जीतकर संसद में पहुंच जाएंगे। डरे छोटे नेता जो, टिकट के लिए संघर्ष करते और अपनी जमीन बताने निपट जाते हैं उन्हें ये आरक्षण अपनी गर्दन पर रखी छुरी की तरह लग रहा है। और, सच्चाई भी यही है कि ये आरक्षण देश में लोकतंत्र का इतिहास बदलेगा लेकिन, साथ में लोकतंत्र का मखौल बनाने का जरिया भी बन जाएगा।

अब सोचिए जरा महिला आरक्षण मतलब 100 में से 33 सीटों पर सिर्फ महिलाएं लड़ेंगी, पुरुषों को लड़ने का हक ही नहीं होगा। यानी प्रतिस्पर्द्धा से नेतृत्व निखरने की लोकतंत्र की पहली शर्त पर ही महिला आरक्षण चोट करेगा। जाहिर है महिलाओं के लिए आरक्षित लोकसभा सीट पर कोई पुरुष नेता नहीं बनना चाहेगा और वो, क्षेत्र के लिए चिंता बिल्कुल ही छोड़ देगा। और, चूंकि ये आरक्षण रोटेशनल आधार पर यानी एक बार ये लोकसभा तो, दूसरी बार बगल वाली लोकसभा को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा। तो, जाहिर है जाने-अनजाने इन क्षेत्रों से स्वाभाविक नेतृत्व ही खत्म होता जाएगा। इस आरक्षण का फायदा उन सामंती परिवारों को आसानी से मिल जाएगा जो, राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-अपराधिक तौर पर पहले से बेहद बलशाली भूमिका में हैं। होगा ये कि अपराधियों को खत्म करने की संभावना दिखाने वाला ये महिला आरक्षण, महिलाओं की आड़ में अपराध रक्षण का बड़ा हथियार बन जाएगा। ये दलिता, पिछड़े आरक्षण की तरह नहीं है। जरा सोचकर बताइए ना किस बाहुबली सवर्ण या फिर बाहुबली दलित-पिछड़े के घर की महिलाओं को उनका अधिकार न देने की ताकत सामान्य लोगों में होती है। किसी राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली परिवार चाहे वो, जिस जाति का हो, उस परिवार की महिलाओं का हक भला कौन मार रहा है या मार सकता है।

मुझे चक दे इंडिया फिल्म का वो, दृश्य याद आ रहा है जिसमें महिला हॉकी टीम कड़े मुकाबले में पुरुषों से हार जाती है लेकिन, ऐसा जज्बा उनके दिलो दिमाग में घर कर जाता है कि वो, वर्ल्ड कप हासिल करके लौटती हैं। मेरा तर्क ये है कि अगर महिलाओं को सही मायनों में पुरुषों के बराबर हक देने की बात हो रही है तो, महिलाओं के लिए अलग कोना खोजकर उन्हें कमजोर ही बनाए रखने की और देश में नेतृत्व खत्म करने वाला ये बिल क्यों लाया जा रहा है।

तर्क ये आता है कि महिलाओं को आरक्षण मिलेगा तो, कम से कम 33 प्रतिशत सीटों पर महिलाएं तो, आएंगी। और, इससे लोकसभा का माहौल सुधरेगा। ये आरक्षण के बूते संसद में पहुंची महिलाएं कैसे माहौल सुधार पाएंगी। वो, भी ज्यादातर ऐसी होंगी जो, बमुश्किल ही अपनी ही पार्टी में मौजूद नेता पति की आज्ञा की अवहेलना कर सकेंगी। और, अगर महिलाओं को आरक्षण दिए बिना उनका हक नहीं मिलेगा ऐसी सोच है तो, पुरुषों के साथ मैदान में ताल ठोंककर सबको चित करने वाली भारतीय राजनीति में सबसे ताकतवर (महिला या पुरुष) सोनिया गांधी जैसा नेतृत्व आरक्षण से पैदा होने की उम्मीद हम कैसे पाल पाएंगे। भले ही सोनिया के नाम के आगे गांधी लगा हो लेकिन, जिस तरह विदेशी मूल की बहती विरोधी बयार के बीच इस महिला ने खुद को साबित किया है वो, दिखाता है कि नेतृत्व चाहे महिला का हो या पुरुष का बिना प्रतियोगी माहौल के बेहतर नहीं हो सकता है।

लोकसभा में भाजपा नेता सुषमा स्वराज और कम्युनिस्ट पार्टी की पहली महिला पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात ही भला किस महिला आरक्षण से इतनी प्रतिभा जुटा पातीं। किस पुरुष राजनेता में इतनी ताकत है कि वो मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता को खारिज करने का साहस जुटा सके। महिलाएं लोकसभा-विधानसभा में चुनकर आएं समस्या इससे नहीं है। समस्या इससे है कि संसद-विधानसभा में पहुंचने का लॉलीपॉप देकर महिलाओं के लिए एक अलग कमजोर कोना तैयार कर दिया जाए। समस्या इससे है कि महिलाओं को उनका हक देने के परदे के पीछे हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमजोर साबित कर दिया जाए।

लालू-मुलायम के भले ही इसके विरोध में अपने दूसरे हित छिपे हों। लेकिन, मुलायम की ये बात ज्यादा दमदार लगती है कि पार्टियों को खुद से क्यों नहीं महिलाओं को टिकट देना चाहिए। चुनाव आयोग उनकी मान्यता समाप्त करने का डर भी उन्हें दिखा सकता है। टिकट के दंद फंद में महिलाएं न फंसें ये तो, फिर भी जायज माना जा सकता है चुनावी दौड़ में आधी आबादी पुरुषों को लड़ाई से ही बाहर कर दिया जाए ये तो, एक नई विसंगति पैदा करने की कोशिश है।

राजनीति में ही नहीं कॉरपोरेट और दूसरे क्षेत्रों में जिन महिलाओं ने बिना आरक्षण के अपना मुकाम बनाया है उनकी ताकत सब मानते हैं वरना तो, ज्यादातर बॉसेज की सेक्रेटरी का पद महिलाओं के लिए ही आरक्षित होता है। लेकिन, क्या वो महिला को उसका हक दिला पाता है। क्या वो, महिला सशक्तिकरण के दावे को मजबूत करता है। बिल्कुल नहीं। महिला सशक्तिकरण का दावा मजबूत होता है। पेप्सिको चेयरमैन इंदिरा नूई के कामों से, ICICI बैंक की CEO चंदा कोचर से, HSBC की नैना लाल किदवई से, पहली महिला IPS अधिकारी किरण बेदी को देखकर महिलाओं को मजबूती मिलती है। ये लिस्ट इतनी लंबी है कि किसी के लिए उसे एक जगह संजोना मुश्किल है।

इसलिए भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण के लिए जरिए सामंती परंपरा को और मजबूत करने की कोशिश का विरोध होना चाहिए। भारतीय नेतृत्व को कमजोर करने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। महिलाओं को पुरुषों की प्रतियोगिता से बचाकर उन्हें पुराने जमाने में ठेलने की इस कोशिश का विरोध होना चाहिए। राजनीति में महिलाओं को उनका हक देना ही है तो, कांग्रेस-बीजेपी अगले किसी भी चुनाव में 33 प्रतिशत क्या पचास प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर महिला सशक्तिकरण पर अपना भरोसा दिखा सकती हैं। किसी अपराधी, बाहुबली, धनपशु के खिलाफ किसी भी महिला को शायद ज्यादा लोगों का समर्थन मिल जाएगा। सोचिए क्या महिला आरक्षण देश में एक अजीब विसंगति की जमीन नहीं तैयार कर रहा है। इसलिए महिलाओं के हक के लिए महिला आरक्षण का विरोध कीजिए। क्योंकि, सच्चाई यही है कि अगर महिलाओं की सीट आरक्षित हुई तो, ये प्रभावशाली लोगों (राजनैतिक-आर्थिक-अपराधिक) के पूरे परिवार को आसानी से संसद और विधानसभा में पहुंचने में मदद करेगा।

Tuesday, March 16, 2010

हरामखोर, कमीने सिर्फ एक गर्लफ्रेंड, ब्वॉयफ्रेंड के साथ जिंदगी ... नामुमकिन है

किसी भी समाज की पहचान वहां के साहित्य और आसपास के माध्यमों की रंगत देखकर पहचाना जा सकता है। अकसर हम इस बात की चर्चा तो करते रहते हैं कि देश में हर क्षेत्र में गिरावट आ रही है। क्या नेता, क्या पत्रकार, क्या न्यायपालिका, क्या प्रशासन, व्यापारी और क्या .. कोई भी, सबका स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। अब सवाल ये है कि जिसे हम समाज की गिरावट मानकर चल रहे हैं कि उसे क्या सचमुच समाज गिरावट मान रहा है या ये पुराने-नए का ऐसा फर्क हो गया है कि नए के जीने के तरीके को पुराने लोग समाज की गिरावट मानकर खारिज कर रहे हों। पता नहीं हम तो पीढ़ी के लिहाज से न तो अतिआधुनिक में हैं न पुरातनपंथी। तो, सबसे ज्यादा भ्रमित भारत हम जैसे लोग ही हैं।

UTV Bindass चैनल पर एक शो आजकल आ रहा है इमोशनल अत्याचार। ये फिल्म DEV D के गाने कैसा तेरा जलवा ... कैसा तेरा प्यार .. तेरा इमोशनल अत्याचार। फिल्म में अभिनेता के इमोशनल अत्याचार में ढेर सारी लड़कियों के साथ संबंध थे तो, बिंदास के शो में लड़की या लड़का अपने प्रेमी की परीक्षा लेता है जिसमें अकसर लड़की का प्रेमी चैनल की हीरोइन के चक्कर में फंस ही जाता है। ये एक नमूना है। इसी चैनल की नई प्रोमो लाइन में एक लड़की कहती है कि बिंदास हूं इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं सबके साथ सोने के लिए तैयार हूं। ऐसी ही लड़का कहता है कि मैं बिंदास हूं इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूं।

सबसे ज्यादा सुना जाने वाले रेडियो स्टेशन का दावा करने वाला RED FM  का स्लोगन है ये आप के जमाने का रेडियो स्टेशन है, बाप के जमाने का नहीं। आप के जमाने का रेडियो स्टेशन साबित करने के लिए गाने के बीच-बीच में रेडियो जॉकी सवाल पूछता रहता है कि क्या आपको लगता है कि रियलिटी शोज हमारी संस्कृति भ्रष्ट कर रहे हैं या फिर क्या आपको बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वकील बनना है तो, काइंडली कट लीजिए क्योंकि, ये आज के जमाने का रेडियो स्टेशन है बाप के जमाने का नहीं। वैसे तो, ये सुनते वक्त बस बिंदास रेडियो जॉकी की चुहलबाजी या रेडियो स्टेशन की मस्ती भर लगती है लेकिन, थोड़ा ध्यान से सुनें तो, समझ में आता है कि ये सचमुच कैसे हंसते-गाते हमारी संस्कृति का बैंड बजा देते हैं।

RED FM पर गाने सुनते हुए मैं वैलेंटाइन डे के आसपास सफर कर रहा था। रास्ते में एक रेडियो डॉकी का नाम सुना तो, दंग रह गया। उसने चहकते हुए बताया मैं हूं हरामखोर अविनाश। वो, पूरे कार्यक्रम के दौरान लड़के-लड़कियों से अपनी हरामखोरी साबित करने को कह रहा था। और, हरामखोरी मैसेज करने के लिए नंबर भी बता रहा था साथ ही ये प्रलोभन भी कि अगर हरामखोरी जंची तो, वैलेंटइन डे पर वो, बेहतरीन हरामखोरी भेजने वाले लड़के या लड़की को स्टूडियो बुलाएगा। वैलेंटाइन डे के शो का नाम भी था लगी लव की। लव की लगती भी है ये पहली बार सुना।

विज्ञापन भी कुछ इसी तरह से बदलते जमाने के लड़के-लड़कियां तैयार कर रहे हैं। सुरीले जिंगल और प्रति सेकेंड प्लान के साथ मोबाइल बाजार में उतरा टाटा डोकोमो का विज्ञापन में एक लड़का-लड़की साथ बैठे हैं। लड़के की नजर एक दूसरी लड़की पर पड़ती है और वो, लड़की को बातों में फंसाकर दूसरी लड़की के साथ जरा मस्ती के चक्कर में उठता है जाते समय देखता है कि उसकी गर्लफ्रेंड ने दूसरा ब्वॉयफ्रेंड पकड़ लिया। थोड़ा सा वो, हतप्रभ दिखता है फिर मुस्कुराता है और नई गर्लफ्रेंड के साथ चल देता है। पीछे से टाटा डोकोमो का संदेश सुनाई देता है when everyday there is new plan then why take fix mobile plan. Tata docomo daily plan. ये नए जमाने का दर्शन हम जैसे लोगों को डरा रहा है। शायद हम पुरातनपंथी हो रहे हैं क्या पता नहीं। 

Friday, March 12, 2010

बीजेपी ने अरसे बाद सही राह पकड़ी है



इंदौर के राष्ट्रीय अधिवेशन से लौटने के बाद उत्तर प्रदेश के एक युवा बीजेपी नेता ने मुझसे कहाकि गडकरी जी अलग तो हैं। पार्टी सही रास्ते पर जाएगी। उस युवा नेता की आंखों की चमक नए अध्यक्ष नितिन गडकरी में भरोसा साफ दिखा रही थी। इसकी वजहें भी साफ हैं। गडकरी शायद पहले बीजेपी अध्यक्ष होंगे जिन्होंने राष्ट्रीय अधिवेशन में अपनी पत्नी को भी मंच पर जगह दी। राजनीतिक मंच पर पत्नी को बैठाना प्रतीकों की राजनीति है। और, नागपुर के इशारे पर अध्यक्ष बने गडकरी प्रतीकों की ये राजनीति अच्छे से समझते हैं। उन्हें साफ दिखता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दलितों के बीच काम करना शायद ही कभी सुर्खियां बन पाता हो लेकिन, जब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के एक दलित के यहां रात रुके तो, वो सबसे बड़ी खबर बन गया। इसीलिए अधिवेशन से पहले गडकरी खुद एक दलित के यहां पूरी मंडली लेकर भोजन करने पहुंच गए। गडकरी पैर न छूने की बात कहते हैं, फूल लाने के बजाए उस पैसे को विदर्भ की विधवा महिलाओं के भले के लिए बॉक्स में डालने को कहते हैं। प्रतीकों की राजनीति का इस देश में बहुत महत्व है। एकदम से हिंदुत्व से नाता तोड़ने का नुकसान लोकसभा चुनावों में भाजपा को दिख चुका है। इसीलिए गडकरी बीच के रास्ते की बात कर रहे हैं कि मंदिर वहीं बनेगा लेकिन, मुसलमान भाई अगर मंदिर बनाने पर सहमति बनाएं तो, बीजेपी मस्जिद बनाने में मदद करेगी। ये प्रतीकों की राजनीति है। भले ही इससे कट्टर हिंदुत्व की राह वाले भाजपाई नाराज हों और मुसलमानों का एक भी वोट बीजेपी के खाते में न जुड़े लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी का एक जो, व्यवहार होना चाहिए उसे गडकरी समझ रहे हैं। ये और भी महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि, वो पूरी तरह से संघ की ओर से नामित अध्यक्ष माने जा रहे हों।

लेकिन, असल राजनीति जमीन पर होनी है। और, बड़े अरसे बाद जमीन पर भाजपा अपने असली विपक्षी तेवर में लौटती दिखी है जिसके लिए वो जानी जाती रही है। और, ये विपक्षी तेवर अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की अगुवाई के बगैर है। उत्तर प्रदेश में नंबर एक से नंबर तीन पर पहुंच चुकी भाजपा का महंगाई पर प्रदर्शन अरसे बाद दमदार दिखा। साफ दिखा कि भाजपाई कैडर जिंदा है बस उसका भाजपाई नेताओं से भरोसा चुक गया था। यही वजह थी कि लगातार पांच साल तक विपक्ष में रहने के बावजूद बीजेपी किसी बड़े आंदोलन के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रही थी। यहां तक कि बीजेपी के सबसे बड़े नेता और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद पूरे देश में घूमकर कार्यकर्ताओं से हार की वजह जानने का एलान तो कर दिया लेकिन, वो योजना इसी डर से आडवाणी ने ठंडे बस्ते में डाल दी कि कहीं कार्यकर्ताओं ने इसे नकार दिया तो, बुढ़ापे में रही-सही इज्जत भी चली जाएगी।

होली जैसे मस्त त्यौहार पर भी बीजेपी की महंगाई के विरोध में बंद की रणनीति कारगर रही। होली के साथ महंगाई और बीजेपी की अच्छी चर्चा रही। साल भर से महंगाई पर विपक्ष की अप्रभावी मौजूदगी में मीडिया खुद से ही महंगाई के विरोध में आंदोलन सा चला रहा था। अब विपक्ष की अपनी भूमिका समझकर बीजेपी ने ये मोर्चा थाम लिया है। ये मोर्चा ऐसा थमा कि अरसे बाद संसद के बाहर सुषमा स्वराज के साथ यादव तिकड़ी शरद-मुलायम-लालू और लेफ्ट तक सरकार के खिलाफ एक सुर में हुंकार भरते दिखे। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने का आंकड़ा बीजेपी अपने कामों से अब पुख्ता कर रही थी। बीजेपी ने सरकार के खिलाफ ऐसी घेरेबंदी कर दी कि भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ जब बजट भाषण के दौरान पूरा विपक्ष वॉकआउट कर गया।

एक और बड़ा मौका रहा महिला आरक्षण बिल के राज्यसभा में पास होने का। बीजेपी ने अपनी सधी रणनीति से इस बिल को पास कराने का श्रेय कांग्रेस से थोड़ा बहुत झटक ही लिया। कम से कम भातीय जनता पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले वोट बैंक को इतनी उम्मीद तो जरूर हुई होगी कि पुरानी बीजेपी के दिन फिर से लौट सकते हैं। जब पहले दिन राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी के सांसदों के बेलगाम विरोध की वजह से बिल पास नहीं हो सका तो, टेलीविजन स्क्रीन पर भारतीय जनता महिला मोर्चा का बिल के पक्ष में संसद के बाहर की आवाज मजबूत संदेश दे रही थी। इतने महत्वपूर्ण महिला आरक्षण बिल का चर्चा के साथ पास होना भारतीय जनता पार्टी की उपलब्धि के तौर पर माना जा सकता है।

लेकिन, बजट सत्र के बाद क्या। ये भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ा सवाल होगा। क्योंकि, टेलीविजन स्क्रीन और अखबारी सुर्खियों के लिए संसद और सड़क का विकल्प अब कम होगा। रोज-रोज महंगाई पर प्रदर्शन तो किया नहीं जा सकेगा। अब सवाल ये होगा कि भारतीय जनता पार्टी अपने बचे कार्यकर्ताओं के बीच कैसे पहुंच रही है और खोए कार्यकर्ताओं को वापस लौटाने का क्या इंतजाम कर रही है। गडकरी का हर साल 10 प्रतिशत नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने का एलान सुनने में तो शानदार है लेकिन, इसकी परिणति का कोई फॉर्मूला अब तक नहीं दिख रहा है।

अगर कोई फॉर्मूला तैयार भी होता है तो, उसे जमीन पर उतारने के लिए चाहिए होगी एक ऐसी टीम जो, कार्यकर्ताओं को उस जमाने की याद दिला सके कि बीजेपी के पास दूसरी पांत नेताओं की लंबी कतार है जो, सड़क से संसद तक उनकी अगुवाई कर सकते हैं। इसलिए गडकरी को सबसे बड़ी चुनौती यानी अपनी कार्यकारिणी का एलान जल्द करना होगा और इस बात का खास ख्याल रखना होगा कि उसमें संतुलन बरकरार रहे। संजय जोशी को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की जिद से गडकरी को बचना चाहिए। संघ से संगठन महामंत्री पद के लिए दूसरे योग्य व्यक्ति की मांग की जा सकती है जिसे बीजेपी की राजनीति की भी अच्छी समझ हो। राजनीतिक तौर पर भी महाराष्ट्र से ही राष्ट्रीय अध्यक्ष और संगठन महामंत्री बहुत समझदारी भरा फैसला नहीं होगा।

कार्यकारिणी का गठन करते समय एक और बात का खास ख्याल रखना होगा कि पार्टी में अपील वाले नेता बड़े कम रह गए दिखते हैं। इस कमी को भरने के इंतजाम करने होंगे। कुछ नई खोज करनी होगी। जिनकी किसी जगह अपनी जमीन हो। दिल्ली कार्यालय में बैठकर राजनीति करने वाले एकाध लोगों को कार्यकारिणी में जगह देना काफी होगा। वेंकैया नायडू जैसे आधारविहीन नेता- जिनकी अपनी प्रदेश में कोई हैसियत नहीं है लेकिन, दिल्ली कार्यालय के जरिए जिनका प्रभाव बना रहता है- को कार्यकारिणी में वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाकर अध्यक्ष के समांतर सत्ता चलाने की कोशिशों को गडकरी को रोकना होगा। अच्छा ये है कि D4 यानी दिल्ली दरबार के चार महारथियों में से सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को लोकसभा और राज्यसभा का नेता बना दिया गया है और गडकरी इसे संगठन में उनके दखल को कम करने के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं।

वरुण गांधी की अपील को भुनाने के लिए वरुण गांधी को भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। क्योंकि, उत्तर प्रदेश में जिम्मेदारी देने से पहले ही वरुण का विरोध वहां कई मोर्चों पर हो रहा है और वरुण की अपील राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के मुकाबले ज्यादा कारगर हो सकती है। वैसे, संघ शैली के गडकरी इस बार कार्यकारिणी के एलान के साथ एक नई परंपरा की शुरुआत प्रयोग के तौर पर कर सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की मुख्य कार्यकारिणी के पदाधिकारी हों या फिर युवा मोर्चा, महिला मोर्चा और दूसरे प्रकोष्ठ हों, सभी पदाधिकारियों को कम से कम एक केंद्र को मजबूत करने की जिम्मेदारी तय हो, उसके बाद भले वो राष्ट्रीय महासचिव या दूसरे पदाधिकारी के तौर पर देश में बीजेपी को मजबूत बनाने का जिम्मा ले लें। जाहिर है जो, नेता एक केंद्र (शहर या जिला) मजबूत नहीं कर सकता तो, वो मीडिया में भले मजबूत पदाधिकारी बन जाए, असल में कितना बड़ा नेता होगा और बीजेपी को कितना आगे ले जाएगा ये पहले के दिल्ली-मीडिया के जरिए राजनीति करने वाले पदाधिकारियों की करनी से दिख चुका है। खुद गडकरी चाहें तो, इसकी शुरुआत संघ मुख्यालय वाले शहर नागपुर का जिम्मा लेकर कर सकते हैं। क्योंकि, संघ मुख्यालय वाले शहर से कांग्रेस का लगातार जीतना अकसर संघ की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।

गडकरी के पक्ष में अच्छी बात ये है कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद अचानक पार्टी सही रास्ते पर चलती दिखने लगी है भले ही ये सायास न हो। लेकिन, नौजवानों-महिलाओं की राजनीति में बढ़ती भागीदारी के समय में गडकरी को इस मोर्चे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। गडकरी संघ को इस बात के लिए तैयार कर सकते हैं कि विद्यार्थी परिषद पूरे देश में छात्रसंघ की बहाली के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन की भूमिका तैयार करे। छोटे-छोटे डिग्री कॉलेजों से लेकर विश्वविद्यालयों तक छात्रसंघ प्रतिबंध झेल रहे छात्रों का बड़ा हुजूम परिषद के जरिए बीजेपी से जुड़ सकता है।


एक महत्वपूर्ण बात जो, शायद अति भोजन प्रेमी होने की वजह से गडकरी गैर जरूरी मानें और राजनीति में इसकी जरूरत एकदम से नकार दें वो, है नितिन गडकरी का लुक। ऐसे वक्त में जब गडकरी को जाने-अनजाने राहुल गांधी के साथ तुलना में उतरना पड़ रहा हो तो, जरूरी है कि गडकरी भी अपने आपको इतना तो दुरुस्त कर ही लें कि नौजवानों के साथ वो थोड़ा ही सही लेकिन, दौड़ते हुए चल सकें। इतने बड़े मिशन के लिए ये बड़ा त्याग नहीं होना चाहिए।

Thursday, March 11, 2010

देश की भगदड़ का जिम्मेदार कौन खोजेगा


अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के नोएडा ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल पहुंच गए। नोएडा की सड़कों पर घंटों के लिए जाम लग गया। अखबार-टीवी चैनलों पर आयोजकों की बदइंतजामी खबर बन गई। भला हुआ कि इस भगदड़ में कोई अनिष्ट नहीं हुआ। लेकिन, क्या सचमुच कहीं-कोई इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है कि इस देश की भगदड़ की असली वजह क्या है। क्यों, हर दूसरे-चौथे देश भगदड़ लेने लगता है और अगर भगदड़ में देश के कुछ लोगों की मौत हो गई तो, थोड़ी बहुत खबर बन जाती है नहीं तो, भगदड़ों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं होती। क्या भगदड़ इस देश की नियति बन गई है।

 अभी कुछ दिन ही हुए हैं जब एक और भगदड़ देश की सबसे बड़ी खबर बन गई थी। इस भगदड़ के देश की सबसे बड़ी खबर बनने के पीछे कई वजहें थीं। सबसे पहली कि ये एक स्वघोषित जगतगुरु कपालु महाराज के आश्रम में आयोजित भंडारे के दौरान हुई भगदड़ थी। दूसरी ये कि पहले के कई मंदिरों में मची भगदड़ों की तरह इस भगदड़ में भी कई निर्दोष जानें चली गईं थीं। तीसरी ये कि बाबाओं-साधुओं के इतने कुकर्म मौके से सामने आ रहे थे कि कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ टीआरपी खींचू और पाठक संख्या बढ़ाऊ खबर बन गई। उस पर आश्रम के एक व्यस्थापाक का ये कह देना कि इन 65 मौतों के लिए ईश्वर जिम्मेदार हैखबरों में और मसाला डाल गया। भगवान भरोसे चलते इस देश में एक बार फिर भगवान के मत्थे 65 मौतों का जिम्मा देकर मामला निपटा लिया गया। लेकिन, कौन था इन 65 मौतों का जिम्मेदारईश्वर या फिर ईश्वर के तथाकथित प्रतिनिधि कृपालु महाराज।

ईश्वर तो बिल्कुल भी नहीं थे। कृपालु महाराज के यहां भंडारे में आए लोग मरे थे तो, उन पर जवाबदेही तय हो सकती है। लेकिन, क्या कृपालु महाराज जिम्मेदार थे। थोड़ा ध्यान से देखें तो, कैसे जिम्मेदार थे वो, तो कुछ भूखे-पेटों के भोजन का इंतजाम कर रहे थे साथ ही उन्हें कुछ रुपए और बरतन दे रहे थे। और, क्या ये भगदड़-मौत नहीं होती तो, वही कृपालु महाराज इतने परिवारों के लिए असली जगतगुरु नहीं प्रतिस्थापित हो जाते। तब तो, ये चर्चा टीवी-अखबारों में नहीं होती फिर भी, 25000 गरीबों के भगवान कृपालु ही बन जाते। और, अगले भंडारे में 50000 गरीब इस कृपालु भगवान के दरवाजे खड़े होते।

दरअसल इन भगदड़ मौतों के असली जिम्मेदार खोजकर उसके सही इलाज के बजाए सारी मशक्कत किसी कृपालु, किसी इंडियन आइडल के आयोजक को गुनहगार बताकर असली समस्या पर ध्यान न जाए इसकी कोशिश सफलता पूर्वक काम कर रही है। ये गुनहगार हैं तो, मुंबई पुलिस की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ में मारे-रौंदे गए लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। लगभग हर बार सेना की भर्ती में सेना के जवान बनने के बजाए सेना के जवानों की गोली खाने के लिए अभिशप्त बेरोजगारों की मौतों-भगदड़ों का जिम्मेदार कौन है।

असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी। अब ये तर्क आ सकता है कि इन सारी भगदड़ों-मौतों की जिम्मेदारी एक जगह जाकर कैसे तय हो सकती है। नोएडा, प्रतापगढ़ का कृपालु महाराज का आश्रम, मुंबई या फिर देश के दूसरे हिस्सों में सेना की भर्ती या फिर रोजगार का कोई दूसरा मेला। चलिए शुरुआत प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज के आश्रम से करते हैं। यहां भगदड़ की वजह ये बनी कि एक टाइम का खाना मुफ्त में खाने के लिए कुछ हजार लोग पंगत में बैठ चुके थे। और, बाहर उससे कई गुना लोग एक टाइम के भोजन और थाली-लोटा के साथ 20 रुपए मिलने की आस में खड़े थे। ज्यादा समय लगने लगा तो, भूख जोर मारने लगी और 20 रुपए, थाली-लोटा न मिल पाने का अनजाना डर उन पर हावी होने लगा और उन्होंने गेट तोड़ दिया। कुछ लोगों के ही ऊपर गेट गिरा लेकिन, उससे मची भगदड़ ने 65 जानें ले लीं। जाने कितने लोगों का सामान्य जीवन शुरू होने में महीनों लग जाएंगे।

दरअसल यही भूख और बेकारी असली वजह वजह है इस देश की भगदड़-मौतों की। ये भगदड़ उसी बीस रुपए की वजह से है जिस पर अभी भी देश की बड़ी आबादी का रोजाना गुजर-बसर हो रहा है। ये हमारी पैदा की हुई विसंगति की भगदड़ है जहां दुनिया की मंदी में भी हम इंडिया ग्रोथ स्टोरी के सिर्फ थोड़ा धीमा पड़ने की बात करते हैं लेकिन, उन लोगों की चिंता बस इतने से पूरी हो जाती है कि साल के 365 दिन में से कम से कम 100 दिन का रोजगार हम देने वाली योजना ले आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अलग-अलग राज्यों में 100 दिन के दावे का भी 18 से 60 प्रतिशत ही पूरा हो पा रहा है।

ये भगदड़ तरसते भारत के चमकते इंडिया के साथ की चाह में मची है। भूख-बेकारी के दौर में सेना या पुलिस की नौकरी के लिए लगी लाइन कोई देश सेवा की चाह में नहीं है। ये सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरने-जीवन स्तर बेहतर करने की चाह में लगी लाइन है। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसा समझदार अर्थशास्त्री कह रहा है कि हमने महंगाई बढ़ने दी, बेरोजगारी नहीं। पिछले साल भर में टेक्सटाइल, आईटी, रिटेल, रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग हर चमकते क्षेत्र से निकाले गए लोगों की बेरोजगारी की खबरों से ही टीवी-अखबार भरे रहते थे। इन सेक्टरों को जिंदा रखने के लिए रियायतों का पिटारा खोलने से उद्योगपतियों ने तो अपना मुनाफा बचा लिया लेकिन, जिनके पेट पर लात पड़ी उन्हें कहीं से मरहम नहीं मिला। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमने महंगाई भले बढ़ने दी लेकिन, बेरोजगारी पर काबू पाया।

ये देखने में भले लगता है कि इंडियन आइडल बनने की लाइन में खड़ा हर लड़का-लड़की ये चमक-दमक के लिए बनना चाहता है। सच्चाई ये होती है कि वो, जल्दी से पैसा कमाकर भारतीय से हटकर इंडियन बन जाना चाहता है। इस चक्कर में भगदड़ का शिकार भी बनता है। लेकिन, इस सिस्टम में जब तक भगदड़ों-मौतों के लिए किसी कृपालु महाराज, इंडियन आइडल के आयोजक या फिर सेना-पुलिस की भर्ती में पुख्ता इंतजाम न होने को बहाना बनाकर जिम्मेदारी थोपी जाती रहेगी। तब तक देश की भगदड़ मौतें रोकने का शायद ही कोई इंतजाम हो पाए। इसीलिए भगदड़ और भगदड़ में हुई मौतें इस देश की नियति बनती जा रही हैं। और, देश असली समस्या से ही भगदड़ लेता दिख रहा है।

(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

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