करगिल भारतीय इतिहास का ऐसा पड़ाव है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इस महान विजय दिवस को 10 साल पूरे हो गए और मीडिया ने जिस तरह से करगिल के शहीदों, जवानों पर खास कार्यक्रम पेश किए उससे निश्चित ही देश में देशप्रेम की भावना उफान मार रही होगी। मीडिया ने तो अपना काम बखूबी किया। लेकिन, मैंने कल और आज (26 और 27 जुलाई) के सारे अखबार देख डाले उसमें कहीं भी एक छोटा सा भी विज्ञापन सरकार की ओर से शहीदों की याद करने वाला नहीं दिखा।
अखबारों में आधे से ज्यादा पेज पर रविवार, सोमवार दोनों ही दिन करगिल के शहीदों की याद दिलाने वाली खबरें छपी थीं। टीवी चैनलों (हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही) पर तो शनिवार से ही करगिल के हर पहलू को याद दिलाने वाले खास शो चल रहे हैं। जिन्हें करगिल कम याद होगा। वो, भी उससे जुड़ गए होंगे। फिर क्या वजह है कि सरकार इसे याद करने से भी बच गई। हमें क्या सबको ही ये अच्छे से दिखता होगा कि कैसे गांधी परिवार में किसी की भी पुण्यतिथि हो तो, जाने कितने मंत्रालयों की तरफ से विज्ञापनों की कतार लगी होती है।
अरे छोटी सी उपलब्धि किसी मंत्रालय की होती है तो, एकाध पेज का विज्ञापन तो ऐसे ही चला जाता है। फिर देश को, देश के सम्मान को बचाने वाले इस दिन को सरकार कैसे भूल गई। क्या सिर्फ इसलिए कि ये महान विजय बीजेपी के शासनकाल में आई थी। क्या अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते जो कुछ भी देश के लिए हासिल किया वो, इतिहास में दर्ज नहीं होगा। क्या कांग्रेस ये तय करके बैठी है कि देश में आने वाली पीढ़ी को यही पता लगेगा कि आजादी से लेकर आज तक देश में जो कुछ हुआ है वो सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की सरकार ने किया है।
अगर ऐसा न होता तो, क्या वजह है कि करगिल विजय दिवस मनाने से सरकार डर रही है। अब तो चुनाव भी 5 साल बाद हैं। क्या वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय शुरू हुई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की रफ्तार बहुत कम कर दी गई है। ऐसा नहीं है कि यूपीए के समय सड़कें नहीं बन रही हैं। खूब बन रही हैं कि लेकिन, उस योजना की कामयाबी लोगों के जेहन से मिटाने की हर कोशिश ये सरकार कर रही है।
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ही देश के सभी किनारों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना की ही तरह नदियों को जोड़ने की योजना का भी प्रस्ताव लाया था। अब उस पर कोई चर्चा ही नहीं है जबकि, अगर ये काम हो जाए तो, देश के एक हिस्से की बाढ़ और दूसरे हिस्से के सूखे के असंतुलन को बहुत कम किया जा सकता है। ऐसे ही चुनाव के समय चिदंबरम और प्रधानमंत्री तक बता रहे थे कि देश के पैसे को काला धन बनाकर जितना भी पैसा विदेश ले जाया गया है उसे सरकार हर हाल में वापस ले आएगी। लेकिन, अब उस पर कुछ सुनाई इसलिए नहीं दे रहा कि बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ये मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। बताइए न मैं गलत कह रहा हूं क्या ...
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Monday, July 27, 2009
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